Vachan

January
01-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Happy New Year"

2015 में मेरे बच्चों ने पूर्णता का वचन निभाया । आज 2016 पहली तारीख मेरे बच्चे करेंगे 16 में सोला सिंगार । पहला सिंगार प्यार । दूसरा सिंगार परिवार से प्यार । तीसरा सिंगार देह अध्यास को छोड़ कर अपनी देह से प्यार, जो देह ब्रह्म स्वरूप है, जो देह आत्मरस में डूबी हुई है उसको भी छोड़ना नहीं है, उसके लिए भी सिंगार सोचना है ।
सच्चा सिंगार त्याग से, वैराग से, धीरज से, प्रेम से, गुरु भक्ति से, गुरु भावना से सच्चा सिंगार होता है । तू १६ सिंगार करके गुरु के वचनों को साथ लेकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा और आतम निश्चय करके आत्मा की सुंदरता को प्राप्त करेगा ।
Happy New Year 2016 आपको मुबारक, अच्छी अच्छी शुभकामनाएं आशीर्वाद आपके साथ है ।

।। है ही भगवान।।

01-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"1st January 2017 - मेरे बच्चों को आज भी नए साल की शुभकामनाएँ हैं, वधाई है"

आप खुश रहो, इस साल, शाद रहो, आबाद रहो। अब कोई खतरा नहीं है। चारों तरफ अच्छा ही अच्छा, खुशियाँ ही खुशियाँ, निश्चय ही निश्चय। हम आनंद-भवन (लोनावाला) में हैं और आप हमारे साथ हवन में हिस्सा ले रहे हो। स्वाह स्वाह स्वाह।

बच्चों कितनी भी उन्नति करो, सबसे पहले देह की भी संभाल करो। खाना, पीना, उठना, बैठना, तेरी दिनचर्या सही सलामत होनी चाहिए। परिवार की संभाल करो। परिवार में आपका अहम हिस्सा है। संसार के साथ चलना है, संसार को पीछे नहीं छोड़ना, संसार से मुख नहीं मोड़ना। हमें तो संसार के साथ-साथ है चलना, तभी यह यात्रा सुखद होगी। जैसे परिवार के साथ-साथ चलना है, वैसे मांँ प्रकृति के साथ चलना है, देव-देवताओं के साथ चलना है, ग्रहचारियों को भी समझना है। ग्रहचारी क्या होती है? सब ग्रह आपके सहयोगी बन जाएंगे, भगवान ने अपने वाणी में promise की है जब तू निश्चय में आएगा। बस निश्चय में तो आ गया, अब सारे ग्रहदेव भी आपके सहयोगी हैं, देवता भी आपके हैं। चारों तरफ पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण।

किसी में भेद-भ्रम न रखो, negative-positive न रखो। आपके भीतर अगर positive प्रेम है, positive energy है, positive सोच विचार है, positive कर्म हैं, तो आपसे negative कभी टकराएगी ही नहीं। टकराएगी भी तो वो positive बन जाएगी और तेरी ही शक्ति बन जाएगी। Why fear when ज़रे ज़रे, कण-कण वासी, घट-घट वासी is near ! प्रेमपूर्वक बनो और अपने निश्चय को आगे बढा़के सृष्टि सुंदर करने में लग जाओ। इस साल आपको समय बहुत मिलेगा। समय की भी मेहरबानी होगी। समय देव भी आपके ऊपर राज़ी होके समय देवता भी सृष्टि सुंदर करेंगे आपके संग। श्री शारदा शरणम के बच्चों के संग सब साथ हो जाएंगे और सृष्टि सुंदर करने में मददगार बन जाएंगे। यही शुभकामनाएँ हैं, यही आसीस है।

।। है ही भगवान ।।

02-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निर्विकारी जीवन"

निर्विकारी जीवन किसको कहते हैं ? क्या तू कुछ खाए-पीए ना तो निर्विकारी हुआ ? क्या तू अच्छा कुछ पहने ना तो निर्विकारी हुआ ? या तो बोले ना तो निर्विकारी हुआ ? पर हलंदे चलंदे, गुमंदे फिरंदे, नाम वसायऊं मन में। चलते-फिरते, गूमते-फिरते, खाते-पीते, भगवान भीतर साथ रहे। तेरा साथ कभी छूटे ना। तेरा हाथ जिसने पकड़ा वो कभी बेसहारा रहेगा नहीं। इसी प्रकार की अपनी वृत्ति को ठीक करो, वृत्ति को बनाओ और सुख पाओ। ऐसे सुख की तलाश कि जो सुख आए फिर न जाए, उस तलाश में अपनी खोज जो तेरी होती है, उसी में तेरा निर्विकारी जीवन आ जाता है।

विकार किसको कहते हैं ? जो सुख तुझे तकलीफ देता है, जो सुख तुझे विखेप देता है, वो विकार बन जाता है। पर सुख, कोई भी चीज़-पदार्थ तू जब limit में लेता है, किसी की बात में भी जाता है, तो deep नहीं जाता, तो विखेप कहांँ से आएगा ? कौनसी खिड़की खुलेगी जो विखेप तेरे भीतर जाएगा। Balance में चलने वालों की सारी खिड़कियाँ बंद होती है। धीरज, प्रेम, शांति, संतोष, ये खिड़कियाँ खुली रहती हैं। विखेप, तू-मा, दोस्ती-दुश्मनी की खिड़कियाँ बंद रहती हैं। इसीलिए जीवन सब कुछ करते हुए भी निर्विकारी जीवन हासिल होता है।

।। है ही भगवान ।।

03-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपना उद्धार"

अपना उद्धार कैसी स्थिति में है ? अपना तेरा उद्धार तेरे खुद में रहने में है, अंतर्मुखता में है। अंतर्मुखी सदा सुखी। अंदर चले जाओ। अंदर सतगुरांदा डेरा, ज्योत जगंदी। उस ज्योत दे लश्कारे कई सूरजों की रोशनी से बढ़कर है, जो तुझे हर अंधेरे से निकालके रोशनी में लाकर खड़ा करते हैं। देखी ज्योती निराकार की अपने भगवान के आँखों में। निराकार की ज्योती को पकड़ो, उस नूर को पकड़ो जो एक ही नूर है। उस स्थिति में आ जाओ जो तेरे लिए ज़रुरी है। इस जन्म में, इस जीवन में, अगर वो स्थिति आपकी न आई, तो ज्ञान सुनना, ज्ञान सुनाना, शेवाएं करना, घर-संसार में रहना, सब व्यर्थ जाता है, उद्धार नहीं होती। पर जे तू अपनी स्थिति को ठीक करके, एकाग्रता में रहे, तो चलते-फिरते, शेवा करते, कर्म करते दीपक जलता रहेगा, अंधियारा कभी आएगा नहीं और तू अपना उद्धार करके अपनी जीवन यात्रा को सफल बनाएगा।

परहेज़ ज़रुरी है। थोड़ी सी परहेज़ तेरी ज़िंदगी की रक्षा करती है। परहेज़ नहीं है, तो रक्षा कैसे होगी। परहेज़ ही है जो तुझे करनी है और अपनी वृत्ति को ठीक रखना है। हम लाए हैं ब्रह्मकार वृत्ति गुरुद्वार से, इस वृत्ति को रखना मेरे मनवा संभालके। हर वक्त ये line बोलो, realize करो और अपनी यात्रा सफल करो।

।। है ही भगवान ।।

04-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Comparison"

जब तू comparison में आता है, तो भी कई मुश्किलातों का तेरे को सामना करना पड़ता है। Comparison किया, छोटा देखा, बड़ा देखा, उचा देखा, सादा देखा, दिमाग चला, दिमाग थका - वसूली कुछ भी नहीं। इसीलिए सब में एक ही ब्रह्म देखो। बाकी सब तीन गुणों का खेल देखो कि सब लीला पेई हले। लीलाधारी पर दृष्टि रखो, लीला को चलने दो। जब तू परमात्मा की लीला हर दृश्य में देखता है, तो कहीं कोई तकलीफ आती नहीं। पर जे तू हर दृश्य में comparison करता है - इसका ऐसा, उसका ऐसा, तो कहीं ना कहीं मन-मुटाव, कहीं ना कहीं राग-द्वेष। और जब राग-द्वेष, मन-मुटाव बढ़ जाते हैं तो एक पौधा पनअपता है नफरत का। वो बड़ा होता जाता है। एक बारी पौधा आ गया, वृक्ष बन गया, तू काट नहीं सकता।

जहा नसीब सतगुरु मिले, तो वो नफरत का पौधा निकालके फेंक सकता है। पर जब तक तूने ज्ञान नहीं समझा, गुरु की बात न समझी, तो कहीं ना कहीं से नफरत आ ही जाती है, जो आपको तो तकलीफ देती है, लेकिन सारे संसार और समाज में भी बहुत सारी तकलीफ देती है। इसीलिए foundation सही करो। किसीके comparison में जाओ ही नहीं। सब सुठो, भाणो मिठो आ। तेरा भाणा मीठा लागे। झातूद्ध भावे साई भली का! परमात्मा को जो कर्म अच्छे नहीं लगते हैं वो न करो। उनको क्या अच्छा नहीं लगता हैं-छोटा-बड़ा देखना, comparison करना, उनको अच्छा नहीं लगता है। इसीलिए वो सब तज दो।

।। है ही भगवान ।।

05-Jan-2016

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पाण सुञारण आयो, भली करे आयो।"

जो अपने आप को पहचानने के लिए संसार में आया है, उसका आना सफल है। उसका संसार में जीना भी सफल है, उसका मरना भी सफल है, मिटना भी सफल है। उसी का जीवन सफल हुआ है, जो सतगुरु के आज्ञा-चक्र में चलते रहते हैं। वैराग-वृत्ति तेरे को मज़बूत करती है और चंचल-वृत्ति तेरे को ढ़ीला करती है।

।। है ही भगवान ।।

05-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरु मन्यता"

गुरु झिणके तो मिठा लागे। गुरु बक्षे तो उनकी वढि्याई। गुरु के घात में भी प्यार छुपा हुआ होता है, ये तेरे मूर्ख मन को, देह-अध्यासी मन को पता नहीं पड़ता। अंधेरा मिटाने के लिए, तेरे मन को ज्योति स्वरुप बनाने के लिए, गुरु दिन को रात कहे तो रात कहो। रात को दिन कहे तो दिन कहो। आगे-पीछे, कभी न कभी, भलाई सामने आती है, जब तू श्रद्धा की देवी को अपने साथ रखता है।

हलाईं त हला, बिहारीं त बस, मुहिंजी वाग सजण तुहिंझे वस। जैसे भी तू चला हम चलेंगे। डोरी परमात्मा आपको दे दी है, आप संभालो। मेरे रथ के स्वामी आप ही तो हो। भीतर ऐसी श्रद्धा की देवी को जगाते चलो जो सतगुरु से मिलाके एक करती है, वो है श्रद्धा की देवी।

अपने निश्चय में आकर, अपने भगवान पणे का एहसास करो। जे तू ब्रहमस्वरुप है, तो सामने भी तो ब्रहमस्वरुप है। फिर खिट-खिट कैसी, तकलीफ कैसी, चौ चौ कैसी, राग द्वेष कैसा। यहाँ भी ब्रह्म, वहाँ भी ब्रह्म। दफ्तर गुम करके, बस निष्काम ज़िंदगी में लग जाओ और खुद सुखी रखो अपने को और संसार में भी सच्चा सुख फहलाते चलो। ताकि तेरा जन्म जीवन सफल भी हो जाए और संसार को भी कुछ खुशियांँ तेरे से मिले।

।। है ही भगवान ।।

06-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जब भगवान का चौ तरफ वास है तो फिर तू क्यों उदास है?"

कोई कहे देह से ऊपर कैसे उठूॅं ? देह-अध्यास को कैसे छोडूॅं ? हम कहेंगे छोड़ो नहीं, ऊपर उठाे नहीं, पर एक नूर देखो। खुद में भी देखो, सर्व में भी देखो, लेकिन एक नूर देखो। देह, देह-अध्यास, चिंता न करो, जहा पड़ा है पड़ा रहने दो, पर परमात्म का नूर जहाॅं-तहाॅं महसूस करो।

एक ईश्वर की शक्ति को महसूस करो। 'नाम कोई भी लीजिए, ईश्वर तो है एक'। एक ईश्वर को सिद्ध करने के लिए तेरा मनुष्य-जन्म बना। मनुष्य-जन्म को पाकर, तू अपना फर्ज़ पूरा कर। 'पाण सुञाणण आयो सो भली करे आयो, कम न हुयुस को बि॒याे मिठा'। अपने आप को पहचानो, यही तेरा सबसे सुंदर पहला फर्ज़ है।

।। है ही भगवान ।।

06-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तंदुरुस्ती"

संभालो अपनी तंदुरुस्ती को जो तेरे लिए सौगात है। परमात्मा ने तो अच्छी दी, लेकिन तूने कहांँ की? आप समय के अनुसार अगर चलते हो तो तंदुरुस्ती बरकरार है। पाँच तत्व बाहर, पाँच तत्व की तेरी देह। जैसे बाहर पाँच तत्व की प्रकृति का चक्र चले, वैसे तेरी देह का भी चक्र शुरु होना चाहिए। लेकिन तू आलस करके कुदरत के साथ-साथ नहीं चल सकता। थोड़ा-बहुत आगे-पीछे जाने की आदत है।

सुबह सवेरा हुआ - जो सुबह का अंधेरा देखता है, प्रभात का अंधेरा देखता है, उसके जीवन में कभी अंधेरा आता ही नहीं। क्योंकि प्रभात को तू उठा और धुंधला सा अंधेरा दर्शन किया पाँच तत्व का, परमात्मा के नूर का, तो तेरे सब दुख दूर। सवेरे उठा, ठंडी हवा खाई, walk किया, परमात्मा का नाम लिया, जहाँ तेरी routine है, दरबार गया, सिमरण किया, सत्संग किया, तंदुरुस्ती सही चलेगी।

सवेरा उठने से भूख भी लगती है। समय पर नाश्ता खाया, समय पर lunch भी ले लेंगे, समय पर रात का भी खाएँगे। लेकिन तू सुबह उठते ही late-late-late-late होता जाता है। उसका भी आपकी तंदुरुस्ती पर बुरा असर पड़ता है। ज़्यादा भूख लगती है जब तू समय के बाद खाना खाता है। फिर ज़्यादा खा लेता है। अन्न ज़्यादा खाया तो भी तुझे तकलीफ तो आनी ही है। वज़न तो बढ़ता ही है। उसको face तो करना ही पड़ता है। इसीलिए कुदरत के साथ-साथ चलो। कुदरत की भावनाएँ तेरे प्रति बहुत अच्छी हैं। तू कुदरत को प्रेम कर, कुदरत तुझे करेगी। मांँ कुदरत आसीस देगी और तंदुरुस्ती बनी रहेगी। हर कदम पर देखो भगवान है ही है। दूजा भाव मन में आने न दो। खाना-पीना सही खाओ। ख्याल सही रखो, routine सही रखो और फिर देखो तेरा शरीर, तेरा मन, तेरी बुद्धि, किस प्रकार अच्छे से चलते हैं और संसार में अच्छा कार्य करते हैं।

।। है ही भगवान ।।

07-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शरण पड़े की लाज सतगुरु को रखनी ही है।"

निभाना हम सतगुरु से ही सीखते हैं। प्रेम अगर पक्का है, तो ज्ञान निश्चय मज़बूत ही होगा। आगे पीछे काट कूट कर, तू अपनी बुद्धि को छोड़ कर आज्ञा चक्र में आ ही जाता है, जे प्रेम तेरा निस्वार्थ है तो। निस्वार्थ प्रेम के सिवाय, निष्काम ज़िंदगी कैसे बनेगी? उसके लिए लगन की ज़रूरत है। लगन आई, तो फिर अगन की ज़रूरत है। सिर को तू पाव बना ले, फिर चल इस नेक राह पे। सिर, पाव बनने देते नहीं, सिर कहता है, मैं तो सिर हूं, मैं पाव क्यों बनू? पर जब गुरु तुझे अर्थ समझता है, सिर को पाव बना के दिखाता है, महसूस करता है, तो वही taste आपको भी आती है, और तू इसी चीज़ को अपना लक्ष्य बना ही देता है, कि मैं न रहूं बस रहे मेरा भगवान। मेरी इच्छा न रहे, रहे भगवान की मर्ज़ी। जो गुरु की मर्ज़ी में चलता है, वो सारे मर्जों से, सारे बीमारियों से, सारे तकलीफों से, हालतों से छूट जाता है। जन्म चक्र से छूट जाता है। कहीं प्रलब्द में भी तब्दीलियां आती है, ये जिज्ञासु महसूस भी करता है, और फिर विश्वास भी बढ़ जाता है।

।। है ही भगवान ।।

07-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Past और future"

Past और future पर दृष्टि रखनेवाला जिज्ञासु कभी आत्मिक power में आ नहीं सकता। Past is past. Future तो आया ही नहीं। आएगा तो देखा जाएगा। लेकिन तू past और future की बातों को कितना चिंतन में रखता है वो आप समझो। तेरे दिल-दिमाग में, छोटे-छोटे-छोटे-छोटे कीड़े past के, और future के, चलते रहते हैं, रेंगते रहते हैं।

पर तुझे सतगुरु से डा्त मिलती है, कि उठाओ torch, हाथ में रखो। 2 foot तक torch रखो, 2 foot आगे जाओ। फिर 2 foot की torch रखो, फिर आगे जाओ। तो ना past पर दृष्टि जाएगी, न future पर, न present का चिंतन। तीनों कालों से तू ऊपर उठ जाएगा और अपनी आत्मा में तू रमण कर सकता है। पर तू past और future की कल्पनाएँ और संकल्प-विकल्प, और घटी हुई जो भी घटनाएँ हैं, उसके ऊपर जब तू चिंतन ज़्यादा करता है, तो तू अपने से धोखा ही तो करता है। धोखा मत करो अपने से। Present, past, future, तीनों से ऊपर उठके, साखी भाव में आ जाओ। साखी थी रहो मंज संसार, दादी भगवान जी सिख्या तू कडी् न विसार।

।। है ही भगवान ।।

08-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निर्भयता और नम्रता"

निर्भयता अगर नम्रता के बगैर है तो निर्भयता danger रुप धारण कर लेती है। नम्रता निर्भयता के बगैर है तो नम्रता अपना कोई असर छोड़ती नहीं है। निर्भयता नम्रता के सिवाय, नम्रता निर्भयता के सिवाय, आधे-अधूरे हैं। इसीलिए निर्भय होके भजो भगवाना। लेकिन निर्भयता में नम्रता नहीं है तो भगवान भी मिलते नहीं हैं।

नम्र-नम्र-नम्र सुख पावे। नम्रता में जो सुख है वो किसी चीज़ में नहीं है। निर्भयता में जो बहादुरी है वो सबसे बढ़कर है। लेकिन balance, control निर्भयता में भी होना चाहिए। नम्रता में भी अपना balance ढूंँढके नम्रता करो। दोनों जब साथ-साथ चलते हैं तो तेरे जीवन में चार-चाँद लग जाते हैं। यहाँ तू bold और बहादुर होता है, यहाँ तू नम्र-नम्र होके सबके दिल में अपना महल बनाता है।

निश्चय में ये सब possible है, हो सकता है। निश्चय के बगैर ये नहीं हो सकता। इसीलिए सबसे पहले निश्चय रखो कि तू ब्रह्मस्वरुप है। जा्णी जा्रण हार, जानना रुप है तेरा। तू जानता है, जा्ण स्वरुप है। जा्ण स्वरुप को पकड़ो, कर्ताभाव को छोड़ो। कर्ताभाव में ही तू कहीं ज़्यादा निर्भय होता है, कर्ताभाव में ही तू नम्रता इतनी करता है जो एकदम पड़ जाता है। दोनों तरफ से उजाला होवे, शौक होवे कि मैं अलौकिकता की तरफ आगे बढूं।

।। है ही भगवान ।।

09-Jan-2016

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इंसाफ"

क्या शब्द है! आराम आ जाता है, जिसे इंसाफ मिल जाता है। इंसाफ कहाॅं है? इंसाफ का घर तेरा अपना मन ही तो है। हम प्रेम-नगर में रहते हैं। प्रेम-नगर कहाॅं है? तेरे भीतर, तेरे मन के आंगन में ही तो प्रेम-नगर है। मन के उस पार जाओ, कईं चीज़े अच्छी मिलेगी। उस पार जाने में एक ही bridge cross करनी है। वो bridge है देह से उपर उठके आत्मा में उतर जाओ। ब्रह्म-स्वरुप बन जाओ। मन ज्योत-स्वरुप बन जायेगा।

कितनी सेवाऍं करते हो, कितना पुरुषार्थ भी करते हैं, पर क्या मन जो इंसाफ का घर है, जो ज्योत-स्वरुप है, जो प्रेम का स्वरुप है, उससे इंसाफ किया? नहीं! अपने मन से अगर आपने खुद इंसाफ न किया, तो तुझे सृष्टि में इंसाफ मिले या न मिले, उसका क्या! तू इंसाफ कर अपने मन से कि बहुत जन्म बिछड़े थे माधव, अब ये जन्म मेरा तेरे लेखे। इंसाफ कर अपने मन से कि मैं इस जन्म में अपनी मैली चादर को धो डालूं। जो दाग़ past के, future के, मेरे भीतर छुपे हुए हैं, उसको मिटा डालू।

कभी तू past की यादगिरियाॅं लेकर दिल के दाग़ बना देता है, कभी furure की कल्पनाऍं लेकर। अंधेरों में चौ तरफ घूम रहा है, उजाला तेरे पास है, तेरे साथ है। अंधेरे का पर्दा हटाओ, पीछे सत्य का सूरज है। देखो, जानो, विचार करो। सत्य का संग जब तू करता है तो तेरे मन से इंसाफ होता है। सारी सृष्टि में भी तुझे फिर इंसाफ ही मिलता है। प्रकृती माता परमात्मा की बनाई हुई है। बेइंसाफी हो नहीं सकती, फक्त tu first अपना इंसाफ ले ले। भीतर जा। अपने आप को पहचान, आत्म निश्चय जगा, आत्म शक्ति जगा। भीतर ही भीतर तू आनंदित रहेगा, जीवन की यात्रा सुखद होगी, रिश्ते मज़बूत रहेंगे, समाज सेवाऍं कायम रहेगी। निष्कामी बनकर तू निखरेगा, आनंदित होगा, जगेगा खुद, जगाएगा औरों को।

ऐसा तू वीर पुरुष बनेगा, वीरता को प्राप्त करो, पहले अपने मन के ऊपर विजई करो। मन जीते, जग जीत! मन को आनंद में रखो। वो तब हो सकता है जब तू अज्ञान के अंधेरे से निकल कर ज्ञान दृष्टि में आ जा।

।। है ही भगवान ।।

09-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सफलता की सीढ़ी"

सफलता की सीढ़ी सहजता है। जब तक तू सहजता में नहीं आता, तब तक सफलता के करीब नहीं पहुँचता। सहजता, सहज योग, सहज में चलना, हीयं भी सड्यण वाह वाह, हूअ भी सड्यण वाह वाह। जैसे चलाओ वैसे मैं चलता हूँ। रुकाओ तो रुकता हूँ, चलाओ तो चलता हूँ, दौडा़ओ तो दौड़ता हूँ। जो आप करो सो हमें मंज़ूर है। सहजता किसको कहते हैं ? आज तू किसी संकल्प को पूरा करने जा रहा है, प्रकृति से signal है - पूरा होगा। कल उसी संकल्प पर संकेत आया - पूरा नहीं होगा। तू disturb mind होता है, विखेपता में आता है, तो तू सहजता में नहीं है। पर जे तू किसी भी प्रकार की change खुद में महसूस नहीं करता, जैसा होता है, वैसा ठीक है मानके चलता है, अर्थ है तू सहजता में हैं। सहजता वाला सदाईं सुखी रहता है। सहजता वाले जिज्ञासु सदाईं सर्व को सुखी भी करते हैं। अपने को भी खुश रखते हैं, सभी को खुश रखते है, और दिल-दिमाग हल्का रखते हैं, और आत्मा के निश्चय में आके खुद को पूर्णता पक्क कराते रहते हैं।

।। है ही भगवान ।।

10-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Mood का मालिक"

संसार में मनुष्य अदला-बदली होता रहता है क्योंकि बदलाव आते रहते हैं। वही बदलाव मनुष्य के मन के ऊपर भी आते हैं और मन का effect तन के ऊपर भी आता ही है। बदलाव आए, पर mood न बदले। आप इतने strong बन जाओ कि किसी भी बदलाव में तेरी mood न बदले। Mood बदलती है तो तू mood का गुलाम बन जाता है। पर mood का मालिक बनना है।

जो भी आए हम प्रेम नगर में रहते हैं। जो भी बन आए हम सब देखते रहते हैं। खाली साखीभाव को strong करो। साखीभाव में रहते हो, तो हर चीज़, हर हालत, हर change तू देखता रहता है। और साखीभाव में कोई उलझन नहीं आती। और जब तू कर्ताभाव में है, तो ही उलझनें तेरी तरफ आती हैं। साखीभाव में आकर अपने खुदको तृप्त रखो और tensionless हो जाओ।

साखीभाव में tension नहीं होता, कर्ताभाव में बहुत सारा tension हो जाता है। साखीभाव में तू थकता नहीं है, कर्ताभाव में थकता ही थकता है। और साखीभाव में तू अपनी इंद्रियों का भी साक्षी बन जाता है कि ये रथ मेरा कहांँ जा रहा है, किस ओर उसकी मंज़िल है। पर कर्ताभाव में तू रथ के पहिये को ही अंदर से निकाल देता है, रथ चलता ही नहीं है। खुदको संभालो। खुदको ऊपर उठाओ। सबसे तेरा ऊंचा पद है। साखीभाव में तू अपने ऊंचे पद को ग्रहण कर और संसार सागर से मुक्त हो जा।

।। है ही भगवान ।।

11-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तन-मन एक रस होए, सिमरन कहिए सोए"

बिगड़ी बात तेरी बन सकती है जब तू एक रस हो जाए तो। राग-द्वेष मिट सकता है, जब तू एक-रस हो जाए। एक-रस मतलब तन और मन एक ही जगह होना चाहिए। जहाॅं तेरा तन है, मन की डोर को ज्ञान-दृष्टि से, सतगुरु-प्रेम से खेंच कर, तन की तरफ लेके आओ और तन-मन एक-रस कर दो। अब जब तेरा मन कहीं दौड़ रहा है, तो तू शरीर को मन के पास लेके नहीं जा सकता। परंतु मन को तो देह तक लेके आ सकता है न! मन तेरा उड़ता पंछी है, उसको गुरु प्रेम में गुरु वचनों में, निष्काम भाव में, निष्काम कर्म में खेंचकर, अपने मन को तन की तरफ लेके आओ और उसी को प्रेम से कहो कि जहाॅं तन है, वहाॅं तेरा निवास है।

तन-मन एक-रस होने से तेरे हर चीज़ में स्वाद आएगा। खाना पकाओगे, तन-मन एक-रस है, तो स्वाद। काम, business, service कुछ भी करोगे, तन-मन एक-रस है, चित्त शांत है तो success tere कदम चूमती है। पढ़ाई करोगे, तन-मन एक-रस है तो अच्छे numbers आते हैं, अच्छी पढ़ाई होती है। कोई भी कार्य करने के लिए एक-रस्ता ज़रुरी है। जैसे तेरे खाना पकाने में नमक का अहम part है, sweet बनाने लिए sugar ka अहम part है, ऐसे ही success होने के लिए भी तेरे तन-मन एक-रस होने का अहम हिस्सा है। उसको निभाओ और अपने तन-मन एक-रस करके मंज़िल को प्राप्त करो, आदर्शों की चुनरी को साफ सुथरा रखो।

।। है ही भगवान ।।

11-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"होशियारी-चतुराई"

होशियारी जब तेरे देह की है, तो तू फस गया। फसा हुआ मनुष्य कभी हसता नहीं है, खुश नहीं रहता। पर तू देहध्यास वाली होशियारी-चतुराई कोे हर वक्त आगे रखता है और समझता है कि मैं कोई नेक काम, अच्छा कार्य कर रहा हूँ। लेकिन होशियारी-चतुराई तुझे जंजटों में डाल देती है। कहीं success होने नहीं देती है। पारब्रह्म परमेश्वर से दूर कर देती है। अपने निश्चय से तू एकदम दूर चला जाता है। आखिर होशियारी और चतुराई से आपको मिलता क्या है? अपने से थोड़ासा हिसाब किताब लगाना कितना ज़रुरी है। हिसाब किताब में नहीं लगाता तो अंधी पीसे और कुत्ता खाता जाता है। इसी प्रकार तू बिना हिसाब-किताब कीए, संसार में कभी आतम-निश्चय की ओर बढ़ता है, तो कभी देह की बातों की ओर, देह की रसों की ओर तू बढ़ता रहता है। पर तेल धारा सदरश तू अपना ध्यान आत्मा में नहीं लगाता। ध्यान अपना आत्मा में लगाओ और हर वक्त की खुशी को, हर वक्त की हसी को प्राप्त करो। हर वक्त तू तृपत रहेगा और तू अपने आप से प्रेम करके, सर्व को प्रेम में रख भी सकता है। इतना तू नसीबवाला है तो भी तू अपने को क्यों कम मानता है !

।। है ही भगवान ।।

12-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सदा बसत हम साथ"

जो जिज्ञासु ये मानके चलते हैं कि सतगुरु निराकार या साकार, दोनो रुप में मेरे साथ है ही है। तू खाली आँखे रख वो जिससे तुझे प्रियतम दिखाई दे।दिखाई नहीं देता है मनुष्य को, तो नज़दीक सतगुरु को पाकर भी वो पा नहीं सकता, देख कर भी देख नहीं सकता। पर जो श्रध्दालू है, जो गुरु को जानता है, गुरु से link है, गुरु में मन है, वो लाख कोस साजन बसे तो भी ह्रदय में हुज़ुर है। हमेशा यही महसूस करो कि भगवान मेरे अंग-संग है।

कभी भी कोई विकार टकराता है, तो तू निकाल कैसे सकता है ? जब तू ये सोचे कि भगवान मेरे साथ है, तो तू विकारों को भी निकालने की क्या कोशिश करेगा ? संतोष में आ जाओ, विकार अपना रास्ता लेके चले जाएंगे। धीरज में आ जाओ, विकार तुझे वरदान देके चले जाएंगे। प्रेम-मय हो जाओ, विकार तेरे सारे प्रेम-मय हो जाएंगे। विश्वास तो रखो, change रखो तो सही अपने में। Change जो करते हैं, वही हर change से शक्ती प्राप्त करते हैं, न कि हर change में शक्ती गंवाते हैं। यहाँ सब विकार दे दे, बदले में तू प्यार ले ले, फिर इसी प्यार से तू ज़िदगी गुज़ार।मोहब्बत लुटानी है, लुटाते चलो। नहीं लुटाते हो तो कसूर किसका है ? तेरा ही तो है ना ? मोहब्बत तो सबको मिली है, ये दौलत किस पर लुटाऊ ? तेरे को भी मिली है, अपना जन्म-जीवन सफल कीजीए और मोहब्बत को लुटाते चलें। प्रेम की गंगा को बहाते चलें।

।। है ही भगवान।।

12-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुम होईके वेख नज़ारा"

खुदको गुम करो। गुम करने में ही तेरी भलाई है। जो ये भलाई महसूस करता है और खुदको गुम करता है तो उसका बेड़ा पार है। गुम होईके वेख नज़ारा। अपने नज़ारे को, अपने दृष्य को ठीक रखो और आप अपने में खुदकी तृप्ति को ढूंढो। खुदकी तृप्ति तेरी ज़रुरी है। इसीलिए खुदको तृप्त करने के लिए आत्मा का निश्चय ज़रुरी है। आत्मा का बोध जब तुझे होता है तो दिल के सारे दाग भी मिट जाते हैं और अपने में तू रहना सीख लेता है। अंतरमुखता की ओर बढ़ता है। बाहर-मुखता तेरे से छूट जाती है और अपने में, खुद में तू खुदको समा देता है। आप विसर्ज़न होए तो सिमरण कहिये सोए।

।। है ही भगवान ।।

13-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"स्वास-स्वास में परमात्मा बस जाए"

एको ओहम सतगुरु प्रसाद। सतगुरु अपने आप में दर्शन करा देते हैं कि सो प्रभू दूर नहीं, वो तू ही तो है। अंदर ही सतगुरां दा डेरा, अंदर ज्योत जगंदी। अंदर ज्योत दे लष्कारे हैं, सूरज चमकन कई हज़ारे हैं। अंदर ही अंदर परमात्मा को पकड़ो, जीवन सफल बनाओ। कण-कण वासी, घट-घट वासी एक ही परमात्मा है, एक ही भगवान है। जड़ है या चेतन है, एक ही भगवान है। तू है या मैं है, ये है या वो है, पर एक ही भगवान है। ऊँचा है, नीचा है, चंगा है या मंदा है, पर एक ही भगवान है। सभी के भीतर भगवान ही है। बाहर की दृष्टी छोड़कर अंदर की दृष्टी को मजबूत करो और परमात्मा देखने में सफल हो जाओ, तो जीवन भी सफल हो जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

13-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"देह का त्याग अर्थात मौत"

क्या है यह देह का त्याग ? एक गहरी समाधि एक गहरी नींद । सतगुरु ने कहा यह भी एक गहरी समाधि है, तू जब अपनी age में, अपने दिनों में सच्चा, सही और समय पर और गुरु के संग, अपनी आत्मा को पहचानने की शक्ति बनाता है, वोही पुरुषार्थ तेरे जिंदगीभर की कमाई है । दादी भगवान ने वाणी में कहा, जो सफल जीवन है वो भले छोटा भी है तो क्या हुआ, लेकिन अज्ञानी बनके रोना धोना, दुखी होना, शिकायतों से भरपूर जीवन वो तो अस्सी साल भी जीए तो उस जीवन का कौनसा मतलब है । सफल वोही जीवन है जो तूने मनुष्य जन्म धारण करके अपनी आत्म को पहचाना, अपने भीतर झांका, भीतर सखा ढूंढा, सतगुरु को साथी बना लिया, संगत को अपनी सुन्दरता बना ली यही तेरी सच्ची और सही सिंगार है । समय पर सिंगार करो तो वोही सिंगार तेरा संसार के लिए एक आदर्श बनता है । आदर्शों पर जब तू सतगुरु के चलता है तो तुझे तृप्ति आती है, किसी बात में down नहीं होता, discourage नहीं होता हमेशा तेरी तूफानी चाल चलती है और तू आगे आगे बढ़ता जाता है ।

शरीर के साथ अच्छे अच्छे विचार, अच्छे अच्छे संकल्प तुझे सतगुरु से मिले वचन उनके द्वारा पुरुषार्थ से जो सही विचार मिले है वोही तेरा जीवन आगे बढ़ाने के लिए बहुत है । रास्ता खुला खुला मिलता है और तू आगे बढ़ता ही जाता है । हर वक्त तृप्त रहता है, हर वक्त तू अपनी आत्मा में रहेगा, भगवान ही पकड़ेगा ।


॥ है ही भगवान ॥

14-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु की ओट ले ले, उनके वचनों का सहारा ले ले, बाकी काम आपे ही गुरु निभा देते हैं"

वचन गुरु के धोए-धोए पी, अर्प गुरु को अपना जीव। अपना जीव-भाव जब तक अपने सतगुरु को अर्पण नहीं किया, तब तक जीवभाव से मुक्त नहीं हो सकता, अपने आत्मा को पकड़ नहीं सकता। अर्पण कैसे करेंगे ? गुजारत मां उहा आया, जो अकल में खाली अचां। अर्पण करना, खाली अर्पण करने का शौक रखो। बाकी काम गुरु करेंगे। सच्चा सतगुरु, सच्चे बादशाह, सच्चा साथी होता है, सहारों का सहारा होता है। बच्चे खाली शौंक रखते हैं, गुरु guide बनकर रोशनी देते हैं, रास्ता बताते हैं, निश्चय भी कराते हैं, त्याग-वैराग में टिका भी देते हैं, कुसंग से बचाते हैं, अच्छा संग कराते है। अपने से दूर, अपनी आत्मा से दूर जाकर जो मनुष्य से पाप होता है, वो भी अपनी आत्मा को पकाकर पुण्य में परीवित करते हैं।

प्रकृती पूरी परिवर्तनशील है। मनुष्य अज्ञान के अंधेरे में समझता नहीं। सच्चे बादशाह, सच्चे सतगुरु प्रकृती का भी दर्शन करा देते हैं कि ये तेरे दुखों के लिए नहीं बनी, तेरे तकलिफों के लिए नहीं बनी। ये तो बनी है तीन गुण से। अदली-बदली तो होगी ना। ऐसी ऐसी बातें सुनाकर, हर राज़ से पर्दा उठाकर, सृष्टी की रचना को महसुस कराकर, अपने निष्काम प्रेम की बूँद को चखाकर, उनका निष्काम प्रेम अमृत तुल्य है। वो अमृत पीकर सदा निहाल हो जाते हैं जो श्रध्दावानम् होते हैं, जो उनके मतवाले होते हैं। पिये पियारे प्रेम का प्याला। प्रेम का प्याला पीते हैं और पिलाते रहते हैं। बच्चों में भी यही आदत होनी चाहिए। आप जपे, औरा नाम जपावे। एक बूँद ब्रम्हज्ञान की मस्त कर देती है। तू एक बूँद ले सकता है और एक बूँद दे भी सकता है। अपने सतगुरु, अपने सच्चे बादशाहा में भरोसा रखो, विश्वास रखो, वो सत्य के मार्ग पर चलाते रहेंगे, निभाते रहेंगे,। यही आदार्ष सभी को रखना चाहिए कि हे सतगुरु, हे सच्चे बादशाह, सत्य के रास्ते पर लग रहें है, सत्य के रास्ते पर निभ आए। सब निश्चय हो जाए और सब को हम प्रेम करें। सतगुरु से दिया हुआ वचन कि सृष्टी सुंदर करेंगे आपकी, वो भी पुरा करें।

।। है ही भगवान।।

14-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्मा पशंती आत्मा"

आत्मा को जानने के लिए कोई कंडीशंस नहीं है कि तू कितना बड़ा हो जाए फिर तू आत्मा को जाने । पर जब सतगुरु मिले, गुरु की आत्मा का एहसास मिले तो खुद की आत्मा tu पहचान लेता है । पहले से ही तू आत्मा तो है ही पर जाना नहीं था, गुरु के प्रेम की चिंगारी मिली, दिया जगमगा उठा ।

आत्मा प्राप्ति की प्राप्ति है । अप्राप्त कोई वस्तु नहीं जिसको तू प्राप्त करने निकले । पर आइने में जैसे तू खड़ा हो गया सामने तो खुद का स्वरूप देखा, खुद का रूप देखा । ऐसे ही जब तू सतगुरु के सम्मुख होता है फिर तू चाहे कितना भी मनमुख हो सम्मुख होने से आईना सामने दिखाई देता है, और अपने आत्मा की पहचान मिलती है ।

देह छोटी है या बढ़ी है पर तू अपनी आत्मा को पहचान सकता हूं कि मैं कौन हूं, क्या हूं, कहां से आया हूं, क्या काम है मेरा, क्या पहला फर्ज़ है मेरा, क्या धर्म है मेरा ।


॥ है ही भगवान ॥

15-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सत्य का सौदा"

सत्य का सौदा करनेवाले तू ही तो सत्य को जानता है और सत्य को जानकर तू निष्काम राहों पर चलना सीख जाता है। निष्काम राहों पर चलते-चलते तू खुद भी तृप्त है और तेरे आस-पास कोई अतृप्त रहता नहीं है। क्योंकि सभी को संदेश मिलता है कि तू ब्रम्हस्वरुप है। खुदको ब्रम्हस्वरुप जानो, औरोंको भी यही संदेश देते जाओ, और इसी निष्काम प्रेम में अपने जीवन को सफल बनाते जाओ।

।। है ही भगवान ।।

15-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"श्रद्धा से ही ज्ञान"

श्रद्धा एक ऐसी स्तिथि है जिसमें तू खाली हो जाता है । ज्ञान वोही है खाली हो जाना । Past, future दोनो से खाली । Present में ज्ञान हो जाएगा । रोशनी तेरे भीतर आएगी, ज्ञान से तू चलेगा, उठेगा, बैठेगा । श्रद्धा वानम लाभते ज्ञानम । श्रद्धा आ गई, सतगुरु के सम्मुख हो गया, मन को बेच दिया, बाकी काम न रहा । और आस जब छोड़ी मैने तो मेरा नंग तो पर पढ़ियो।एक तू ही तो सहारा है, तू ही तो किनारा है, तू ही तो हमारा है । आत्म निश्चय तुझे भरपूर कर देगा । देह दृष्टि रोज़ तुझे खाली कर देती है ।अतृप्त कर देती है । तृप्त जीवन सभी को तेरे से मिलेगा । आधा अधूरा जीवन, तू भी दुखी औरों को भी दुखी, विखेप तेरा पीछा नहीं छोड़ेगा जब तक तूने श्रद्धा में खुद को डुबा न दिया तब तक विखेप भीतर की नसों से जा नहीं सकता । भीतर की सफाई श्रद्धा से होती है । श्रद्धा तुझे चार दिशाओं में भगवान दिखाती है । देह दृष्टि लौट के आती है विखेप लेकर, दुख दर्द लेकर, सार वैर लेकर, बिहायी दुहाई लेकर, मान अपमान लेकर । इसलिए श्रद्धा रखो, प्रेम रखो, धीरज रखो, विश्वास रखो और अपनी आत्मा के निश्चय से अपनी दृष्टि को अंदर भी भेजो, बाहर संसार में भी आत्म दृष्टि से सुहाना सफर करो ।


॥ है ही भगवान ॥

16-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

साथ जिसके सतगुरु हैं, वह हमेशा तृप्त रहते हैं, आगे बढ़ते हैं, उन्नती करते हैं, सृष्टी सुंदर करते हैं, कभी गिरते नहीं हैं। कभी गिरावट आई भी तो वो हर वक्त अपने सतगुरु की गोदी में ही रहते हैं। लाइन चार्यिन सां छा तुहिंजो, हेठ मथाइन सां छा तुहिंजो। जब भी कभी कोई तकलीफ आती है, नीचे-ऊपर होते हैं, हालतें आती-जाती रहती हैं, प्रकृती के गुण टकराते रहते हैं, प्रालब्ध का चक्कर चक्कर लगाता रहता है, तो भी हरिभक्त, दादी भगवान के भक्त सदा ही face करने का power रखते हैं। Face करने का power हर वक्त रखो, हमेशा रखो तो दुखों सुखों की, हालतों की end है। वरना counting करते-करते कभी भी end आती नहीं। कम-जास्ती सब चलता रहता है, मान-अपमान सब होता रहता है। Face करने का power रखो तो कभी भी हालतें अच्छी हो जाएंगी, सुधर जाएंगी सारी बातें और तू तृप्त होके अपनी जीवन की यात्रा में सफल बनेगा।

।। है ही भगवान ।।

16-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जहाँ देखूंँ तुझको पाऊंँ, तुझको पाकर खुदको गवाऊंँ"

एक ही रास्ता है खुदको गवाने का, खुदको गुम करने का - जहाँं-तहांँ भगवान देखो। हर शै में उसी का नूर है। जड़ हो या चेतन हो, समाया तो वो ही है। हर प्राणी में, जीव-जंतू में, पेड़-पौधों में, मिट्टी-सोने में, भंगार खाने में भी तो वो ही है। कभी तो तुझे सुख दिया किसी चीज़ ने, आज तू भंगार करके फेंकता भी है, पर है तो भागवान। किसी चीज़ से कोई विखेप न लो और अपने भगवानपणे को कभी न भूलो। तू जब निश्चय में है तो सारे संसार में तेरा ही आतम रुप है।

।। है ही भगवान ।।

16-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लगन और उसी में अगन"

ये तन मन जीवन सुलग उठे,
कोई ऐसी आग लगा दे रे,
कोई ऐसी आग लगा दे।
दिन दुना हो,
पल भर चैन ना आए,
कोई ऐसी आग लगा दे रे, कोई ऐसी आग लगा दे।
ये तन मन जीवन सुलग उठे,
कोई ऐसी आग लगा दे रे, कोई ऐसी आग लगा दे।

आग जब परमात्मा के प्रेम की ज़िंदगी में लगती है, तो संसार के दुखों-सुखों की, मान-अपमान की, मुसीबतों की, कष्टों की, राग-द्वेष की आग, बुज जाती है । जब तक गुरु प्रेम की आग नहीं लगी, वचनों की आग नहीं लगी, सत्य के दीवाने ना बने, तब तक संसार के कष्ट बास्ते रहते हैं और जब सत्य के दीवाने हो गए, सत्य को ले लिया अपने life में, तो कष्ट, कष्ट नहीं रहते हैं, तेरे कष्ट भी कुर्बानी बन जाते हैं ।

गुरु की कुरब, गुरु की मेहर, गुरु का निष्काम प्रेम, तुझे सत्य के रास्तों पर चलना सिखाता है, आगे बढ़ना सिखाता है और निश्चय करने में मददगार बनता है, मंज़िल तक पहुँचाता है । मंज़िल क्या है, तू ये ही मंज़िल प्राप्त कर लेता है कि मैं देह नहीं, मैं तो ब्रह्म स्वरुप हूँ। जड़ देखूँ, चेतन देखूँ, मानव देखूँ, दानव देखूँ, जहाँ भी मैं देखूँ, दृष्टि यही कहती है कि है ही भगवान। दूजा भाव ना होवे।
दूसरा भाव जब तेरे भीतर आता है तो तू भीतर का सखा भूल जाता है। बाहर से दूसरा-दूसरा भाव, अलग-अलग भाव मत रखो।

है ही भगवान पक्का करो। है ही भगवान में ही शक्ति है, भक्ति है, प्रेम है, निष्काम है, मंज़िलें हैं। है ही भगवान में जो तृप्ति है, वो कहीं नहीं है। इसीलिए तेरी aim क्या है, तेरी मंज़िल क्या है। Life छोटी है या बढ़ी है, लेकिन मंज़िल तो same है ना । Age छोटी है या बढ़ी है, मंज़िल तो same है ना । Same मंज़िल को सभी को प्राप्त करना है कि मैं ब्रह्म स्वरुप हूँ, मैं आनंद स्वरुप हूँ। जड़-चेतन सब मैं ही तो हूँ। जड़ वस्तु में भी भगवान देखो, वो भी तो सुख-दायक है। कौनसी ऐसी जड़ वस्तु है जो सुख नहीं देती ? छोटी सी सुई भी सुख देती है। छोटी सी छोटी चीज़ भी सुख देती है। जो सुख दाता है वो ही भगवान है ना। कोई कचरा भी है, वो भी सुख देता है, फिर तू क्यों भगवान नहीं देखता। भगवान देखो आगे-पीछे, दाएं-बाएं, अंदर-बाहर, जड़-चेतन, वैरी-विरोधी, सब में एक ही भगवान देखो। सब में वसे थो साईं, घट वध छो थो भाईं।

।। है ही भगवान ।।

17-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरी मस्ती मेरी मर्ज़ी"

बराबर! मेरी मस्ती तो बराबर है, पर जब तेरी मस्ती के साथ तेरी मर्ज़ी जुड़ जाती है, तो मस्ती उतर जाती है। छोटी सी भूल मनुष्य को कहांँ से कहांँ पहुंचा देती है। कहांँ तू अपनी मस्ती में चले और मस्ती में अगर मर्ज़ी को plus कर दिया, add कर दिया तो तेरी मस्ती तेरी हस्ती को छीन सकती है। पर तेरी मस्ती में अपनी मर्ज़ी को minus करो, तो तेरी हस्ती बढ़ जाएगी। हस्ती तेरी कायम-धायम है जब मर्ज़ी परमात्मा की चलती है तो। विचार करके देखो। विचार में सुख है, अविचार में दुख है। मस्ती तेरी, मर्ज़ी परमात्मा की।

।। है ही भगवान ।।

17-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संयम"

संयम तेरी सुंदरता है । संयम तेरा विश्वास है । संयम तेरी शक्ति है, तेरी भक्ति है । संयम ही तेरा निश्चय प्रघट करता है, तू साफ सुथरा है, ये तेरा संयम दिखा है, बता देता है ।संयम से तेरा निश्चय बढ़ता है, तेरा प्रेम भी बढ़ता है । जहां तू प्रेम नहीं कर सकता वहां पर थोड़ा सा संयम लगा दो, देखो प्रेम हो जाएगा, पवित्रता आ जाएगी । संयम से तू सतगुरु को रिझा सकता है । जब समझ आई तो ये समझा की गुरु ज्ञान का दीपक मन मंदिर में जलाना ही पढ़ता है । गुरु को संयम से रिझाना ही पढ़ता है ।

संयम तेरा साथी है । आज भी है, कल भी था, आगे भी संयम से कई रास्ते निकलते है । कई मंजिलों को तू प्राप्त कर सकता है, तू एक मंजिल पे खाली दृष्टि रख कि तू ब्रह्म स्वरूप है । एक साध्ये सब साध्ये । एक मंजिल को तूने प्राप्त किया अपने संयम से कि तू ब्रह्म स्वरूप है, दुख आता नहीं जाता नहीं । अपनी जगह पर है, तेरा संयम अपनी जगह पर है । तेरा निश्चय अपनी जगह पर है तू ये realise करता है तो मंजिल एक प्राप्त जब होती है, कि तू देह नहीं, तू ब्रह्म स्वरूप है उसके बाद सारी मंजिलें तेरे कदम चूमती है और तू एक सुंदरता को प्राप्त करता है जो तेरी सुंदरता जमाने को अच्छी लगती है । तेरा आदर्श संसार के लिए एक सबक बन जाता है ।


॥ है ही भगवान ॥

18-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

नज़र तेरी पड़ने से नज़ारे change हो जाते हैं, सहारे मज़बूत हो जाते हैं, किनारे नज़दीक हो जाते हैं, प्यारे दिल में समा जाते हैं। तेरी एको ही नज़र, मेरी लखा दी मरज़। परमात्मा सतगुरु के रुप में आकर अपने बच्चों को संभालते हैं, नज़र से निहाल करते हैं, वाणी से खुश कर देते हैं, मन में अडोलता आती है, स्थिरता आती है, प्रेम भावनाएँ बढ़ती हैं, ज्ञान दृष्टी उज्वल होती है, तीजा नेत्र खुल जाता है। तेरी एको ही झलक अच्छी लगती है। दृश्य डि्सां माँ पहेंजे सतगुरु जो, आश इया मुहेंजे अंदर में। एक ही दृश्य सतगुरु का, जीवन बदल सकता है, जीवन खुशहाल कर सकता है। जीवन के दौड़ पर सभी कुछ मिलता है, लेकिन एक गुरु ना मिला तो कुछ भी ना हुआ। एक तू जो मिला तो सबकुछ हुआ, इतना भरोसा रखो।

।। है ही भगवान ।।

18-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सही दिशा-सच्ची राहत"

सही दिशाओं से ही आपको राहत मिलती है। राहत से ज़िंदगी में तृप्ति आती है। तृपत मनुष्य प्रेम कर सकता है। दिशाए मिलती है सतगुरु वचनों से, सतगुरु प्रेम से। सच्चे सतगुरु के vibration से दिशाए बदल भी सकती हैं, सूली से कांटा भी हो सकता है। हर इच्छाओं पर तेरा संयम आकर इच्छाए पूरी भी हो सकती है। लेकिन सही दिशा पहले आपको इच्छाओं पर संयम देती है, फिर परमात्मा पूरी भी करते हैं और तुझे तृप्त भी रखते हैं। सच्ची तृप्ति को पाने के लिए सही दिशा पकड़ो। सही दिशा मिलती है सत्संग से। सत्संग एक सौगात है, कभी न भूलो। प्रेम से सत्संग attend करना ही तेरा लक्ष्य होना चाहिए।

।। है ही भगवान ।।

18-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आपके हौसलों में बुलंदी"

आपके हौसलों में बुलंदी ही आपकी बंदगी है । शरीर, देह ढीली भी पड़ जाए, पर हौसले तेरे ढीले ना पड़े । शरीर कष्टों से भी गुजरे पर तेरे हौसले सदा ही तंदुरुस्त रहे । तेरे हौसलों की तंदुरुस्ती ही तेरी सही और सच्ची तंदुरुस्ती है ।

तू देह नहीं तो ब्रह्म स्वरूप है, अपने हौसलों में फिट कर दो । एक ही निश्चय मनुष्य को कई संकटों से पार उतार सकता है कि मैं देह नहीं मैं तो आत्मा हूं । Everything is God Everywhere is God । हर चीज में वासा मेरे वासुदेव का । सतगुरु साईं सब में वसी थो तूं मां घट वध छो कहिंखे भाहियां। तेरे हौसलों में द्वेत ना रहे द्वेष ना रहे, किसी बात का इंतजार ना रहे, कि यह होवे या ना होवे । जो होवे मंजूर ए परमात्मा । जो तू चलाए भगवान शुक्र है । शुक्र शुक्र कर, शुक्र में गुज़ार । सदा ही अपने ख्यालों को मजबूत रखो कि तू दे नहीं तू ब्रह्म स्वरूप है । ख्यालों को मजबूत रखो कि संग निर्माण मान आ मुहिंजो सतगुरु सदाई मूं सान आ । मेरा भगवान मेरे साथ अंग संग है । जहां भी मैं देखूं वहां है ही भगवान ।


॥ है ही भगवान ॥

19-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

पाँच तत्व और तीन गुण - ये खेल अनोखा जाने कोई। जो जानता है वो सही दिशा में चल सकता है।पाँचों तत्व कदम-कदम पर आशिष देते हैं। तीन गुण तेरे रथ को चला रहे हैं। जिस रफ्तार में कुदरत चले, उस रफ्तार को मंज़ूर कर ले। जैसे भी वो चलाए, अच्छा मान ले, तो अच्छा ही होता है।घर-घर में किट-किट, किट-किट चली जाएगी, जब हर घर में यह realise होगा कि लीला फक्त इतनी ही है - पाँच तत्व, तीन गुण। ज़्यादा कुछ लंबा नहीं है। लंबा तेरा अहंकार है जो खिचता रहता है। अहंकार तेरा दूर हो जाए, नम्रता में change हो जाए, प्यार में change हो जाए, तो दिन सुहाने और सुनहरे जल्दी आ सकते हैं। Golden future is waiting for you ! कब ? जब तू आत्मा का निश्चय करके, गुरु वचनों का ध्यान करके अपने जीवन को simple, सादी और सच्चाई वाली ज़िंदगी के पथ पर लेकर आ।

।। है ही भगवान ।।

19-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सहनशक्ति - सहारो वरी वेसारो"

सच्ची सहनशक्ति सतगुरु की देन है। वो सहने की शक्ति तो देते हैं, साथ-साथ उसको भूलने की शक्ति भी देते हैं। इसी कारण हृदय पर कोई दाग आती नहीं। हृदय पर दाग आए और वरी उसे मिटाओ, waste of time, energy waste ! रहणी कहणी ऐसी रखो जो कभी दिल पर दाग आए ही नहीं। ऐसी तप, ऐसी तपस्या होवे जो तू काम की चीज़, काम की बात ग्रहण करे, बाकी सब बाहर फेंक दे। समुंद्र की तरह बाहर सब किनारे पर फेंक दो। भीतर न लो, तो दाग आएंगे नहीं, सहनशक्ति में तू करता भाव में आएगा नहीं कि मैंने कुछ सहनशक्ति की। अब तू आत्मा के निश्चय में आकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता ही चला जाएगा और खुदको संतोष में रखेगा, संसार में संतोष को बांटेगा।

।। है ही भगवान ।।

19-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एको ओह्म सतगुरु प्रसाद"

सच्चा प्रसाद सतगुरु से अपने बच्चों को मिलता है कि तू देह नहीं, तू तो आत्मा है, तू तो भगवान है। भगवान की शक्ति और मनुष्य की शक्ति एक ही तो है, जड़-चेतन एक ही तो है। नज़र जो सतगुरु से मिलती है, उस नज़र से देखो, तो एक दिखाई देगा। तू देह-दृष्टि से देखता है, तो संसार में हर चीज़ आपको अलग-अलग दिखाई देती है। वरना एक नूर से सब जग उपजे। भ्रमित होता है मनुष्य जब देह में आता है और दुखों-सुखों को झांकने लगता है। तभी गुरु बाबा ने कहा - दुख-सुख झांको नहीं, वैरी मीत समान। वैरी नहीं कोई, मीत नहीं कोई, जे तेरे भीतर देह का अध्यास नहीं है।

देह अध्यास होने के कारण, तू वैरी-मीत, मिट्टी-सोना, मान-अपमान, दुख-सुख, नज़दीकी-दूरी, सब द्वंदों को उत्पन करता है। वरना द्वंद है ही नहीं। देह-दृष्टि में भ्रम और द्वंद है, आत्म-दृष्टि में एको ब्रह्म लखाएँगे। भले सूखे चने भी चबाने पड़े, चबाएँगे, लेकिन एको ब्रह्म ज़रुर लाखाएँगे।ऐसा कठिन व्रत लीजिए, जो ले ना सके कोई, घड़ी इक विसरुं राम को, तो ब्रह्म हत्या मोहे होवे। देह अध्यास को छोड़ो और सतगुरु के स्वभाव-संस्कार में आ जाओ। खुद भी आओ, औरों को भी ये स्वभाव-संस्कार देते जाओ, पहचान कराते जाओ।

छोटे-छोटे बच्चों में छोटी-छोटी age में, अगर आप अच्छे संस्कार, आत्मिक संस्कार, अच्छे और बुरे संस्कार का definition क्या है,आत्मिक संस्कार। आत्मिक जो स्वभाव है तेरा, जो संस्कार है तेरा, वो तुझे अंदर में प्रेम के सिवाय जीने नहीं देगा। तू सबको प्रेम दान ज़रुर देगा। सब दान से प्रेम दान श्रेष्ठ है। प्रेम करो, और सबको आत्मा की पहचान दो, परमात्मा की फुलवारी बनाओ। हे गुरु तेरी फुलवारी सबसे न्यारी है। छोटे छोटे बच्चों में भी आत्मा का भाव डालो, है ही भगवान डालो, तो उनको भी मन मज़बूत रहेगा और तुझे भी सहुलियत होगी, वो बिना किसी पुरुषार्थ के पलके बढ़े हो जाएँगे। तू देखते रह जाएगा कि मेरा बच्चा बढ़ा कब हुआ और कैसे हुआ और इतना अच्छा कैसे हुआ। वो इसीलिए हुआ, जो तूने भगवान को पकड़ा और तेरे vibration तेरे बच्चों में भी आएँगे ।

।। है ही भगवान ।।

20-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

सतगुरु की यादें भी शक्ती बन जाती है, प्रेम में बरकत हो जाती है। सतगुरु जे सिक में साह पैजी तो वन्ये। मुर्दों को भी सांसों की पूँजी नसीब होती है। रुका हुआ शरीर चलने के काबिल बन जाता है। कहीं हालतें निपट कर तेरी राहों की रोशनी बन जाती है। फक्त इश्क चाहीए, शौंक चाहीए, मानना चाहीए। और आस जब छोड़ी मैंने, मेरा नंग तुम पर परो। मानना चाहीए कि भगवन मैं तेरा, तू मेरा, सारे भ्रम मिट गए। तू और मैं एक हो गया। तिलों में जैसे तेल, मेहंदी में रंग समाए हुए हैं। मुझमें राम, मैं राम में समाया हुआ हूँ, हम दो नहीं, एक हैं। एक आवाज, एक शक्ती, एक प्यार, हर चीज़ तेरा श्रृंगार बन जाएगी, जे सतगुरु सदा ही तेरे साथ है तो। साथ जिसके सतगुरु हैं, वो कभी गिरते नहीं हैं, वो हमेशा सतगुरु की गोदी में ही पड़ते हैं, कहीं रुकावट नहीं।

।। है ही भगवान ।।

20-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु का साथ"

जब तू जिज्ञासु बनके गुरुद्वारे आया, तो सतगुरु ने तुझे साथ दिया, अपना साथी बनाकर। अब तू उसी साथी बनने की fees चुका दे। कैसे - उनकी तरफ अपनी दिशाओं को जोड़ दे। अरदास कर दे कि हे माँ प्रकृति मैं अपने सतगुरु का साथी बनकर उसके हर यज्ञ में साथ दू, कदम से कदम मिलाकर चलूं, नैया को पार लगते हुए देखूँ। संसार सागर से सभी की नैया को हाथ लगाकर पार करना है। राम नाम की नैया को सभी को दिखाना है और सभी को प्रेम की नगरी में पहुंचाना है। यही तेरी मंज़िल भी है, यही तेरा प्रेम भी है।

।। है ही भगवान ।।

 

20-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विश्वास"

विश्वास ही तेरी करामत ही करामत है । विश्वास जब तू भगवान में रखता है तो यह सोचो कोई दूसरा नहीं भीतर ही है तेरे, कुदरत में रखता है वह भी तेरा ही रूप, तू उसका रूप । सतगुरु में रखा तो कोई भेद नहीं, गुरु और तू एक ही तो है । एक विचार रखके विश्वास रखते हैं, तो कभी टूटने का डर नहीं है । हर हाल में विश्वास, विश्वास ही रहता है । पर जे तू विश्वास दूसरा जानकर रखता है, तो कहीं ना कहीं विश्वास को भी ठोकर लग सकती है ।

मनुष्य भटक जाता है । एक शक्ति को पहचानो, एक ही शक्ति है, एक ही ब्रह्म है, एक ही भगवान है, एक ही ब्रह्म की सूत्र में सब मोती, सब इंसान, जड़ चेतन, समय पड़े हैं, पिरोए पड़े हैं, तब यह जगत की माला तैयार होती है और जगत की सुंदरता बढ़ाती है ।

अलग जो भी दिखाई देता है वह प्रकृति की रचना है, वह लीला है पर लीलाधारी एक ही है, रचनाकर एक ही है । एक पर दृष्टि रखो और विश्वास को मजबूत रखो कभी अविश्वास में बदल ना पाए वह विश्वास जिज्ञासु का धर्म है ।


॥ है ही भगवान ॥

21-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"करन करावण हार स्वामी, सकल घटा के अंतरयामी"

प्रभू को करनेवाला मानो, करते भी वही हैं। तू मुफ्त में विचार लेता है कि मैंने किया। सत्य विचारधारा रखो कि जो कुछ हो रहा है भगवान से हो रहा है, उसी की शक्ती से हो रहा है। जब तू देह नहीं है तो तेरी शक्ती और भागवान की शक्ती में कोई अंतर नहीं। बस उनकी तो जागी शक्ती है, जगाई है उन्होंने, तुझे जगानी है। जितनी तू अपनी शक्ती को जगाता है, उतनी शक्ती बढ़ती है। बाकी शक्ती तो वही है। वही करती है शक्ती, वही करण करावणहार है। तू देह में आकर अपने को मानता है मैंने किया, तो मुसीबतों से मुकाबला करना पड़ता है। वरना प्रेम की दुनिया बसाते चलो। तू कर्ता है तो राग-द्वेष भी होता है। तू ना करे तो नफरत भी न होवे, द्वेष भी ना आए। नैया तो चल रही है। लेकिन तू सोच रहा है मैं चला रहा हूँ। अब नैया को नैया के हवाले छोड़ दो, फिर देखो कौन चला रहा है ? उसके साथ भी भगवान है, नैया के साथ भी भगवान है, तेरे पास भी भगवान है, फिर तू क्यों दिलगीर होता है और कर्ताभाव में आता है ? अकर्ता भाव में आ जाओ, प्रेम की दुनिया बसाओ, नम्रता रखो, चैन की निंद सो जाओ, चैन से खाना खाओ, simple ज़िंदगी जीयो और अच्छी जिंदगी जीयो।

।। है ही भगवान ।।

21-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ढकीं मुहिंजा ढोलणा, ऐभ छल कहिंजा न खोलणा"

किसके गलतियों पर पर्दा डाला, तो कुदरत तेरे ऊपर भी चदर डाल देती है। तू किसीकी गलतियों का पर्दा उठा देता है, तो कुदरत भी सहन कर नहीं सकती। क्योंकि तेरा जन्म-जीवन व्यर्थ जा रहा है। कुदरत तुझे प्यार कर रही है, तभी सहन नहीं कर रही है। ये मत सोचो कि कुदरत उसीको प्यार कर रही है जो गलती कर रहा है और मैं देख रहा हूँ, तो मुझे सहन नहीं कर रही है। यहाँ भी कुदरत आप ही को प्रेम करती है, आप ही के लिए सोचती है, आपकी ही उन्नति मांँ कुदरत को प्यारी है।

।। है ही भगवान ।।

21-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"देह भी ब्रह्म रूप है"

उन्हण जे मिट्टी भी लढ़ो मान। जो परमात्मा के रास्ते पर चलते हैं, जो भगवान को नस-नस में समा के, हृदय में बिठाकर, दिल दिमाग में भगवान के विचार करके, अपने जीवन को स्थिरता में रखते हैं, उनका शरीर भी ब्रह्म रूप होता है । ये रथ मेरा, मैं राजा हूं, बड़ी शान से जीवन की सैर करूं, उनके लिए सब सैर है ।

सतगुरु प्यारे ने जन्म मरण सब दुख दूर किया । सतगुरु प्यारे ने आना जाना भी मिटा दिया, जो आत्म निश्चय में टिक जाता है, सतगुरु को आत्मा करके देखता है, तो खुद भी आत्म रूप बन ही जाता है । बनना है तो ब्रह्म बनो । बनना है तो परमात्मा का प्यारा बच्चा बनो । बनना ही है तो सर्व से न्यारा और सर्व का प्यारा बन जाओ ।

जो आत्मा के निष्ठा में रहते हैं वह सदा ही अजर और अमर रहते हैं । वह कभी मिटते नहीं, मिटाए नहीं जाते। भक्तों के जनाजे नित कुदरत में सजाए ही जाते हैं । भक्त अपने भक्ति से हर वक्त, हर काल में, हर घड़ी रहता ही है । मैं ही था, मैं ही हूं और मैं ही रहूंगा । अजर अमर आत्मा अविनाशी मैं ही तो हूं । चांद सितारों में, मेरी ही शक्ति है, मेरी ही भक्ति है, मेरा ही प्रकाश है । अपने को इसी हद में, देह की हद में, न रख के तू भ्रम भाव में जब अपने जिज्ञासु पने के जीवन को आगे बढ़ाता है तो मंजिल आपको यही मिलती है कि तू ब्रह्म स्वारूप है और तेरी देह भी ब्रह्म स्वरूप हो जाती है । और सकलों ब्रह्म तू पहचान लेता है । पूरी कुदरत में आपके लिए ब्रह्मांड ही ब्रह्मंद रेहता है और कोई बात ही नहीं रहती ।

बस भगवान देखो, भगवान सुनो, भगवान बोलो, भगवान विचार में रखो, भगवान दो और भगवान लो । एक ही सौदा करो, है ही भगवान ।


॥ है ही भगवान ॥

22-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"छडे़ हठ होअण जो ज़िंदगी तू सुखी गुज़ार"

मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ की रट जब एक मनुष्य लगाता है तो तकलीफों में तो आता ही है, पर तकलीफों में डालता भी है। इसीलिए अहंकार छोड़कर, अपनी ज़िद छोड़कर जे तू सहजता को, निर्मलता को, soft बनकर अपने धर्म की ओर आगे बढ़ता है, तो तू सर्व सुखों का स्वामी बन जाता है। पाया कहे सो मस्करा, खोया कहे सो कूड, ज्ञानी ज्यूं का त्यूं भरपूर। तू ज्यूं का त्यूं भरपूर बन जाएगा अगर तू आत्मा का निश्चय करके गुरु वचनों को संभालके रखेगा। हम लाए हैं ब्रम्हकार वृत्ती गुरुद्वार से, इस वृत्ती को रखना मेरे मनवा संभालके। यह वृत्ती ही है जो तुझे हर परिवर्तन में थिर रखती है। ये गुरु वचनों की सौगात है जो हर परिस्थिती में तुझे सुंदर बनाए रखती है। ये सतगुरु का निष्काम प्रेम है जो तुझे सब बंधनों से, दुखों-सुखों, द्वन्दों से छुडा़कर अपने चरणों में, वचनों में स्थान देकर तुझे आत्मा में संतुष्ट करते हैं।

।। है ही भगवान ।।

22-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"चढ़ा खुमार, उतरा तकरार"

नाम खुमारी नानिका चढ़ी रहे दिन रात। दिन रात जब तुझे अपनी निश्चय की खुमारी चढ़ी रहती है तो फिर तकरार को कोई जगह नहीं। वो उतर ही जाता है। वर्ना सारे दिन में देखो किस-किससे तू तकरार करता रहता है। देह-अध्यासी मन जड़ चीजों को भी छोड़ता नहीं, उनसे भी तकरार। कहीं लात लगाएगा, कहीं हाथ से फेंकेगा। कहीं मुख से निंदा करेगा, कहीं बड़ी-बड़ी आँखें करके देखेगा।

जड़ और चेतन से तेरा तकरार रहता ही है। पर जब निश्चय करे तू आत्मा का तो इकरार हो जाता है और प्यार हो जाता है। तकरार छूट जाता है, मन में relax आ जाती है, ठंडक सी आ जाती है कि सब ठीक है। जो भी हो रहा है सब ठीक है। तेरा भाणा मीठा लागे। जातुद्ध भावे साईं भलि कार। जे न वणन कर्म उन्खे, मुहिंजे सतगुरुखे, उन्हनखा पाणखे बचाईंदो हल। जो कर्म मेरे सतगुरु को अच्छे नहीं लगते हैं, उनसे side करके चलो, और आत्मा का निश्चय मज़बूती से पकड़ो, बस वो ही एक तेरा साथ और सहारा है।

।। है ही भगवान ।।

22-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अर्पण समर्पण"

जो अपनी जिंदगी में अपनी life में, जो परमात्मा से मिली age में, अपने जीवन को, अपने जीवन के सभी भार को, भगवान को अर्पण कर देता है, सतगुरु को समर्पण हो जाता है । जीते जी जन्म भी सफल होता है, मृत्यु उसको मार नहीं सकती, मृत्यु भी उसको प्रेम से वरदान देती है कि तुझे सृष्टि सुंदर करने का मौका देंगे ।

जो सतगुरु की मान्यता में चलता है, वही जीवन में सफल होता है । किस बात में सफल होना है ? अपने निष्ठा में सफल होना है । डट के रहना है, कि मैं देह नहीं, मैं तो आत्मा हूं । डट के रहना है कि भगवान जो भी करता है उसमें छुपी भलाई है । तुम करो भला हम भलो ना जाने । वह त्याग वैराग में श्रेष्ठ रहता है । कभी यह नहीं सोचता क्या मेरी उम्र निश्चय की है ? क्या मेरी age त्याग वैराग की है ? वह तो बस अपनी मस्ती में, अपने आत्मा की मस्ती में, सतगुरु के वचनों में निकलता जाता है । अपनी कुमारी में खोया रहता है, अपने आनंद में डूबा रहता है । अपने को आत्मा के निश्चय में रखकर तृप्त करो, सुरक्षित रखो, अपने निश्चय के सिवाय तेरी सुरक्षा कहां है ? अपना निश्चय रखो और सब से प्रेम करो प्रेम की दृष्टि रखो ।


॥ है ही भगवान ॥

23-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सब साधन का मूल है सतगुरु दुर्लभ प्रेम"

आत्म-निश्चय के लिए साधना ज़रुरी है।साधना के सिवाय साधक की सुंदरता नहीं। साधना के सिवाय साधक का आदर्श नहीं। साधना के सिवाय साधक का प्रेम नहीं। जे तू सच्चा साधक है तो सच्चा सिधक भी रखो और सही साधना भी करो। सही साधना है सबसे पहले सतगुरु दुर्लभ प्रेम। गुरु से प्रेम, गुरु से निभाना, कभी भी कोई बात समझ में आए या न समझ में आए धीरज करना पड़ता है। जब धीरज ना आए साधक को तो यह सोचना चाहिए कि इतनी सारी बातें आज तक तो समझ में आ ही गई है ना। जे कुछ बातें समझ में नहीं आती तो वो मेरी बुध्दी का दोष है। बुध्दी धीरे-धीरे गुरु प्रेम में खुलती जाएगी। आत्मिक colour से रंगी जाएगी, गुरु प्रेम में डूब जाएगी, तो बुध्दी से दोष निकल जाएंगे, और दोष मुक्त बुध्दी साधक के लिए उन्नती का कारण बन जाती है।

दोष ना मानो मानुष देहा। गुरु भी तेरा देह नहीं है। देह में दिखाई भले दे। गुण-कर्म उनमें भी कभी दिखाई दें, तो भी ये line तेरी श्रध्दा को बरकरार रखने के लिए बहुत है कि दोष ना मानो मानुष देहा। मनुष्य-देह में गुरु आकर तुझे देह-अध्यास से उठा सकते हैं। गुरु जे मनुष्य-देह में न आए तो तुझे देह-अध्यास से भला कौन उठाए ? तेरे देह को कौन राह दिखाए ? कौन प्रेम कराए ? बाकी तो गुण-गुण में टकराते रहते है। आप टकर ना खाओ। साखी हो जाओ। साखी भाव ही सबसे ज़्यादा सुंदरता देता है, जो आपको इस साल करनी है। सत्यम् शिवम् और सुंदरम्।

।। है ही भगवान।।

23-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"चुगलियांँ, गलतियांँ और फिर माफियाँ"

इसी दायरे में तेरा जीवन है। परमात्मा ने नहीं रखा, तूने खुद ये दायरा ले लिया है। बिना ज़रुरत के आप इस दायरे में रहते ही हो। देह-अध्यासी मन तेरे को बार-बार किसी न किसी की चुगली देता रहता है और तू भी मन को कहांँ छोड़ता है ! तू भी मन को चुगलियांँ देता रहता है। फिर आया तेरा विखेप।

गलतियांँ और चुगलियांँ विखेप की खिड़कियांँ खोल देती हैं। आ गया विखेप, discussion हुआ, बहस हुआ, तकलीफें आई, फिर ली माफियाँ। क्या यहीं जीवन है? क्या ये जिज्ञासु स्वभाव है? या फिर मनमानियांँ है? मनमानी छोड़ कर गुरुमनी जे मनुष्य करे तो शायद वो मिटी से सोना बन जाए। अधूरी ज़िंदगी पूर्णता की तरफ बडे़। बुझा हुआ दिया तेरी ज़िंदगी का मशाल बन जाए। इतनी सी थोड़ी change, थोड़ा बदलाव और बड़ा सा फायदा, जीवन भर का फायदा। जे किसी को समझ में न आए तो उसको क्या कहें? सवाल मेरा, जवाब आप ही दे दो।

।। है ही भगवान ।।

23-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इश्क"

मुझे इश्क सतगुरु से मेरी जान जिंदगानी तेरे पास मेरा दिल है मेरे प्यार की निशानी ... मुझे इश्क सतगुरु से...
इश्क जब आए, अकल कहे, चलो अब हमारा काम यहां पर नहीं है । आयो इश्क अंदर में अकल चयो हल त हलियु ।

Simple प्यार होता है पर कभी-कभी इश्क लग जाता है, उसका कोई जवाब नहीं कि क्यों लगता है, क्यों होता है । लग गया सो लग गया ।

लगा इश्क अपने भगवान से तो इश्क आसमान में उड़ता रहता है । उसको न मन की, ना बुद्धि की, ना देह की कोई चिंता नहीं । कुछ होवे या ना होवे । कुछ मिले या ना मिले । भगवान सुख दे, या कष्ट दे । इश्क कभी तराजू नहीं लेता । इश्क कभी तखत तौर नहीं करता । इश्क तो बस बहना जानता है, बहता ही जाता है, जहां रास्ता मिला, जैसा रास्ता मिला, उसका धर्म है बहना । इश्क का धर्म है आगे बढ़ना । इश्क का धर्म रुकना नहीं है, इश्क परमात्मा से लगाने वाली एक ऐसी मीठी स्थिति है, जो भाग्यशाली को मिलती है ।

तू अपना भाग्य बना दे । अपने भीतर परमात्मा के लिए पहले एक छोटी सी अंदर में लहर उठा, प्रेम की लहर । वही प्रेम की लहर तेरी धीरे-धीरे करके इश्क का रूप ले ही लेगी । और जब इश्क लग जाता अपने सतगुरु से, तो आप विसर्जन होता है कि मैं देह नहीं, मैं ब्रह्म स्वरूप हूं । पहले इश्क में थोड़ा बहुत कष्ट आता है, बाद में अच्छा भी लगता है ।


॥ है ही भगवान ॥

24-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

कितनी सारी energy मनुष्य की जाती है ये सोचने में इसने क्या किया, उसने क्या किया ? उसने क्या सोचा, उसने कैसा बोला ? इसने, उसने में कितनी सारी तेरी शक्ती जाती है। पर जे तू उसके बदले ये सोचे कि मेरे भीतर क्या संकल्प है ? मैंने क्या सोचा ? मैंने क्या सोचा सोचेगा तो तेरे संकल्प-विकल्प शांत हो जाएंगे। भीतर तू जा सकता है। इसने-उसने, तूने-मैंने में तू भीतर नहीं जा सकता। पर जब तू अपनी ओर, only अपनी ओर दृष्टी रखेगा तो सीधा तू भीतर जा सकता है, और लेके आओ अपने कमियों के खयाल। भीतर जाओ लेकर आओ अपनी negativity, भीतर जाओ लेकर आओ अपनी नफरत, भीतर जाओ लेकर आओ अपना tension। Success तू होगा, आशीश गुरुदेव की है। वचनों की torch भी उनकी ही है। तू शौंक रख भीतर जाने का। मौन कर, चुप, शांत।वेएव्व माठ करे, चित्त खे शांत करे, तुहिंजी शांत करण सा थो जगत ठरे। मौन करके जब भीतर की तरफ तेरी यात्रा होगी तो कहीं दुख-दर्द तुझे भीतर से निकालने में मिलेंगे और गुरु वचनों से तू निकालने में success हो जाएगा। भीतर की सफाई तेरी बाहर की सफाई हो जाएगी। भीतर संक्लप विक्लप शांत।

।। है ही भगवान।।

24-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्म और निष्कामता"

तेरा कर्म निष्कामता को जन्म दे नहीं सकता। कर्म से कभी तू निष्काम हो नहीं सकता। पहले किया तूने कर्म कर्ताभाव से, और कहोगे मैं निष्काम करता हूँ, ये हो नहीं सकता। लेकिन निष्कामता सतगुरु प्रेम से आ जाए। गुरु वचनों से निष्कामता, निष्काम भावनाएँ, तेरे भीतर आ जाए, वो कर्म को जन्म देती है। तेरी निष्काम भावनाएँ जिस कर्म को जन्म दे, वो कर्म निष्काम हुआ। वर्ना निष्काम सोचो ही नहीं। कर्म कभी निष्काम नहीं होता, क्योंकि कर्म जो तेरे मन के देहध्यास से होता है, वो तू कर्ताभाव से करता है। मैं करता हूँ, सामने वाले के लिए करता हूँ। लेकिन गुरु ज्ञान से ब्रह्मकार वृती से जो तेरे मन में भावनाएँ निष्काम की उठती हैं, वो कर्म तेरा अलौकिक कर्म बन जाता है। जो तुझे भी सुख देता है, औरोंको भी सुख देता ही है।

अलौकिक कर्म समझो कि क्या होता है। निष्काम कर्म समझो कि क्या होता है। तू सकाम कीए जा रहा है। सकाम कर्म कीर्ती के लिए करते हैं। कीर्ती मिलने पर खुश, कीर्ती ना मिली तो नाखुश। ऐसे कर्म सकाम कर्म हैं, निष्काम नहीं हैं। निष्काम का विचार सतगुरु के बिना आता ही नहीं। निम्र-निम्र-निम्र कर तो सुख पावे निष्काम का। वर्ना तो तू सकाम की खट्टी-मीठी गोली खाके, निष्काम के सपने देखता रहता है। ऐसा धोखा खुदसे मत करो।

।। है ही भगवान ।।

24-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अमानत"

मनुष्य को, जो कुछ संसार में परमात्मा से मिला है, वह सब भगवान की अमानत है । कोई चीज, तेरे पास कोई अमानत रखकर जाता है, लौटाने के टाइम तू खुशी से, संतोष से, लौटा देता है, कि मेरा भार उतरा ।

इसी प्रकार संसार में कोई भी हालत आती है, कहीं पर कोई आपको कुछ मिलता है, कुछ परमात्मा वापस लेता है, तो वह उसकी अमानत ही तो है । संतोष से हर हालत को face करो । धीरज से अपनी हालत हो face करने से, सामने वाले को भी शांति मिलती है और तू भी अपना फर्ज निभा सकता है ।

संतोष सबसे बड़ी चीज है, श्रेष्ठ धन है । धीरज में रहना, आत्मा का निश्चय करना, खुद में आत्मा देखना, सामने वाले को आत्मा करते देखना, यही तेरा स्वधर्म है । अपना स्वधर्म निभाओ । छोथो शरीर सदायी, छोथों सूर सहिं । देह मत मानो अपने को, तो सामने वाले को भी तू देह नहीं दिखेगा, ब्रह्म स्वरूप करके देखेगा ।

सकलो ब्रह्म जिसने पहचाना, जिसने आत्मा का ज्ञान भीतर ले लिया उसको भगवान के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता, वह तो भगवान ही भगवान हाजरा हजूर देखता रहता है ।


॥ है ही भगवान ॥

25-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्मज्ञान से ही आत्म-निश्चय होता है"

बिना सुन्याते पहिंजे, वन्ये ना देह अभिमान। जब तक अपने आप को पहचानता नहीं है तब तक देह-अध्यास, देह-अभिमान जाता नहीं है। जब तक देह-अध्यास है, आत्म-निश्चय नहीं होता, तब तक तू निर्विकारी हो नहीं सकता। निर्विकारी होने के लिए, निर्विकारी का आनंद चखने के लिए, रस पाने के लिए, तुझे अपने को पहचानना पडे़गा। खुद को पहचानने के सिवाय तू अद्वैत में आ नहीं सकता। जब तक तेरे भीतर द्वैत का छोटा कणा भी है, तब तक तू निश्चय को नहीं पा सकता, और संसार में खुशी दे नहीं सकता। सच्ची खुशी है आत्मा की, सच्ची सुजागी है आत्मा की, सच्चा आनंद है आत्मा का। अपनी आत्मा में जो संतुष्ट रहता है, वो ही सच्ची खुशी को प्राप्त कर सकता है, और अपना रास्ता सरल और सुगम बना सकता है।

।। है ही भगवान।।

25-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विश्वास"

विश्वास के सहारे जीवन हल्का-हल्का हो जाता है। विश्वास करामत की करामत है। विश्वास मन change कर देता है। विश्वास प्रेम पैदा करता है। विश्वास ही है जो प्रेम की रक्षा करता है। विश्वास के सहारे तू आतम-निश्चेय तक, आत्मपद तक पहुंच पाता है। विश्वास ज़िंदगी का आनंद है। विश्वास एक ऐसा रस है जो कभी फीका नहीं पड़ता। कभी विश्वास का रस सूखता नहीं, सूख नहीं जाता। हर वक्त विश्वास तेरे जब नसों में दौड़ता है तो तेरी नस-नस भगवान के शुक्राने गाती है और प्रेम से लहराती है। पतंग तेरी सतगुरु के हाथों में जो है, उस पतंग को भी सतगुरु विश्वास के सहारे धागा बांधके, आसमान तक पहुंचा देते हैं। वो पतंग आसमान में उड़ने लगती है जो विश्वास बनकर गुरु के हाथों में है।

।। है ही भगवान ।।

25-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आदेश और आदर्श"

आदेशों की study करनी पड़ती है । आदेशों को सुनना नहीं है । आप आदेश सुनने के आदती बने हो, पर आदेशों को पढ़ना सीखो, महसूस करना सीखो, फिर आदर्शों पर खरे उतर सकोगे । जब तक आदेश सुनने का आदती है तो कभी ना कभी आदेशों को तू भूल भी सकता है, मुकर भी सकता है । लेकिन आदेशों को जब सतगुरु के हृदय में उतर कर महसूस करोगे, तो जान पाओगे कि सतगुरु आपके लिए क्या चाहते हैं ?

जब तू आदेशों को सतगुरु की दृष्टि से पहचानोगे तो ही तो तेरे आदर्शों में ब्रह्मा कार, दृष्टि ब्रह्मा कार वृति आ जाएगी ।

जब तक आदेशों को महसूस नहीं किया, तो आदर्शों में तू खरा उत्तर नहीं पाएगा । आदेश को सुनने का तू आदती है, आप बोलो गुरुजी, जो बोलो हम कर गुजरेंगे, तो कोई ना कोई, यां तो सतगुरु, यां तो तू करता बन जाएगा । करता बनके किया कर्म result अच्छी नहीं देता, इसलिए आदेशों को महसूस करके आदर्शों को अपने जीवन में उतार दो, कि तू देह नहीं, तू ब्रह्म स्वरूप है । तुझे एक से नहीं सब से प्यार करना है । तुझे किसी एक की गलती नहीं देखनी है, पर ब्रह्मकार दृष्टि ब्रह्मकार वृत्ति में दटके रहना है । तुझे द्वैत को नहीं, द्वेष को नहीं, अद्वैत को पकड़ना है । अद्वैत के पुजारी बनो, पूजा करो तो अद्वैत की, कि यह मत कहां से पाई रे मैने साधु, सतगुरु से पायी । जो मत है, अद्वैत मत, कि एक ही ब्रह्म है, संसार में दूजा भाव ना कोई ।

इस प्रकार अगर तू निश्चय में रुकता है तो तेरा जन्म जीवन सफल हो सकता है वरना Time Pass मत करो ।


॥ है ही भगवान ॥

26-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन।।

"प्रकृति परिवर्तनशील है"

परिवर्तन के सिवाय प्रकृति चल नहीं सकती। मनुष्य स्थिरता के सिवाय सुखी हो नहीं सकता। बीच का रास्ता कौन सा निकालें जो प्रकृति के धर्म में भी कोई रुकावट न आए और मनुष्य की स्थिरता, एकाग्रता, एकरसता भी कायम रहे। बीच के रास्ते पर सतगुरु का संदेश है। सतगुरु ने संतोष धन का ऐलान किया है। बीच के रास्ते में धीरज है, बीच के रास्ते में wait and watch है, बीच के रास्ते में आत्म-निश्चय है। यह सब प्रकृति के और आपके मन के बीच में यह सब बातें अगर आ जाती हैं, तो प्रकृति अपने धर्म में चलेगी और मनुष्य अपने धर्म में चल सकता है।मनुष्य एकाग्रता में आकर अपनी शक्ति को कहीं गुना ज़्यादा बड़ा सकता है, और प्रकृति परिवर्तन में आकर कहीं गुना ज़्यादा एक मनुष्य के लिए कहीं सुखों की उन्नति कुदरत भी कर सकती है। कुदरत को कुदरत में चलने दो, मनुष्य को मनुष्य में चलने दो, संसार को संसार में चलने दो। All round होकर all is right वही सोचो, वही विचारो कि जो भी हो रहा है सब अच्छा हो रहा है। बदलाव भी ज़रुरी है, एकाग्रता भी ज़रुरी है, विशालता भी ज़रुरी है। कहां पर तू हद खींचे और मर्यादा में चले वह भी ज़रुरी है। Everything is first class !

।। है ही भगवान।।

26-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सब साधन का मूल है सतगुरु दुर्लभ प्रेम"

प्रेम बिना सब थोथा जान। अगर मनुष्य को तृप्ति आनी है तो वो गुरु वचनों से, गुरु प्रेम से। प्रेम के बिना जीवन ऐसा जैसे भोजन नमक के बिना। प्रेम जगत में सार है। प्रेम ऐसी चीज़ नहीं जो तुझे तकलीफ दे और कठिनाई प्रेम करने में आवे। पर प्रेम पाण हर रास्ते खोल देता है। सब रास्तों पर, सभी दिशाओं पर फूल बरसा देता है, काँटे निकाल देता है। प्रेम को शक्ति है काँटों को निकालके फूल बरसाने की। बाकी प्रेम नहीं है तो जीवन भारी है, जीवन बोझ है। तेरा जीवन हल्का न होके सर दर्द बन जाता है। प्रेम से सारे सर दर्द उत्तर जाते हैं, तू हल्का हो जाता है और तेरी खुशियों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। हितां हुतां प्यो महर वसाँए, सड्ण डिसण में भले अचे न चाहे। सामने सतगुरु है, तुझे न भी दिखाई दे, तो भी उनकी महर प्रेम के बाद कृपा दृष्टि बरसती रहती है।

।। है ही भगवान ।।

26-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संभाल"

संभाल एक ऐसी स्थिति है जो आपको सदा सुख देती है । आप संभाल सकते हो तो औरों को भी सुखी कर सकते हो । संभाल सबसे पहले करो अपने देह अध्यास की, जरा संभल के । जरा गफलत हुई या नजरें झुकी चौ ओर सभी ने घेर दिया । कहां से राग ने, कहां से द्वेष ने, कहां से मान अपमान ने ।

संभाल एक आत्म निश्चय से हो सकती है, कि तु ब्रह्म स्वरूप है तो गफलतें छूटती जाएगी ।

संभाल करो परिवार की । बातें तो आती जाती रहती है, कोई बात आए, हालत आए, लंबा न खींचो, उसको छोटा करने की कोशिश करो । साफ सफाई रखो घर में तो तंदुरुस्ती भी बनी रहेगी ।

संभाल रखो अपने रिश्तो में । ज्यादा किसी के डीप में मत उतरो । कमल के फूल की तरह खिले रहो । सभिनी जे विच में रहो ऐैं नयारा रहो । रिश्तो की संभाल करो ।

संभाल करो अपने शहर की, चमका दो साफ सफाई रखो, कचरा यहां वहां न फेंको ।

अपने मन में सच्चाई रखो । सच्चाई से जो कार्य करते हो, वह संपूर्णता से करो । आधे अधूरे कार्य से तृप्ति नहीं आती । फिर चाहे वह परिवार हो, शहर हो या देश हो या सृष्टि हो ।

संभाल रखो अपनी दृष्टि की । दृष्टि से दोष निकालकर फेंको । आत्म भाव भर दो । जहां तहां आत्मा की आत्मा । कूड़ा कचरा एक जगह फेंको और साफ सुथरा हर जगह को रखो । वह सफाई, वह सच्चाई, आपको ही अच्छे वाइब्रेशन(vibrations) देगी और आप सुंदर तो सृष्टि सुंदर । आत्म निश्चय कर के देह अध्यास को विदा करो और अपनी आत्मा में रहो, अपने परमात्मा के साथ, भगवान के साथ जुड़े रहो ।

॥ है ही भगवान ॥

27-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Be Relax"

Relax एक ऐसा इलाज है जो हर व्यक्ति के ह्रदय तक पहुंच कर उसको तंदुरुस्त बना सकता है। फिर चाहे वह बीमारी तन की है, मन की है, बुद्धि की है, राग द्वेष की है, नफरत की है, जिसकी जो बीमारी है, वह relax से दूर हो सकती है। Relax - शब्द बोलते ही तू ठंडा हो जाएगा। आत्मा में जब तू संतुष्ट है तो ही सच्ची relax मिल सकती है। निष्काम प्रेम - जब कुणका निष्काम प्रेम का तेरे ह्रदय में उतरता है, तो भी तू relax को प्राप्त कर सकता है। Relax एक ऐसी मीठी चीज़ है जो हर कड़वी हालत को हज़म करने में support देती है। Relax जब तू है तो तेरी मीठी जो मुस्कुराहट, relax से भरी निकलती है, उसी मुस्कुराहट के सहारे तू कईयों की जिंदगी बना सकता है। कईयों को रास्ता दिखा सकता है। सच्ची समाज की सेवा भी कर सकता है। हर एक राही को relax की ज़रुरत है। बाकी हर चीज़, हर एक को मिल रही है। उसकी प्रालब्ध के अनुसार, उनके कर्मों के अनुसार, उनके अपने पुरुषार्थ के अनुसार सभी को सब कुछ मिल रहा है। किवलीअ खे कण, हाथीअ खे मण ड्यण लाये बदल आहे। पर relax गुरु भक्त, गुरु भाई को दे सकता है। गुरु भाई सर्व को दे सकता है। Relax हो जाओ और औरों को भी ठंडा करो। ठंडे मटके गर्मी में भरके रखते हैं, ताकि कोई प्यास बुझाए। पर सतगुरु जी ने यही संदेश दिया ठंडा मटका भले भरो पर तू खुद ठंडा मटका बन जा कि तुझसे हर वक्त ठंडा अमृत बरसे, औरों को भी ठंडा करे। गुरु ने कहा आप जपे औरा नाम जपावे। यही तेरा लक्ष्य है, यही तेरी मंज़िल है।

।। है ही भगवान ।।

27-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दुख सुख झांको नहीं वैरी मीत समान"

ऐसी स्थिति तेरी बन सकती है कि तू दुख और सुख में कोई फर्क न समझे। वैरी तेरे लिए न रहे, सारे मीत बन जाएँ। ये स्थिति आत्म-ज्ञान के सिवा नहीं आती। आत्म-ज्ञान से ही तेरी स्थिति बन सकती है। आत्म ज्ञान से जो आपके पास आत्म-प्रेम आता है, सीख जाते हो, हृदय से निकलता है, वो तेरी स्थिति को थिर कर देता है। ब्रह्म में टिका देता है। ब्रह्मस्वरुप जब तू खुद हो गया, ब्रह्म में तू लीन हो गया तो तेरी स्थिति में कोई बदलाव नहीं। दुख सुख झांको तो कोई फर्क नहीं। वैरी मीत बना नहीं। ऐसी एकाग्रता जब तेरे भीतर आती है तो ही तो तू संयम में रह सकता है। और संयम वाला पुरुष ही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है और आत्मपद् पर बैठ सकता है।

।। है ही भगवान ।।

27-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दोखा"

दोखा खुद से होता है, दूसरे से नहीं। दूसरे को दिया दोखा भी खुद से ही होता है। जब तू आत्म-निष्ठि नहीं है, तो तेरा दोखा खुद से ही होता है। Loss तेरे पास आती है कि तूने आत्मा का निश्चय नहीं किया, देह को पकड़ा, देह अध्यास को पकड़ा, धीरज गंवा दिया, गुस्सा किया, तू-मां किया, मन-मुटाव रखा, नफरत की बठ्ठी में जला, तो दोखा किसे हुआ? देखने मात्र आपने सारे विकार दूसरों से किए, लेकिन फल किसको मिला? खुदको मिला।

खुद से दोखा मत करो। व्यवहार में कहीं अड़चन आती है, बातें बिगड़ती बनती हैं, तो भी दोखा तेरा खुद से होता है। व्यवहार सीधा क्यों नहीं रखा? Clear क्यों नहीं रखा ? तू कहेगा सामने वाला clear नहीं रखता। पर तू तो अगर strong है, तू रख सकता है। तूने भी नहीं रखा, तो दोखा तेरा खुद से हुआ। दोखा घर-परिवार को जब कोई देने की कोशिश करता है, वो भी फल किसको मिलता है? अशांति अपनी तरफ आती है। विचलित बुद्धि तेरी अपनी होती है, दूसरे की नहीं। तो दोखा किससे हुआ? तेरे से, खुद से हुआ। संसार-समाज में भी तू कहीं पर सही नहीं चलता तो vibration अगर अच्छे नहीं फहलते, तो वो बुराई भी किसकी तरफ आती है? सबसे पहले आपकी तरफ ही आती है। वहाँ पर भी दोखा खुद से हुआ। इसीलिए sprituality के रास्ते पर चलो, आत्मा का ज्ञान ले लो, आत्म-निश्चय करो, निश्चय-आत्मिक बुद्धि रखो, नफरत को दूर बगाओ, प्रेम को आगे रखो और दोखे से बच निकलो। यही तेरा लक्ष होना चाहिए, तेरी मंज़िल होनी चाहिए, यही तेरा कार्य भी होना चाहिए। और अपना कार्य करके अपना जन्म-जीवन सफल करो, और दोखा ना करो।

।। है ही भगवान ।।

28-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

प्रभात का सुख मनुष्य को प्राप्त हो जाए, तो पर-सुख से जान छूट जाए। पर-सुख में जब तक जान अटकी हुई है, तो अपनी सुख की ओर दृष्टि ही रख नहीं पाता, तो अपना सुख ले कैसे सकेगा? जिस चीज़ को तू देखता नहीं वो चीज़ को तू पा कैसे सकता? सुख तुझे भी है, - अपना सुख, अपना परिवार, अपनी तंदुरुस्ती, जो भी है तुझे बहुत कुछ अपना है, फिर भी पर-सुख में, पर-स्त्री में, पर-चिंतन में, पर-पदार्थ में, पर-धन में मन क्यों दौड़ता है? यह बीमारी है। इलाज है, एकदम सही, सहुलत जैसा तूर्त इलाज है। पर-सुख, पर-बीमारी जाएगी प्रभात से।

प्रभात का सुख लिया नहीं तो सारे पर में आ गया। सारे पर को वहीं पर ही रखो। निकालने की कोशिश मत करो। पर तू एक वारी मेरे वचन को ध्यान देकर प्रभात का सुख लेकर देखो। प्रभात का सुख पर-चिंतन छुड़ा देगा, पर-स्त्री छुड़ा देगा, पर-धन में मन है, वह भी छुड़ा देगा। जो भी दूसरे में तेरी उंची-नींची भावनाएं जाती हैं, जो न जानी चाहिए वह सुबह उठकर परमात्मा का ध्यान करो, भगवान देखो।भगवान में कितनी शक्ति है यह तू प्रभात को महसूस कर सकता है। प्रभात की एक ऐसी महिमा है, जो सुबह शक्ति लहरा रही है, लेकिन तू सोया है।

सुबह शक्ति परमात्मा देने के लिए निकलते हैं। लेकिन तू आलसी है। क्या कर सकते हैं? हर वक्त खुशी मिल सकती है प्रभात को उठने से। ठंडी हवा प्रभात की ग्रहण करो और भीतर विकारों की गर्मी को छोड़ते जाओ। सौदा बुरा नहीं है। लेकिन तू काबिल बना अपने को। सौदागर अच्छा बना तो यह सौदा हो सकता है। प्रभात को उठो और पर-सुख से, पर-चिंतन से अपने को छुड़ाते जाओ। अच्छे कर्म होते हैं, प्रभात में प्रेरणाए मिलती हैं। जितनी अच्छी प्रेरणा मिलेगी उतना अच्छा तेरा कर्म भी बनेगा। तेरा अच्छा कर्म है तो सृष्टि को एक अच्छा member मिलेगा, सृष्टि को एक अच्छा सेवा धारी मिलेगा जो आत्मिकता को प्रगट करे, आत्मा को प्रगट करे, अपनी आत्मा को जगाए, औरों को भी जगाए।

।। है ही भगवान।।

28-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ऐसा कठिन व्रत लीजिए जो ले न सके कोए, घड़ी इक बिसरुं राम को तो ब्रह्म हत्या मोहे होए"

बाकी के व्रत-उपवास तो तू कभी-कभी रखता आया है, वो भली रखो, वो अच्छे हैं। लेकिन एक उपवास, एक व्रत जो तेरे लिए और सबके लिए ज़रुरी है, वो व्रत कौनसा है? वो कठिन व्रत ये है - जो तू ज़र्रे-ज़र्रे ब्रह्म नहीं देख सकता, उसको देखने की कोशिश करो। Success हो जाओ। जो तू बार-बार भुलकड़ होके भूल जाता है, वो भूलना बंद करो। ब्रह्म में स्थित हो जाओ, तो कठिन व्रत तेरा हो ही जाएगा।

अंदर में द्वैत बुद्धि, द्वेष बुद्धि पड़ी रहती है, उस बुद्धि के कारण तू आत्मा में आ नहीं सकता। अब उस द्वैत और द्वेष वाली बुद्धि को खत्म करके, प्रेम की बारिश बरसा दो। ये व्रत रखो कि मैं प्रेम की बारिश को बरसाऊंगा। सारे संसार को उस बारिश में भिगाऊंगा। ऐसा व्रत लीजिए जो ले न सके कोई। परमात्मा अपने बच्चे से बहुत प्रेम करते हैं। ऐसा ही उन्हें संभालते हैं और जिज्ञासु को बराबर रखते हैं। अब तेरे भी हाथ में है फैसला कि तू भी भगवान के यज्ञ को सोहेला बना, प्रेम कर। ऐसा व्रत रख जो कोई समझे कि इसने जो रखा है, बहुत अच्छा आदर्श कायम किया है। कायम करो आदर्शों को और गुरु को भी आदर्शों से प्रगट करो।

।। है ही भगवान ।।

28-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सब लीला पई हले"

सब लीला ही तो चल रही है। लीला को लीला करके जानो तो सारे भेद भ्रम मिट जाएंगे,जीवन प्रेरणामय ब्रम्हमय हो जाएगा।Life is game , उसमें संतोष करना ही पड़ता है। संतोष संतोष से करो तो बहुत अच्छा,पर संतोष अपने पीड़ा से किया, तो वो पीड़ा बड़ जाती है। पीड़ा बढ़ाने के लिए हमारा जन्म नहीं हुआ है। संसार से पीड़ा घटाने के लिए, अपने आपको पहचानने के लिए, परमात्मा की रांद को देखने के लिए, ये मनुष्य जन्म मिला है। प्रकृति बदलती रहती है, लीला चलती रहती है,थीर तो आपको होना है।मन को थीर रखना है, लीला तो बदलती रहेगी ना। तू उल्टी दवाई पिता है। जो लीला,जो दृश्य आपको अच्छा लगता है, सोचते हो ये रूक जाए ।मन बलि भागे ,पर ये दृश्य मेरे जीवन में रूक जाए,ऐसे कैसे हो सकता है? इसलिए रंग बदलती दुनिया, प्रकृति माता जो परिवर्तनशील है, उसको भी जानो, और अपने आत्मा के निश्चय को जानो , की तू देह नहीं, तू तो ब्रह्म स्वरूप है। दवाई बराबर पियो । बदलने वाली प्रकृति को बदला हुआ मानकर अपने मन को स्थिर रखो।


॥ है ही भगवान ॥

29-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अरदास"

अरदास वचन से ही आपके दिल में, आपकी नस-नस में relax दौड़ती हुई आती है, ध्यान से खुद में, खुदको देखो तो। अरदास एक ऐसी स्थिति है, जो तू ज्ञान में भी इस एक अरदास को साथ में लेकर आगे बढ़ जाएगा। हर वक्त यही अरदास तेरे भीतर रहेगी कि हे परमात्मा, हे प्रकृती माता, ऐसे रास्ते देते जाओ जिसमें मैं खुद भी सुखी रहूंँ आत्मज्ञान से और मैं संसार को भी आत्मज्ञान से सुखी करुं। ये भी एक अरदास है, रोज़ करो, हर वक्त करो, हर वेले करो।

लेकिन अरदास तू एक अपनी इच्छा के वस में भी करता है। संसारिक पदार्थ, भौतिक सुखों के लिए, हर वक्त तू अरदास करता रहता है। वो भी ठीक है, करो। लेकिन कभी कुछ मिलता है संसार के सागर से, कभी तेरी प्रालब्ध के अनुसार, कर्मों की खेती के अनुसार न भी मिले तो भी शक-शिकायत मन में न रखो। वहीं पर अरदास सत्य की रखो कि इक भगवान तू जो मिला है , तो सारी दुनिया मुझमें समा गई है। इक तू जो मिला, सारी दुनिया मिल गई। परमात्मा अपने बच्चों को हर वक्त उसकी ज़रुरत के अनुसार देते रहते हैं। पर तू परमात्मा को चाहता है, अपने जीवन में मांगता है तो ये सबसे बड़ा तेरा जीवन सोना है। है मनुष्य जन्म सोना इसको यूँ ही न खोना।

।। है ही भगवान ।।

29-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आतम पद से नीचे आना अर्थात गिरना"

जिज्ञासु की complaint तो रहती है, कि मैं फिर फिर क्यों गिरता हूं ? क्यों फिसलता हूं ? लेकिन मालूम नहीं पड़ता उसको कि क्यों, कब, कैसे गिरता है । क्यों मालूम नहीं पड़ता ? क्योंकि कारण जनता नहीं, कारण को पकड़ो, तो निवारण भी हो सकता है ।

कुछ छुपे हुए ख्याल, उसका डर, कहीं बाहर निकले तो क्या होगा । कुछ छुपे हुए कर्म, छुपा के करने की आदत, जरूरत भी नहीं है छुपाने की, खुलम खुला करो तो भी चलेगा, समझता भी है, लेकिन फिर भी बड़ी पुरानी आदत बातों से बदलती नहीं है । छुपे हुए कर्म उसमें आपको taste आती है, मजा लेते हो, कर्म भी बनाते हो, कर्मों का खाता multiply (मल्टीप्लाई) होता जाता है ।

भगवान ने कहा उड़ा दो, भीतर से निकाल कर रख दो, अपने विकार बीचो-बीच तो हवा में उड़ जाएंगे । पकड़ते हो तो तेरे साथ चलेंगे । वही विकार फिर जन्म लेंगे, उड़ा दोगे अपने निश्चय से सतगुरु के प्रेम में तो दोबारा जन्म भी अच्छा होगा । ब्रह्म बन के जियो । ब्रह्मामय बनके लीन हो जाओ, ब्रह्ममय बनके फिर रचना करो, जिज्ञासु इसी को कहते हैं ।

लेकिन तू खुद से धोखा कर रहा है जब भीतर ही भीतर कोई न कोई प्राइवेसी रखता है । कुछ न कुछ छुपाने की आदत छुपी पड़ी है, खुद से पूछो ना छुपाया तो क्या होगा । दो थप्पड़ भी खाओ लेकिन भीतर मन को काला मत करो । कम खाओ, भीतर मन को काला मत करो । कम बोलो, मान अपमान को सहन करो, लेकिन अपने भीतर आत्मा के निश्चय में कभी नुकसान मत ले लो । सच्चा नुकसान यही है कि तू आत्मा का आनंद ले नहीं सकता, आत्मा का निश्चय कर नहीं सकता, क्योंकि तेरे कर्म और तेरे ख्याल सब अंदर ही अंदर दमन है । भीतर खाली करो खुद को और खाली बर्तन में अमृत लेकर जाओ ।

॥ है ही भगवान ॥

30-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संतों का संग मस्तक रेख मिटा देता है, सूली से कांँटा बना ही देता है"

तू कौन सी company में रहता है? जब तू संसार की company में ज़्यादा जाता है, deep जाता है तो उनकी बातें आपके दिल दिमाग पर छा जाती हैं। उनके विकार आपके भीतर आने लगते हैं। लेकिन तू संतों का संग कर, सतगुरु का सत्संग कर, तो फिर देखो आपके भीतर कितनी अच्छी बातें आती हैं। करुणा का स्वभाव, मैत्रित्तव्, मुद्दता, सब तेरे हृदय के भीतर आ ही जाएँगे। क्योंकी as the company, so the colour! जिस रंग में, जिस संग में तू खुदको बिठाता है, उसी रंग-संग में तू गुम होके रहता है। गुम होईके वेख नज़ारा। अपने भीतर झांकों और अपने सतगुरु के प्रेम में डूबकर उसके संग को महसूस करके बस उनमें लीन रहो। तेरे नाम की लओ कुछ ऐसी लगी जो मैं पल भर भी तुझे बिसरा न सकुं। उसमें लीन रहो और अपनी मस्तक की रेखाओं को ठीक करते जाओ।

।। है ही भगवान ।।

30-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

अपनी सीमा में रहना सीखो ,हद्दो में रहना सीखो।एक हद्द है जिससे सतगुरु के वचन ऊपर उठाते है।'हद्द- हद्द सबको कहें,बेहद कहें न कोई '। हद्दो से ऊपर उठाने वाले सतगुरु हैं, उनके वचन है।सारी हदें पार करके तुझे आतम पद् पर बिठा देते हैं। लेकिन फिर भी कुछ हदें ऐसी होती हैं, जिसमें रहना ही पड़ता है। मर्यादाऐ नीभानी पड़ती है, वाणी को control में रखना पड़ता है ‌, शब्दकोश  से शब्दो को चुन-चुनकर बोलना पड़ता है, सत्संग में भी अपने दायरे में रहना पड़ता है। सभी के भीतर जाना, और सब के बातों में जाना ,हर चीज को अपने तरफ से परखना ये मर्यादा नहीं है।इन मर्यादाओं का पालन करने के लिए अपनी हदों को पहचानना जरूरी है। इस प्रकार तू जब इन हदों को पार करके आत्म पद् पर पहुंचेगा, और एक हद् को पार न करके , अपनी हद् में रहके भी तू आत्म पद् पर ही पहुंचेगा। दोनों तरफ से आपको जिज्ञासु को फायदा ही होगा।जे तू गुरू वचनों को ध्यान में रखके practical में आता जाएगा, तो कोई भी बात तेरे लिए impossible नहीं होगी, सारी चीजें possible है, तू हर चीज कर सकता है, लेकिन अपनी judgement सही रखो।


॥ है ही भगवान ॥

31-Jan-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर यज्ञ को संभालना। हमने गाया, आपने साथ दिया, यज्ञ अच्छा चला, चल रहा है, चलेगा। लेकिन आपके साथी चार हैं - बोलना, सुनना, सोचना, करना। अब मैंने तो अपने साथियों को सुखी किया, क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे सुखी किया। पर तू अपने साथियों को शायद सुखी कर पाया है या नहीं ये आप जानो। बोलना दुखी है क्योंकि तू ज़्यादा बोलता है। बोलना कहता है मुझे थोड़ी relax दो। आप सुनते ही नहीं हो। हम आपकी सुनते हैं। आप अपने साथी की नहीं सुनते हो, थका देते हो, ज़्यादा बोलते हो। सुनना कहता है, अरे मैं तो तेरे से ज्यादा थक गया हूं। क्योंकि जहां ज़रुरत नहीं है, वहां सुनता ही हूं। अब मैं क्या करुं? आप सोचो वह क्या करे? सोचना तो बीमार पड़ गया है। आपने उसे इतना थका दिया है जो वह बीमार पड़ गया है। वह कहता है मैं सही सोच ही नहीं सकता हूं। क्योंकि मेरे ऊपर load- वज़न ज़्यादा दे दिया गया है। मैं कैसे सोचूं? इसीलिए मैं उल्टा सीधा सोच लेता हूं।

करना - वह बिचारा तो आवारा ही बन गया है। वह कहता है तीनों का बोझ मेरे ऊपर है। अगर यह तीनों थके हुए हैं तो मैं कैसे relax में आऊ। इसीलिए करने में तो आवारागर्दी आ गई है। अब आपके चार साथी जब इतनी तकलीफ में हैं तो आप कितने तकलीफ में होंगे ये हम जानते हैं। इसीलिए थोड़ीसी तपस्या की ज़रुरत है। अपने चारों साथियों को सुखी करो। तप में थोड़े आ जाओ। आत्म-निश्चय करो। गुरु श्रद्धा, गुरु प्रेम, गुरु भक्ति, गुरु भावना, गुरु वचन - इन सब बातों को ध्यान में रखकर अपने चारों साथियों को सुखी करो। हम आशीष देते हैं और आपको आदेश भी देते हैं और विनती भी करते हैं। Please अपने चारो साथियों को सुखी करो तो हम और सुखी हो जाएंगे।

।। है ही भगवान।।

31-Jan-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"न पाया, न खोया, संश्य मूल चुकाया"

आत्मा के ज्ञान में पाया-खोया तो है ही नहीं। पाना क्या है ? आत्मा तो तृप्ति की तृप्ति है। आत्मा तो प्राप्ति की प्राप्ति है। फिर तू क्या पाएगा, किस बात में तृप्त रहेगा? क्योंकि वो तो पहले ही तेरे पास है। खोया क्या? देह तो तेरी थी ही नहीं। आत्मा के निश्चय में ये निश्चय ज़रुरी है कि तू देह नहीं है। पर वाजिब बात भी यही है कि तू देह था ही नहीं, तो अभी तू खोएगा क्या! वो एक भ्रम थी, भ्रम तूने छोड़ दिया, तो खोने के लिए आपके पास कुछ रहा ही नहीं। इसीलिए आत्मा के निश्चय से आप भरपूर ही भरपूर हो और future में कभी भी कोई गिरावट आती नहीं। क्योंकि तूने झूठ को झूठ, सत्य को सत्य समझ लिया, मान भी लिया।

।। है ही भगवान ।।

31-Jan-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ब्रह्मकार विरती"

सतगुरु तूझसे लगन मेरी लागी रहें और ब्रह्मकार जागती रहें '।कड़ी मेहनत से सतगुरु जिज्ञासु के ब्रम्हकार विरती बनाने में सफल होते हैं, और तू उसी विरती को नष्ट और भ्रष्ट पल में कर देता है, ये गुरू का कर्जा कैसे चुकाएगा?रोज गुरू विरती बनाए और तू खराब करे_कैसे हो सकता है? ये जिज्ञासु का जीवन तो नहीं हुआ। जिज्ञासु कर्म करें न करें पर अपनी विरती को संभालने में रहें, तभी जिज्ञासु हैं। जिज्ञासु दुसरे कोई शौक रखें न रखें, पर एक शौक जरूर रखें, कि मैं देह नहीं, मैं आत्मा हूं, ब्रम्ह स्वरूप हूं।जे तू ब्रम्ह स्वरूप है, तो तेरे आस-पास जो भी है -जड़,चेतन,मानव-दानव सब तो ब्रह्म स्वरूप हुए न ।उनको ब्रह्म स्वरूप न देखा, तो विरती पर हमला हो सकता है। कोई न कोई विकार तेरे ब्रह्मकार विरती पर हमला कर देता है।'फिर पछताए क्या हुआ जब चिड़िया चुग गई खेत '।बार बार पछताना जिज्ञासु का धर्म नहीं है। इसलिए दट् के रहो-अपने आत्मा में दट् के रहो, अपने निश्चय में अड़ोल रहो, अपने विश्वास में अटल रहो, श्रद्धा में भरपूर रहो। दादी भगवान ने कहा - sense की कमी नहीं है common sense संसार में नहीं है।अपना फर्ज समझोcommon sense को रखना,और तू रखेगा तो औरों तक बांट सकता है, वरना lecture करते रहो , कोई किसी की सुनता नहीं है।'पर पदरें थींधन जात तुहिजीं रहत मां'।रेहत से आदर्श टपकता है, आदर्श बताने से बदल नहीं सकते हैं। इसलिए आदर्श रखो,रेहनी-केहनी रखो, ब्रम्हकार विरती में मजबूत रहो, और बनना है तो ब्रह्म बनो।


॥ है ही भगवान ॥

February
01-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"God gift मुस्कुराना"

मनुष्य के होठों ने भगवान को complaint किया है कि मनुष्य खुद तो बड़े-बड़े महल बनाता है, इतनी area लेता है, complex बनाता है, बेहिसाब area लेता है। लेकिन मनुष्य अपने होठों को 1 inch की area दे नहीं पाता। होंठ कहते हैं हमें खाली 1 inch मिल जाए। आधा inch इस तरफ, आधा inch उस तरफ। हम अगर फैहल जाएं तो मनुष्य की रौनक बढ़ जाएगी, face smiling हो जाएगा। वही face देखकर सभी को अच्छा लगेगा, आनंद आएगा। पर तू मुस्कुराता क्यों नहीं है ? परमात्मा के होते हुए आपको कभी कोई तकलीफ आनी ही नहीं है। आप किस चीज़ की चिंता करते हो और क्यों करते हो ? मुस्कुराना क्यों भूल गए हो ?

हंसकर ही सुलझ जाती है उलझनें कभी-कभी, हर मनुष्य जे मुस्कुराना सीख ले, मुस्कुराना अपना फर्ज़ मान ले। Duty है तेरी मुस्कुराना ! हालत आए चाहे जैसी, पर लुट ना पाए तेरे मन की मस्ती। भगवान ने आशीष तो दे दी है, पर तू लेता चल और मुस्कुराता चल। हर हालत गुज़र जाएगी, हर बात निपट जाएगी, जे तेरा face smiling है तो। Smile करो! देखो नहीं - यह चंगा है या मंदा है, खराब है या खोटा है। बस तेरा धर्म है मुस्कुराना। मुस्कुराता हुआ चेहरा रखो और अपना जन्म सफल करो।

।। है ही भगवान।।

01-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रणाम, गुरुदेव को शत्-शत् प्रणाम, बार-बार नमस्कार"

जब तू उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते, खाते-पीते, सतगुरु को भीतर ही भीतर link जोड़ता रहता है, प्रणाम, नमस्ते, नम्न भाव, नम्रता करता रहता है, ऐसी स्थिति भीतर कायम रखता है, तो link तेरी हर वक्त जुड़ी रहती है। वर्ना गफलत हुई, नज़रें झुकीं, घेर दिया present, past, future ने। घेरे से निकल नहीं सकते हो, बंद जाते हो तीनों कालों से, हर कर्म से। कर्म करने के लिए होते हैं, बंदने के लिए नहीं। जो कर्म मुझे बांध लेते हैं वो कर्म, कर्म नहीं हैं। वो सज़ा बन जाती है। कर्म आत्मनिश्चय से होते रहें, हस्ती-शक्ति तेरे कर्म परमात्मा की सिद्ध करें। एसे कर्म सतगुरु को प्रणाम करते-करते होते रहते हैं, मन से शुक्राने भी निकलते हैं और तू बंधन में भी नहीं आता। इसीलिए थकान तेरी dictionary में नहीं। एक से अनेक कर्म करो, लेकिन no counting ! जब counting नहीं तो थकान नहीं। किया किसने ? जिसकी हसती-शक्ति है! मैंने क्या किया, कुछ भी तो नहीं। नज़र टेडी करे तो घाई बना दे। उसकी नज़र से जो हो रहा है, समझो वो ही कर रहा है।

।। है ही भगवान ।।

02-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नाम कोई भी लीजिए ईश्वर तो है एक"

एक ईश्वर को सिद्ध करने के लिए मनुष्य का जन्म हुआ। एक मनुष्य ही तो है जो ईश्वर को सिद्ध कर सकता है। महसूस करो वही ईश्वर तेरे पास में ही है, साथ में ही है, दूर नहीं है। फक्त अज्ञान का पर्दा सतगुरु उठाए तो ईश्वर दिखाई दे। ध्यान दो अंतरमुखी होके, तो महसूस करोगे परमात्मा की हाज़री। वह हाज़रा हजु़र है। किसी दिल से दूर नहीं है। सभी के अंग संग है। सदा बसत हम साथ, सदा बसत सब साथ, सदा बसत तुम साथ। आप सभी के साथ महसूस करो तो वह हाज़रा हज़ूर है ही है। ऊठो तो ऊठते हैं, सो जाओ तो सुलाते हैं।

घट में कौन है तेरे ? जे वह घट में ना बैठे, मुख में ना आए तो शब्द बोलके दिखा! वह मत में ना बैठे। मत विच रतन जवार माणिक जे इक गुरु की सिख सुनी। मत में जब सतगुरु बैठते हैं, तो ही तेरी मत सही दिशा में चल सकती है। वरना मत का भी क्या भरोसा? तप के लिए तेरा जन्म हुआ। तप ना हुआ तो क्या हुआ। ज़्यादा तप में कोई तकलीफ नहीं। फक्त अंतर्मुखी हो जाओ, ध्यान अपने ख्यालों पर लगाओ। उल्टे सीधे ख्यालों को साफ-सुथरा करते जाओ तो कर्म भी अच्छे होंगे। तू प्रिय बनेगा, सबकी आंखों का तारा बनेगा, सृष्टि का तू दुलारा भी बन जाएगा, परमात्मा का तो साथी बन जाएगा। परमात्मा को भी ऐसे साथियों की ज़रुरत है जो सृष्टि में सत्य का संदेश फैलाते जाए, सृष्टी में शांति देते जाएं। मन की शांति के सिवाय कुछ भी नहीं है। इसीलिए सच्चे साथी बनो और मन शांत रखो, मन एकाग्र रखो, मन प्रेम मय रखो, तो तुझसे औरों को भी यही डा्त मिल सकती है। सच्ची कुर्बानी यही है कि तू अपने देह से ऊपर उठ जा, देह-अध्यास को छोड़ दे, आत्म-भाव को पकड़ ले। यही सतगुरु का संदेश है, जो हम सब बच्चों को बाँटना है।

।। है ही भगवान।।

02-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बोलत बोलत बहे विकार"

जो विकार तेरी मुख की इंद्री करती है वो विकार कोई और इंद्री कर नहीं सकती। मुख में परमात्मा को बिठा दिया, तो वो इंद्री विकार करने से बच जाएगी और आपको तकलीफ नहीं देगी। नहीं तो वो ही इंद्री बुरा बोलके, बुरा खाके, बुराई की तरफ बढ़ती ही जाती है। इसकी रोक थाम समय पर न हुई तो आगे जाके तू रोक थाम कर भी लेगा। पर जो इंद्री मुख की control में न रहकर तुझे नुकसान पहुंचाएगी, उस नुकसान का कोई भी return नहीं है। उसने जो नुकसान पहुँचा दिया सो पहुँचा दिया। जहां नसीब कोई गुरु तेरे को return करा दे। वर्ना मुख से निकले शब्द, फालतू की चीज़ खाना, मुख से उल्टे-सीधे बोलना, कौन इसकी भरपाई कर सकता है? कोई भी नहीं! तू जब तल्बदाड़ है, अपनी बुराइयों को छोड़ने का शौंक है, तो ही गुरु कारीगर बनके तेरे ऊपर काम कर सकता है। वर्ना तुमरी गत् मत् तुम्हीं जानो। यही गुरु का संदेश है।

।। है ही भगवान ।।

02-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दोष"

दोष विचार किया जाए, तो कहां है ? संसार में है ? या आपके पास है ?
निकालें तो कहां से निकाले ? संसार से निकाल सकते हैं या जो आपके पास है उससे निकालने में खुद तू समर्थ है । संसार से दोष निकालने में तू जितना असमर्थ है उतना तू अपने से दोष निकालने में समर्थ है । पर उल्टा काम हो रहा है । दोष तू संसार से निकाल रहा है, खुद के दोष पर कोई दृष्टि ही नहीं । अपने में विचार कर, अंतर्मुखी हो जा ।

दोष कहां है ? गुरु के वचन भीतर लेकर भीतर से ढूंढो, सबसे पहले दोष तेरी दृष्टि में है । दोष तेरी वाणी में है । दोष तेरी नजरिए में है । दोष तेरे खयालों में है, तेरी फिलिंग्स (feelings) में है । तेरी इंप्रेशन (impression) और उसूलों में है । और न जाने कहां-कहां दोषों को तू छुपा कर रखता है । यह तो सतगुरु ज्ञान की लाइट जला दे, रोशनी दे दे, तो ही तुझे मिल सकता है कि मेरे दोष कहां है फिर तू विचार कर सकता है कि मेरे गुण अवगुण प्रभु हर लो । दोष सब मैं तेरे समर्पित करता हूं मुझे खाली कर दो ।

संसार से निकालने वाले दोष ऐसे तो नहीं निकलेंगे ।पर जे कोई एक मनुष्य जिज्ञासु की अवस्था में आ जाए, खुद को जिज्ञासु में माने और जिज्ञासु वाला आदर्श अपनाए, जिज्ञासु की तपस्या में रहे, खाली हो जाए, अपनी इंद्रियों से, अपने मन से दोषों को निकालकर निर्दोष बन जाए कि मैं ब्रह्म स्वरूप हूं मैं आनंद स्वरूप हूं, मैं अजर अमर हूं लेकिन मैं यह देह नहीं हूं ।

देह मानना ही सबसे बड़ा दोष है । देह माना दृष्टि वही देह वाला काम करेगी । देह माना दृष्टि तेरी तेरे ऊपर न जाकर औरों के ऊपर जाएगी और दूसरों का दोष समेत कर तेरे मन के भीतर डालती जाएगी । वाणी भी तेरी देह अध्यक्ष का ही काम करेगी । कर्म भी इंद्रियां देह अध्यासी बनकर करेगी इसीलिए दोष, अपने में ढूंढो बाहर संसार में ना ढूंढो । अपने में अगर दोष ढूंढ के तू आत्मा में आ जाता है तो संसार के बहुत सारे हिस्सों में तू निर्दोष बना सकता है कि तुम भी सब मेरे जैसे आत्मा हो, मेरे जैसे ब्रह्मा हो । जिस जिस को तू आत्मा का निश्चय कराएगा उसी का दोष निकल जाएगा और संसार समाज में उतनी हिस्से में सुख शांति आ जाएगी और इसी तरह, दूसरा तीसरे को, तीसरा चौथे को, अगर आत्मा का निश्चय कराए तो फिर संसार में बहुत हद तक शांति फैल जाए और मेरे सतगुरु की सृष्टि सुंदर हो जाए । यही काम करो, खुद को देखो, खुद में जानो और सृष्टि सुंदर करने का सही और सच्चा मार्ग सही समय पर ले लो ।

॥ है ही भगवान ॥

03-Feb-2016

।। परम पूज्य श्री दीमां भगवान जी के अमृत वचन ।।
"मर्यादा"


मर्यादा शब्द ही सुंदर है, अति सुंदर है । मर्यादा में मौज ही मौज है, balance ही balance है। मर्यादा शब्द से भी ममता हो गई।
मर्यादा की सि्थति में तू जीने लगा, अपने आदर्शो की डोरी से बांधने लगा, तो तेरा जीवन सर्व के लिए बन सकता है। तेरा जीवन आलौकिक हो सकता है, सफल हो सकता है। सफलता में कई बार मर्यादा खिसकती है, असफलता प्राप्त हो जाती है। मौन अगर मर्यादा में रहना सीख ले तो समाज से तो दुख दर्द निकल सकते है। मर्यादा में तू एक दूसरे को प्रेम कर सकता है, एक दूसरे का दुख दर्द बांट सकता , समझ सकता है। मर्यादा नहीं तो तू बिना पतवार के जीवन जी रहा है डगमगाता है । मर्यादाओं से स्थिरता प्राप्त होती है तू अपनी मर्यादा में स्थित है आगे ईश्वर की मर्जी जो होगा अच्छा ही होगा। मर्यादा तेरे मन की तेरी बुद्धि की तेरे तन की सबसे first है। मन की मर्यादा ख्याल ठीक रखो, बुद्धि की मर्यादा, बुद्धि साफ-सुथरी रखो , भटकाने के लिए मत छोड़ो। तन की मर्यादा विकारों के रंग में तन को न रंगों प्रभु प्रेम के रस में तन को भी रंग तन ,मन ,बुद्धि की मर्यादा तेरी सबसे पहली है । परिवार की मर्यादा, जियो और जीने दो। कभी तेरी चली, कभी किसकी चली। Digestion power बढ़ाते जाओ। मर्यादाओं भावनाओं से digestion power तेरे मन का बढ़ जाएगा। ‌सहारो, वरी वेसारो। सहनशक्ति ऐसी होवे , उसके साथ भूलने की शक्ति भी होवे। याद रहता है मैंने सहा , मैंने सहा तो तू पीड़ित बन गया, पीड़ा में आ गया पर मैंने मर्यादा निभाई तो तू खुशी में आ गया, संतोष में आ गया। समाज के प्रति भी मर्यादा है। समाज की सेवा के लिए first तन ,मन, बुद्धि, परिवार ठीक रखेगा तो आदर्शी पुरुष बन सकता है। एक आदर्शी family बन सकती है। समाज के सारे दुख दर्द निकल जाएंगे अगर तू मर्यादा की सीमाओं में रहेगा तो । सबको प्रेम कर सकता है, सबको जीवन दे सकता है , मर्यादाओं की सीमाओं में । मर्यादा निभाओ , मौज में रहो , प्रेम में रहो , शक्ति बढ़ेगी , उन्नति होगी , spirituality का power सारे संसार में तेरी मर्यादाओं से ही बढ़ जाएगा।

।।है ही भगवान।।

03-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बांटने से बढ़ती है शक्ति, होता अपना ही उद्धार है"

गुरुदेव ने बता दिया कि बांटने से बढ़ती है शक्ति। लेकिन आप बांटों तो क्या बांटों? जिस बांटने से शक्ति बड़े ! बांटना है तो धीरज बांटों, संतोष बांटों, प्रेम बांटों, आत्मविश्वास बांटों, आत्मनिश्चय बांटों। सबको आत्मा का दीदार कराओ, त्याग वैराग बांटों, समता भाव बांटों। समता का अंजन खुद ले लो और संसार में समता का अंजन सबको छँडा लगाओ और अंजन देते जाओ। समता भाव से जो सुख मिलता है संसार को वाकिफ करो। बांटना है तो ऐसा सुख बांटों, जिसको बांटों फिर कभी वो उससे जाए न। जो सुख आए और फिर कभी न जाए। ऐसे सुख की तलाश करके, खुद सुखी हो जाओ, औरोंको भी सुखी करो।

।। है ही भगवान ।।

03-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दुख सुख झांको नहीं वैरी मीत समान"

दुख सुख झांकने से, गिनती करने से कुछ नहीं होता । दुख सुख की डेफिनेशन(Definition) बदल दो ।

दुख किसको कहता है ? कौन सा ऐसा दुख है जो भगवान ना दिखाएं ? कौन सा ऐसा सुख है जो बैलेंस में रहने ना दे ? तो दुख सुख कैसे हुआ ? चेंज कर दो डेफिनेशन कि मुझे दुखों और सुखों सभी से है प्यार । आप मत करो इंतजार, न दुख का न सुख का, आने वाला इंतजार, न दुख का न सुख का जाने वाला इंतजार । सम दृष्टि करके देखो बस एक भ्रम ही नजर आवंडा ।

एक आत्मा ही नजर आएगी जब तू ब्रह्म ब्रह्म ब्रह्म देखता है, महसूस करता है, हर हालत में हर बात में । जिन सकलो ब्रह्म पहचानो । जो सब ब्रह्म करके जानता है, वह अकर्ता कर्ता दोनों से ऊपर उठ जाता है; और 2 फुट torch रखकर बस परमात्मा की मस्ती में, अपनी आत्मा की मस्ती में चलता रहता है । ना किसी से अड़ता है ना किसी से लड़ता है, ना impression बनाता है ना उसूलों में भटकता है; बस जो उसका पड़ोसी है वह उसको प्रेम करता भी है, लेता भी है देता भी है ।
Love your neighbour । पड़ोसी से प्रेम करो । पड़ोसी तेरी देह भी है । पड़ोसी तेरा परिवार भी है । पड़ोसी सत्संग भी है, समाज संसार भी है, जो तेरे संपर्क में आया वह पड़ोसी है । फिर चाहे दुख आया, या सुखा आया, मान आया, अपमान आया, नजदीकी आई या दूरी आई, है तो पड़ोसी ना । पड़ोसी से प्रीत करो, यह न कहो कि पड़ोसियों से दिल ना लगाना । हम कहते हैं पड़ोसी से प्रेम करो ।

॥ है ही भगवान ॥

04-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कुर्बानी"

अच्च कुर्बानियजी कतार में। सच्ची कुर्बानी वही है जो तुझे पता भी न पड़े और कहींयों को सुख मिलता रहे। पता भी न पडे़ का अर्थ है, तुझे उस कुर्बानी का अहंकार न आवे। कुर्बानी मनुष्य करे, फल निकले, किसीको सुख मिले। कुर्बानी शब्द फक्त अहंकार में अपनी गाथा गाने के लिए नहीं होता है, पर कुर्बानी first अपनी सुख बुद्धि की कुर्बानी चाहती है। अपने सुखों को संभालके रखो। तू ही लेले। तेरी प्रालब्ध तेरे लिए ही बनी है, किसी और के लिए नहीं। लेकिन सुख बुद्धि की तो कुर्बानी कर ना। सुख तेरा, सुख बुद्धि भगवान को अर्पित करो, तो कहींयों को सुख मिलेगा। समाज सुखी हो जाएगा। गृह-गृहस्थ ठंडे हो जाएंगे। सुख बुद्धि है तो छीना झपटी है, छीना झपटी है तो अशांति है, अशांति बढ़ी तो दुख-दर्द बढ़ा। दुख दर्द बढ़ा तो नफरत की आग में मनुष्य जलता रहता है। तू-माँ होती रहती है। Foundation खराब है, तेरी सुख बुद्धि। सुखों को लेना है, सुख बुद्धि को छोड़ना है। उलटी चाल, सुख तेरे हिस्से में आए ना आए, कुछ मिले ना मिले, पर सुख बुद्धि तू ज़रुर रखता है। मुझे यह मिलेगा, मुझे वह मिलेगा। कल्पना की दुनिया में भी सुख बटोरता है। बाहर की दुनिया में नहीं मिला तो क्या हुआ? कल्पना में तो रस लेता हूं ना। यह सुख बुध्दी है तेरी जो तुझे कुर्बानी की कतार में खड़े होने नहीं देती।

याद करो देश भक्तों की कुर्बानी, याद करो soldier भाइयों की कुर्बानी, याद करो जो अच्छे निष्काम कर्म करके समाज में pillar होके खड़े रहते हैं, औरों को सुख देते हैं - उनकी कुर्बानी याद करो। तू भी आ कुर्बानी की कतार में, कहीं कुछ तेरे से हो जाए तो अच्छा है। लेकिन क्या होवे ? First चीज़ है आत्म-निश्चय। आत्म-निश्चय तू करेगा, उसमें तुझे अपनी सुख बुद्धि की कुर्बानी देनी पड़ेगी। देह-अध्यास की कुर्बानी देनी पड़ेगी। देह को संभालना पड़ेगा और त्याग वैराग से तू भरपूर रहेगा। वहीं पर निरइच्छा होके अपनी इच्छा की कुर्बानी देनी पड़ेगी। पहले तू यह छोटी छोटी कुर्बानियां देने के काबिल बन जा, कतार में आ जा, फिर कुदरत तेरे से बड़े से बड़े कार्य भी करा ही देंगे। तेरा जन्म सफल हो जाए ।

।। है ही भगवान ।।

04-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मौन"

मौन एक ऐसी मनुष्य की शक्ति है जो वो जहाँ लगाए सुख पाए। जो बिगड़े काम तेरे नहीं बनते, वो भी मौन होने से सब बन जाते हैं। मौन करने वाला जिज्ञासु ही हर वक्त मजे़ में रहता है। वर्ना जिज्ञासु के लिए भी सतोगुणी माया है, जिसमें उलझता रहता ही है। पर मौन रहने से सतोगुणी माया, रजोगुणी माया, या खणी तमोगुण माया, मौन वाले जिज्ञासु पर हावी नहीं पड़ती। इसीलिए मौन धारण करो। मौन की definition समझो। मौन का अर्थ यह नहीं है कि कुछ बोलो ही ना। मौन का अर्थ यह है कि तू जो extra बोलता है, उसमें ही तुझे बहुत सारी दिकतें आती हैं। Extra न बोलो, मर्यादा में रहो। अपनी सीमा खुद खैंचो। अपनी लकीर खुद लगाओ कि आपको कितनी मौन ज़रुरी है। ज़रुरत के अनुसार तू दो शब्द कहता है तो वो तेरी तो ताकत बनता ही है, सामने वाले की भी ताकत बनता है। पर तेरी आदत है बोलने की, खुद उस आदत के गुलाम होके जब तू बोलता ही जाता है तो शक्ति तेरी तो जाती ही है, सामने वाले की भी ताकत को तू खत्म करना चाहता है। इसीलिए सतगुरु का वचन हर वक्त ध्यान में रखो, आत्मा का निश्चय करो। मौन is सौन। मौन आहे मिठाई, बोलना है विख्ख। वरजाएण तव विख्ख, मौन तव मज़ो। अब तेरे हाथ में है तेरा जीवन बनाना।

।। है ही भगवान ।।

04-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रेम"

प्रेम गली अति सांकड़ी ज्या में दो न समाए । प्रेम की गली में दो रह नहीं सकते । जहां दो रहते हैं, वहां राग और द्वेष है । गलतफहमी मत रखो कि वह प्रेम है । दो से राग द्वेष आता ही है । तू कितना भी संभाल संभाल कर चल फिर भी, फिसलना तो सामने खड़ा ही है । क्योंकि तू प्रेम नहीं करता, मोह को प्रेम समझने की भूल कर बैठा है । मोह नर्क का द्वार है । नर्क क्या है, राग और द्वेष, मोह और नफरत, यह नर्क है ।

अगर कभी जिसको तू प्रेम कहता है, प्रेम करने के बाद कभी तू मोह में आता है, कि यह मेरा मेरा मेरा है, और कभी तू नफरत में आता है कि मैं भागकर चला जाऊं, तो यह प्यार नहीं है यह मोह है । मोह में ऐसे ही होता है । तेरा ही मोह तुझको कब से रुला रहा है इसीलिए संभाल करो अपनी मोह को प्रेम न समझो ।

प्रेम को पहचानो कि प्रेम क्या है । प्रेम तो बस श्रद्धा में बहता जाता है । धीरज में दिल बड़ी कर देता है । संतोष में सुखी हो जाता है । प्रेम तो सब को मिलता है, किसी एक को मिले एक को नहीं यह नहीं होता । तेरे हृदय में अगर प्रेम है तो वह सर्व तक पहुंचता है । जे मोह है तो फिर बंधन है । किधर जाएगा प्रेम तेरा कहा नहीं जाएगा । तू गिनती करेगा क्वालिटी देखेगा नफरत करेगा पर प्रेम में सब कुछ खत्म है और खत्म होने के बाद आत्मा ही आत्मा है । है ही ब्रह्म, हैही ब्रह्म, है ही ब्रह्मा ।

॥ है ही भगवान ॥

05-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"खुशियाँ"

कितनी अच्छी मन की स्थिति है जब तू खुश है। मन खुश तो पूरा जहान खुश। लेकिन खुशी है क्या? जो खुशी कायम-दायम रहे वह खुशी है क्या? सबको खुशी देने के बाद जो खुशी बचत है वह तू लेता है, उस खुशी में तृप्ति है, और जो खुशी छीना झपटी, अपने पास खिसका-खिसकाकर, अपने स्वार्थ बुद्धि से बटोर-बटोरकर जो खुशी प्राप्त हुई, औरों को ना देकर आपने अपना ही ख्याल किया, अपने वालों का ही किया, वह खुशी कायम दायम चलती नहीं। वरना पाक-पवित्र खुशी तुझे हर वक्त परमात्मा की तरफ डकेलती है और आत्मिक खुशी बन जाती है।

खुशियों का खज़ाना परमात्मा देते हैं। तेरे लिए है, लेकिन वह बांटने से बढ़ती है खुशियां। सभी का ध्यान रखो, निष्काम रहो, प्रेम-मय रहो। अपनी खुशियों को छोटा छोटा करके सभी में बांटो। यह न देखो यह इंसान छोटा है या बड़ा है। यह सोचो खुश रखना, मेरा भी खुश रहना है। आत्मा के आनंद में जो खुशी मिले उस खुशी को पकड़ो, तो संसार की खुशी को आत्मिक खुशी संभालके रखेगी, कहीं टूटने ना देगी। आत्मिक भाव हर प्राणी में रखो, तो तुझसे हर प्राणी खुश हो सकता है। आत्मिक दृष्टि तेरी जब बन जाती है तो दोष दृष्टि से मुक्त होकर तू सर्व में एक अच्छा आनंद, अच्छा वातावरण फैला सकता है, जिसकी आज संसार को ज़रुरत है। तू पूरी कर सकता है। यह ना कहो कि समाज को, संसार को देखने वाले कई बैठे हैं, मैं क्या करुं ? लेकिन तू खुद से सोच कि तू ऐसी खुशी को प्राप्त कर जो तू संसार-समाज को खुश रख सके।

।। है ही भगवान।।

05-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कोठे चड़ कबीरा देखा घर-घर लागी आग"

दादी भगवान ने संदेश देकर घर-घर जलती अग्नि को दिया शांति का संदेश। शांति का संदेश यही है कि तू ब्रह्म है, तू अमर है, तू अजर है, तू अविनाशी है। तू अंधेरों में नहीं है, तू सुजागी का दीपक है। तू ब्रह्मस्वरुप है। विकार तेरे में बने नहीं हैं, तेरा जीवन निर्विकारी है, मान लो खाली, जान लो। इस जन्म में तुझे जानने की शक्ति मिली है। जानना रुप है तेरा। पर तू जानता नहीं है, अपनी मन-मस्ती में चलता-फिरता है। कब तक मन-मस्ती चलती रहेगी, कब तक बनी रही है, कब तक बनी रहेगी? आखिर तो मन-मस्ती मन-मस्ती ही है। गुरु-मस्ती जो जब चड़े तो मन-मस्ती तुझे क्यों भटकाएंँ।

गुरु-मस्ती आपको आराम देती है और मन-मस्ती आपका आराम छीन लेती है। तो भी तू मनुष्य क्यों अपने मन की मस्ती के पीछे भागता रहता है। क्यों नहीं तू संदेश सुनता सतगुरु का और अपने को ब्रह्म सिद्ध करता और फिर मन-मस्ती से छूटकर तू ब्रह्म की गाथा गाने लगता है, और ब्रह्म के नशे में तू रहता है। अपने मन को ज़रा संभालो ये किस ओर जा रहा है, इसको किस तरफ जाना चाहिए। अपनी दिशा को देखो और अपने लक्ष्य को देखो। अपनी दिशा को अपने लक्ष्य की तरफ अंदर ही अंदर पुकारो। दिशाएंँ तुझे साथ देगी, ग्रह-चारी तेरे सहयोगी बन जाएँगे, प्रेम देवता तेरे ऊपर महर करेंगे। सतगुरु स्वामी तो महर करते ही आए हैं। लेकिन तू अपने को अपने लक्ष्य की तरफ रख।

।। है ही भगवान ।।

05-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पूजा"

पूजा जो करता है , वो कभी हक नहीं महसूस करता । पूजा तो पूजा है। वो तो राजी रखना जानती है । जिसकी तू पूजा करता है। उसको तू राजी रखना चाहता है।
प्रेम में कभी तू कहता है, प्रेम अंधा है , लेकिन पूजा कभी अंधी नहीं है, वो सर्वश्रेष्ठ सुजागी में है। सबसे ज्यादा सुजागी पूजा में होती है ।
पूजा जब करते हो कितने विधि से कितने सफाई से, कितने सामग्री लेते हो, कितना ध्यान लगा कर बैठते हो , तब जाके पूजा सफल होती है ।
इसी प्रकार आतम निश्चय में भी पूजा ही है । तो उसी सफाई से उसी सच्चाई से सब में आत्मा देख। मिलावट कुछ नहीं ये वो कुछ नहीं , नाम रूपनास ब्रह्म का प्रकाश ।
पूजा देना जानती है अपने भगवान को भी प्यार करना जानती है । भगवान की तू पूजा करता है , शांति आती है, ज्ञान आतम निश्चय में भी जब तू सर्व में पूजा में आता है तो गहरी शांति आपको मिलती है पूजा करो अपनी देह की गलत चीज गलत ख्याल मत डालो ।
देह के भीतर बराबर आदर्श उठना, बैठना, खाना , पीना , सोना , सही रखो ।तो हुई अपने देह की पूजा घर परिवार में खींचातानी मत करो जियो और जीने दो अपनी खाली न चलाओ दूसरे की भी सुनते जाओ हो गई परिवार की पूजा ।
संसार समाज में भी इसी प्रकार निम्र भाव में आगे बढ़ना है। उन्नति भी करनी है आगे भी भरना है। भगवान भी देखना है, प्रेम भी करना है , पूजा को भी नहीं छोड़ना है ।यहां दमदम में होती है पूजा सर उठाने की भी फुर्सत नहीं है , ऐसा विचार मन में रख कर अपने जीवन को सही दिशा देना भी एक पूजा ही है।

॥ है ही भगवान ॥

06-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।
"दुख और सुख"

दुख को तू मानके बैठा दुश्मन, सुख को मान लिया साथी। बाज़ी कहीं उल्टी भी जा रही है। पता नहीं है। दुख दारुं, सुख रोग भैया। पर सतगुरु ने बताया दुख सुख दोनों तेरे साथी। दुख सुख दोनों तेरे भाई भाई। घबराना कैसा? Why fear, God is near! दुख का नामकरण करने वाला तेरा देह-अध्यास है। सुखों में लालच रखके सुखों का नामकरण करने वाला भी तेरा अपना ही देह-अध्यास है। वरना सुख और दुख में समता भाव भगवान ने बताया। समत्व बुद्धि, समता योग, सहज भाव, सहज योग, सहज में जो भी सामने आया उस को दुख ना बोलो, उसको सुख ना बोलो। जैसी भी स्थिति है उसमें तू सम रह सकता है। हर स्थिति में तू प्रेम-मय बन सकता है। फिर तू डरता क्यों है और डराता भी क्यों है ? ना डरो, ना डराओ। सहज भाव में चलो, शांत स्वभाव में चलो।

स्वभाव - सभी ने कहा स्वभाव change होने वाली चीज़ नहीं है, लेकिन भगवान ने prove करके दिया। स्वभाव change हो गया तेरा I जो सत्य को जानता है, सत्य में टिकने की शुभ इच्छा रखता है, उसका स्वभाव भी change हो जाता है। पहले तेरे स्वभाव में रुकावटें रुकावटें पैदा करना, अड़चने पैदा करना, negativity पैदा करना, दुश्मनी पैदा करना, इस प्रकार की कहीं बातें तेरे स्वभाव में थी। अब सत्य को समझो - तू देह नहीं, तू ब्रम्ह-स्वरुप है, आत्मा है तू। अपने स्वभाव में change पाओगे।

मुस्कुराके दुश्मन, दुश्मन नहीं रहते, दोस्त बन जाते हैं। वरना तू कई अरदासें कर, भगवान मेरे दुश्मन दफे कर I भगवान कहता है मैं क्या करुं? तू कभी दुश्मनी, कभी दोस्ती, कभी दोस्ती, कभी दुश्मनी निभाता रहता है। तो मैं तेरे पीछे चंचलता में कैसे आऊं ? कभी उसको दफा करुं, कभी उसको प्रगट करुं, यह कैसे हो सकता है। इसीलिए भगवान तो साक्षी है, लेकिन कर्ता-धर्ता तू ही है। अब ज्ञान के सहारे, गुरु प्रेम के सहारे कर्ता-धर्ता बनना बंद करो, साक्षी भाव में आ जाओ। अपने स्वभाव को वश करो। दुख सुख की definition को change करो और समता योग पक्का करो। सहज योग में चलो, सहज भाव में चलो। तेरा दिमाग कभी भी थकेगा नहीं। यह promise है सतगुरु की कि तेरा दिमाग कभी out नहीं होगा, कभी गुस्सा नहीं आएगा। हर चीज़ तेरी balance में चलेगी, अगर तू इन बातों को ध्यान में रखेगा तो I

।। है ही भगवान।।

06-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"राजा भी दुखिया, प्रजा भी दुखिया, सकल संसार दुखिया, सुखिया वो जिस है नाम आधार"

नाम आधार तेरा निश्चय है, आत्मिक निश्चय। आत्मा का निश्चय करो तो आधार नाम का हर वक्त, हर घड़ी हर वेले तेरे साथ है। और साथ जिसके सतगुरु हैं, वो कभी गिरते नहीं हैं। वो गिरने से पहले संभल जाते हैं। तू गिरकर संभलता है, उस संभलने से कोई फायदा इतना तो नहीं है। बाकी गिरने के पहले तेरा पुरुषार्थ इस प्रकार का होवे जो गिरने से पहले तुझे थाम ले। तेरी फिज़ूल जा रही शक्ति को वो भीतर से पकड़ ले। तेरी ऐसी पुरुषार्थ की कहानी होवे जो हर वक्त negative को तू positive बना सके। यही सत्य की कहानी है। बाकी कहानियांँ सब झूठी हैं। झूठी कहानी, झूठी रहणी-कहणी, सुख आए तो कहांँ से आए। सत जा्णी संसार खे, मुर्ख नाना दुख सहन था। कितने प्रकार के तू दुखों को झेलता आया है, अब तो सुखी हो जा। आत्मा का निश्चय करो और सुखी हो जाओ।

।। है ही भगवान ।।

06-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शक्ति"

शक्ति को पहचानने के लिए ,शक्ति को प्रगट करने के लिए , तेरा ये मनुष्य जन्म हुआ है ।
शक्ति को सही दिशा देने के लिए तेरा ये जन्म हुआ है । शक्ति पहिंजीअ खे कर याद। अपनी शक्ति को याद करो । एक शक्ति है जो तू गुस्सा करता है , प्रगट होती है, पर एक शक्ति तेरी निमृता से भी प्रगट हो सकती है। एक शक्ति तू देह बनकर खड़ा है ।देह अदयास से प्रगट होती है। शक्ति आतम भाव से भी प्रगट होती ही है ।
एक शक्ति परपंच, पर चिंतन से प्रगट होती है, कि तू कितना पर चिंतन कर सकता है । ता नहीं है एक शक्ति आत्मचिंतन से भी प्रगट होती है ।वो तेरी सारी जिंदगी की थकान मिटा सकती है ।
एक शक्ति है जो तू व्यवहार में संसार में खुद को गिराता है । राग द्वेष में तो तेरी शक्ति प्रगट है । कि तु कितना राग द्वेष कर सकता है , एक शक्ति समता भाव समत्व बुद्धि, समान योग से भी प्रकट होती है ।फैसला तेरे हाथ में है।
एक अहंकार ही तो है । जो तेरी शक्ति को प्रगट कर ही लेता है और एक सतगुरु से मिला अहंकार शुद्ध आत्मा का अहंकार भी तो शक्ति प्रकट करता है , फिर तू क्या चाहता है, कौन सा अहंकार चाहता है।
ये तेरे ऊपर है एक शक्ति तू बोल बोल के खत्म करता है , बोलत बोलत बए विकार।
एक शक्ति तु माठ में शांति में भी प्रगट ही कर सकता है ।बोलते हुए शक्ति को प्रकट करना आखर शक्ति को खत्म करना और माठ करके शांति चुप करके शक्ति को प्रगट करना ।
शक्ति को बढ़ा देना, विकारों में गिरकर ,विकारों में खुद को उलझा कर भी तू अपनी शक्ति का ही तो दर्शन कराता है , के देखो मैं कितना विकार कर सकता हूं , लेकिन आतम ज्ञान से आत्मदर्शन से विकारों को शृंगार कर दे। वो भी तो तेरी ही शक्ति प्रगट है कितने प्रकार हैं जो तेरी शक्ति को प्रकट करते हैं प्रगट तो होनी ही है तेरी शक्ति दिशा चाहे तू जो भी दे दे उसको लेकिन शक्ति का रूप तू है ही है प्रगट तो होनी ही है सही दिशा सही मार्ग सही समय पर तेरी शक्ति प्रकट होती है और तेरी क्वालिटी तेरे को तकलीफ नहीं अच्छा ही बना देती है कि तू ब्रह्म स्वरूप है तो आनंद स्वरूप है ।
शक्ति को दिशा वो दो जो आत्मा की तरफ जाती है और शक्ति बढ़ती जाती है शक्ति को वह दिशा न दो जो तेरी शक्ति तेरे जीवन में कम पड़ जाए घटती जाए आप बै बूढ़ा तृष्ना ऐ सी जवान।
पर जे गुरु के मुख से तू ने जन्म लिया तो गुरमुख कदीना बुड्ढे होए।

॥ है ही भगवान ॥

07-Feb-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"तेरा अपना निश्चय तेरी शक्ति है"

तेरा निश्चय तेरी भक्ति है I तेरा निश्चय तेरा प्रेम है, आदेश है। अपने निश्चय में आने के लिए सतगुरुजी सहायता करते हैं। लेकिन पुरुषार्थ खुद को करना पड़ता है। पुरुषार्थ से ही तू परमात्मा को प्राप्त कर सकता है, जो भले ही प्राप्ति की प्राप्ति है, तो भी पुरुषार्थ ज़रुरी है। सोने की गिन्नी गिरी तो गटर में, उठाने के लिए झुकना तो पड़ेगा, गटर में हाथ डालना पड़ेगा। इसी प्रकार तू सोने की गिन्नी है, तू दलदल में फंसा है, कचरे में अटका है। सतगुरु को हाथ देकर तुझको बाहर निकालना पड़ता है। तू सोने की गिन्नी, निकल आई तो तेरा दाम कम नहीं है। कभी यह ना सोचो कि मैं विकारों में गिरा, अब मेरी value नहीं। Value फिर भी है, पाण ज़्यादा हो जाएगी, अच्छी हो जाएगी। क्योंकि तूने सिद्ध किया इतने विकारों में जाने के बाद भी कि मैं ब्रम्ह स्वरुप हूँ। दूसरों के लिए तू रास्ता बना। दूसरों के लिए तू bridge बन सकता है, दूसरों के लिए तू प्रेम का मैदान भी बना सकता है। बस अपने सोने को पहचानो। मनुष्य जन्म सोना है, इसको यूं नहीं खोना है। उसको पहचानो और गुरु को प्राप्त करने के लिए गुरु के आज्ञा-चक्र में रहना सीखो, तो तेरा बेड़ा फटाफट पार हो जाएगा I

।। है ही भगवान।।

07-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निंदा"

निंदा ! हमने क्या कहा - निंदा - अपकीर्ति ! अपकीर्ति कोई एक सहन नहीं कर सकता। और तू है कि अपकीर्ति किए जा रहा है। नादान है ना ! पता नहीं पड़ता कि मैं अपकीर्ति कर रहा हूँ। कभी अपने मन की अपकीर्ति, कभी तन की अपकीर्ति, कुल-परिवार की अपकीर्ति। संसार में कितने सारे प्राणी हैं जिनकी हम कीर्ति भी कर सकते हैं, अपकीर्ति ढूंढें तो भी मिल जाएगी।

लेकिन तू करता क्या है? कीर्ति को छोड़कर अपकीर्ति। जड़ चीज़ों की अपकीर्ति, हालतों की अपकीर्ति, दोस्तों की, दुशमनों की अपकीर्ति, परिवार में तू ही एक सच्चा। बाकी सब अपकीर्ति के काबिल। इतनी सारी नादानियांँ मनुष्य करता है, तो भी अपनी नादानी को पहचान नहीं पाता। जितनी अपकीर्तियाँ तू करता है, उतना तेरा कर्मों का खाता बढ़ता जाता है। तेरी अपकीर्ति फिज़ूल नहीं जाती। वो कर्मों की खेती को पानी देती है।

याद रखो मेरी बात। कर्मों की खेती को अगर पानी मिलता है तो तेरी द्वैत बुद्धि से की गई अपकीर्ति से, द्वैष से ही पानी मिलता है। और तेरी कर्मों की खेती बढ़ती जाती है। फिर कर्म एक काटो दूसरे बनाओ, दूसरे काटो तीसरे बनाओ। तेरी आयु यूँ ही भीत जाएगी, तंदुरुस्ती चली जाएगी, मन की शक्ति खत्म हो जाएगी, इंद्रियों की ताकत एकदम सत्यानाश। फिर तू पछताए क्या हुआ जब चिड़िया चुग गई खेत।

इसीलिए सतगुरु की शरण आओ जी। सतगुरु से वचन पाकर अपनी negative को positive रखो और अपकीर्ति के जाल जंजाल से बचकर तू किसकी अपकीर्ति करे, इससे अच्छा है तू कीर्ति कर। वो लायक नहीं भी है, तो भी अपने कर्म न बनें, इसीलिए भी तू किसीकी कीर्ती कर। शायद वो तेरे कीर्ति करने से अच्छा हो जाएगा। और जे बुरा हो रहा है, तो तू लगातार सामने वाले की अपकीर्ति करके, उसको बुरा भी बना रहा है और अपने कर्म भी बना रहा है।

।। है ही भगवान ।।

07-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जेदा् थी नज़र
दोहराया सतगुरु सदा तो खे थी पाया"

 

गुरु त मुहिंजो अहिरो मिठिरो राम थो देखारे।
पहिंजी तपस्या सा, वाइब्रेशंस सा , मुहिंजी ब्याई थो कडे। देह अध्यास थो शदाए।
पर अपनी कृपा जो आप करें , तेरी कृपा है तो गुरु आगे ही है पीछे नहीं रहता। लेकिन तेरी दृष्टि बदलनी चाहिए , जहां दृष्टि रखते हैं, वहा राग दुवेश को प्राप्त करते हो , अब दृष्टि प्राप्ति की प्राप्ति करें , जो है भगवान ।
सर्व में पेखे भगवान, सब चीज में वासा मेरे वासुदेव का, हर बात में हर हालत में भगवान को प्रकट करो, तो हो सकता है, ये तेरे ऊपर है , तू जितना स्ट्रांग है उतना तू भगवान को नजदीक महसूस करेगा। तू जितना कमजोर है, उतना भगवान को दूर समझता है , दूरियां अब नजदीकियां बन गई ।अब कोई दूरी न रही ।
हाणे अगि्लो जमानो नाहे। जो भगवान पढ़ते रहे ।
भगवान ने भी यही फैसला लिया है कि मैं अपने भक्तों के अंग संग रहूंगा, साथ में चलूंगा, साथ में उठूंगा, साथ में ही बैठूंगा , साथ में ही खाऊ गा ।
भगवान का प्रेम तो है ही है, पर तु दर्द दिल में जगा सत्य की राह पानी का तो साथ देंगे तुझको निराकार अगर शरदा है अपार। श्रद्धा की देवी को सदाई भरपूर रखो । कम न करो उसको ऐसे भीतर से पकड़ लो जो कहीं जाने न पाए ।
शरदा दे नाल भेजा बि हिरि और छोड़ दे अपने सतगुरु के सहारे वो आपे खेवट बनकर आशी और नया तेरी लगाएंगे किनारे। निश्चय जे तू पक्का रखता है तो सतगुरु को भी दौड़ लगानी पड़ती है वह दौड़ता दौड़ता तेरे पास आता है और तुझसे मिलकर एक हो जाता है।

।। है ही भगवान।।

08-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सत्य का सौदा"

सत्य का सौदा करने वाले सत्य को तू ही तो जानेगा। लेकिन जानने के लिए अपने मन को ज़रा संभालो। मन को आत्मा की राह दिखा दो, वर्ना मन नहीं मानेगा। मन नहीं मानेगा तो तू सौदा कैसे करेगा। मन माने, इसीलिए मन बेच दो। न मानने वाला मन- उसको बेच दो। भंगार के हिसाब से बेच दो। लेने वाला खरीदार कौन है-वो सतगुरु है। मन बेचै सतगुरु के पास तो सेवक के कार्ज रास।

तू खिटपिट वाला मन बेच दे। तू खिटपिट वाले मन से निपटना चाहता है। तू खिटपिट वाले मन को खुद बनाना चाहता है। लेकिन सतगुरु की fees नहीं भरता। Fees भरके मन को सतगुरु को दे दो। गुरु की fees क्या है - एक नम्रता, एक मान्यता, एक सत्संग का नेम टेम। Easy तो fees है। Easy fees देकर, नम्रता रखकर, सत्संग का नेम टेम बनाकर तू गुरु को मन, खिटपिट वाला मन दे दे। वो आपे ही, रंग चढ़ा के तुझे वापस दे देंगे।

खिटपिट वाले मन को colour करके, वो राम रंग से रंगके, ज्योत स्वरुप बनाके, तुझे ही वापस दे देंगे। इसीलिए तेरा जन्म-जीवन सफल हो जाएगा, मन की शक्ति बढ़ जाएगी और भक्ति भी तुझसे होगी। वर्ना तू भक्ति भी नहीं कर सकता, ज्ञान भी नहीं समझ सकता। जब तू सतगुरु को मन दे देगा तो कांटा चुभने से रहेगा ही नहीं। आराम से तेरी तपस्या भी चलेगी और ज्ञान भी चलेगा।

।। है ही भगवान ।।

08-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विशालता"

सच्ची विशालता है सबसे पहले आपके खयालों में विशालता, आपकी भावनाओं में विशालता, आपके कर्म में विशालता, आपके प्रेम में विशालता, सत्संग में विशालता, अपनी बुद्धि में विशालता, विशालता विचार करो। जब विशालता तेरे ख्यालों में आती है ,तो ख्याल तेरी आत्मिक हो जाते हैं, हदों कि तू सोचता नहीं ,हद में रह कर सारे दिन मंश दूसरे के गलतियों में जाता है ,दूसरे के कर्मों में जाता है , मिलता तो कुछ नहीं फायदा क्या हुआ। इसीलिए खयालो में विशालता रखो कि,
है ही भगवान कोई wrong नहीं है कोई right नहीं है, सर्व में पे खे भगवान।
मेरा ख्याल अगर मुझ को तकलीफ ना दे दुखी न करें तो आसमान से खुद भगवान भी आ जाए तो भी तेरे को कोई दुखी नहीं कर सकता , ऐसा विशाल ख्याल रखो आत्मा के निश्चय का बुद्धि में ख्याल कौन से आते हैं समता भाव समत्व बुद्धि निश्चय आत्मिक बुद्धि ये रखेंगे तो ख्याल शुद्ध पाक पवित्र रहेंगे , कि तू देह नहीं दूसरा भी देह नहीं , धीरज कर हर चीज को समय दे टाई म पर सब अच्छा होगा, ऐसे विचार आते हैं , तो ये विशालता है पर जे तू अपने मन बुद्धि को कुंठित करता है, तो मन बुद्धि कुंठित होकर तुझे देह अध्यास ही दिखाती है, फायदा कुछ भी नहीं है। अपने कर्मों में भी विशालता रखो आज तूने करम किया कल किसी और ने किया , फिर कल किसी और ने किया अगले दिन किसी और ने किया फिर क्या हुआ ।
कर्म में तेरी विशालता होनी चाहिए कि मैं ना करूं तो बराबर दूसरे भी कर सकते हैं नहीं तो तू सोचता है मैं जो करता हूं वो ही अच्छा है ये विशालता नहीं है सब में अच्छी उम्मीद रखो यही विशालता है अपने मन और बुद्धि को आत्मा के रंग में रंग दो तो मन भी तेरा विशाल हो जाएगा बुद्धि तेरी संतुष्ट हो जाएगी परमात्मा से संबंध भी तेरे पाक पवित्र होते जाएंगे और परमात्मा तेरे ऊपर हाथ रख के तुझे आतम निश्चय में आगे बढ़ाएगा।

।। है ही भगवान।।

09-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

आसक्त भाव जब मनुष्य के ह्रदय में आता है तो सुंदर संसार भी असुंदर लगने लगता है। सुखसागर, भवसागर भासने लगता है। आसक्ती तेरी तेरे को काट रही है, तेरे को डंक लगा रही है। आसक्ति के सिवाय किया हुआ कर्म परमात्मा का प्रसाद बन जाता है और आसक्ती में किया हुआ कर्म मनुष्य के लिए एक मौत सी बन जाती है। आसक्त भाव तुझे तकलीफ में डालता है। आसक्त भाव परमात्मा से दूर करता है। आसक्त भाव दुख-सुख को जन्म देता है। आसक्त भाव तेरी बनी बातें बिगाड़ देता है। आसक्ति ऐसा डंक मारती है, वह शिकायतें देती है, नफरतें देती हैं, परमसुख लेकर अशांति देती है। इसीलिए शिकायत ना कर तू, ना कर तू पुकार, सदांईं शुखर कर, शुखर में गुज़ार। शुखरानो के गीत गाते जाओ और आसक्ती को भगाते जाओ। प्रभु से मिलके एक होते जाओ और ज्ञान दृष्टि से अपना तीजा नेत्र खोलकर अपने जीवन की यात्रा को सही दिशा में चलाना ही तेरा धर्म है, न कि आसक्ती करना तेरा धर्म है।

।। है ही भगवान।।

09-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"वारे वेठो जम जो खातो"

इतना तू खाली हो जा, इतना तू अपने जिज्ञासु भाव में आ जा, तो तू कर्मों को समझ भी सकेगा, रोकथाम भी कर सकेगा। समझना क्या है ? यही कि जो कर्म आपको विखेप देते हैं, वो कर्म कर्ता-भाव से तू कर रहा है। विखेप कोई नहीं है तो तू अपने निश्चय से कर रहा है। अब फैसला तो तेरी रहणी कहणी ही बताएगी। पधरी थींदन ज़ात्त, पहिंजे रहणी कहणीअ मां। तेरी रहणी कहणी क्या कहती है, ये तू भी समझ सकता है। तेरे रहणी में तृप्ति होवे, तेरे रहणी में परमात्मा शामिल होवे, तेरे रहणी में प्रेम होवे, तेरी रहणी में relax होवे। Relax से उठो, relax में बैठो, relax में हर कार्य करो। Relax है तो सब कुछ है, relax नहीं तो कुछ भी नहीं।

।। है ही भगवान ।।

09-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"किस्मत की कुंजी"

किस्मत की कुंजी है, सर्व से प्रेम, ये सर्व से प्रेम क्या है? कैसे होता है? सर्व से प्रेम , सर्व में पेखे भगवान ।
सब में भगवान देखा तो सर्व से प्रेम हुआ, समता का प्रेम हुआ ।
कभी-कभी मंश को किसी न किसी के साथ मनमुटाव होता रहता है , क्या गलत है? होता रहेगा ,पर मनमुटाव तेरे मन में होना चाहिए, पर मनमुटाव तेरी वर्तन में आ जाता है ।
मनमुटाव तेरे फेस पर लकीरें देता है , वो क्यों? किसलिए क्योंकि तू जताना चाहता है सामने वाले को कि मुझे तेरी बात अच्छी नहीं लगती, मैं कुछ खास हूं , तू कुछ अलग है। सवाल ये है कि यह सब सामने वाले को realize कराया कि मैं तेरे साथ खुश नहीं हूं , इसका फायदा क्या है ?फायदा होवे तो आप करो ।
फायदा ना होने पर भी तू ये करता जाता है। ये ना समझी है, तेरे सर्व के प्रेम करने में एक रुकावट है। एक वृति खराब होने में तेरी गिरावट है । वो तू क्यों करता है ?
जबकि तू एक जिज्ञासु है अपने भीतर झांका तो मनमुटाव तुझे सामने वाले के दिल में भी मिलता ही है , कि वो भी तेरे लिए मनमुटाव रखता है , तू भी रखता है, वो भी रखता है, फायदा कुछ नहीं है। मनमुटाव को मनमुटाव तक रहने दो प्रेम के आडे आने न दो ।
भीतर ऐसा बैलेंस होवे अपने आतम निश्चय से कि तु धीर गंभीर हो जा और अपने मन की बात को शक्ल तक आने न दे। अपनी रहणी कहणी में तू आने न दे। तो तू सही जिज्ञासु हुआ ।
नियारा हो के भली चलो , पर किनारा करके मत चलो, तू किनारा करता है कि ये मुझसे अच्छा नहीं चलता। इसलिए मैं किनारा करता हूं , किनारा नहीं करना है, किस-किस से किनारा करेगा। कहां-कहां से किनारा करेगा, कब तक किनारा करेगा , इसीलिए मन में आत्मा का निश्चय रखो और किनारा छोड़कर नियारा बनो ।
सब में है ही भगवान realize करो कि सामने वाले की बुद्धि इसी प्रकार की है तो वह बेचारा क्या करें ? तेरी भी तो बुद्धि इस प्रकार की है सामने वाले को तू भी तो गलत लग सकता है। फिर तू क्या करें ? ऐसे में ये सब बातें realize करके तू नथिंग न्यू अंडर द सन नई बात नहीं है। कोई भी बात पुरानी ही है, पुरानी ही है।
इस प्रकार आगे चल के सबको प्रेम करो गले से लगाओ मनमुटाव ना रखो गलतियां न देखो और आत्मा देखो भगवान देखो तेरा बेड़ा पार है।

।। है ही भगवान।।

10-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हर दिन की अपनी खुशबू"

है ही भगवान की अपनी महिमा। है ही भगवान आपको वह balance दे देता है कि आप हर घड़ी, हर वेले, हर दिन, हर साल, पल-पल में आप खुश रहना सीख जाते हो। है ही भगवान तेरी शक्ति है। है ही भगवान तेरी भक्ति है। है ही भगवान से तेरे आदर्श हैं। है ही भगवान से ही तेरी अपनी तृप्ति है। है ही भगवान से ही तेरी शुद्ध प्राप्ति है।भगवान प्राप्त करो। है ही भगवान को कंठित करो और जहां तहां भगवान ही भगवान देखो। प्रभु सब में थो वसे। घट घट में मुहिंजो साई, घट वद छो कहिंके भाईं। किसी को छोटा न समझो, किसी को बड़ा ना समझो, खोटा न समझो, खरा न समझो, चंगा न समझो, मंदा न समझो। समझो तो बस एक है ही भगवान। है ही भगवान के सहारे जो जीवन जीते हैं, उनका जीवन बहुत हल्का-हल्का हो जाता है। खुशियाँ उनके द्वारे पर दस्तक देती रहती हैं। गम भी आते हैं तो खुशियों का चोला पहनकर आते हैं। बाकी तो गम तुमको सताते नहीं है। हर बात में वाह-वाह, हर बात में मज़ा है। शुक्रानो के गीत गाते हैं। जो है ही भगवान है तू सीखता है, श्री शारदा शरणम सतसंग से।

श्री शारदा शरणम सतसंग क्या है ? सतगुरु है। श्री दादी भगवान है। दादी भगवान का नाम है शारदा। शारदा शरणम सतसंग। शारदा शरणम सतसंग में ही तू है ही भगवान की पकता करता है और अपना जन्म सफल करके तू सभी को खुशियां देगा, निस्वार्थ प्रेम सीखेगा, कुछ भी आपको आनंद ही आनंद आएगा। श्री शारदा शरणम सतसंग तेरे को खुशियां दिला देगा और तू अपने ही लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जाएगा, मन की शांति को प्राप्त करता जाएगा, संतोष धन को प्राप्त करता जाएगा, नफरत को तू खत्म करता जाएगा और तू फर्ज़ duty को भी अच्छा पहनावा देगा। फर्ज़ है, duty है। सब में वसे थो साईं! भगवान भगवान करते, है ही भगवान, है ही भगवान करते तू फर्ज़ की भी अच्छी कुरवाई कर सकता है।

दिन त्यौहार को भी तू मनाता है। हर त्यौहार को समय दो, हर दिन को समय दो। हर बात की महिमा है अपनी-अपनी। उस महिमा के अनुसार हर त्यौहार को accept करो, हर बात को accept करो। गुरु डि्ना खोले खुशियों का खज़ाना, हाणे गुज़र्या गमन जा ज़माना। आसाने साग्या ही लद्धा निशाना।

।। है ही भगवान।।

10-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्मन कंधे अथस समाधी, रखे अंदर में का न उपाधि"

कर्मों को करते हुए भी जब तू समाधि की अवस्था में आता है तो ही तेरा कर्म सफल कर्म है। भीतर एक न दो, त्रिपुटी नहीं, तीन गुण नहीं, दूसरा नहीं, तो कर्म अलौकिक कर्म हो जाते हैं। कर्म बंधन में नहीं आते हैं। कर्म में तू बंधन में आया तो कर्म का आज नहीं तो कल पछतावा भी आता ही है। कभी ये कहोगे मैंने क्यों किया, कभी ये कहोगे मैंने क्यों नहीं किया, कभी कहोगे result सही नहीं आया, फिर कहोगे इसके कारण सही नहीं आया, उसके कारण सही नहीं आया।

एक ही विखेप है, तेरे देह अध्यास से, कि तू कर्मों से बंध गया है। देह अध्यास के कारण तू कर्मों से बंधता है, विखेप में आता है और return चाहता है। त्रिपुटी में return समझ में तुझे आती नहीं। परमात्मा छोड़ता नहीं, इंसाफ है, देता भी है, पर तू त्रिपुटी में है, तो तुझे दिखाई नहीं देता, और तू कर्म करते हुए ups down में आता ही है। इसीलिए आत्मनिश्चय करो, कर्मों में समाधि ढूंढो, कर्मों में विखेप न ढूंढो, कर्म करो, return की इच्छा न रखो और कर्म तेरा पूजा बन जाए, फर्ज़ नहीं बने। फर्ज़ बनता है तो तू return चाहता है, कि तेरे से भी कोई फर्ज़दाई पूरी करे। पर जे तू पूजा चाहता है, पूजा करता है, तो तू चाहेगा नहीं कि दूसरा कोई पूजा करे या न करे। आप अपनी पूजा में खुश हो, थकान भी नहीं है, तेरी dictionary में थकान शब्द नहीं रहेगा जे तू कर्म बंधन में नहीं आएगा।

।। है ही भगवान।।

10-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मां गंगा"

गंगा मैया को मेरा शत-शत प्रणाम ।
आज मेरे बच्चे मां आपके हर की पौड़ी पर आए हैं, आप के तट पर आए हैं , मेरे साथ आए हैं , मैं उनके साथ आई हूं ।
हम सब आपको प्रणाम करते हैं आशीर्वाद लेते हैं। गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे , जल रहे मेरे दादी भगवान के प्रेम की कहानी , ज्ञान की मुरली मेरे सतगुरु के ग्रंथों की कथा चलती रहे ।
कभी ना रुकने वाला ये श्री शारदा शरणाम सत्संग आगे बढ़ता रहे, विशालता प्रेम सद्भावना और सब एक दूसरे से प्यार करें भाईचारा ये सब गुण गंगा मैया आप हम सब बच्चों को प्रदान कीजिए ।
मां गंगा के चार शीटे डालकर श्रध्दा से डुबकी लगाकर तू शेर बब्बर बन सकता है , लेकिन शरदा, प्रेम , उनके लिए भी श्रद्धा प्रेम विश्वास जरूरी है।
मां गंगा इंजॉय तो कराते हैं , लेकिन तप भी कराते हैं अपनी तपस्या कभी न भूलो, डुबकी लगाते समय अपने ध्यान को अपने में रखो मन में है ही भगवान डाल दो।
तू ऐसा शेर बब्बर बनकर आएगा जिस की आवाज बड़ी ना होगी । पर मन की आवाज शांत, relax , silence में होगी । तू ऐसा शेर बब्बर बनेगा शरीर से कभी थकावट नहीं आएगी ,लेकिन शरीर की पूरी थकावट निकल जाएगी ।तू ऐसा अर्जुन बनकर आएगा जो तेरी बुद्धि निश्चय आत्मिक बुधी बनकर अर्जुन बन जाएगी। सभी को श्रद्धा देगी , तू अटूट विश्वास बनकर आएगा , अटल विश्वास बनकर आएगा और सबको प्रेम करेगा ऐसी ऐसी बातों का बदलाव आप अपने में महसूस कर सकते हैं ।आतम निश्चय बढ़ता ही जाएगा , बढ़ता ही जाएगा ।
एक आतम निश्चय ही तो भडाना है , बाकी तो संसार में सारी बातें यों कि यों खड़ी है खड़ी रहेगी, बदलती है बदलती रहेगी, उसकी कोई तकलीफ है, ना गम है , बस अपने मन को थिर रखो , बुद्धि को आत्मा में रखो , वाणी को मिठास में रखो , कानों को धीरज में रखो , इंद्रियों को परमात्मा के सहारे छोडो, तेरा बेड़ा पार है।

।। है ही भगवान।।

11-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आलस्य"

मनुष्य आलस्य करता तो है लेकिन अनजान है उसकी result से कि आलस्य करने के बाद उसको कितनी आलस्य की सज़ा मिलती है, वो समझ नहीं पाता। कई बातें तेरे परिवार की, तेरे समाज की, तेरे शरीर की, तेरे से खिसककर तकलीफें पैदा करती हैं, हालतें पैदा करती हैं, कर्म खेती तेरी गहरी हो जाती है एक आलस करने से।

आलस्य ऐसे किया जो कर्मों की खेती बड़ गई। आलस्य के कारण कुछ न किया तो कर्म बन गए, आलस्य के कारण कुछ late किया तो कर्म बन गए। पर आलस्य छोड़ा तो तू सबका प्यारा बना। आलस्य छोड़के मनुष्य active बन जाता है, ever-ready बन जाता है, तो सबके आँखों का तारा बन जाता है। सभी उसको प्रेम करते हैं, उसमें अच्छी उम्मीद रखते हैं कि ये मनुष्य आलस्य नहीं करेगा, समय पर हर चीज़ निभाएगा। निभाना सीखो, निपटाना सीखो। आलसी मनुष्य न निभा सकता है, न निपटा सकता है। बस खाली वो बोलता ही जाता है और बाकी उसके हाथ में नहीं है। आत्मा का निश्चय करके, अपने शत्रु आलस्य को दूर करो और प्रेम जैसे मित्र को अंदर ले लो।

।। है ही भगवान ।।

11-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जिज्ञासु"

जिज्ञासु किसको कहते हैं ? जिज्ञासु के लक्षण क्या होते हैं ? जिज्ञासु सबसे पहले अंतर्मुखी होता है, धीरज में रहता है । प्रेम ऐसा करता है, करता ही जाता है । खुद करता है, सामने वाले में कभी उम्मीद नहीं रखता कि यह रिटर्न दे दे, प्यार के बदले प्यार कर ले ।

जिज्ञासु प्यार करता है, वापसी में अगर उसको अपमान भी मिले, थप्पड़ भी मिले, तो भी जिज्ञासु को स्वीकार है क्योंकि मन की शक्ति वहां पर भी बढ़ जाती है । मन की वृत्ति वहां पर भी और टाइट हो जाती है । ब्रह्म कार वृति ब्रह्म कार दृष्टि, वहां पर भी मजबूत हो जाती है तो जिज्ञासु अपनी मजबूती को देखता है, न कि सामने वाले को देखता है कि इसने मेरे साथ क्या किया । जो भी है सब भगवान मेरे को बनाने के लिए ही लीला कर रहा है, फिर कौन कहे साहिब नू यूं कर यूं न कर । जब कि मेरे फायदे की ही बात है । सामने वाला मेरे से उल्टा चलता है तो उस के थैंक्स (thanks) मानो । जिज्ञासु उसको कहते हैं कि कोई कहे मैं लेफ्ट जाऊं सामने वाला कहे राइट जा उसको बोलो अच्छा है, आपने मुझे आदत तो डाली, मैं तो बड़ा बन गया । ऐसे अपने को ऊपर उठाने की जो अंदर में लग्न है वह जिज्ञासु बना देती है । जिज्ञासु बनो, मोक्ष की इच्छा रखो, कि जीते जी मोक्ष को प्राप्त करना है । मोक्ष क्या है सर्व दुखों की निवृत्ति, परम आनंद की प्राप्ति, जबकि दुनिया के दुखों सुखों को छोड़कर, तू संसार में सतगुरु के पास आया, तो वरी (फिर) ये छोटे-छोटे दुख सामने वालों के दुख सुख में हम अपने समय और एनर्जी(energy) और वृत्ति खराब करने वाली हालत को क्यों खराब करें । क्यों ना हम अपने को मजबूत बनाएं । बनना है तो ब्रह्म बनो, आतम बनो और जिज्ञासु बनो और फ्री दिल होकर चलो, ब्रॉडमाइंड होके चलो, जिंदादिली से चलो । जियो तो जिंदो की तरह, मुर्दों की तरह क्या खाक जीते हो । की पल पल में इस ने क्या किया, उसने क्या किया, यह मुर्दों वाला जीना है । पर ज़िंदों वाला जीना है कि कुछ होता ही नहीं है, जो भी है सब लीला पेई हले ।

॥ है ही भगवान ॥

12-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

जब भी तू‌ कहीं भी, किसी परेशानी में हैं, मन मायुसी में हैं, तो भी अपने भीतर झांकी लगाओ, अंतरमुखी हो जाओ, भीतर से ही तुझे रोशनी मिलेगी । भीतर की आवाज सुनोगे तो तुझे एक नई  दिशा मिलेगी, उसी दिशा के सहारे, तू अपने जीवन को आगे बढ़ाऐगा तो तेरी मुंझ-मायुसी, मन-मुटाव हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा । इस रास्ते पर चलने के लिए धीरज की बहुत जरूरत है । धीरज के सिवाय काम नहीं चलता, धीरज में ही तुझे अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है । धीरज से ही तेरे मन-मुटाव खत्म होते है, धीरज से ही तेरे प्रेम की दुनिया बढ़ती जाती हैं, सर्व से प्रेम होता है, सर्व के सुख का‌ तु साधन बन सकता है, लेकिन धीरज चाहिए । धीरज करो , धीरज न आए तो महा-धीरज करो, महा धीरज न होऐ तो खुद को surrender करो । आज्ञा चक्र में आ जाओ और आज्ञा चक्र से तेरी सारी मुशकलाते हल हो सकती हैं और तू सुखद यात्रा में आगे बढ़ सकता है और अपना जीवन तू‌ सफल बना सकता है।

।। है ही भगवान ।।

12-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आदर्श"

जिज्ञासु तब तक अधूरा सा अधूरा है, जब तक सतगुरु के आदर्श की चुनरी उसके ऊपर नहीं है। मेरे सतगुरु का जीवन आदर्श है हमारा। उन्होंने तो इस बगिया को है अपनी तपस्या से खिलहाया, महकाया, चमकाया। सतगुरु का आदर्श मस्तक पर रखो। मस्तक की रेखाएँ बदल जाएगी। सतगुरु का आदर्श torch बनाके अपने कर्मों में रखो। जो तू कर्म करता है, पहले सतगुरु के आदर्श की torch उसके ऊपर डाल और कर्म को ध्यान से देख, quality को पकड़ और कर्म करते जा।

तेरे कर्मों में भी बर्कत पड़ेगी, फल में भी बर्कत पड़ेगी। सतगुरु का आदर्श कदम कदम पर जब तेरे साथ है, तो तेरे past के खडे हैं या present में कोई खडा सामने आया, future में किसी खडे के आने का अंदेशा है। तीनों कालों के खडों में सतगुरु के आदर्श मटी भर देते हैं, platform बना देते हैं। और फिर तू एक नई दिशा लेकर, नया रास्ता लेकर आगे निकल पड़ता है। नई मंज़िल मिली, नया रास्ता मिला, नई दिशा मिली, जो सोची ना थी वो खुशी भी मिली। ऐसी खुशियों से जीवन तेरा महक उठेगा, खुशबुदार बनेगा। बस आदर्श से लिपटे रहो।

।। है ही भगवान ।।

13-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"रौनक"

बर्तनों में तू line से रख ग्लास, थाली, चमचा, कटोरा, टोप। साथ में रख करमंडल। आकर्षित कौन कर सकता है ? एक करमंडल बर्तनों की रौनक बन जाएगी, क्योंकि करमंडल को ऋषि, मुनी, गुरुजन, संत, साधु स्पर्श करते हैं और करमंडल की रौनक बढ़ाते हैं। धरती पर तू कितने प्रकार के बड़े-बड़े ताजमहल बना, बड़े-बड़े buildings बना, बड़े-बड़े malls बना। सुख भी देंगे, यादगिरी कायम करेंगे, पर एक महल तू इन्सान के दिल में बना। उस महल की रौनक और तेरी रौनक दोनों बढ़ जाएंगे। Road रास्तों पर कितनी भी सुंदरता के लिए आप कारीगिरी करो, पर जहां road रास्तों पर greenary है, पेड़ पौधे हैं, उस road रास्ते की रौनक कुछ अलग है, अलौकीक है। वहां से गुज़रते ही तादात्म्य-भाव कुदरत से जुड़ जाता है। इसी प्रकार कितनी सारी चीजें, कितनी सारी बातें संसार में हैं, पर रौनक कहीं-कहीं है।

तू भी मनुष्य है, तेरे में रौनक है, छुपी हुई है। बाहर निकालो, निकल सकती है। हिम्मत करो, प्रेम करो खुद को, वही प्रेम सृष्टी को मिलेगा। रौनक तेरी बढ़ जाएगी। तू जे आत्म-निष्ठी है, आत्म-बल है, आत्म-प्रेम है, आत्म-रस है, तू सतगुरु का बच्चा है, तो तेरी रौनक भी कुछ अलौकिक बन जाएगी, और तू अपनी रौनक सारी सृष्टि में फैहला के सभी को रसदार, खुशबूदार, प्रेम-मय बना ही देगा।

सत्य है तेरे भीतर तो रौनक ही रौनक है। सत्य तेरा जीवन है। सत्य क्या है? सत्य तू ब्रह्म-स्वरुप है, तू आनंद स्वरुप है, तू ज्योत-स्वरुप है। सत्य यह है, अंधेरा तुझ में बना नहीं। तू खुद ही खुद अंधेरों से टकराता रहता है। रोशनदान बनो, फूल बनो कुदरत के। परमात्मा के चरणो में क्या चढ़ाया जाता है? फूल! वह तू बन जा। अपने Ego, अहंकार को जे आपने कुदरत के हवाले कर दिया, सतगुरु के हवाले कर दिया तो रौनक तेरी बढ़ जाएगी। अहंकार में जितनी रौनक तू महसूस करता है उससे कहीं गुना रौनक तेरे सत्य को अपनाने में बढ़ जाएगी।

।। है ही भगवान।।

13-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरा श्रृंगार"

तेरा श्रृंगार किस चीज़ में है? सच्चा श्रृंगार है तेरा आत्मनिश्चय, सच्चा श्रृंगार है तेरा झुक जाना, सच्चा श्रृंगार है तेरा मरो-मिटो और मुस्कुराओ, सच्चा श्रृंगार है तेरा आज्ञाचक्र। जब तू आज्ञाचक्र में रहता है तो संसार के कई कर्मों के चकर से छूट जाता है। आज्ञाचक्र में वो शक्ति है, जो तुझे कर्मों के बंधनों से ऊपर कर देती है। कर्मों की है ये खेती, तू फल पा रहा है। इसके साथ अनमोल जीवन को तू यूं ही गवां रहा है। अपने जीवन को व्यर्थ जाने ना दो और उस जीवन को सजाया करो, संँवारो। उस जीवन को प्रेम करो, उस जीवन का श्रृंगार करो, तो जीवन महक उठेगा और तू अपने आप में इतना खुश रहेगा कि तृप्ति तेरा साथ कभी नहीं छोड़ेगी।

।। है ही भगवान ।।

14-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

एक मनुष्य मन का ईश है, बशर्तिक वह अपना आदर्श सही करे तो। आदर्श - आदर्श एक ऐसा सिक्का है, जो तेरा जहां तहां चल सकता है। पर सिक्के को सोना बनाने के लिए, आपको खुद को मोड़ना पड़ता है। आदर्श एक तेरी ऐसी गिन्नी है, जो कभी भी अच्छी गिन्नी, सही सोने की गिन्नी, गटर में गिरे, तो मूल्य घटता नहीं। ऐसे ही आदर्शी पुरुष का मूल्य कभी कम नहीं पड़ता। दिन दिन सवायो होता है। प्रेम बढ़ता जाता है। सभी तेरे में विश्वास करते रहते हैं। पर पहले तू आदर्शी बन तो। आदर्शी बनने के लिए मनुष्य को ज्ञान की ज़रुरत है, गुरु के guidance की ज़रुरत है। गुरु guide करता है, आज्ञा चक्र में चलना तेरा धर्म है। गुरु torch दिखाता है, torch के आगे चलना तेरा धर्म है। गुरु तेरे पर भरोसा करता है, पर तेरे को श्रद्धा रखनी है, बदले में वह तेरा कर्तव्य है। भरोसे के बदले अगर तू श्रद्धा भी रखेगा तो भी तू जीत जाएगा बाज़ी। सतगुरु पुकार कर-करके यही कहते हैं, जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, पर खेल अधूरा छोड़ो ना।

खेल अधूरा कौन छोड़ता है? जो मन का गुलाम है, जो आवारागर्दी करता है, उसको खेल अधूरा छोड़ना पड़ता है। वरना खेल अधूरा क्यों छूटे? सब ठीक ठीक चल सकता है अगर तू ठीक आ का ठेका ले ले तो। ठेका ले लो कि मैं हर वक्त, हर समय ठीक देखूंगा। उलझन में भी सुलझन देखूंगा, दुख में सुख महसूस करुंगा, अपमान में मान की खुशबू लूंगा, जुदाई भी आई तो समझूंगा, आत्मा से मिलके एक हो गया। इसी प्रकार तू हर वक्त खुद को नया नया बनाएगा। नई मंजिल, नई रौशनी, नई बातें, सब कुछ नया तेरे लिए हो सकता है अगर तू अपने को मोड़ दे तो। अपने को मोड़ दो, आत्मा में जोड़ दो, अपने परीवार से जुड़ जाओ, अपने ज्ञान से जुड़ जाओ, गुरु से जुड़ जाओ। बस इसके पीछे तो आशीर्वादों का ढेर लग जाता है और तू भी अपने में आता है। संसार को भी रास्ता देता है कि तू भी अपने में आ जा, खुदी के बदले खुदा को पा जा।

।। है ही भगवान।।

14-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पूर्णता"

पूर्णता पूर्ण सतगुरु से ही मिलती है। जो पूर्ण है, वो तुझे पूर्ण कर सकता है। पूर्णता तू खुद से प्राप्त कभी नहीं कर सकता। क्योंकि पूर्णता पूर्णता से ही आती है। तू अभी अपूर्ण है। पूर्णता का भाव रखता है तो तू अपूर्ण अपने मन को पूर्ण कैसे बना सकता है। तेरे देह-अध्यास में कर्म भी अपूर्ण हैं। करते जाओ, करते जाओ, मंज़िल नहीं मिलती, तृप्ति नहीं आती, कर्मों में शांति नहीं मिलती। पर पूर्ण सतगुरु का जीवन, तेरी dictionary बन जाए, तो तेरे कर्मों में भी, उनके कर्मों को देखकर, पूर्णता आ सकती है। क्योंकि उनके कर्म पूर्णता देते हैं। वो पूर्ण हैं तो आप भी पूर्णता से पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं। वर्ना कोई रास्ता नहीं है।

मगज़-मारी करते-करते, कर्मों को करते भी हैं, पर शुद्ध कहाँ होए काच्ची भित। कच्ची मट्टी की दीवार, पानी डालते जाओ, पर शुद्ध नहीं होती। मट्टी निकलती ही रहती है। ऐसे ही तू कर्मों को करता है, फिर कर्मों से खुदको तृप्त भी करना चाहता है, पर तू होता ही नहीं है। पर गुरु अंजन जो देते हैं, उससे तू तृप्त, तू पूर्ण, तेरे कर्म भी पूर्णता की तरफ बढ़ते जाएँगे।

।। है ही भगवान ।।

15-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

ज़िंदगी है तो जीने का ढंग भी होना चाहिए। जीने का अंदाज़ है तो ही तू अपनी ज़िंदगी को हल्का-फुल्का बना सकता है और तृप्त रह सकता है। जीने का ढंग आता है ब्रहम ज्ञान से, सतगुरु के निष्काम प्रेम से। निष्काम प्रेम में अवल नंबर उतरो, ब्रहम ज्ञान समझो, भगवान के प्रेम में शक्ति है, भगवान के प्रेम में तृप्ति है। सतगुरु हमारे लिए ज़र्रे-ज़र्रे torch लेके खडे़ हैं, गोदी लेके खडे़ हैं कि मेरा बच्चा गिरे तो मेरी गोदी में गिरे। अगर लड़खड़ाए तो मेरी torch उसके आगे होनी चाहिए। प्रेम देकर वो अपना बनाते हैं। जो वो हमें देते हैं, हमें प्रेम करके सभी को वो return करना चाहिए और अपना जीवन सफल करना चाहिए। कर्ज़दार हूँ तेरा मैं, कर्ज़ चुकाने के काबिल तो नहीं हूँ, लेकिन फिर भी गुरु से मिला हुआ एक अंश भी तू बांटेगा तो गुरु खुश होगा।

।। है ही भगवान।।

15-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संयम"

जो संयम में रहता है, वो सुख प्राप्त कर सकता है। जो संयम में रहता है, उसको दोनों जहान की खुशियाँ प्राप्त हो ही जाती हैं। वो तन से सुखी, मन से सुखी, बुद्धि से सुखी, परिवार से सुखी, संसार-समाज से सुखी हो सकता है, जो संयम में रहना जानता है। कभी तेरा मन जीव-भाव में, देह-अध्यास में उछलता है। पकड़ो, संयम करा दो, digestion power मज़बूत रखो। कभी तेरा मुख अपनी लगाम छोड़ देता है। कोई भी शब्द, अपशब्द बोल देता है। लगाम पकड़ो और मुख को तुरंत ठंडा पानी पिलाके मुख बंद कर दो।

बुद्धि खिसक जाती है। जैसे तू साबुन के पानी से, केले के छिलके से खिसक जाता है, वैसे तेरी बुद्धि भी किसी मनुष्य को, उसके स्वभाव को, उसकी रहणी कहणी को, उसकी बातों को देखकर खिसक जाती है। फिर बुद्धि को tax भी भरनी पड़ती है। वो दुखी होती है, सुखी होती है और भटकती रहती है अपने निश्चय की तलाश में। जब गुरु मिले तो फिर बराबर होता है। पर जब तक गुरु ना मिले तो बुद्धि भटकती रहती है। भटकी हुई बुद्धि को रास्ता दिखाओ और खुद में समा दो। बोलो तू भी आत्मा, मैं भी आत्मा। ऐसा तप करो जो सकलो ब्रह्म दिखाई दे।

।। है ही भगवान ।।

15-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ईश्वर की महेर"

महेर तो ईश्वर की होती ही है, पर जब अपनी मेहर तू आप पर करें , वो सेवक जब सतगुरु से मत ले तो ईश्वर की मेहर को भी प्राप्त करें ।
प्रकृति मां की मेहर को भी प्राप्त करें , संगत बी मेहर करती है , सारी सृष्टी तेरे ऊपर मेहरबान होती है।
जब तू गुरु वचनों को भीतर ही भीतर संभाल के रखता है , हम लाए हैं ब्रह्म कार वृत्ति गुरुद्वार से इस वृत्ति को रखना मेरे मनवा संभाल के।
अपनी वृत्ति को संभाल के रखो ,वचनों को संभाल के रखो ,जो गुरुद्वार से लाए हो , उस वृत्ति को अपना खजाना समझो, साथ तिजोरी में तू अपना धन रखता है कि कहीं किसी की नजर न पड़े ,पर उससे भी कीमती है तेरा यह धन।
सतगुरु के वचनों का धन उससे भी बढ़कर है , ज्ञान गुरु का हृदय से कभी न भूलो ये बुलाने की चीज नहीं है, ये तो बरसाने की चीज है , खुद वचनों पर जब लग जाते हो तो संसार को भी बारिश देते हो कि तू ब्रह्म स्वरूप है, तू आनंद स्वरूप है , जो अपने में भीतर झांकता है, वो भीतर डुबकी लगाता है और हर वक्त प्रेम में गीला रहता है ।
प्रेम में गीले रहो और अपने को सजाते चलो सतगुरु के स्वभाव से ।

।। है ही भगवान।।

16-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संयम"

संयम अर्थ सुंदरता। संयम है तो आपकी सुंदरता है। संयम तेरी दौलत है, संयम तेरी अपनी जागीर है, तेरे खुद से है। किसी और की मिली हुई दौलत संयम नहीं है। संयम तेरी अपनी खेती है, तेरा अपना पुरुषार्थ है, संयम तेरी अपनी पवित्रता है। पवित्रता है तो संयम है। मनुष्य में कितने भी गुण हैं, गुणों की खाण है, गुणों का भंडार है। लेकिन गुणों के बीच में संयम नहीं है, तो गुण जल्दी से अवगुण बन सकते हैं। संयम है तो अवगुण भी गुण बन जाते हैं। अब तू क्या चाहता है? क्या तू संयम चाहता है? अगर तू संयम चाहता है तो तुझे मिल सकता है। पर तेरा नेम-टेम-प्रेम सतगुरु की तरफ होवे, सतसंग की तरफ होवे। खुद को बनाने की, खुद को change करने की लालच होवे। अपने आप को पहचानने का लक्ष्य होवे। परम शांती प्राप्त करने की तेरी लगन होवे, तो संयम दूर नहीं है, संयम तेरा तेरे पास है। जैसे भगवान तेरे साथ है, वैसे संयम भी तेरे पास ही है।

।। है ही भगवान ।।

16-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मन जीते जग जीत"

मन की जीत है, तो हर उतार-चढ़ाव में, तू मन के उस पार जाकर, जगत में स्थिर रह सकता है। अर्थ है - जग भी जीता। पर तू बाहर की जीत चाहता है, तो मन से हार जाता है। मन के उस पार जा नहीं सकता, देह-अध्यास से दूर हो नहीं सकता, अहंकार को छोड़ नहीं सकता। तुझे बाहर की जीत चाहिए। ले सकता है, लेकिन बहुत सारा नुकसान तेरे हिस्से में आता है। इसीलिए मन को ज़रा संभालो, भक्ति की ओर डालो, इसके सिवाए मार्ग न कोई। भक्ति क्या है ? एक-एक में जब परमात्मा देखते हो, तो ही तेरी भक्ती सही सिद्ध होती है। वर्ना भक्ति अपने जब तू स्वार्थ से करता है, तो भक्ति भी तुझे return जो देती है, वो तुझसे आत्मा का निश्चय दूर रखती है और तुझे बाहर का फल देती है। इसीलिए be careful, सावधान।

।। है ही भगवान ।।

16-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मन की सफाई"

मन अपने दी करो सफाई तो फिर देंगे प्रियतम दिखाई । मन की सफाई क्या होती है ?  तेरे भीतर तेरे मन के अंदर कोई एक ख्याल घर करने वाला न होना चाहिए, अटकने वाला न होना चाहिए, खयालों का बहाव आता है जाता है पर जे ख्याल बार-बार तेरे को आता है, उस ख्याल का हल्का सा टेंशन होता है तो वो मन की सफाई होने से रोक देता है, मन को शुद्धता से वंचित करता है, तेरी पवित्रता पर आंच आ जाती है, इसीलिए भीतर एक भी कोई ऐसा ख्याल न रखो जो घर कर जाए । अपने मन की सफाई तू सतगुरु वचनों से ही कर सकता है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं, अपने सतगुरु में प्रेम भाव,  श्रद्धा, समर्पण भाव, अंदर में गुम होने की आस, खो जाने का शौंक वो ही तेरे भीतर ताकत बन जाती है और तू उसी ताकत से अपने को फ्रेश फ्री और साफ रख सकता है, बाकी कोई रास्ता नहीं है, इसीलिए अपने मन की सफाई करने के समय गुरु को विचार करो सतगुरु के वचनों का ध्यान करो और शौंक रखो कि बहुत जन्म बिछड़े थे माधव अब ये जन्म तो तेरे लेखे, चाहे जो भी हो जाए पर मैं तो अपने को साफ-सुथरा करके रहूंगा । सह चुके हैं सितम हम माया के बहुत अब करेंगे हर एक वार का सामना ।  कैसे करोगे ?  वचनों से और वचनों में श्रद्धा प्लस होवे, श्रद्धा में समर्पण भाव होवे, समर्पण भाव में आनंद भी होवे, ऐसा नहीं कि समर्पण कर दो और आनंद खोलो जो सच्चा समर्पण करता है वो  आनंद को प्राप्त करता है और गुरु से मिलके एक होके अपनी शक्ति को अपनी भक्ति को एक नया मार्ग एक नई दिशा दे ही देता है ।

।। है ही भगवान।।

17-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कलेश"

कलेश छोटा है तो भी तकलीफ, बड़ा है तो भी तकलीफ, तुर है तो भी तकलीफ । कलेश आता है, क्या जन्म पत्री में लिखा है ? या तेरा शौंक है खरीद करने का ? खुद से हर एक verify कर सकता है । कलेश को तू create करता है । कलेश की creation करके, तू खुद को किट किट में डाल ही देता है, वरना परमात्मा भला करता है पर तू भलाई समझता नहीं है । 

कलेश कैसे मिटे? एक बोले, दूसरा ok करे; दूसरा बोले, पहला ok करे बीत गया दो बीत गया । 98 तो आप इस प्रकार चलो कि जो बीत गया सो बीत गया, वापस आ नहीं सकता, आगे के लिए मैं सुधार नहीं सकता, फिर कलेश करके फायदा क्या ? फिर भी 2% थोड़ा बहुत बोला जाए, और बोलके छोड़ दिया जाए । 

एक बोलना है, जो तू बोलके पकड़ लेता है, एक बोलना है जो तू बोलके छोड़ देता है । एक बोलना है जो तू बार बार बोलता है, एक बोलना है जो तू एक बार बोलके रज़ा में राज़ी रहता है । एक बोलना है तू तंगदिली से बोलता है, स्वर तेरा अच्छा नहीं है; एक बोलना है जो तू जिंदादिली से बोलता है, स्वर तेरा मज़ेदार है, सामने वाला गलती accept कर लेता है । 

जब तेरा सुर अच्छा नहीं है, तो सामने वाला गलती accept करके भी नहीं करता, नहीं मानता । बहुत सारी बातें ऐसे ही है, छोटी छोटी, छोटी छोटी जिससे कलेश उत्पन्न होता है, उन बातों को ध्यान में रखकर, कलेश से थोड़ा side हो जाओ, और कलेश को करने का भाव न दो । मन में कलेश आए, उदर मन में ही निपटा दो, बाहर न लाओ, और हर वक्त यही सोचो ’हीय बि सजन वाह वाह, हुआ बि सजन वाह वाह’ सफर बहुत अच्छा गुजरेगा, सभी से प्रेम बहुत अच्छा होगा, और जिससे प्रेम है, उससे प्रेम और मजबूत होगा, जे तू कलेश को हृदय में जगह न देगा । 

।। है ही भगवान ।।

17-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बाहर मुखी हर वक्त दुखी"

कितना भी बाहर-मुख्तावाले को सुख मिले, तो भी सुख उससे रूठ जाते हैं। बाहर-मुख्तावाले को कितना भी प्रेम मिले पर वो कांटे बाहर-मुख्ता के कारण, प्रेम में कांटे mix कर देता है। बाहरमुखी मनुष्य कभी भी, किसको ना प्रेम दे सकता है, ना प्रेम लेने के काबिल है, जो कोई उसे प्रेम करे। क्योंकि मनुष्य बाहर मुखी है। बाहर-मुख्ता के कारण आधा glass खाली, आधा भरपूर। बाहर-मुख्तावाले को जो दृष्टि है, वो खाली पर ही जाती है, भरेला तो उससे दूर है।

बाहर-मुख्ता के कारण तू भ्रमों में पड़ा ही है। भ्रम में प्रेम को भी नफरत मानता है। अपनी दृष्टि को संभालो, अपनी मंज़िल को पहचानो, लक्ष्य को पहचानो। तेरा लक्ष्य अंतर-मुख्ता है पर तू इतनी बड़ी गलती करता है, जो अंतर-मुख्ता के बदले बाहर-मुख्ता रखता है, तो तेरे को कौन सिखाए, कौन बचाए। इधर खुआँ, इधर खाई। बाहर-मुख्तावाला ही कुएँ और खाई में गिरता है। अंतर-मुखीवाले के लिए कुदरत रास्ते बना-बना के देती है। कुदरत रास्ते अगर तेरे को नहीं देती है, तो दोष अपना ढूंढो, कुदरत का नहीं। खुदको change करो, दूसरों को नहीं।

।। है ही भगवान ।।

18-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दूध - खीर"

जो खीर पिये सो वीर थीये, ड्ंद भी ज़ोर वठन, सुईंणा भी लग्न, अखियुन जी ज्योत भी वदे, हड्डा भी मज़बूत थियन, दिल दिमाग ताज़ो थिये। दूध - दूध पीने वाले भाग्यशाली होते हैं। जो नहीं पीते हैं, उनको अपनी संभाल करनी चाहिए। दूध ने भगवान को complaint भेजी है, ध्यान से सुनें।

दूध ने कहा - मैं इतने सारे सुख सबको देता हूं, पर मेरी इज़त क्या है, value क्या है, जो मनुष्यों के kitchen के भीतर मैं उनकी gas पर जलता रहता हूँ। मेरे में सुगंध है, लेकिन फैलती है दुर्गंध। या तो दूध की kitchen में संभाल नहीं होती, फटता रहता है। दूध कहता है, अगर मुझे पनीर के रुप में लेना है, तो ताज़े खीर के पनीर से स्वाद लो। मुझको फटाके आप पनीर का दावा करते हैं, यह कौनसी रीत है ? फिर दूध ने कहा, टोप छोटा रखते हैं, मैं ज्यादा हूं, उबलता हूं, चूल्हे पर आ जाता हूं, फैहल जाता हूं। मनुष्य का फोन चालू है, ध्यान नहीं है, चूल्हे पर गिरकर मैं जलता रहता हूं, दुर्गंध फैलाता रहता हूं, टोप को खराब करता हूं। लेकिन यह गुण मेरे नहीं है, यह तो अवगुण हैं। यह तो मनुष्य के हैं, जो common sense की कमी के कारण मुझको तकलीफ दे रहा है।

अब complaint आपके सामने रखी गई है। उसको सुधारो तो शायद बहुत अच्छा लगेगा। दूध जैसी चीज़ घर-घर में हम देखते हैं, फटती है, फैहलती है, खराब होती है। भाग्य की निशानी है जो तुझे दूध मिला। शास्त्रों में जाके देखो, किसी गुरु के बेटे को दूध ना मिला तो क्या हुआ। पर जे तेरे को हर चीज़ मिलती है तो तू अपने भाग्य को क्यों खराब करता है ? दूध का गिरना, दूध का फटना, दूध का जलना, यह अच्छी निशानी नहीं है। Negativity आपके भीतर आती है, जब किचन में आप अनर्थ करते हो। फिलहाल आज के लिए एक ही change। आगे मिलेंगे।

।। है ही भगवान ।।

18-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरु वचनों की कीमत"

गुरु वचनों की कीमत जिज्ञासु जब करता है, तो उसकी कीमत पूरी कुदरत करती है। पूरी प्रकृति में उसका प्रेम भट जाता है। वो प्रेम के काबिल बन जाता है। लेकिन जो गुरु वचनों की कीमत नहीं करता, उससे प्रेम भी हो नहीं सकता। खुला था बाज़ार तो सौदा नहीं किया। हुई हटतार तो सौदा याद आया। जब प्रेम करने का समय है तब तू प्रेम कर नहीं सकता, प्रेम ले नहीं सकता, दे नहीं सकता। अपने अहंकार में मरा-गरा रहता है। लेकिन जब हाथ से सौदा निकल जाता है, तब तू क्या करेगा। फिर पछताएँ क्या हुआ जब चिड़ियाँ चुग गई खेत। समय पर पछताना भी एक सुंदरता है। समय पर भूल को सुधारना भी अबुल बनना है। समय पर आत्मनिश्चय करके, अपने सारे विकारों को खत्म करना ही समझदारी है। समय के बाद कुछ भी नहीं होता। तेरी आयु यूँही बीत जाती है।

।। है ही भगवान ।।

19-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"साधना और सिद्धि"

साधना तू करता रहता है, थोड़ा सा ध्यान अपनी सिद्धि पर भी डालो। साधना किया, सिद्धि प्राप्त हुई या ना? साधना कईं प्रकार की आप करते हो - सतसंग में जाना, ध्यान से वाणी सुनना, सतसंग में सबसे प्रेम करना, जहां-जहां तेरा मन भटक जाता है वचनों से उसको खौंचना, निष्कामता को जन्म देना, भावनाओं को अच्छा बनाना - कितनी सारी साधनाएं आपकी तरफ से होती हैं। थोड़ा बहुत ध्यान दो सिद्धि पर। सतसंग में तू आया, आप में कोई change आई ? Change आई तो यह तेरी सिद्धि है। सबसे प्रेम कर सकते हो, पहले नहीं कर सकते थे, अब कर रहे हो, तो सिद्धि हासिल हुई है। निष्कामता की भावना पहले नहीं थी, स्वार्थ बुद्धि थी, अब निष्काम बुद्धि आई है, स्थिर बुद्धि आई है अगर तो तेरी सिद्धि प्राप्त हुई है। एक दूसरे के लिए दर्द जागा है, तो सिद्धि प्राप्त हुई है। भावनाएं भीतर से simple, सरल, नेक, अच्छी हैं, राग- द्वेष उनमें नहीं है, तो समझो सिद्धि प्राप्त हुई है।

इच्छा नहीं रखते हो किसी में, किसी ने मुंह फेर लिया, तेरा मन न चला, किसी ने तेरे को response नहीं दिया, पर तेरा मन न चला। भीतर ही भीतर unconscious में भी मन चलता है - सूक्ष्म-मन। स्थूल मन ख्याल बनके चलता है, सूक्ष्म-मन तेरी मन की अवस्था को change करके चल रहा है। तू कहता है, पता नहीं अभी तो मैं अच्छा था, अभी मेरा मन, मेरी mood खराब हो गई। तो यह तेरा सूक्ष्म मन है जो चल रहा है, पर तुझे पता नहीं पड़ रहा है। अब उसका भी ध्यान धरो, सूक्ष्म-मन ना चले, स्थूल मन ना चले, स्थूल तन से कोई गलत कर्म ना होवे, तो समझो आपको सिद्धियां प्राप्त हो रही है। और सतगुरु की प्रेम की वर्षा यही है कि आप साधना करते-करते इतनी सफलता की तरफ बढ़ते हो, आत्म-निश्चय की तरफ बढ़ते हो, जो आपको यह सब सिध्दीयाँ आती हैं।

किसी सिध्दी में अटकना नहीं है। फिर आगे चलो, फिर आगे चलो। आज जो प्राप्त हुआ, उसको पीछे रखके, साथ में रखके, फिर आगे के लिए कुछ दूसरी change की अंदर ही अंदर फिलहाल भावना रखो और गुरु की वारिश पढ़ने के साथ ही वो भी सिद्धि मिल जाएगी, जिसकी तू कामना करता है, जिसकी तू अंदर ही अंदर अच्छा संकल्प करता है, वह भी मिल सकती है। पुरुषार्थ, तेरा भीतर का पुरुषार्थ, जो हम बताते हैं, वह यही तेरा भीतर का पुरुषार्थ है कि आप देखो साधना तो कर रहे हो लेकिन सिद्धि प्राप्त हुई या नहीं ?

।। है ही भगवान ।।

19-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पद्ध"

सबनीखाँ पद्ध तुहिंजो ऊंचो। सबसे ऊंचा तेरी अपनी पद्धवि है जो आत्मा की पद्धवि है। तू देह नहीं, तू बह्मसवरुप है, जागंदी ज्योति है। दौष न मानो मानुष्य देहा। मनुष्य जन्म को सफल बनाओ। सफल तब होगा जब तू अपनी तपस्या को पहचानेगा। सतगुरु ने निश्चय तो बता दिया, पद्ध पर बैठने के लिए रास्ता भी दिखा दिया। अब बाकी की duty जिज्ञासु की अपनी बन गई। तू उस रास्ते पर कितना चलता है, कितनी तपस्या पसंद करता है। गुरु ने पद्ध दे दिया कि तू मेरा अपना ही बच्चा है। सतगुरु ने पद्ध दे दिया कि तू जिज्ञासु बनजा। जिज्ञासु के लक्षण अपने में आरोप कर। वर्ना अपने पद्ध की ओर तू कैसे बढ़ेगा।

तपस्या सबसे पहली अपने मुख की। मुख से बराबर खाना-पीना-बोलना। मुख एक ऐसी इंद्री है जो शरीर में अहम part अदा करती है। उसको अपने तप से वस किया मतलब सब इंद्रियाँ तेरी वस में आ गई। जब भी मन तेरा नीचे की ओर जाता है, अपने तप को छोड़ता है, तूँ मां में आना, वाद-विवाद, भला-बुरा बोलना, ऐसी मन की स्थिति जब आए, तब गुरु वचनों को भुलाना नहीं। सतगुरु को ध्यान में रखकर, अपनी स्थिति पर तू हावी पड़ जा। कैसे पड़ेगा? उस स्थिति में भी भगवान देखेगा। मनुष्य में, जड़ में, चेतन में, सब में भगवान देखो।

पर जो दुख सुख आते हैं, हालते आती हैं, बीमारियाँ आती हैं, उसमें भी भगवान देखना है। तो हालतें हालतें न बनकर, प्रभु प्रसाद बन जाएगी। वैराग दे देगी, त्याग भी दे देगी, निश्चय भी करा देगी। हर वक्त मन को ढीला छोड़ना नहीं है। उसपर थोड़ा बहुत ज़ोर लगाके, अपनी आत्मा की तरफ पहले ही खींच लो। जब तेरे को signal आता है भीतर से कि मन नीचे की ओर जा रहा है। जाने के पहले तू उसकी डोरी खैंचकर सतगुरु के किले से बांध ले। फिर वो तेरा मन नीचे की ओर जा नहीं सकता। अपनी श्रद्धा से तू success हो सकता है, बुद्धि से नहीं। ज्ञान भी श्रद्धा से लो, बुद्धि से नहीं लो। मैं मैं ना कर भांवरे। मैं करता हूँ, मैं करुंगा, मैं जानता हूँ, ये सब बातें फिज़ूल की हैं। आत्मा में स्थित होने के लिए, भोले भाव मिले रघुराई। परमात्मा को तेरा भोला भाव भी पसंद है, पर तेरा देहअध्यासी स्वभाव नहीं। बुद्धि चलाके, वाद-विवाद करना, अपने मन को शैतान बनाना, ये परमात्मा को पसंद नहीं। पर श्रद्धा में डूबे रहो, परमात्मा को वो पसंद है। अब फैसला तेरे हाथ में है। यहाँ सब विकार दे दे, बदले में तूँ प्यार ले ले, उसी प्यार से तू ज़िंदगी गुज़ार।

।। है ही भगवान ।।

20-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु"

सतगुरु - जो सत्य बताए, सत्य में टिकाए। सतगुरु हलत-चलत संवारे, सतगुरु बहार बनकर आए ज़िंदगी में तो सारी सृष्टि में बहार लागे। लगी लगन अब तुझसे। जब सतगुरु से लगन लग जाती है तो दुनिया, संसार सुंदर दिखाई देता है। क्योंकि सुंदर सलोना साजन का स्वरुप उसका ही shadow पूरी कुदरत में आ जाता है। किसी के लिए आए न आए, पर जिअरा हरि नु ध्याएं, हरि रुप बनता जाए। तू जे सतगुरु को मन में बिठाता है, तो तू सब कुदरत में उसी का shadow देखता है और मन में भी महसूस करता है। ज्ञान easy हो जाता है, परिवार perfect बनता जाएगा, संसार-समाज तेरे लिए सुंदर रुप लेता जाएगा। पहले किसी से प्यार नहीं था, अब सब आपको मीठी, अपनी ही आत्मा महसूस होने लगेगी, जब तू सतगुरु अपने साथ महसूस करेगा तो। इसीलिए गुरु का आदर्श अपनाके, गुरु का निष्काम प्रेम झोली में भरके, थोड़ा सा अपने सर को झुकाके, नम्रता भाव रखके, सतगुरु से लगन चलती रहे, लगन में अगन आती रहे तो सारी बातें अच्छी होती जाती हैं, श्रद्धा भाव में तू पलने लगता है, आगे बढ़ने भी लगता है।

।। है ही भगवान।।

20-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"देह तेरी एक आईना"

तेरी देह भगवान ने इसीलिए दी है, कि ये तेरा आईना है। देह को जब तू आईना दिखाता है, अपनी देह की बातें देखने के लिए, तो वो आईना तेरे कांच का तुकड़ा है। पर तेरी आत्मा क्या कहती है ? तेरा आदर्श क्या है ? तेरी भक्ति किस रंग में चल रही है ? तेरी इंद्रियों की तपस्या कितनी है ? ये सब एक आईना है जो हमें दिखाता है। यह कांच वाला आईना नहीं, ये तेरी देह तेरे लिए आईना है।

मन में वैराग है तो देह से झलकेगा। तेरी देह वैरागी होने के कारण, भीतर वैराग है, तो देह संयम में होगी। तेरा वज़न न ज़्यादा, न कम। तेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा न ज़्यादा, न कम। तेरा आदर्श, तेरी देह के हलत चलत से, तेरे मुख के वाणी से साबित होगा। तेरा उठना, तेरा बैठना, तेरा सोना, तेरा जागना, हर चीज़ ये देह दिखाएगी। तू देख सकता है तो अच्छा, वर्ना संसार तो देखेगा न कि तू कितना वैराग में है, कितना प्रेम में है, कितना संयम में है। ज़र्रे-ज़र्रे अपना संयम संभालो, ज़र्रे-ज़र्रे आदर्शों की अपनी कहानी सलामत रखो। वैराग में मन तेरा मज़बूत रहे तो झलक तेरे चेहरे पर आएगी। तृप्ति अगर तेरे भीतर है, तो तेरी मुस्कुराहट ज़रुर बताएगी। राग द्वैष अगर तेरे पास नहीं है, तो तेरे आँखों के इशारे सब कहानी बता देंगे कि मैंने सतगुरु से क्या है पाया।

अपने को बनाओ। बदले ना दुनिया, बदल जाएंँ हम। आईना साफ करो। जैसे धूल का आईना तेरे सामने आए तो तू गुस्सा करेगा - आईना पोचके क्यों नहीं दिया। जब तूने आईना गुरु को देना है, अपने मोक्ष के द्वारे लेकर जाना है, तो उस आईने को साफ रखो। भले मन कितना भी तेरा साफ रहे, पर शरीर की शुद्धी भी जिज्ञासु के लिए ज़रुरी है।

।। है ही भगवान ।।

21-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"समझौता"

समझौता का सुख अति प्रिय, अति सुंदर है, और वह ज़रुरी भी है। समझौता करने की आदत मनुष्य में होनी चाहिए। अगर नहीं है, तो तू श्री शारदा शरणम सतसंग में दादी भगवान से सीख ले। क्योंकि ज़िंदगी में समझौता करना ही पड़ता है। लेकिन तेरा एक समझौता है जो तू करता है और ह्रदय पर लकिरें भी लगा देता है। समझौता करता है, मन के भीतर ज़ख्म भी बना देता है, दाग पड़ जाते हैं, impression, उसूल तेरे बन जाते हैं। समझौता तो समझौता है। इस प्रकार के समझौते तुझे सुख से जीने नहीं देते हैं और ज्ञान-दृष्टी से अपने अज्ञान को जब ज्ञान में आपने change किया, दोष-दृष्टि को, राम दृष्टि में change किया। हम लाए हैं ब्रम्हकार वृत्ती गुरुद्वार से, इस वृत्ती को तूने संभालके रखा, गुरु वचनों को तूने अपने नस-नस में, blood के कतरे-कतरे में डाल दिया, तो फिर वह जो समझौता तू ज़िंदगी में करता भी है तो न दिल पर दाग, न impression, न लकिरें, न कोई दुख, न कोई सुख लगते हैं। बस तेरा शान बन जाता है, मान बढ़ाता है ऐसा समझौता। इसी समझौता से, इसी समझौता की आदत डालने से मनुष्य की ज़िंदगी बहुत अच्छी गुज़रती है, आत्म-निश्चय भी होता है, घर- परिवार, समाज-संसार सभी अच्छे से चलते हैं, कहीं कोई शिकायत नहीं रहती। सदा ही यह समझौता शुक्राने सिखाता है, शुक्रानों के गीत भी गाते रहते हैं और खुश रहते हैं। ऐसी खुशी को प्राप्त करना तेरा हक भी है और तेरा धर्म भी है, फर्ज़ भी है। सतसंग में आना और संतोष धन को इकट्ठा करना, समझौता कर लेने की शक्ति लेना।

।। है ही भगवान ।।

21-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मन के अँधेरे"

तेरे मन के अँधेरे तेरे लिए ही अँधेरा करते हैं। बाकी सारे संसार में उजाला है। तेरे भीतर अज्ञान का अँधेरा, तेरे भीतर अहंकार का अँधेरा, तेरे भीतर past, future, present का अँधेरा, तेरे भीतर व्यक्तियों का अँधेरा, हालतों का अँधेरा, गुज़रे हुए समय का अँधेरा। हम कौनसी list बनाके आपको दें। जैसे मैंने कुछ बातें कहीं तेरे अँधेरे की, वैसे तू अपना अँधेरा खुद ढूंढ़ और एक-एक करके अपने अँधेरे मन को रोशनी की राह दिखा दो। वर्ना मन नहीं मानेगा। गुरु ज्ञान दाता है, गुरु ज्ञान देता है। अज्ञान को ढकेलने में मदद ज़रुर करेगा। पर अज्ञान तेरे को खुदको ढकेलना पड़ता है। गुरु तेरे घर में जगमगाहट, रोशनी दे भी दे, दे सकता है। लेकिन उसी कमरे में तू चदर लगाके अपने side अँंधेरा कर दे, तो गुरु की रोशनी काम नहीं करेगी। तेरे अँधेरे तुझको मिटाने हैं। मिटाओ तो सुखी हो जाएगा। वर्ना तू दुखी तेरे मन के अँधेरों से अगर है, तो संसार को तू हरुबरु दुखी नहीं कर सकता। हर एक अपनी light जलाएगा, अपनी रोशनी में रहेगा, खुश रहेगा, अँधेरे में तू ही भटकता है, भटकता चला जाएगा। इसीलिए सावधान। मन के अँधेरों से सावधान। सतगुरु है जो मन के अँधेरे मिटा भी देता है, तेरे को अँधेरों में छोड़ भी देगा, ताकि अँधेरों का एहसास भी तुझे हो जाना चाहिए।

।। है ही भगवान ।।

22-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पुरुषार्थ"

तेरा देव है पुरुषार्थ। पुरुषार्थ तेरा अपना है, पुरुषार्थ तेरे अपने हाथ में है। पुरुषार्थ तेरा तेरे नसीब में है। पुरुषार्थ से तू प्रभु को प्राप्त कर सकता है। पुरुषार्थ से बिगड़ी बात बना सकता है। पुरुषार्थ से तू कई कर्म जो उल्टे चल रहे हैं, सीधे कर सकता है। पुरुषार्थ से शत्रु को मित्र बना सकता है। बस खाली पुरुषार्थ - पुरुष के अर्थ होना चाहिए। खाली meaning नहीं है पुरुषार्थ की मेहनत, लेकिन मेहनत वो जो करे तो परमात्मा के अर्थ में होनी चाहिए। अपने पुरुषार्थ में भरोसा रखो, कुदरत पर विश्वास रखो और चलो इस नेक राह में।

।। है ही भगवान।।

22-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरा सखा"

अपने सखा को ढूँढो। बाहर के मित्र तुझे मोक्ष कहांँ देंगें ? सतगुरु कितना भी सखा मानो, तुझे ज्ञानदाता बनकर मदद करता है। अपना सखा ढूंढने के लिए तुझे इशारा करता है। लेकिन कोई भाग्यशाली ये समझे इशारे। ना समझे तो गुरु क्या करे। भीतर है सखा, तेरा सखा, तू मन लगाके देख। अपनी इंद्रियों को भीतर की राह बताके देख। अपने सखा को भीतर से जगाके देख। इसके सिवाय कोई और मार्ग है ही नहीं। जब तक तूने अपना निश्चय न किया, तब तक तेरी अपने विकारों से, तेरे present, past, future से, तेरे स्वभाव-संस्कारों से, तेरे घडी़-घडी़ गलतियाँ करने से, तू छूट नहीं सकता, जब तक तूने अपनी आत्मा का संदेश नहीं सुना। भीतर जाओ, अंतर्मुखी हो जाओ, आत्मा की आवाज़ तक पहुंचो। आत्मा की आवाज़ सुनो। वो राग-द्वैष से ऊपर तुझे आवाज़ें दे रही है। वो तुझे प्रेम के नगर में बैठने के लिए, औरोंको बिठाने के लिए, प्रेरणा दे रही है। पर जो बहरे हैं, वो सुनते नहीं हैं। अहंकारी उसके भीतर, अपने भीतर जा नहीं सकता। अपने अहंकार का इलाज करो और भीतर सखा ढूँढो।

।। है ही भगवान ।।

23-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निश्चय - तेरा अपना निश्चय"

निश्चय के सिवाय तू अपने आदर्श को संभाल नहीं सकता। गुरु का आदर्श समझ नहीं सकता। निश्चय के सिवाय तू किसीसे निभा नहीं सकता, किसी हालत को निपटा नहीं सकता। निश्चय के सिवाय अतृप्ति को छोड़ नहीं सकता, तृप्ति को पा नहीं सकता। निश्चय के सिवाय तू कोई भेद-भ्रम मिटा भी नहीं सकता। गुरु से भी भेद-भ्रम रहते चलते आते हैं जो तू निश्चय में आता नहीं है। निश्चय में आओ, भेद-भ्रमों से ऊपर उठो, अपनी आत्मा की गर्जना करो।

कल भी था, आज भी हूँ, कल भी रहूंगा। मैं ही था, मैं ही हूँ, मैं ही रहूंगा। पक्क करो, विश्वास रखो, भीतर झांको। झांकने के सिवाय निश्चय ना होगा। बाहर देखते हो, देखते रहते हो। पर देखते रहने से तू वह नहीं देख सकता जो तुझे देखना चाहिए। बाहरमुखता में देखता है, बाहरमुखता में बोलता है, बाहरमुखता में हर चीज़ करता है। भीतर जाता नहीं तो तृप्ती ना दे सकता है, ना तृप्ती ले सकता है।

।। है ही भगवान।।

23-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अरदास"

अरदास करुं सतगुरु तुम साथ सदा रहो मेरे। यही विनती अपने सतगुरु को करते आनी चाहिए। तो ही तू एक घड़ी भी उनसे भूल नहीं सकता। जब तू उनके साथ है तो तू विश्व को प्रेम करने की क्षमता रखता है। क्योंकि तुझे पता है कि मेरा सतगुरु ऊंँचा है। अब उस ऊँचे सतगुरु को ऊँचा होके जानिए। जब मैं ऊंँचा उठता हूँ, सतगुरु का हाथ पकड़कर चलता हूँ, निम्र भाव रखता हूँ, झुकना-मुड़ना-मिटना-मुस्कुराना सब एक साथ कर सकता हूँ, तो मैं भी बड़ा हो गया। फिर ऊँंचे को ऊँचा पहचानता ही है और ऊंँचा होते जाता है। गुरु में और तुझमें भेद-भ्रम नहीं है। पर जिस प्रकार सतगुरु भरपूर है, तू भी खुदको भरपूर कर। सारे भेद-भ्रम मिटाके ही तू भरपूर हो सकता है। कल्पनाओं से परे हट जा, दूर हो जा झूठ से। तो ही तू सत्य की डोरी को थाम सकता है।

।। है ही भगवान ।।

24-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नैलानी मोजा"

नैलानी मोजे ने आज मनुष्य को आशीष की है कि मेरे जैसे आप सब से fit हो जाओ। छोटों से, बड़ो से, तीखों से, कड़वों से, हर मनुष्य से तू fit हो जा जैसे मैं होता हूँ। नैलानी मोजे ने पूछा, अगर vibration काम करते हैं तो मेरे vibration मनुष्य तक क्यों नहीं पहुँचते ? सवाल ये है! क्योंकि नैलानी मोजे ने कहा मुझे खरीद करनेवाले खरीद करते हैं, बनानेवाले बनाते हैं, factories चलाते हैं, बेचनेवाले बेचते हैं, सारे दिन मुझे अपने हाथों से यहाँ-वहाँ करते हैं। उससे बढ़कर मनुष्य सारे दिन मुझे पहनता है, तो भी मेरे vibration मनुष्य के ह्रदय तक क्यों नहीं पहुंचता? वो सब से fit क्यों नहीं हो जाता? वह थोड़ी बहुत गड़बड़ क्यों नहीं हज़म करता? जब की थोड़ी छोटी-बड़ी size मैं तो हज़म कर लेता हूँ। फिर मनुष्य क्यों नहीं कर सकता?

मेरी दुआ है मनुष्यों पर कि आप मेरे जैसा छोटा-बड़ा, थोड़ा-बहुत ना देखो, पड़ जाओ। छोटा है तो भी पड़ सकते हो, बड़ा है तो भी थोड़ा बहुत काम चल जाएगा। सब ठीक है, सब ठीक है हम कहते हैं, सब ठीक है आप भी कहो, तो तेरी ज़िंदगी में बहार ही बहार आएगी। साफ सुथरे रहोगे और fit होने से तेरे मन की सफाई होती है। जब भी तू adjust करता है, जब तू अपने को मोड़ देता है, तो तेरे मन की बहुत सारी शक्ति बढ़ जाती है। अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए आपको एक मोजे से सीखना पड़ेगा जो हर वक्त आपके पांव में रहता है। उसीसे सीखो और मुड जाओ, soft हो जाओ, सबसे fit हो जाओ, तो तेरी ज़िदगी में रौनक आएगी। तेरी रोज़ सफाई भी होगी। तू भी तो रोज़ अपने मोजे की सफाई करता है। फिर तेरे पास जो vibration आएंगे तो गुरु भी तेरी रोज़ की रोज़ सफाई करेगा। तू अपने को मोड़ दे और सतगुरु से खुद को जोड़ दे। सर्व में प्रेम कर, सर्व में अपने निष्कामता का दुकान खोलते जाओ। यहां-वहां तेरा निष्काम दुकान दिखना चाहिए।

।। है ही भगवान ।।

24-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"देश , काल , पात्र"

निश्चय में तू कितना भी अढोल हो जाए, प्यार में तू कितना भी सागर बन जाए, सत्संग में तू कितना भी आगे बढ़ जाए, सतगुरु के पास कितना भी तू समर्पण भाव रखे फिर भी तीन गुण वाली प्रकृति , त्रिपूटी उसी में ही संसार भी चलता है , सत्संग भी चलता है और उसको चलाने के लिए देश , काल और पात्र ये सब जरूरी है। अगर आपने देश , काल और पात्र का अभ्यास नहीं किया ,  देश , काल ,  पात्र को समय पर , समय के अनुसार नहीं लगाया तो न निश्चय का फल निकलता है , न प्रेम का फल निकलता है ,न  सतसंग का फल निकलता है , न सतगुरु से return होती है। देश, काल, पात्र को देखना ही पड़ता है , समझना ही पड़ता है , उसके अनुसार चलना ही   पड़ता है इसीलिए सबसे पहले ये common sense रखो कि मैं क्या कर रहा हूं ,कहां चल रहा हूं। देश , काल , पात्र तुझे कहीं अटकने नहीं देगा,तुझे दो foot torch ( फुट टोर्च ) पकड़ाके आगे चलने के लिए प्रेरित करेगा। और तू जब इन सब बातों का ध्यान रखेगा , तो तू हर बात में success हो जाएगा।

॥ है ही भगवान ॥

25-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पद"

सबनीं खांँ पद तुहिंजो ऊँचो। सबसे ऊंचा तेरी अपनी पदवी है जो आत्मा की पदवी है। तू देह नहीं तू ब्रम्ह-स्वरुप है, जागंदी ज्योति है। दोष ना मानो मानुष देहा। मनुष्य जन्म को सफल बनाओ। सफल तब होगा जब तू अपनी तपस्या को पहचानेगा।

सतगुरु ने निश्चय तो बता दिया, पद पर बैठने के लिए रास्ता भी दिखा दिया। अब बाकी की duty जिज्ञासु की अपनी बन गयी। तू उस रास्ते पर कितना चलता है, कितनी तपस्या पसंद करता है। गुरु ने पद दे दिया कि तू मेरा अपना ही बच्चा है। सतगुरु ने पद दे दिया कि तू जिज्ञासु बन जा, जिज्ञासु के लक्षण अपने में आरोप कर। वरना अपने पद की ओर तू कैसे बढ़ेगा ?

तपस्या सबसे पहली अपनी मुख की। मुख से बराबर खाना, पीना, बोलना। मुख एक ऐसी इंद्री है जो शरीर में अहम part अदा करती है। उसको अपनी तप से वस किया, मतलब सब इंद्रिया तेरी वस में आ गई। जब भी मन तेरा नीचे की ओर जाता है, अपने तप को छोड़ता है, तू मां में आना, वाद-विवाद, भला-बुरा बोलना, ऐसी मन की स्थिती जब आए, तब गुरु वचनों को भुलाना नहीं। सतगुरु को ध्यान में रखकर अपनी स्थिती पर तू हावी पड़ जा। कैसे पड़ेगा? उस इस स्थिति में भी भगवान देखेगा। मनुष्य में, जड़ में, चेतन में, सब में भगवान देखो। पर जो दुख-सुख आते हैं, हालतें आती हैं, बीमारियाँ आती हैं, उसमें भी भगवान देखना है। तो हालतें, हालतें न बनकर प्रभू-प्रसाद बन जाएगी। वैराग दे देगी, त्याग भी दे देगी, निश्चय भी करा देगी।

हर वक्त मन को ढीला छोड़ना नहीं है। उसपर थोड़ा-बहुत जो़र लगाके, अपनी आत्मा की तरफ पहले ही खींच लो। जब तेरे को signal आता है भीतर से कि मन नीचे की ओर जा रहा है, जाने के पहले तू उसकी डोरी खेंचकर सतगुरु के किले से बांध ले। वह नीचे की ओर जा नहीं सकता। अपनी श्रद्धा से तू success हो सकता है, बुद्धि से नहीं। ज्ञान भी श्रद्धा से लो, बुद्धि से नहीं लो। मैं-मैं ना कर बावरे। मैं करता हूँ, मैं करुंगा, मैं जानता हूँ, यह सब बातें फिज़ूल की हैं। आत्मा में स्थित होने के लिए भोले भाव मिले रघुराई। परमात्मा को तेरा भोला भाव भी पसंद है, पर तेरा देह-अध्यासी स्वभाव नहीं। बुद्धि चलाके वाद-विवाद करना, अपने मन को शैतान बनाना, यह परमात्मा को पसंद नहीं। पर श्रद्धा में डूबे रहो, परमात्मा को वह पसंद है। अब फैसला तेरे हाथ में है। यहां सब विकार दे दे, बदले में तू प्यार ले ले, उसी प्यार से तू ज़िंदगी गुज़ार।

।। है ही भगवान ।।

25-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"वक्त"

वक्त कहता है मेरा हाथ थाम ले। वक्त कहता है मुझे ध्यान से सुन। वक्त कहता है मेरी value कर। वक्त कहता है मेरे को waste मत कर। अगर मैं चला गया आगे तो तू पीछे रह जाएगा - यह वक्त पुकार पुकार के मनुष्य को कहता रहता है। वक्त रोज़ तेरी आयु को count करता है, वक्त रोज़ तेरे स्वासों को count करता है, वक्त तेरे प्रेम को भी महसूस करता है। लेकिन मनुष्य कुछ नहीं करता - वक्त की value नहीं करता, वक्त को संभालता नहीं, वक्त का misuse करता है, आयु का misuse करता है। उस जिज्ञासु को क्या कहिए जो वक्त की परवाह नहीं करता, लापरवाही करता है और वक्त उसे पीछे छोड़कर आगे निकल जाता है।

।। है ही भगवान ।।

26-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"रुकावटें"

रुकावटों में रुकना तेरा शान नहीं है। धीरज में चलना तेरा मान है। रुकावटों को देखकर तू नीरस, सुस्त हो जाता है कि रुकावट आई क्यों? किसने भेजी? क्यों भेजी? कभी मनुष्यों पर, कभी भगवान पर अपनी रुकावटों का कारण मानते जाते हैं। लेकिन रुकावट भी तेरा भ्रम हो सकता है। किसी अच्छाई के लिए भगवान ने धीरज कराया हो, यह क्यों नहीं सोचता? उस कार्य के लिए time favourable ना हो, परमात्मा ने बचा दिया। कुछ तो अच्छा हो सकता है, इस विचार को भी मनुष्य रख सकता है। लेकिन क्यों ? कहाँ ? किस ? ऐसे वचनों के बीच तू रहता है, तो क्यों-क्यों का जवाब क्यों-क्यों में ही रह जाता है। पर है ही भगवान, है ही भगवान मानके तो देखो। रुकावटें भी चली जाएगी। किसको तू दोष भी ना देगा।

हर वक्त अपने निश्चय की ओर आगे बढ़ना है। संसार में रुकावट बनी ही नहीं है। हर वक्त मौज में मुस्कुराकर रहने वाले के लिए कोई रुकावट नहीं। रुकावट आती भी है तो किसी चीज़ का balance करने के लिए ही आती है। विश्वास करामत की करामत है। आपका विश्वास रुकावट नहीं देखता, success की तरफ आगे बढ़ता है, मगर प्रेम-प्रेम से। तो तेरा जन्म-जीवन सफल है और मन शांत है। संतोष धन तुझे मिल रहा है। इसके आगे मनुष्य को क्या चाहिए ?

।। है ही भगवान ।।

26-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हाज़रा हुज़ूर"

जिज्ञासु जब तक हाज़िर-नाज़िर भगवान नहीं देखता, तब तक उसकी साधना पूरी नहीं होती। साधना को सफल बनाने के लिए हाज़िर-नाज़िर भगवान तो देखना ही पड़ेगा। भगवान जब देखते हैं तो ही तेरा आत्मा का दीदार, आत्मा का विश्वास, आत्मा का रस छलकता है। वर्ना फीका-फीका मनुष्य, सुस्त नीरस मनुष्य सफल नहीं होता। असफलता की तोहमत औरों पर लगा देता है और अशांत रहता है। अशांत मन वाले के पास शांति आ नहीं सकती और शांति पसंद मनुष्य के पास अशांति दूर से ही चली जाती है। अपनी-अपनी बात है, अपना-अपना अनुभव और अपनी निश्चय की ताकत। जो होता है, अच्छे के लिए होता है। अच्छा विचार करो तो अच्छा होगा, वर्ना कोई खैर नहीं।

।। है ही भगवान ।।

27-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सफाई"

सबसे पहले तेरी मन की सफाई, बुद्धि की सफाई, खयालों की सफाई, घर की सफाई, भंगार खाने की सफाई, परिवार में सफाई, रिश्तो में सफाई, भाई -भाई गुरु भाई में सफाई, भक्त भगवान में सफाई, गुरु और उसके बच्चे में भी सफाई, सत्संग में सफाई ।

सफाई एक ऐसी चीज है जो तुझे पूरे का पूरा मज़बूत बना देती है । आज तेरे जीवन में अगर प्रेम है और power है दोनों है तो सफाई होगी तो है । अगर तेरे पास प्रेम की कमी है, power की कमी है, तो कहीं न कहीं सफाई की कमी होगी । सफाई जैसी चीज तुझे पाक पवित्र बना सकती है, तेरी खोई हुई पवित्रता वापस आ सकती है, रिश्ते मजबूत हो सकते हैं । बुद्धि राम रंग में रम सकती है ।


तन को आतम रस में डूबा दो, मन को ज्योति स्वरूप बना दो, बंगार खाने को इस तरह साफ करो जैसे वह भगवान का मंदिर महसूस होवे । इतनी सफाई रखो सफाई से आपके पास success दौड़ती हुई आएगी । सफाई है तो श्रद्धा है । सफाई है, तो तू निष्कामी बन सकता है । सफाई अपनी जीवन की पूरी तरह से रखो खास करके अपने व्यवहार की सफाई रखो । व्यवहार, रिश्तो में भी व्यवहार होता है प्यार की कमी पड़ जाती है । निस्वार्थ प्रेम करने की आदत डालते जाओ । जिंदगी में निष्काम प्रेम नहीं हुआ तो जिंदगी सफल न हुई । निष्काम रखो खुद को और हरी में आराम दो सबको । एक तू ही समाज संसार को सुख दे सकता है । हर एक अपने लिए विचार करें कि मैं ऐसा आदर्श बनाऊं मेरे आदर्शों में भी ऐसी सफाई होवे जो तेरे आदर्शों से रोशनी की किरण उठे और सब को मिले |

 

।। है ही भगवान ।।

27-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मैं मुआ तो खुद खुदा हुआ"

गुरु ने कहा तू देह नहीं, तू ब्रह्म है। मन ने सुना अनसुना कर दिया। गुरु सज़ा भी देता है, फिर भी तेरा मन अहंकार का मज़ा नहीं छोड़ता। गुरु आशावादी है। अपने में तुझे टिकाने के लिए गुरु ने कभी लात भी लगाई, धक्का भी दिया, गुस्सा भी किया, तो क्या हुआ। तेरे को थोड़ी किया, तेरे अहंकार को किया, तेरे स्वभाव-संस्कारों की डीठता को किया और तुझे soft बनाने के लिए किया। मैं क्यों घबराऊंँ जब मुझे मिला जीयावण हार। मेरा जीयावण हार ऐसा है, कैसे भी करके वो मुझे जिज्ञासु-भाव में, जिज्ञासु-अवस्था में भी, ज्ञान देकर, पहला सबक देकर, आत्मा का, आत्मरस चखाकर ज़िंदा रखता है।

।। है ही भगवान ।।

27-Feb-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

मां कुदरत की गोद में , प्रकृति माता की गोदी में । जब तू छोटा था तो मां की गोदी में होता था , मां उल्टा करें , सीधा करें , हसाए , तेरी भलाई के खातिर कोई ऐसा कर्म करे जो तुझे रोना भी पड़े , दवाई खिलाए । मां की गोदी में बच्चे से , मां कर्म कराती है और सुरक्षित रखती है । तू अपनी मां की आंचल तले totally  सुरक्षित रहता है । ऐसे ही आज भी तू ज्ञान के रास्तों पर , सत्य के रास्तों पर आ ही गया है फिर भी थोड़ा सा tension ( टेंशन ) रहता ही है , ये कर्म करूं या न करूं , ये अच्छा है या नहीं अच्छा है ,  हिसाब - किताब तेरे दिमाग में चलता ही रहता है जब तक हिसाब - किताब है तब तक तू आत्मा का आनंद fast  प्रकृति उसके साथ  fast दौड़ना , तू नहीं कर सकता लेकिन बच्चे की तरह , मां प्रकृति की गोदी में आ जाओ , भरोसा रखो उनकी गोदी का , वो चलाएगी , वो उठाएगी , वो पुचकारेगी  बच्चे की तरह , वो कभी रुला भी देगी , तो क्या हुआ , मां है ना कभी रुलाया तो भलाई के खातिर ही ना , power ( पावर )बढ़ाने की खातिर ही न । कभी तू जो चाहेगा वो करेगी , वो  भी तेरे खातिर पर तेरे खातिर , तेरी भलाई के खातिर , कभी तू जो चाहेगा वो नहीं भी करेगी फिर भी बलाई तो तेरी ही है ना । ऐसे ही मां प्रकृति की गोदी में जब तू कर्म करता है , एक छोटे बच्चे की तरह खुद को surrender ( सरेंडर ) करता है , तो आज भी तू कितना भी बड़ा हो जा , मां कुदरत के लिए तू छोटा ही तो है । वो तुझे आज भी गोदी में ही तो रख रहे हैं फिर डर किस का ? Counting ( काउंटिंग ) किसकी ? सोच किसका ? Wrong - right ( रॉन्ग - राइट ) किस लिए ?  कुदरत आपे ही कर्म कराती है । सतगुरु कुदरत के धणी  है , उस पर भरोसा रखो और अपने सद्गुरु को surrender  ( सरेंडर ) भी करो , एक छोटा सा समझौता भी करो  कि हे गुरुवर जो कर्म मेरे लिए सही नहीं है , उसको मुझसे दूर रखना ,  और जो कर्म आप चाहते हैं , आपको अच्छे लगते हैं , वो मेरी झोली में डाल देना , करने की शक्ति भी तू ही देना , फल भी तेरा , कर्म भी तेरा , क्या लागे मेरा ? हस्ती शक्ति तेरी ही है सतगुरु , तू ही कर रहा है, करा रहा है  फिर मैं क्या सोचूं  ? इसी प्रकार अपने भावनाओं के साथ आगे बढ़ते हुए‌ fast (  फास्ट )  प्रकृति में तू  fast ( फास्ट ) दौड़ेगा तो कुदरत आपे ही संभालेगी ,  गिरने नहीं देगी ,  कहीं पर भी कोई रुकावट नहीं आएगी , ऐसा भरोसा ही तेरा लक्ष्य होना चाहिए ।

॥ है ही भगवान ॥

28-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जल्दबाज़ी"

जल्दबाज़ी जल्दी नहीं कराती, धीरज fast दौड़ता है। यह गुजारत किसकी अक्ल में आए। न आए तो क्या करें! जल्दबाज़ी में किए गए फैसले, फैसले नहीं, वह जिंदगी की कभी-कभी भूल बन जाती है। जल्दबाज़ी में दिया गया जवाब, सवाल बन जाता है। जल्दबाज़ी में प्रेम तेरे जिंदगी की जाली बन जाती है, जिसमें तू फँस जाता है। समझ में नहीं आता। बस मेरा प्रेम हो गया। दरअसल वह प्रेम नहीं है, तेरी जल्दबाज़ी है। जल्दबाज़ी के emotions हैं। वह प्रेम नहीं, तेरी ज़िंदगी का पतवार छूट जाता है।

जल्दबाज़ी में खाया खाना खून न बना, बन गया पानी। जल्दबाज़ी में चार आदतें किसकी लेके भीतर डाल दी, ज़िंदगी खत्म हो गई। जल्दबाज़ी में तू न जाने क्या-क्या करता है। फिर भी तुझे पता नहीं पड़ता कि क्या से क्या हो जाता है। अर्थ का अनर्थ हो जाता है। फिर भी मनुष्य जल्दबाज़ी छोड़ता नहीं है, धीरज में देर नहीं लगती। भ्रम नहीं लो कि धीरज करुँ, तो समय नहीं है मेरे पास। जल्दबाज़ी तुझे पटकके slow train में डाल देगी। धीरज तुझे सुजाग करके fast train में लेके आगे पहुंच जाएगा। कहाँ तेरी मंज़िल, कहाँ तू जा रहा है। अनमोल जीवन को सजाया नहीं, संवारा नहीं, तो संभाला कैसे जाएगा ! इस जीवन को हम नहीं संभाल सकते। सतगुरु के हाथों डोरी को छोड़ दो। मल्ला मज़बूत है, चड़ जाओ बेरी में। Slow चलेगी लेकिन पार पहुंचाएगी।

पार लगाईंदो झूलेलाल,
कष्ट मिटाईंदो झूलेलाल।
झूलेलाल मुहिंजो झूलेलाल।
झूलेलाम मुहिंजो झूलेलाल।

बोलो बैठ जाओ बेरी में, तो भी slow slow भी तू अपने को अपनी मंज़िल तक पहुंचा सकता है। फैसला तेरे हाथ में है, जल्दबाज़ी करो या धीरज करो। मुझे तो धीरज पसंद है, आपको क्या पसंद है ? जवाब ज़रुर देना।

।। है ही भगवान ।।

28-Feb-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु का साथ"

सतगुरु का साथ सबसे सुंदर साथ, मज़बूत साथ, तृप्त साथ। गुरु का हाथ जिसने पकड़ा वो रहा न बेसहारा। दरिया में डूबकर भी उसे मिल गया किनारा। साथ जिसके सतगुरु हैं, वो कभी गिर नहीं सकते। गिरते हैं तो गुरु की गोदी में गिरते हैं। माता पृथ्वी भी support करती है कि तू गुरु की गोदी में गिर, मैं तेरे को गोदी के नीचे संभाल लूंगी। पाँचों तत्वों की आशीष बरसात बनके बरसती है, तीन गुण तकलीफ न देकर सहारा बन जाते हैं, त्रिपुटी तेरे लिए वङ्भागी बन जाती है। पूरी कुदरत, पूरा संसार तेरा सहयोगी बन जाता है। इसीलिए सहारों का सहारा मेरा सतगुरु। वो ही सागर है, वो ही किनारा है। बूंद सागर में समा गई तो वो सागर बन गई।

।। है ही भगवान ।।

29-Feb-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मैं अकेला की पक्क ही सबसे बड़ी safety है, सहुलत है"

अकेला संसार लगता नहीं, कुदरत छोड़ती नहीं, सतगुरु आदेष देता नहीं। फिर भी अपने मन के अंदर मैं अकेला की पक्क करना बहुत ज़रुरी है। अकेला चलो रे, अकेला चलो रे, अकेला चलो रे। साथ में मेला हो ही जाएगा। इसीलिए अपने त्याग, वैराग में बरोसा रखो और प्रेम में पत्त रखे भगवान, वो ही अरदास करो।

।। है ही भगवान ।।

March
01-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्ज़"

सतगुरु का कर्ज़ कभी उतर ही नहीं सकता। लाख सेवा करो, लाख दान करो, कितनी भी सहुलतें लेकर सतगुरु दरबार में हाज़िर हो जाओ, कर्ज़ उतरेगा नहीं। क्योंकि गुरु ने जो दिया, सतगुरु ने जो दिया, वो अपनी तपस्या का ज़र्रा दिया, अपने निष्काम प्रेम के सागर का एक अंजली दिया, अपनी मीठी मुस्कान का सहारा दिया। कर्ज़ उतरता नहीं क्योंकि बदले में तू शेवाए देना चाहता है, बदले में पदार्थ देना चाहता है, बदले में गुरु को अपना बनाना चाहता है। वो अपना कभी बनता ही नहीं है, क्योंकि वो सबका है। जो सबका है, वह खुद का भी नहीं है। पता नहीं देह का उनको तो औरों से है क्या मतलब ? कर्ज़ उतरता है तप का तप से। उतारना है तो तप करो।

गुरु ने दिया मिठी मुस्कुराहट का सहारा। तू अपनी मुस्कुराहट को शुध्द, पाक, पवित्र कर। मुस्कुराहट में कहीं स्वार्थ छुपा है उसको अलग कर, तो कर्ज़ उतर सकता है। हर चीज़ का जो तप दिया गुरु ने, उसी चीज़ के सहारे कर्ज़ उतर सकता है, वरना उतरता नहीं है। अब जब तू कर्ज़ उतार नहीं पाता, तो ज्या़दा क्यों लेता है ? रोक-थाम करो, ज़्यादा मत लो। मेहनत गुरु से ज़्यादा नहीं लेनी चाहिए। अगर मेहनत लेनी चाहिए तो खुद को भी निष्कामी बनाना चाहिए। एक-दो शब्द गुरु बोले तो तेरे ऊपर कर्जा़ चड़ा, और तू जब तक चार शब्द संसार को निष्कामी गुरु के वचन नहीं बताता, तब तक कर्ज़ उतरता नहीं है। Be careful ! इसीलिए careful बनो, शांती में रहो, अकेले में रहो, ज़्यादा कर्जा़ ना लो, अपनी चाल चलो, तो भी ये ज्ञान तुझे सुखी करेगा, दुखी नहीं करेगा।

।। है ही भगवान ।।

01-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विनती और आदेश"

आपकी body language में खुदको ही observe करते चलो अगर जिज्ञासु हो तो। Observe करो आपकी body language में विनती, नम्र-भाव छुपा है या आदेश, order - क्या महसूस होता है? जिज्ञासु खुदको ही observe करता है, औरोंको नहीं। खुदको observe करते हैं तो खुद की शक्ति, खुद के लिए काम करती है। जब जिज्ञासु औरोंको आदेश, औरोंको order, औरोंको observe करते हैं, तो जिज्ञासु की शक्ति उसीके लिए काम करती है जिसको तू order करता है। Loss में तो जिज्ञासु ही गया ना। खुद की शक्ति को, खुद में न लगाके, सामने वाले की तरफ लगा दीया।

जैसे तू अपनी धन की रक्षा करता है, वैसे ही अपनी इस धन की भी रक्षा कर, इस शक्ति की भी रक्षा कर। धन तू लगाए, फायदा सामने वाले की तरफ जाए, तेरे को नुकसान रहे, तो क्या ये सौदा तुझे कबूल है? नहीं! इसी प्रकार आत्मिक धन अपना, जो तेरा भीतर का धन है, शक्ति है, वो तेरी सामने वाले की तरफ जाके फायदा दे और तुझे नुकसान में डाले। तू खुद को ना observe कर सके, न खुदको बना सके, तो सौदा काम का नहीं है। काम का सौदा करो और अपनी शक्ति खुद के लिए रखो, औरों के लिए नहीं। यही तेरा लक्ष्य, यही तेरा परमात्मा का रास्ता होना चाहिए।

।। है ही भगवान ।।

02-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"डुबकी"

डुबकी हर मनुष्य लगाता ही रहता है। कभी तू धन में डुबकी लगाता है, कभी तू पदार्थों में डुबकी लगाता है, कभी तू सुखों में डुबकी लगाता है, तो कभी तू दुखों में डूब जाता है। कभी तू अपने ही मन के ख्यालों में डुबकी लगाता है, कभी बुध्दी में भटक-भटक कर डुबकियाँ लगाता रहता है, उसूलों की अथाह सागर में डुबकी लगाता है। इसी प्रकार तू कहाँ-कहाँ डुबकियाँ लगाता है, खोज करो। और तू डुबकी लगाने के बाद डूबता नहीं है। नीचे नहीं उतर सकता क्योंकि इन सभी चीजों में इतना गेहरा पानी नहीं जो तेरे सर के ऊपर आए। तू आधा सुखा, आधा गीला किनारे पर आ जाता है और फिर एक डुबकी कहीं न कहीं लगाने के लिए तरसता रहता है। लेकीन जो जिज्ञासु खोजी है, परमार्थी है, सतगुरु से link में है, वो भी एक डुबकी लगा ही देता है गुरु के निष्काम, प्रेम के सागर में, उनकी ममता के दरियाह में, उनके आदर्शों के प्रवाह में, सांनिदिय में।

जिज्ञासु भी डुबकी लगाता है। गुरु की इन बातों में पानी गेहरा है। लेकीन तू पूरा डूब यहाँ भी नहीं सकता। पानी गेहरा है, लेकीन डूबने जितना नहीं है। डुबकी बराबर लगानी है। ब्रम्हसागर में उतर जाओ। तेरी डुबकी बराबर लग जाएगी। गुरु वहाँ ही है, हाथ पकड़कर तुझे पकड़ लेगा, डुबकी लगवा देगा। शौंक रख डूबने का, तैरने का शौंक सभी को आता है लेकिन डूब जाने का शौंक रखो। क्योंकी ये साधारण ordinary डूबना नहीं है।श, ये डूबना भी अलौकीक है। इस डूबने के बाद तेरी नई ज़िंदगी की नई शुरुवात होती है और तू सबसे न्यारा, सबसे प्यारा हो जाता है। क्योंकी पूरी डुबकी लगाके तू पूरा new हो जाता है।

।। है ही भगवान।।

02-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"भीतर-बाहर की personality"

जिज्ञासु खुदको इस प्रकार बनाता जाता है, जो उसकी बाहर की personality down ना होवे। पूरा खाना, पूरा पहनना, पूरा घूमना, अपनी चद्दर के भीतर रहना, शुद्ध बोलना, शुद्ध कर्म करना, अर्थात ना खुदको विखेप आए, ना औरोंको विखेप दे, ये है अलौकिक्ता। ये हुई बाहर की personality. भीतर की personality में क्या आता है? जिस प्रकार तुझे बाहर की personality प्रिय लगती है, प्रिय रखते हो, उसी प्रकार थोड़ी सी दृष्टि भीतर की personality पर भी डाल ही दो। भीतर तेरे निश्चय, त्याग-वैराग, समता-भाव, इन ख्यालों से ही तेरी भीतर की personality बनी रहती है। भीतर ख्याल सही हैं, अर्थात तृप्ति वाले हैं, अतृप्त ख्याल तेरे भीतर एक भी नहीं है, तो अंदर की personality तेरी बाहर की personality में चार-चाँद लगा देगी। तू सत्यम् शिवम् सुंदरम् महसूस करेगा। संसार को भी यही महसूस कराएगा, तुझे भी सब relax में देखेंगे, तो यही महसूस करेंगे कि तू ही शिव, तू ही शिव का दुलारा। तुझे आशीष मिलेगी पूरी सृष्टि की, जिस सृष्टि को तू ऐसी दोनो personalities देकर खुश रखेगा और आशीष का हकदार बनेगा।

।। है ही भगवान ।।

03-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नींद"

नींद उत्तम साथी है मनुष्य का। उत्तम Way  से चलाओ तो उत्तम साथी है।तू दिशाहीन है, तो तेरा कोई भी साथी नहीं है। नींद नहीं करते हो, तो भी आलस है। नींद ना करके, जागते रहना तो भी आलस है। पूरी नींद करो, पूरा active बनो जो जिज्ञासु का धर्म है, उसको निभाओ।(आलस छोड़कर एक्टिव बन जाओ। ज्यादा नींद करने से एनर्जी वापस जाती है।नींद न करने से भी एनर्जी खत्म हो जाती है।एनर्जी को बढ़ाना तेरा अपना कर्तव्य है। नींद को ध्यान में रखते हुए, time पर सोना time टाइम पर उठना, हर चीज समय पर होती है, तो अच्छा लगता है समय पर करो। जितनी नींद करनी चाहिए, उससे कहीं अधिक करते हो तो आप खुद के शत्रु  दुशमन हो। कम करते हो तो भी खुद के मित्र नहीं हो हर चीज बराबर रखो।

।। है ही भगवान ।।

03-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"श्राप याँ वरदान"

जिज्ञासु के हाथ में है अपना जीवन बनाना। अगर जिज्ञासु आत्मानिश्चय में है, आत्मबल में है, आत्मरस में है, त्याग-वैराग में है, प्रेम-समता भाव में है, तो किसी की कही बात या उड़ती हुई आई हालतें, कहांँ से भी तू अगर महसूस करता है कि ये मेरे लिए शब्द श्राप बन गए हैं, तो भी तू अपने निश्चय से, अपने सतगुरु प्रेम से, उसको रगड़ता है। रगड़के साफ करता है अपने पुरुषार्थ से, परमात्मा को अपने भीतर लेकर श्राप को वरदान बना सकता है।

भीतर की शक्ति को जगा, अपनी शक्ति को महसूस कर, लीला को लीला करके जान, तो तेरे लिए बुरी चीज़ कहांँ से आई, वो कहांँ चली गई, तुझे नहीं मालूम। बस तू अपनी मस्ती में आगे बढ़ता जा। तेरी मस्ती तुझे उस जगह पर खड़ा कर देगी जहाँ कोई श्राप नहीं, वरदान की इच्छा नहीं। बस है तो एक ही लग्न, एक ही शौंक कि राज़ी हैं हम उसी में जिसमें तेरी रज़ा है। हर बात में वाह वाह, हर बात में मज़ा है। हलाईं त हलां, बिहारीं त बस, मुहिंजी वाॅग सतगुरु, प्रकृति माता तुहिंजे वस।

।। है ही भगवान ।।

04-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Return-वापसी"

मनुष्य वापसी चाहता है, return की इच्छा है, तो अपने पद से गिरता ही है । तुझे तेरे पद से कौन गिरा सकता है, एक return की इच्छा । मैंने जैसे किया, वैसा क्यों ना मिला । मैंने इससे ये किया, उसने थोड़ा कम किया । अपने हर खयाल को झांक कर देखो, return की इच्छा उसमे है ही है । Return की इच्छा, खुजली की बीमारी है । जितनी return मिले, कम पड़ जाती है, जितनी वापसी मिली और चाहिए, अधिक चाहिए, ज्यादा चाहिए, ये तो लगा रहता है ।

विवेक विचार से खुद सोचो की तेरी return की इच्छा की बीमारी कब मिट सकती है, कैसे मिट सकती है, कौन मिटा सकता है । जब तक तू अपना निश्चय न करें, अपने own में, लेकिन निमिर्ता भाव में । own मे भी तू गलत दिशायें पकड़ता है कि मैं अपने own में हूँ, जो मैं करूँ वो करूँ । Own में आना ये नहीं कहता, own में आना ये कहता है की मुझे किसी की वापसी न चाहिये, मैं अपने own में हूँ पर own में ये नहीँ कहता कि मैं किसी को प्यार ना करूँ ।

।। है ही भगवान ।।

04-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Return-वापसी"

मनुष्य वापसी चाहता है, return की इच्छा है, तो अपने पद से गिरता ही है । तुझे तेरे पद से कौन गिरा सकता है, एक return की इच्छा । मैंने जैसे किया, वैसा क्यों ना मिला । मैंने इससे ये किया, उसने थोड़ा कम किया । अपने हर खयाल को झांक कर देखो, return की इच्छा उसमे है ही है । Return की इच्छा, खुजली की बीमारी है । जितनी return मिले, कम पड़ जाती है, जितनी वापसी मिली और चाहिए, अधिक चाहिए, ज्यादा चाहिए, ये तो लगा रहता है ।

विवेक विचार से खुद सोचो की तेरी return की इच्छा की बीमारी कब मिट सकती है, कैसे मिट सकती है, कौन मिटा सकता है । जब तक तू अपना निश्चय न करें, अपने own में, लेकिन निमिर्ता भाव में । own मे भी तू गलत दिशायें पकड़ता है कि मैं अपने own में हूँ, जो मैं करूँ वो करूँ । Own में आना ये नहीं कहता, own में आना ये कहता है की मुझे किसी की वापसी न चाहिये, मैं अपने own में हूँ पर own में ये नहीँ कहता कि मैं किसी को प्यार ना करूँ ।

।। है ही भगवान ।।

04-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निष्काम कर्म"

निष्काम कर्म क्या होता है ? निष्काम - कोई कामना न रहे, जिस कर्म में कोई इच्छा न रहे वापसी की, उसको निष्काम कर्म कहते हैं। लेकिन ये वापसी की इच्छा - इसको समझना ज़रा मुश्किल। जिज्ञासु जब सूक्ष्म बुद्धि में रहता है तो ही वो अपने कर्म को judge कर सकता है कि मेरा किया हुआ कर्म निष्काम है या सकाम। तेरे भीतर की स्थिति, तेरे भीतर की भावनाएँ, तेरे भीतर की सूक्ष्म इच्छाएँ, ये तो तू ही जाने। तेरी कर्म कहानी तू ही जाने कि तेरी कर्म कहानी को तू title कौनसा दे सकता है - निष्काम या सकाम ? ये तेरे हाथ में है, सच्चाई तेरी अपनी है। जितनी लगाए उतना आत्मरस चख्खे।

लेकिन वापसी की इच्छा को judge करना थोड़ा सा मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं। वापसी की इच्छा तू स्थूल बुद्धि से, फक्त पदार्थ, धन-दौलत, इसी में चाहता है, इसी में सोचता है, कि मुझे कर्म करने के लिए कुछ नहीं चाहिए। पर तुझे बहुत कुछ चाहिए। किसी ने credit थोड़ी सी नहीं दी वापसी में तो तू गया काम से। किसी ने शाबाशी नहीं दी तो तू फिसल गया। किसी ने तुझे निहारा नहीं तो भी तू अपने mood का गुलाम बन जाता है। इसी प्रकार की बातें अगर तू सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा अपने को observe कर सकता है, तो तेरा बेड़ा पार है और तेरी ज़िंदगी में जो कर्म कहानी होगी, तेरा अपना इतिहास होगा, वो निष्कामता से तुझे सिद्ध करेगा। वर्ना निष्काम कर्म तेरे बस की बात नहीं। निष्काम करते-करते, निष्काम की भावना से कर्म शुरु करते, तू कब सकाम कर्म में पहुँच जाता है।

निरइच्छा होके कर्म करता है, कब तू इच्छा में आ जाता है, तुझे भी नहीं मालूम। अगर किसी चीज़ में मन हिलता है या disturb होता है, तो ये समझो निष्कामता से मैंने कर्म शुरु किया लेकिन disturb हुआ हूँ तो सकामता में आ गया हूँ। Be careful ! साबुन की सीड़ी है, संभल के चल, तेरा बेड़ा पार है।

।। है ही भगवान ।।

05-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दर्द"

दर्द, एक मीठी चीज है । दर्द का सही उपयोग कोई करे, तो पार पहुंच जाए। दर्द तन में भी कहीं होता है, उस दर्द के सहारे तू अपनी बिमारी तक पहुंच सकता है, कि आखिर ये दर्द मुझे क्यों हो रहा है?
दर्द दिल में भी उठता है, तो भी तू पकड़ सकता है खुदको की, मेरा दिल क्यों दुःख रहा है? बिमारी क्या है? दर्द तो हो रहा है, लेकिन बिमारी क्या है? दर्द दिल में तू जगा सत्य की राह पाने का। ऐसा दिल में दर्द उठे, जो तू सत्य की राह को पहचान लें, चलने लगें, तो भी तेरा दर्द मिट सकता है, और तू उन राहों पर चल सकता है । दर्द नहीं जागा तो कुछ भी नहीं हुआ । कोई फायदा नहीं होता । पर जब दर्द आता है, रास्ते भी निकलते हैं, दिशाएं भी खुलती हैं, भगवान निराकार आसीस करके दर्द को जगाके, धुएं को भी दिशा देता है, कि तेरे दर्द से जो धुआं उठा उसको भी सही दिशा में डाल दो, ताकि दर्द तेरा सलामत रहे, परमात्मा के पाने का, और संसार का दर्द तेरा, हो जाएं कापूर । दर्द तो दर्द हैं, पर संसार के दर्द में तेरी बुद्धि भ्रष्ट है, पर परमात्मा के दर्द में तेरी बुद्धि तेरे इष्ट देव से मिलके एक हो जाएगी । ऐसा दर्द तू जगा, और उसी दर्द में तू चलता रहो, और ये कामना कर, ये संकल्प कर, कि ऐसे दर्द के आंसू, शल मेरे दिल से कभी न मिटे, ये अखियां भी गिली रहे, मन तन गिला रहे, और मेरी ज़िन्दगी भी प्रभू प्रेम में भीगी रहें।

।।है ही भगवान।।

05-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रालब्ध"

प्रालब्ध एक ऐसी भूमी है जिस पर तू जो platform बनाना चाहे बना सकता है। प्रालब्ध के भूमी पर अपने पुरुषार्थ का platform बना ही दो। उसी platform पर तेरी जीवन यात्रा, तेरी कर्मों की कहानी लेकर निकलेगी और तुझे संयम देगी। किसी भी भूमी पर तो तू कोई इमारत बनाता है। संसार की station भी तो किसी न किसी भूमी पर ही स्थित है। जहाँ से तेरी गाड़ियांँ आती जाती रहती है, वो क्या है ? वो तेरी भूमी ही तो है। भूमी के सिवाय क्या बनता है ? तू घर बना या परिवार बना, किसी चीज़ का platform बना या factory बना, office बना या hill station पर बंगला भी बना, सबसे पहले क्या चाहिए ? वो है भूमी। भूमीपूजन के सिवाय तो तू आगे नहीं बढ़ता।

जिज्ञासु भी अपनी प्रालब्ध की भूमी पर जब अपने पुरुषार्थ का platform बनाकर, जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाता है, आत्मरस, आत्म बोध, उसी का platform बनाता है, तो सफल हो जाता है। दूसरी station तेरे आदर्शों की भी आती है। उसी को भी भूमी का support मिलता है, आदर्श सिद्ध होते हैं। निष्कामता का यज्ञ जब तू शुरु करता है तो उस यज्ञ के लिए भी तो भूमी चाहिए। वो भी तेरी प्रालब्ध की भूमी पर ही सुंदर दिखता है। प्रालब्ध से परे होकर तू जो कुछ करेगा, सुंदरता में कमी रह जाएगी। इसीलिए प्रालब्ध की भूमी पर जो कुछ तू करेगा, उसमें सुंदरता आ जाएगी। तेरा जीवन सुंदरता से निखर उठेगा, आदर्शों से चमक उठेगा, आत्मरस से तेज़ आ जाएगा और सच्चाई - लग्न से तेरी प्रालब्ध भी, भूमी भी खुश हो जाएगी कि मेरे घर का बच्चा आज परमात्मा के रास्ते पर लग गया।

।। है ही भगवान ।।

06-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आज़ादी"

 

बहुत अच्छा लगता है शब्द आज़ादी । स्थिति आज़ादी की, सुख मिलता है, पर कहीं-कहीं कभी-कभी ये आज़ादी गिरावट भी बन सकती है। जब कोई बच्चे यां बड़े मर्यादाओं को छोड़ कर, आज़ादी की बातें करने लगते है, तो कहीं न कहीं खुद ही गिरावट बन जाते हैं।

आज़ादी क्यों न होवे, लेकिन मर्यादा की डोरी तो ज़रूरी है न। खास कर के बच्चों के लिए, Teen Age बच्चे, young बच्चे। आज़ादी कितनी भी लो बच्चों, लेकिन थोड़ी बहोत मर्यादा की डोरी से बाँध लो । Excess कोई भी चीज़, गिरावट बन जाती है। Excess आज़ादी भी कहीं न कहीं, किसी न किसी के विकार का बंधन बन सकती है। तू न चाहता है, लेकिन फिर भी कहीं किसी विकार में तू अटक सकता है, जे खुद को full आज़ाद करता है। इसीलिए थोड़ी सी बंधन भी ज़रूरी है। अभ koi बच्चा जे कहे कि मुझ से क्यों पूछा जाता है, कि मैं कभ आऊँ यां न आऊँ घर, late आऊँ यां जल्दी आऊँ, तो खुद ही सोचो इस प्रकार की आज़ादी मनुष्य को कहीं न कहीं डुबा सकती है। इसीलिए सभी को आशीष है की आज़ादी का अर्थ समझो, full आज़ाद रहो, कार्य में, कर्म में, प्रेम में, पर फिर भी मर्यादा की डोरी से अगर उसी आज़ादी का सुख लोगे, तो रेहजी इन्दी, निभ आयेगी सभी से। बड़ों से भी, छोटो से भी, हम साथियों से भी, सब से निभ आयेगी, पर जे तू अजॉब् फायदा लेता है कभी, तो आज़ादी का सुख नहीं दुःख ही मिलता है। मेरे अच्छे बच्चे थोड़ा सा ध्यान देंगे, और थोड़ा सा खुद को change करेंगे, और सभी के दिल का तारा बनेंगे, किसी को भी ऐसा जवाब न देंगे की मैं क्या भी करूँ, आपको क्या । इसी से समाज ढीला पड़ जाता है, संसार सुख सागर है, तो भी दुख सागर बन जाता है । आप तो मेरे सोल्जर हो ना, तो आप संसार को सुख सागर बनाओ, और अपने को मजबूत बनाओ, तो आप के साथ जो भी रहेंगे, जो आपको देखेंगे, वो भी मजबूत बन जायेंगे। कितना अच्छा कार्य करोगे आप ये आप खुद ही सोचो।

।।है ही भगवान।।

06-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"उमंग और emotions"

जिज्ञासु अक्सर इन दो स्थितियों में थोड़ा सा भटक जाता है। उमंग मनुष्य के जीवन में चार चाँद लगा सकती है, emotions कभी-कभी जिज्ञासु को अंधेरों में ढकेल देती है। उमंग उन्नति की सीड़ी है, emotions कभी-कभी गिरावट भी बन सकते हैं। उमंग आपको खुश रखता है, औरोंको भी खुशी देता है। Emotions possessive वृत्ति पैदा करता है और खुद possess होके औरोंकों भी करता रहता है।

उमंग सुखों की खाण है, emotions दुखों के लिए न्यौता है। उमंग तू पूरा कर सकता है, अगर ना हुआ तो तू wait & watch कर सकता है, फिर कभी भी chance मिलता है। लेकिन emotions पूरे न हुए, wait & watch करना emotions जानते नहीं, दूसरे chance में emotions इंतज़ार नहीं करते। अभी चाहिए, जल्दी चाहिए, कभी नहीं होता तो गिरावट की तरफ गिर जाते हैं। उमंग परमात्मा के रास्तों पर spirituality में डाल देता है, emotions परमात्मा से परे करता है और spirituality में तो सवाल ही नहीं है।

इसी प्रकार आप खुद उमंग और emotions को अपने नज़रीए से जानकारी में रखो और अपने जीवन को उमंगों से भर दो। Emotions से थोडा़ दूर करो तो आपका बेड़ा पार है। आपको बहुत अच्छा लगेगा, हल्का लगेगा और जीवन की असलियत तेरे साथ रहेगी, भगवान भी तेरे साथ रहेगा, सतगुरु तो साथ होता ही है। जहाँ उमंग है, वहाँ सतगुरु है।

।। है ही भगवान ।।

06-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरे लाल"

लाल जब मेरे ही हो, तो क्या पूछूं आप कैसे हो । लाल तो लाल ही होगा ना । अच्छा ही होगा, अच्छा ही है, अच्छा ही रहेगा ।

जो आत्म निश्चय में रहता है, जो धीर जवान बनता है, वह कभी निश्चय से दूर नहीं होता । तेरा धीरज, तेरे निश्चय के लिए,safety बन जाता है । धीरजवान बनकर तू अपने निश्चय की रक्षा कर सकता है । धीरज आपको दो जहां की खुशियां दिला देता है । प्रेम में रहो, धीरज में रहो, संयम सीखो, नेम टेम के मजबूत बनो, देह अध्यास छोड़ो, देह की बातों में ज्यादा मत उलझो, आत्मा के निश्चय को आगे रखो । सब से प्रेम करो । जो भी होता है अच्छा ही होता है, अच्छे के लिए होता है ।

तू अगर परमात्मा के रास्ते पर है, तुझे कुछ दिखाई भी देता, कि यह होना चाहिए यह ना होना चाहिए तो भी भरोसा रखो, फल अच्छा ही निकलता है । फल ही तो निकालना है ना, अच्छा ही तो होना चाहिए । वह अच्छा होकर रहेगा अगर तू संयम से सत्य के रास्ते पर चलता रहता है अपनी भावना शुद्ध रखो, कर्म में न जाओ, फल में न जाओ, अपनी भावना पाक पवित्र रखो । यही तेरा उद्देश्य होना चाहिए ।

।। है ही भगवान।।

07-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विचारधारा"

तेरी विचारधारा तेरी प्रेम धारा बन सकती है। तेरा प्रेम किसीको जीवन दान दे सकता है। अपनी विचारधारणाओं में थोड़ासा balance खींच लो। कहीं कोई विचारधारा नहीं मिलती, परेशान होने की ज़रुरत नहीं, विचारों को थोड़ासा ढीला छोड़ो, थोड़ासा समय दो, थोड़ासा बहने दो। साखी भाव में आ जाओ, देखते रहो - कहाॅं जा रही है मेरी विचारधारा ? फिर उसको खेंचो। जल्दबाज़ी विचारों से भी मत करो। थोड़ा ढीला छोड़के, थोड़ा खेंचों। थोड़ा विचारों की study करो, फिर अपने में हिसाब रखो what is what? हर चीज़ हाथ में आएगी, कुछ न छूटेगा, कुछ न बिगड़ेगा, तेरी विचारधारा परमात्मा से मिल-जुलके रहेगी, सृष्टि की रचना से मिल-जुलके रहेगी। ऐसी विचारधारा बनाओ जो भगवान तेरे विचारों में रहे, तेरे साथ रहे ।

।। है ही भगवान ।।

07-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दृष्टिदोष"

दृष्टिदोष क्या है ? ध्यान दो तो दृष्टीदोष तुझे समझ भी आता है और तू इसको दूर भी कर सकता है। तेरी दृष्टि में present, past, future गूम रहे हैं तो दृष्टि दोषदृष्टी हो जाती है। पर जे तेरी दृष्टि में भगवान ही गूमे, तो तू तीनों कालों का साक्षी बन जाएगा। तेरी दृष्टि में राग-द्वैष पनप रहा है। जे प्रेम देवता आसन ग्रहण कर ले, तू उसको बुलादे, तो तेरी दृष्टि में दोष निकल जाएँगे। प्रेम आया, सारे दोष बाहर। तेरी दृष्टि में दूसरा है। आत्मज्ञान समझो, आत्मबोध आ जाए तो दूसरा मिट सकता है। तेरी दृष्टी उजली हो सकती है, पाकपवित्र हो सकती है। तेरे हाथ में जीवन बनाना है, पर तू किस तरफ जा रहा है ये देखना है।

अपनी मंज़िलों की तरफ दौड़ो, आलसी मत बनो। जो तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है, वहाँ पर जाके आप अपना कार्य सिद्ध करो, अपनी दृष्टि को ठीक करो। तू सुखी हो जाएगा, साक्षी-भाव में आ जाएगा, दोषदृष्टि निकल जाएगी, जीवनमुक्ति का आनंद लेगा।

।। है ही भगवान ।।

07-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निश्चय से निश्चय होगा"

एवड ऊंचे को एवड ऊंचा होकर जानिए । ऊंचा होना तू किसको कहता है ? उचित पदवी पर बैठना ? तू ऊंचा नहीं हो गया । जितना तेरा बैलेंस होता है, अपने तन का, मन का, बुद्धि का, तेरी इंद्रियां balance में रहती है, out नहीं होती, गुस्से में नहीं आती, विकारों में नहीं गिरती, वही इंद्रियां शक्तिशाली होती है । वरना इंद्रियों की तो कथा यही है, तु जीव भाव में, देह अभ्यास में, इंद्रियां तेरी शक्तिहीन बन जाती है । उसको ऊपर उठाओ, अपनी इंद्रियों में भी भगवान देखो, ख्यालों में भगवान देखो, रहनी कहनी में भगवान देखो, कर्म धर्म में भगवान देखो । हर चीज में जब तू भगवान देखता है तो ही तू गुरु को भी जान सकता है, पहचान सकता है, वरना गुरु भी तेरे लिए शब्द बन के रह जाते हैं । गुरु शब्द नहीं है, गुरु एक अलौकिक स्थिति है, उस स्थिति को जानना जिज्ञासु का प्रेम है । प्रेम है तो तू गुरु की स्थिति पर जा सकता है, जान भी सकता है ।

पर तेरा deeply प्रेम संसार से है, तो गुरु को जान नहीं सकता, पहचान नहीं सकता । खुश रहता है, उमंग रखता है, अपनी शांति के लिए, अपने व्यव्हार सिद्धि के लिए, अपना नाम निकालने के लिए, तो गुरु गुरु कहेगा, पर गुरु को जानना तेरे बस की बात नहीं होती । इसीलिए अपना निश्चय करो, खुद को जानो, तो गुरु को पहचान सकता है, यही तेरा लक्ष्य होना चाहिए ।

।। है ही भगवान।।

08-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

"कण कण से प्यार - ये है तेरा सिंगार"

जड़ चेतन से प्यार करो, कण कण से प्यार करो, ज़रे ज़रे से प्यार करो, हर मनुष्य से प्यार करो । सृष्टी में परमात्मा ने जो भी उपाया है, सभी से प्रेम करो ।

आप कहोगे कैसे करूँ? अपना एक ऐसा आदर्श बनाओ, जिसमें तेरी ऐसी झलक मिले कि तू प्रेम में डूबा मिले। कण कण से प्रेम करना, जड़ चेतन से प्रेम करना, जीव जंतु से भी बुरी भावना न रखो। वो भी सृष्टि के प्राणी हैं। किसी से द्वेष भाव न रखो । सब पर आत्म दृष्टि तू अपनी डाल सकता है, ये प्रेम है । भावना ऐसी अच्छी शुद्ध बना लो कि मुझको कोई प्यार न करे ये हो नहीं सकता । ज़रा ज़रा सृष्ट का चपा चपा, सृष्टी का हर member, चाहे वो जीव है या जंतु है कोई भी है, मुझे प्यार करता है। ऐसा आत्म विश्वास होना चाहिए। उसी के सहारे तू जिंदगी को आगे बढ़ाता चल। आत्म विश्वास है तो बाहर से भी तेरी रहनी कहनी अच्छी बनती जायेगी । मनुष्य तो मनुष्य है पर केहं केहं मंज खुशबू आ बहार जी । तू अपने आदर्शों से ऐसे बहार की खुशबू वाला मनुष्य परमात्मा की कुदरत को प्रेम करने वाला मनुष्य सर्व में helpful भावना रखनेवाला मनुष्य, ऐसी ऐसी अच्छी, ऊँची आदर्शों वाली बातों को लेकर ऐसे तू मनुष्य बन सकता है । और धीरज तेरा साथी है । सृष्टि की छोटी छोटी चीजों को प्रेम करना तेरा कर्तव्य है।

नमक अभ तू कहेगा नमक को कैसे प्यार करूँ। उसको कभी waste ना करो, उसकी value करो । माना की वो साधारण चीज़ तेरे लिए है। पैसे ज्यादा नहीं लगते है नमक खरीदने में, पर नमक जैसी valueable चीज़ कौनसी है। नमक है तो स्वाद है। Waste न करो । परमात्मा के रास्ते पर भी जाकर देखो, तो नमक को waste करने के लिए मना की गयी है, पर मनुष्य के आदर्शों में कुछ तो कुछ कमी रह जाती है तब उए चीज़े आप से होने लगती हैं, जो चीज़े होनी न चाहिए फिर अपनी गलतियों का एहसास नहीं दोष ग्रह चारी पर, अपनी गलतियों का एहसास नहीं दोष एक दूसरे पर, अपनी गलतियों का एहसास नहीं दोष भगवान पर भी लगा ही देते हैं। थोड़ा थोड़ा करके change करो । हर दिन एक गलती सुनी जाए, कोई सुनाए और तू सुधारे तो भाग्यशाली तू भी है, जो तुझे सुनाता है, वो भी है । दोनो मिल कर नसीब बनाएंगे, सृष्टी सुंदर करेंगे और आदर्शों को ठीक करेंगे । समाज की ये भी एक सेवा है, जो तू अपनी गलती को सुधार कर , फिर सभी को ठीक करने का संकल्प रख, तो भी अच्छा है। तेरा संकल्प भी काम कर जायेगा ।

।। है ही भगवान ।।

08-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्म की मर्यादा"

कर्म की मर्यादा यह होती है कि जो कर्म हम कर रहे हैं, एक तो वो निष्काम होना चाहिए, no return! दूसरा तो उस कर्म से रस, करने वाले को नहीं आना चाहिए। जैसे आप कुछ फल लेते हो, फल का रस फल नहीं लेता, फल का रस मनुष्य लेता है। फल तो रसदार बना मनुष्य के लिए, औरोंके लिए। लेकिन खुदका रस वो खुद नहीं लेते।

नदी बहती रहती है, चलती रहती है, खुद तो बहती है, सभी को enjoy कराती है, नहलाती है, रस देती है। पर खुद तो उबड़ खाबड़ रास्तों से गुज़रती है। घर में तू झाडू लगाता है, very simple! झाडू सारे घर को साफ कर देता है, लेकिन खुद तो बेचारा मैला ही रहता है न, खुद सफाई लेता नहीं। इसी प्रकार आप भी विचार करते जाओ, बहुत सारी स्थितियाँ, बहुत सारी बातें मिलती जाएगी, जो तू समझेगा कि मैं भी कर्म करुं, पर रस कर्म करने वाले, याने मेरे लिए नहीं है। वो रस, जिसके लिए मैं कर्म करता हूँ, सामने वालों के लिए है। मेरे से कर्म हो जाए, ये मेरा जन्म सफल है। कर्म में रस आवे ये मेरे गुरु की महिमा है, पर मेरी कोई बात नहीं है। क्योंकि हस्ती शक्ति उसी भगवान की है, सतगुरु की है, तो बीच में मैं क्यों जाऊँ।

आप बीच में न जाओ। बाकी सब कुछ अच्छा होता है, अच्छा होता ही रहेगा। अपने कर्म पर दृष्टि डालो, कर्म फल पर नहीं, कर्म के रस पर नहीं। आपको कर्म करने का chance मिले वो ही बोलो शुक्र मुहिंजा साईं जीएं तूँ हलाईं। बाकी रस में और credit में नहीं जाओ। तो ही तूँ success बन जाएगा और तेरा जीवन भटकने से बच जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

08-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मोल्ड हो  जाओ और बोल्ड बनो"

 

मोल्ड होने के बाद तू बोल्ड बन जाएगा, सच्चा गोल्ड बन जाएगा । तू सच्चा सोना है , पर जब तू खुद में आदत डाले मोल्ड होने की, जो मोल्ड होता है वो जहाँतहाँ फिट है । फिटनेस उसके साथ चलती है , फिटनेस ही उसकी गुडनेस बन जाती है। हे मनुष्य जन्म सोना इसको यूं ना खोना । ज़िद में ज़िद, तकरार में तकरार, कब होवे इकरार । इकरार हो नहीं सकता जब तू तकरार में मन रखता है । सारी  संसार को अपना रूप करके जानो ।

शक, वहम, धोखा सब दिल से शब्द निकाल दो । प्रेम परमात्मा है, उसी प्यार में जिंदगी गुजार जो प्यार तेरा सबके बीच में तू बांट सकता है वो प्यार है आत्मिक प्यार , आत्मिक निश्चय करो तो आत्मिक प्यार तेरा सलामत रहेगा।  बिना निश्चय आत्मिक प्यार हो नहीं सकता तेरा प्यार बंधन का रूप ले लेता है, कोई न कोई बंधन , किसी न किसी चीज का , किसी न किसी बात का , कोई न कोई कर्म का , किसी न किसी रिश्ते का, ढूंढते रहो,  कर्म के बंधन में बंधते रहो , पर आजाद पंछी बनो ,तेरे को पिंजरे की जरूरत नहीं पड़ेगी तूआकाश वासी होके , आजाद पंछी बनके,  सर्व को प्यार करेगा ,सर्व में तू सुखी हो जाएगा , सर्व तुझसे सुखी होगा । बस अपने को एक निश्चय में बांँध लो बाकी बंधन मानो नहीं । बंधन सुहाता है मुझको भी कभी-कभी ,पर बंधन में बांधना मुझे नहीं आता ।  सुहाता है , ऐसा बंधन बांधे , जो बंधन न लगे ,ऐसा कर्म करो जो क

।। है ही भगवान।।

09-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

"उहा खबर को लहन्दो शेर, असुल में मां आहियां केर"

तू कौन है, कहाँ से आया है, क्या करना है, मनुष्य जन्म का मकसद क्या है, ये सब बातें जानने के लिए तेरा मनुष्य जन्म हुआ है । एक aim ये ना रखेगा, तो भटकती हुई कई मंजिलें तू रखेगा और उसको प्राप्त नहीं कर सकेगा उस तक पहुंच भी नहीं सकेगा । इसलिए अपनी aim बना लो कि मैं ब्रह्म स्वरूप हूँ उसमें मुझे टिकना है और अपने अंतर्मुख्ता में रहना है ।
अंतर्मुखी सदाई सुखी ।

।।है ही भगवान।।

09-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रेम नगर"

जिज्ञासु को प्रेम नगर पहुंँचना है। जाएँ कैसे ? बिना सत्संग के तू जा नहीं सकता। एक तो प्रेम नगर में पहुँचने के लिए सत्संग रुपी गाड़ी, सतगुरु मल्ला और तेरे साथी ज़रुरी हैं जो तेरे साथ प्रेम नगर में चलें। सबसे पहला साथी तेरा अपना धीरज, संतोष, लग्न, त्याग, वैराग, इन सब साथियों के साथ रहकर तुझे आत्मनिश्चय हो ही जाएगा। आत्मनिश्चय से तू सत्संग के द्वारा प्रेम नगर में पहुँचेगा, प्रेम की नईं दुनिया बसाएगा। नईं उमंग, नईं तरंग, नईं मंज़िलें, नईं राहें, सबकुछ नया ही नया। ऐसा तो प्रेम नगर है जिसकी सैर करते ही तू तृप्त हो जाएगा। बस प्रेम नगर चलने की तैयारी रखो और सत्संग का साथ, सहारा ले लो।

।। है ही भगवान ।।

09-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Polish (पॉलिश)"

पॉलिश के सिवाय किसी भी चीज में आकर्षण उत्पन्न नहीं होता । आकर्षण पैदा करने के लिए हर चीज को पॉलिश करना ही पड़ता है । तू फर्नीचर बना या कुछ और पॉलिश तो एंड में करनी ही होती है । परमात्मा ने तेरे जीव भाव को मनुष्य जन्म दिया । जीव बन कर मनुष्य बन कर तू संसार में क्यों आया , पॉलिश करने के लिए , तेरे उपर भी पॉलिश होनी चाहिए । छोटा है तो माँ मालिश करके पॉलिश करती है ,थोड़ा बड़ा हुआ पापा ने थप्पड़ लगाके भी आपको पॉलिश किया । संसार के उतार-चढ़ाव सहने योग्य हुआ , वो सब सहकर भी तू पॉलिसी तो हुआ । गुरु के पास आया, सतगुरु ने कभी निष्काम प्यार से पॉलिश किया , कभी वचनों से । साम दाम दंड भेद किसी भी चीज से आपको पॉलिश ही तो किया । कभी मन को जल्द गुरु के हवाले कर देता है, सतगुरु का कर देता है, सतगुरु प्रेम में पॉलिश करते हैं । जब तू अडेला घोड़ा बन जाता है गुरु भी थप्पड़ मार के, वचनों की थप्पड़ मार के तुझे पॉलिश तो करते हैं।  जब तो निश्चय में आ जाए कि मैं देह नहीं ब्रह्म स्वरूप हूं, तो तू खुद को खुद ही पॉलिश कर सकता है । अपने सबसे पहले स्वभाव पर दृष्टि डालो स्वभाव को कैच करो कि, मेरा स्वभाव किसी को सुख दे रहा है या दुख, खुद ही खुद पॉलिश करो ,कि वह स्वभाव सबको सुख दे सके। स्वभाव में धीर गंभीरता होनी चाहिए , स्वभाव में वेरागवृद्धि होनी चाहिए, समानता होनी चाहिए । तीनों कालों से ऊपर आत्मभाव होना चाहिए ,३ गुण का साखी भाव होना चाहिए। परमात्मा से मिलकर एक होने की लगन प्यास तेरे स्वभाव में होनी चाहिए । ऐसी पॉलिश अपने स्वभाव की करो , तन की भी करो , सही खाना खाओ, मन की भी करो ,सही संकल्प करो । संसार में तूने खुद को पॉलिश नहीं किया तो आकर्षण तेरे में कैसे पैदा हो सकता है, फिर तू कहता है मुझे कोई प्यार नहीं करता । जिस चीज में आकर्षण होवे ,और वह किसी को प्यारी न लगे ,यह हो नहीं सकता । अपने हृदय में मेरी भावनाओं को जगा दो ,ध्यान दो और खुद की जिंदगी को पॉलिश करो।

।। है ही भगवान।।

10-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

'न्यारे और प्यारे'

 

जिज्ञासु का स्वभाव बन जाए, सब के बीच में रहके भी भीतर उदास । उदास का अर्थ ये नहीं है, कि वो खफे है, लेकिन सबके बीच में रहो, सबसे उदास रहो, मतलब-वैराग-शांत । बाहर झमेला भीतर अकेला, इसकी पक्कता करनी है जिज्ञासु को । ये जिज्ञासु का सबसे मुख्य लक्षण है, कि वो सबके बीच में भी बैठकर, प्रेम का व्यापार करता है, और भीतर अकेला बैठकर सतगुरु से सौदा भी करता रहता है । अंदर -बाहर एको जान । परमात्मा प्यारे से संबंध हर वक्त बना रहे, जुड़ा रहे । मन से जो soft हो जाता है, वो ही न्यारा और प्यारा बन सकता है । अहंकार की कड़क बातों में, इच्छा की भटकती बातों में, बुद्धि की झटकती बातों में, स्वभाव-संस्कार में। जो स्वभाव संसार में तूने पाया है, उसमें तू भटकता रहता है, और जो स्वभाव सतगुरु से तू प्राप्त करता है, उसमें तू relax रहता है। स्वभाव स्वभाव से change करो। सतगुरु से सच्चा सौदा करो, और हर वक्त मौज में रहो, मुस्कुराते रहो, प्यारे रहो, न्यारे रहो, और अपने सतगुरु के दुलारे रहो ।

।।है ही भगवान।।

10-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गर्व भरा मस्तक"

गर्व भरे, अहंकार से भरपूर मस्तक को कहाँ seat मिल सकती है ? उसकी जगह कहाँ है ? कभी विचार किया ? मस्तक बेचारा इतना छोटा, गर्व तेरा इतना बड़ा, अहंकार तेरा top, मस्तक कैसे संभाले? वो कहाँ जाए? कुछ तो दया करो अपने मस्तक पर। तेरा ये गर्व भरा मस्तक सतगुरु के वचन के सिवाय कहीं भी रुक नहीं सकता। जब गुरु वचनों से तेरा हृदय भरपूर हो जाए, तो तेरा मस्तक शांत हो जाता है। गर्व को छोड़कर, गर्भ में की हुई वादे की बात, वचन की बात, याद करता है, और अपने परमात्मा के रास्ते पर लग जाता है।

गर्व भरा मस्तक अगर सतगुरु को अर्पण कर दें, तो इस मस्तक से न जाने कितने सारे कार्य हो सकते हैं, कितने खुश हो सकते हैं, कितनी अच्छी-अच्छी बातें संसार में वो मस्तक कर सकता है। लेकिन गर्व और अहंकार तेरे मस्तक से निकले ना! Please अपने ऊपर दया करो और खुदको सफल बनाओ इस जीवन में, इसी जन्म में। अहंकार को छोड़कर प्रेमनगर चलो, प्रेम की भाषा समझो। प्रेम से भरपूर कर दो अपने मस्तक को तो तेरी ललाट की रेखाएँ चमक उठेंगी, तेरी प्रालब्ध भी शानदार बन जाएगी।

।। है ही भगवान ।।

10-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"भलाई और फिर बुराई"

भलाई और फिर बुराई

यह दो पाटन के बीच में हर मनुष्य अपने को खत्म कर रहा है।

मनुष्य का मन, किसी एक व्यक्ति में, किसी एक हालत में, कभी भलाई दिखाता है, कभी बुराई।

तू दो पाटन के बीच में साबित रह नहीं सकता। इसीलिए “भलाई” और “बुराई” दोनों के बीच से, एक छोटा सा रास्ता निकालो और आगे बढ़ते जाओ।
अपने जीवन की गाड़ी इन दो पहियों के बीच से निकाल दो, तू सुखी हो जाएगा।

जबरदस्ती तू किसी की भलाई कर नहीं सकता, थप्पड़ मिलेगी, कि तू क्यों करता होता है, जबरदस्ती किसी की बुराई छुड़ा भी तो नहीं सकता। फिर तू क्यों इन दो पाटन के बीच में खुद को खत्म कर रहा है? पिस रहा है?

“ज़िना पासा कील दा, तिन्हा नाही कस”
कील की तरफ आ जाओ, बच जाओगे।

कील क्या है?

सतगुरु से मिली 2 फुट आगे रखने वाली टॉर्च, तेरी कील बन जाएगी।
करने, न करने, में मत जाओ। भलाई, बुराई में मत जाओ।
अपना रास्ता अपनी टॉर्च से रोशन करो, और आगे बढ़ो।

मैं ब्रह्मस्वरूप हूं, मैं अमर हूं, मैं देह नहीं हूं, यह एक सतगुरु से मिली टॉर्च आपके जीवन को हर वक्त रोशन करेगी। टॉर्च लेना भूलना नहीं। जहां बैठो, जहां जाओ, जिस हालत से गुजरो, दुख में, सुख में, रंज में, खुशी में, टॉर्च हर वक्त तेरे साथ रहे तो किसी चीज़ की कमी नही रहेगी। बलाई और बुराई के चार्कव्यू सें तू छूट जाएगा और नजरिया तेरा आत्मिक हो जाएगा।

जब तक आत्मिक दृष्टि, आतम बुद्धि, आतम रस, आतम प्रेम नहीं मिलता, नहीं होता, तब तक इन चक्रव्यू से तू निकल नहीं सकता।

अपने को चक्रव्यू से निकालो और आतम निश्चय में अपने जीवन को डाल दो।स्पिरिट्युअलिटी ही तेरा लक्ष्य होना चाहिए।

॥ है ही भगवान ॥

11-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सदा बस्त हम साथ"

 

यह एक ऐसा अनोखा भगवान का दिया हुआ जैसे की मंत्र है । जहां भी आप कहीं discourage होते हो, कहीं अकेला खुद को पाते हो, कहीं नीरस होते हो, कहीं tension में आते हो तो एक ही line अपने ह्रदय में उतार दो की सदा बस्त हम साथ ।
किसी और का टैंशन होता है, सामने वाले की कोई तकलीफ मन में आती है, तो भी बोल दो सदा बस्त तुम साथ l "सदा बस्त हम साथ", "सदा बस्त तुम साथ" तो जिंदगी ऐसे गुजरेगी जैसे बहाव पानी में शान मान भी करता है और बहता भी जाता है । जिंदगी ऐसे गुजरेगी जैसे सभ सुख भी है तेरे पास पर कहीं पर सुखों में आसक्ति न होगी। प्रेम के दुनियां में रहते रहते तू अपनी यात्रा को सफल बनाएगा, जीवन को सफल बनाएगा और सब से प्रेम करेगा । प्रेम करो प्रेम ही आत्म पूजा है, प्रेम ही तेरा खाना है, प्रेम तेरा सोना है, प्रेम तेरा श्रृंगार है, प्रेम तेरा हर चीज़ जो कमी है वो प्रेम से पूरी होती है।

।। है ही भगवान ।।

11-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरी अपनी ऐनक"

जिस प्रकार अपनी ऐनक तेरी तेरे से fit होती है, दिखाई बराबर देता है, इसी प्रकार तू अपनी दृष्टि को भी अगर सही रखेगा, अपना करके रखेगा, तो तेरी दृष्टी भी तेरे से fit हो सकती है। जैसे एक ऐनक fit होती है, वैसे तेरी दृष्टी भी तेरे से fit हो जाएगी। वो गलत चीज़ें, गलत दृश्य, गलत दिखाई देनेवाली कर्मों की कहानियाँ, कुछ भी न समेटकर, फक्त प्रेम समेटेगी और प्रेम समेटकर तेरी दृष्टि तेरे साथ fit रहेगी। कहीं कोई विखेप नहीं, कहीं कोई तकलीफ नहीं। तू दृष्टि को सवांरकर ब्रह्मकार वृति को जगाकर तू राजा बन जाएगा, राजाओं का राजा महाराजा बन जाएगा।

जिस जीव को चाह नहीं वो है शाहों का शाह। शाहों का शाह तू फक्त दृष्टि से बन सकता है। अपनी दृष्टि को ठीक करो। कुर्ब कयो पाँजे मथां - अपने ऊपर दया करो और अपनी दृष्टि को संवार ही दो। अब नहीं तो कब नहीं। यह पकता करो कि जहाँ तक मेरी दृष्टि जाएगी सब भगवान ही देखेगी। जहाँ तक जाती दृष्टि है, सर्व मम् रूप है। अपना ही रूप देखकर प्रेम की दुनिया कहीं से भी लाके, तेरी दृष्टी में भरपूर प्रेम रख देगी। ऐसी तो तेरी दृष्टि बन जाए और तू अपना जीवन जन्म सफल कर दे।

।। है ही भगवान ।।

12-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Zig-Zag"

तेरा मन उभर-खाबड़, संसार उभर-खाबड़। उभर-खाबड़ मन, उभर-खाबड़ संसार, अब चले तो कैसे ! आत्मिक निश्चय से तेरे बर उभर-खाबड़ नहीं आएगी, पर तेरे बर प्रेम की राहें आती हैं। जब तेरे हिस्से में प्रेम की राहें आती हैं, आत्मिक विचार आते हैं, तेरे अंदर शक्ति आती है, तो हर उभर-खाबड़ तेरे लिए platform बन जाएगी और तू सफर सुहाना बनाएगा। दुनियाँ की उभर-खाबड़ तेरे मन के उतार-चढ़ाव पर कायम रहती है। मन तेरा शांत हुआ, तो संसार की उभर-खाबड़, वो भी अच्छा-सा सुंदर बगीचा बन जाएगी और तेरा सफर सुहाना बना देगी। आत्मा का निश्चय करो और अपना जीवन सफल करो।

।। है ही भगवान ।।

12-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रेम मैं बरकत"

प्रेम मैं बरकत तभी पड़ सकती है जब तू द्वांधो से ऊपर उठता है। कोई एक भी द्वंद आपके निष्काम प्रेम में रंडक डालता है, कोई एक भ्रम,कोई एक मन की क्रिकेट, कोई एक रॉन्ग राइट, आपको प्रेम के पीछे खड़ा कर देता है। पहले आप रुको, प्रेम तेरे साथ होना चाहिए। पर तू प्रेम को हर वक्त हर मोड़ पर पीछे छोड़ता है,आगे अपने अहंकार को रखता है। उल्टा काम, उल्टी बाजी, उल्टी रिजल्ट आतम निश्चय करो प्रेम को आगे रखो, हे भगवान बोलो।

।। है ही भगवान।।

13-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"वारे वेठो ज्म्म जो खातो"

जब तू सतगुरु की शरण में है तो मस्तक की रेखाएँ भी बदल सकती हैं। लेकिन उसके लिएँ पुरुषार्थ - तेरा देव ज़रुरी है। ऐसा पुरुषार्थ करो, जो तेरा जीवन बदल जाए, तेरी हाथों की लकीरों में परमात्मा आ जाए, मस्तक की रेखाएँ बदल जाएँ। ये तन-मन जीवन सुलग उठे, कोई ऐसी आग लगाएँ। उस आग में मेरा अहंकार जल जाए। अहंकार दे नहीं सकता है कोई, पर अहंकार गुरु चोरी करता है। किसकी चोरी करता है? गुरु श्रद्धालु की चोरी करता है, दिखावेवाले की चोरी हो नहीं सकती, पर श्रद्धावानम् लभते् ज्ञानम।

।। है ही भगवान ।।

14-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जढ़-चेतन से प्यार"

जिज्ञासु को जढ़-चेतन से प्यार होना चाहिए। वो फसेगा कहीं नहीं, अटकेगा कहीं नहीं, पर प्रेम की दृष्टि जढ़-चेतन पर रखता है। जढ़-चेतन उसे भी आशीष देते हैं। जिज्ञासु को इतना नम्र-नम्र भाव होना चाहिए, जो वो जढ़-चेतन से आशीष ले ले। यही आशीष उसकी एकाग्रता बन जाएगी, यही आशीष जिज्ञासु की उन्नति बन जाएगी, यही आशीष सतगुरु से मिलाके एक कर देगी। जब तक जढ़-चेतन से प्रीत नहीं, तब तक सतगुरु भी राज़ी नहीं रहते। राज़ी उनको अगर करना है, तो जढ़-चेतन को प्यार करना ही पड़ेगा। अर्थ ये है कि आपको जढ़-चेतन से, कहीं से भी, कोई विखेप ना आए और अपने मन की मस्ती कभी भी खराब ना करें। मन की मस्ती लुट ना पाए, यही एकाग्रता ही जढ़-चेतन की आशीष है।

।। है ही भगवान ।।

14-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मनुष्य गलती का पुतला"

सोचने वाली बात यह है कि, मनुष्य जब गलती का पुतला है तो गलती तो आपको किसी भी मनुष्य से ढूंढने पर मिल ही जाती है। जितने भी मनुष्य हैं संसार में तू गलतियां ढूंढेगा तो मिल ही जाएगी। क्योंकि गलती उसकी नहीं, नजरिया तेरा यह है कि गलती ढूंढो तो मिल ही जाती है। फिर भी 50 लोग बैठे हैं 50 ही गलती के पुतले हैं। तू किसी पांच की गलती देखता है बाकी को छोड़ देता है,क्या उनमें गलती नहीं है?
तूने 5 की क्यों देखी? देखो तो सबकी देखो पर तू 5 की देखता है क्योंकि तू उन पांच से तेरा अपना मनमुटाव है।
तू शायद किसी को पसंद नहीं करता उसी की गलती देखता रहता है। गलती वह करता नहीं है, गलती तेरी है कि तू उसको पसंद नहीं करता। पसंद करना न करना इसमें तू क्यों जाता है? आत्मा के निश्चय में सब एक हैं। जब सब एक हैं तो तू द्वांधो में जाकर कुछ चीजों को कुछ व्यक्तियों को अपना मानता है, कुछ को पराया मानता है, और किसकी गलतियां देखता है किसकी गलतियां ढक लेता है। यह तेरी निश्चय के लिए नुकसान कार्य स्थिति है। इससे बचिए और अपने आत्मा को अपनी आत्मा से जोड़ दीजिए गुरु की आत्मा और तेरी आत्मा एक है। तू बिछड़ जाता है जब अपनी स्थिति को ठीक नहीं करता।

।। है ही भगवान।।

15-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"No Minus, No Plus = Hai Hi Bhagwan, आत्मा, ब्रह्म ही ब्रह्म, सकलो ब्रह्म"

जहाँ minus नहीं, plus नहीं, दोनों छुरियाँ मुढ़ी हो जाएँ, काम न करें, वहाँ भगवान तेज़ी से प्रगट हो जाए। ज़र्रे ज़र्रे भगवान, जढ़ चेतन में भगवान, सब में वासा मेरे वासुदेव का। प्रगट होता है परमात्मा पत्ते-पत्ते से, ज़र्रे ज़र्रे से प्रतीत होता है जब तू minus और plus की वृत्ति से दूर है। Minus-plus की वृत्ति से दूर है तो मजबूर भी नहीं है, मज़बूत है, शक्तिशाली है। अनन्य भक्ति तब होती है जब तू द्वदों से दूर हो जाए। एक भी द्वंद तेरे भीतर जब है, तो आत्मरस का भीतर महसूस होना, हो नहीं सकता। इसीलिए आत्मरस को चखने के लिए, महसूस करने के लिए, सब तक संदेश पहुँचाने के लिए, आपको अपना आदर्श, अपना दिल दिमाग ठीक करना पड़ेगा। Minus plus से ऊपर उठो, competition- comparison से ऊपर उठो, द्वदों से ऊपर उठो और चलो नेक राह में।

।। है ही भगवान ।।

15-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विशाल बुद्धि"

विशाल बुद्धि रखने के सिवाय आतम निष्ठा कभी ना होगी। जब समझ आई तो यह समझा गुरु ज्ञान का दीपक मन मंदिर में हर वक्त जगाना पड़ता है। ओम के उचार से बुद्धि विकसित होती है।ओम का मतलब है खाली।ओम उचारण
करके देखो तू एकदम खाली हो जाएगा।सब टेंशन सब चिंताएं तेरे से दूर हो जाएगी।फिर जब तू दुनिया के झंझटों में पडता है तो वापस तू ख्यालों से भरपूर हो जाता है।ओम के उचारण से ओम शब्द में टिके रहने से ओम की स्थिति बनाने से तू मजबूत रहता है, खाली भी रहता है ,नुकसान तो कुछ है नहीं।तेरी ब्रहमकार वृत्ति ब्रह्मकार दृष्टि,निश्चयात्मक बुद्धि,ओम का अंदर विचार सतगुरु वचनों का पावर यह सब तो तेरे उन्नति के लिए है फिर तू उन्नति में देर क्यों करता है ?जल्दी-जल्दी अपना काम क्यों नहीं उतारता। मैच्योर तो बनना ही है ना,आज नहीं तो कल तो बनना पड़ेगा,इसीलिए आज ही मैचुर बनो और प्रेम में रहो।गुरु वचनों को रखना संभाल के यह भुलाने की गँवाने की चीज नहीं है।अपनी आत्मा के निश्चय को ऊंचा रखो।सभनी खाँ पद तुन्हिजो ऊंचो,लालन तूँ आहीं लासानी पर जड़हीं तू सैलानी माँ भी सैलानी।अपने को सैलानी मानो और संसार में प्रेममय होके रहो।

।। है ही भगवान।।

16-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हरिद्वार यज्ञ आरंभ"

आज हम सभी संगत की भावनाओं को लेकर, सब बच्चों का प्रेम लेकर, हरिद्वार के, माँ गंगा के द्वार निकल रहे हैं। आप सब मेरे साथ हो, मैं आप सबको लेके जा रहा हूँ। अपने सतगुरु के यज्ञ के लिएँ, हर वक्त active part होना चाहिए। कहते हो भगवान हलंदी हलाए, पर, लेकिन चलो तो चलाए ना। आलस नहीं, सुस्ती नहीं, चलते रहो, दौड़ते रहो, सत्संग के दायरे में रहो। आपस में प्रेम करके एक दूसरे की जान बन जाओ। वचनों को सदा हृदय में उतारते जाओ और अपने प्रेम को पक्का करते जाओ।

।। है ही भगवान ।।

16-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपनी न चलाओ"

मता पहिंजी तू हलाईं अलाए छा बनीं अथई,रब डाढो धनी अथई।अपनी चला के कुछ मिलता तो नहीं है मनुष्य को फिर भी मन के अंधेरों में भटकते हुए मनुष्य अपनी चला ही देता है,फिर तू लख बार पछता,कितनी बार भी तू अपने को जोर देकर ऊपर उठा लेकिन जिस समय जिस period में तूने अपनी चलाई उस  period  की शक्ति तो गई ना, वह तो लौट के नहीं आती है।Be careful  तू कहेगा ठीक है अभी तो मैं सुधर रहा हूं ना पर जो बात तेरे हाथ से गई तेरे भीतर से वह ताकत गई वह ताकत वापस कैसे आए? भले दूसरी बनेगी,तीसरी बनेगी,कई बार तेरी शक्ति कई गुना बढ़ेगी पर वह शक्ति तो तेरी गई ना,इसका भी थोड़ा लिहाज करो।शक्ति की मर्यादा करो कि शक्ति गुरु ने कितने प्यार से दी है,हम उसी शक्ति को कैसे गवा रहे हैं।शक्ति पहिंजीअ खे कर याद।अपनी शक्ति को याद करो और किधर भी waste होने न दो,leak होने न दो।अपने को प्यार करो तो अपनी शक्ति को संभाल कर रखो अपनी वृत्ति को भी संभाल कर रखो। हम लाए हैं ब्रह्र्म कार वृत्ति गुरुद्वार से इस व्रत्ति को रखना मेरे मनवा संभाल के।

।। है ही भगवान।।

17-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बोलो गंगा मैया की जय"

गंगा मैया पर खड़े आपके लिए शुभ कामना करते हैं कि बहते जाओ माँ गंगा की तरह, कभी न थको माँ गंगा की तरह, कभी न रुको माँ गंगा की तरह, तेरी शान-शौकत में कभी कमी न आए माँ गंगा की तरह। प्रेम दादी भगवान का स्वभाव है, उसी स्वभाव को अपनाते चलो। मेरे दादी भगवान की मुरली क्या है बोले प्रेम प्रेम प्रेम, है ही प्रेम। Love is God, God is Love! आपको माँ गंगा का छँड़ा डाल रहे हैं। आप खुश रहो, मस्त रहो। कीय आयो लाल, मौज में आयो न !

।। है ही भगवान ।।

17-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

कींअ आहियो लाल।मुस्कुराते रहो सदाइं खुश रहो,रज़ा में राज़ी रहो,2 फुट torch रखो,त्याग वैराग में भरपूर रहो,निष्काम भाव में अपनी बर्कत महसूस करो।सत्संग को अपनी सुंदरता महसूस करो,सत्संग से ही तू सुंदर है वरना तेरी सुंदरता क्या कहती है।बाकी संसार की सुंदरता ढलती सुंदरता है,सत्संग की सुंदरता रोज उभरती हुई सुंदरता है,तेरे जीवन में रौनक आती है जब तू सत्संग के 2 वचन सुनकर अपने जीवन की गाड़ी को आगे बढ़ाता है।किसी नाल राग नहीं किसी नाल द्वेष नहीं आत्मा आनंद विच कोई भी क्लेश नहीं।कोई क्लेश मन में न रखो तो सारे कष्ट दूर हो जाएंगे,मन में क्लेश है तो ही कष्ट है।क्लेश दूर हुआ तो परमात्मा ने कष्ट काट लिया।कष्ट जो तेरी तपस्या बन सकती है उस शक्ति को पहचानो।देह में है तो कष्टों से तुझे पीड़ा आती है पर जे तू अपनी आत्मा में है,ब्रह्म स्वरूप होकर अपने को सिद्ध करता है तो कष्ट भी तेरी तपस्या बन जाता है।सब दिशाएं तुझे आशीष देती है कि परमात्मा से जुड़े रहो।सब ग्रह चारी तेरे मददगार बन जाते हैं ,हमसफर बन जाते हैं,तू खाली मां कुदरत में भरोसा रख।

।। है ही भगवान।।

18-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सर को तू पाँव बना ले, फिर चल इस सत्य के मार्ग पर"

सत्य के मार्ग पर चलने के लिए, इतना soft बन्ना पड़ेगा, इतना निम्रता भाव में आना ही पड़ेगा कि सर को तू पाँव बना ले। पाँव से चलते हो, अब इतने उल्टे हो जाओ, इतना खुदको change करो जो सर के बल भी चलना पड़े तो भी शुक्राने तेरे हृदय से न जाएँ। शुखुर मुहिंजा साईं जीए तू हलाईं। तू सर के बल चला, पाँव पर चला, कैसे भी चला, पर चलने की शक्ति तो तू ही देता है ना, फिर मैं किट-किट क्यों करु। बस उसको यूँ न कहो कि यूँ कर, यूँ न कर भगवान। उसको यूँ कहो कि जो तू चाहता है उसकी मुझे शक्ति दे दे। बस मुझे शक्ति मिली, माना सब कुछ मिला।

।। है ही भगवान ।।

19-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दो बर्तन kitchen में टकराए, ओम की ध्वनि सुनने में आए"

ऐसी तेरी अखंड वृत्ति बन जाए, सतगुरु से ऐसी लग्न लग जाए, ऐसी ब्रह्मकारवृत्ति बन जाए, मन स्थिर हो जाए, तो दो बर्तन भी टकराते हैं, आवाज़ से तू विखेप में नहीं आता। ये विचार करता है कि बर्तन ने भी ओम का आलाप दे दिया। ऐसी तेरी अखंड वृत्ति बन सकती है। पंछियों की चीं चीं याँ प्रकृति के शब्द, कोई भी आवाज़, फिर चाहे तेरे मन की किट-किट भी कभी आ जाए, लेकिन तू हर हालत में, हर दृश्य में, हर आवाज़ में, हर शब्द में, देखे तो भगवान देखे, दूजा भाव न होवे। ऐसी अखंड वृत्ति मेरी जागती रहे, ब्रह्मकारवृत्ति मेरी बनती रहे। ऐसी अच्छी उम्मीद रखो और पुरुषार्थी बनो, पुरुषार्थ करो। All the Best !

।। है ही भगवान ।।

19-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निष्काम प्रेम"

एक कदम भी तू निष्काम प्रेम की तरफ आगे बढ़ाता है तो जो तुझे पुरुषार्थ करना  चाहिए अपने आतम निश्चय के लिए उसमें आप कई गुना आगे बढ़ जाते हो।एक कदम जो आगे आता है सौ कदम प्रभु आगे उसके आता है, फकत एक कदम आगे बढ़ाने की देरी है।अपने ख्यालों को थोड़ा ठीक रखो,तू ख्याल से कहेगा मुझे समय नहीं,समय को सेट करना पड़ता है| समय तो फुल मिला है,समय देव कहां जाते हैं,तेरे पास तेरे साथ ही तो होते हैं,पर तू समय किस प्रकार सेट करता है funfeast में गंवाता है, परचिंतन में खत्म करता है, भारी भारी ख्याल भीतर रखकर शक्ति गंवा देता है| कितनी सारी भूल आपसे होती रहती है और समय को खराब करती रहती है,फिर तू कहता है कि समय नहीं मिलता | निष्काम प्रेम के लिए खुशी कहां से आएगी,खुशी भी तो नहीं आती | जब तू निष्काम प्रेम में आगे बढ़ता है,तो ही तेरा मन तृप्त रहता है वरना तृप्ति कहां से आए? विचार करके देखो तो ही समझ में आएगा | 

।। है ही भगवान।।

20-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दूरदृष्टि"

दूरदृष्टि है तो तू दूर-दूर तक भगवान देख सकता है। जहाँ तक जाती दृष्टि है, जहाँ तक फैली सृष्टि है, सर्व मम रुप है। कण-कण में, ज़र्रे-ज़र्रे में, जढ़-चेतन में, सब में वासा है मेरे वासुदेव का। ये दादी तो बसे हैं कण-कण में, हम सबके जीवन में। सबके जीवन में सतगुरु बसते हैं, तू फक्त श्रद्धा का दीपक लेके खड़ा होजा, बुद्धि मत चला, अपने स्वभाव संस्कारों के दलदल में मत अटको। दलदल से बाहर निकलके खुदको झटको और कहो है ही भगवान। तू सुखी, तेरे पीछे संसार भी सुखी।

।। है ही भगवान ।।

20-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

कीयं आहियो लाल । जिते भी आहे, करीब आहे, कीयं चव्हां सजण मुहिंजो नाहे । आगे भी है, पीछे भी है, सब जगह भगवान ही भगवान है । भगवान के सिवा कुछ बना नहीं है, बस भगवान देखते जाओ, जन्म जीवन को सफल करते जाओ ।

Be Relax, relax में कोई भी कर्म करो, उसका फल अलौकिक निकलता है । हर चीज तुझे मिलती है, भाग्य से भी मिलती है, पुरुषार्थ से भी मिलती है, परमात्मा से भी मिलती है, जो कुछ मिला उसका Good Use करो ।

Good Use करोगे, हर चीज़ में बरकत पड़ेगी । भगवान देखोगे भाग्य में बरकत पड़ेगी । आत्मा का निश्चय करोगे, आनंद के दाता बनोगे । सब से प्यार करोगे हृदय विशाल हो जाएगा । भगवान सोचोगे बुद्धि में broad mindedness आ जाएगी ।

हर वक्त की खुशी तुझे मिल सकती है, बस हर वक्त आत्मा का निश्चय अपने भीतर रखो, वही तेरा सखा है वही तेरा सब कुछ है ।

।। है ही भगवान।।

21-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ङिठो सब विसार,अणङिठे खे याद कर"

जब लग् देखी तब लग् माया। माया तू किसको कहता है ? धन को, दौलत को, रिश्तों को, पदार्थों को, किसको माया कहता है ? ये तो सब ज़रुरी है, तो माया कैसे हुई। माया तेरे मन की है, माया तेरे आसक्त भाव की है। जिस-जिस चीज़ में तू आसक्ति डालता है, वो तेरे लिए माया बन जाती है। आसक्ति minus करो तो वो भगवान का रुप है। चाहे वो जड़ चीज़ है, चेतन है या तेरा परिवार है, या धन दौलत है। आसक्ति minus करो, रज़ा में राज़ी रहो, शांत स्वभाव रहो, धीर-गंभीर होके रहो, तो जग में नहीं है माया, तेरे मन में है माया। इस माया को तूने अपने निश्चय से राम बनाया।

।। है ही भगवान ।।

21-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

है ही भगवान लाल। खुश आहियो ? कौन सी खुशी में तू खुश है ? देह की खुशी में? आत्मा की खुशी में ?अहंकार की खुशी में? टाइमपास उस खुशी में ? परपंच की खुशी में ? त्याग वैराग की खुशी में ? या गुरु वचनों के ज्ञान की खुशी में ?

खुशी तो खुशी है । एक स्थिर है, एक Time Pass है । तेरी capacity क्या है ? तू कौन सी खुशी चाहता है ? Time Pass करने वाली खुशी, वह न लो । तेरा जीवन ही पास हो जाता है, तेरी स्वासें व्यर्थ जाती है ।

सच्ची खुशी जो तेरे गुरु वचनों से मिलती है, तेरा मन खुश रखती है, इंद्रियों को शक्तिशाली बनाती है, दिल दिमाग को ताजा रखती है, आयु को बढ़ा देती है, प्रेम प्यार में बरकत डालती है, कई फायदे हैं ऐसे खुशी के, जो खुशी तेरी स्थिर है, कायम धायम है और सत्य की खुशी है ।

तुम संसार को सत्य मानता है । उस स्थिति को सत मानो, जो परमात्मा ने दी है, सतगुरु ने दी है, मन को स्थिर रखने की । वह स्थिति तुझे अपनी मंजिल की तरफ लेकर जाएगी । संसार को सत मानने की स्थिति तेरे मन को मंजिल से दूर करती है, इसलिए चाहत तेरे हाथ में है तू क्या चाहता है, फैसला तेरा है । जो सुख आए, फिर न जाए, उसका विचार करो और ऐसे विचारों में अपने जीवन को सुरक्षित रखो यही हमारी आशीष है ।

।। है ही भगवान।।

22-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विश्वास"

विश्वास विधाता की देन है और विखेप जीवभाव की उपज है। विश्वास के सहारे ज़िंदगी अच्छी गुज़रती है, प्रेम-मय गुज़रती है, हल्की गुज़रती है, आदर्शी गुज़रती है। पर जीवभाव, वो तुझे जलाता रहता है। छोथो जलीं जीव तू दुनियाँ जे जलन में, हलीआ सतगुर जी शरण में। जीवभाव से तेरे द्वैत द्वैष पैदा होते हैं, अश्रद्धा से तुझे टकराना पड़ता है और कई हालतों को तू face करता है। लेकिन जीवभाव के कारण, कहीं भी शांति नहीं मिलती। अपने को शाँत स्वरुप रखने के लिए तू अपने अात्मनिश्चय को आगे बढ़ा। अात्मनेश्र्ठी सदाईं सुखी, अंर्तमुखी सदाईं सुखी। बाहरमुखी सदाईं दुखी। देह दृष्टि वाला कभी सुखी रेह नहीं सकता।

।। है ही भगवान ।।

22-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रकृति में भरोसा"

मेरे बच्चों का भरोसा कुदरत में रहता है, अपने नसीब में रहता है, अपने सतगुरु में भी रहता है । जब तू विश्वास मां कुदरत पर करता है, तो तेरा बेड़ा पार है ।
3 गुण है 3 गुणों में ही रहेंगे । कभी कुछ, कभी कुछ जो तुझे दिखाई देता है, आज बहुत अच्छा, आज कुछ थोड़ा अच्छा । बुरा तो तेरी जिंदगी में है ही नहीं । कभी बहुत अच्छा, तभी कुछ कम अच्छा, दिखाता ही रहता है, दिखाने दो परवाह ना करो । लेकिन तू यह जान के साथ जिसके सतगुरु है, वह हमेशा आगे बढ़ते हैं । गिरते नहीं है अब ये तो बोलेंगे नहीं, क्योंकि यह तो भरोसा हो गया, कि वह कभी गिरते नहीं है लेकिन जो साथ में सतगुरु को रखते हैं वह जिंदगी में हमेशा आगे बढ़ जाते हैं । चारों दिशाओं से तुझे आशीर्वाद मिलता रहेगा । सब ग्रह चारी तेरे सहयोगी बनते रहेंगे । सब देव देवताएं तेरे ऊपर आशीष की बौछार डालकर खड़े रह जाएंगे । तू फकत जड़ चेतन में अपनी श्रद्धा कायम रख । जो भी है सब है ही भगवान । भगवान के अलावा कुछ बना नहीं है । इतना विश्वास, इतना भरोसा अपने भगवान पर रखो, सतगुरु पर रखो और अपने निश्चय पर रखो, कि तू देह नहीं तू तो ब्रह्म स्वरुप है, तो बस तू तर जाएगा, तेरा हाथ जिसने पकड़ा वह भी तर जाएगा । तरण कीन जाना बुदस् पे लेहरूं में पर तुहिंजी रम्ज़ सां अज मां लगी वयस किनारे । आज तो मैं किनारे लगा, कल भी मेरा जो भी भार है सतगुरु तेरे ऊपर है । तू ही तारणहार है तू ही तार देगा । मेरे रथ पर भगवान का ही वास है और मेरी जिंदगी की भागदौड़ जो भी है परमात्मा के हाथ है, सतगुरु मेरे साथ ही है ।

।। है ही भगवान।।

23-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बरकत"

जब तू अपनी सच्चाई पर आ ही जाता है तो तेरे हर बात में बरकत पड़ती है। फिर तू चाहे घर-ग्रहस्त में कोई कार्ज करे ,संसार में कोई कार्ज करे या सैर करे तो भी बरकत।

बरकत किसको कहते है ? कि थोड़ा करो ज्यादा महसूस होवे, ये है बरकत। तू थोड़ा करता है और सभी को अच्छा लगता है क्योंकि बरकत होती है। तेरी इंद्रियों की शक्ति में भी बरकत पड़ सकती है, तेरी भक्ति में भी बरकत पड़ सकती है। हर हाल में दाता का शुक्र मानो तो बरकत ही बरकत है।

।। है ही भगवान ।।

23-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु की रेहमतें "

रेहमतान करंदा है, झोलियां भरंदा है । वह पीरों का पीर है, शाही फकीर है । शाही फकीर है, ordinary फकीर नहीं है, वह शाही फकीर है, सब कुछ देता है और फकीरी में रहता है । तू भी अगर उसका बच्चा है, उसके आदर्शों का तू पंधेरु है तो तू भी शाही फकीर बन जा । और न करे आस की, किसकी भी आस नहीं करो । औरों की आस नहीं करो,बस उपकार अपने ऊपर यह करो कि तू सबको प्रेम कर, किसकी गलती ना देख, ना किसी का नाम रूप देख । नाम रूप भगवान ने भी रीत यह बनाई, मनुष्य ने भी रीत यह बनाई, भगवान ने नामरूप तेरे को साथ में नहीं दिया । हाथ दिए, पांव दिए, आंखें दी, पूरा शरीर सुंदर दिया, लेकिन नाम नहीं दिया, खाली रूप दिया, कि रूप का आनंद ले, नाम नहीं दिया । संसार ने भी 6 दिन के बाद नाम रखा, कोई पहले दिन में नहीं रखा ।

फिर नाम तेरे लिए जरूरी क्यों बन गया है ? किसका भी नाम, द्वेश वाले का नाम, राग वाले का नाम, गलती वाले का नाम, काम वाले का नाम । नाम लो सहुलत के लिए, व्यवहार एक सहुलियत है । नाम एक साहुलियत है, पर तूने तो राग द्वेश का लक्ष्य बनाकर रखा है, उस लक्ष्य को साइड करो और नाम का भी आनंद लो कि कितने अच्छे अच्छे नाम है, वह गलती करे या क्या भी करे, इसमें तेरा क्या जाता है ।

तू अपना नाम सफल तभी करेगा, जब तू दूसरे के नाम को भी इज्जत दे, बस उसको राग द्वेष का चोला ना पहना, और खुश दिल रहो, खुश दिल रख broad mind बन, आत्मा का निश्चय कर, झूमने लगे और खुश रहने लग ।

।। है ही भगवान।।

24-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"भ्रम"

भ्रम हुआ था, भ्रम बुलाया, निकाला भ्रम सतगुरु ने, ब्रह्म में टिका दिया। भ्रम ही तो है, सुखों में दुखों का भ्रम ही तो है। मान अपमान द्वंद्वों का भ्रम ही तो है। हालत आती है, तू समझता है टिक जाएगी, वो तो जाने वाली है, ये भी आपका भ्रम ही तो है। रस्सी पड़ी है, तू समझता है वर वकर सांप है, सांप है तो नहीं। रस्सी सांप की shape में पड़ी है। अंधेरे के कारण आपको रस्सी में सांप का भ्रम आता है। तू फिज़ूल डर जाता है। कभी-कभी सांप में रस्सी का भर्म भी आ सकता है। तू careless हो जाता है। हर कदम कदम पर काक् महल आ। मूं मल माया जो छल वल् आ, पर राणे वांगुर रम्ज़ साँ हलंदो जग में को विरलो ज्ञानी, ऊहो ज्ञानी पांजा भ्रम मिटाईंदो। भ्रम मिटाके तू जो ज्ञान निश्चय करेगा तो तू राजाओं का राजा बन सकता है।

।। है ही भगवान ।।

25-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"साक्षी भाव"

साखी होके संसार में चलो। साखी होके जिज्ञासु जब चलता है तो अनंत सुख का मालिक बन जाता है। भीतर आत्मिक सुख, बाहर संसारिक सुख। दोनों जहान की खुशियाँ उसका इंतज़ार करती हैं। साक्षी भाव को छोड़कर तू कर्ता भाव में आता है तो कर्मों की कहानी तेरी तैयार हो जाती है। कर्म करते रहो, फल भोगते रहो, दूसरे कर्मों को करने और भोगने के लिए फिर सोचते रहो। इसी प्रकार तेरा चक्र चलता रहता है और कर्ता भाव में तू कभी शांत नहीं रहता। भीतर भी अशांति, संसार में भी अशांति को ही खरीद करता है। जहाँ बैठेगा र्कताभाव में मज़ा नहीं आएगा। साक्षीभाव में जहाँ बैठेगा, तू आनंद लूटेगा। इसीलिए कर्ता भाव छोड़कर साक्षीभाव में आते रहना ही जिज्ञासु का लक्षण है, धर्म है।

।। है ही भगवान ।।

25-Mar-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अष्टमी"

आज अष्टमी है, दुर्गा माता की जय बोलो । मां से आशीर्वाद लो, चुनरी चढ़ाओ, प्रसाद खिलाओ, भोग लगाओ ।

अगर तू आत्म वासी है, जहां-तहां भगवान देखता है, तो हर दिन उसका महत्व भी समझता है । हर दिन से, हर घड़ी से, शक्ति लेता है, प्यार करता है, किसी बात को avoid नहीं करता । हर बात को मानते चलो, गले से लगाते चलो, मर्यादाओं का पालन करो । हर बात में खुशी मिलेगी, शक्ति भी मिलेगी, प्रेम भी भरेगा । मां कुदरत तेरे और नजदीक रहेंगे । तेरी शक्ति हर वक्त सलामत रहेगी । विश्वास कुदरत में, सतगुरु में, जो कुदरत का धनी है, बढ़ता जाएगा । जीवन तेरा हल्का हो जाएगा, जे तू अपनी शक्ति को पहचानेगा ।

आज मां दुर्गा का दिन है, उनका दर्शन करके, अपनी शक्ति को जगाओ । शक्तिय पहिंजीय खे कर याद । अपनी शक्ति को याद करो और खुश रहो, नमन करो और खुद को एक आदर्शों के रास्ते पर चलाते चलो । भगवान तेरे साथ है, मेरा आशीर्वाद भी तेरे साथ है ।

।। है ही भगवान।।

26-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

'हर हर गंगे, गंगा मईया की जय हो'

"सफर "

एक सफर है जो तुझे परमात्मा से मिलाके एक करता है, जैसे कि आज हमें गंगा मईया तक पहुॅंचा दिया है। डुबकी आपकी हम लगाते है और आप वहाॅं डुबकी लगाओ ज्ञान की ,गुरु प्रेम की , गुरु विशवास की, तो बेड़ा पार है। आगे भी डुबिकियाॅं लगाते रहेंगे।

।। है ही भगवान ।।

27-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

'कुदरत और कुदरत का आनंद'

 

सौ, हज़ार , करोड़ कितनी भी गिनती करो, उतने सुख एक तरफ, मेरी कुदरत का सुख दुसरी तरफ । कुदरत का सुख जिसने नहीं लिया समय तो गया, तंदुरुस्ती भी गई । आज तंदुरुस्ती पीछे है इसलिए क्योंकि तू सारे सुख तो ले रहा है लेकिन कुदरत का सुख छोड़ रहा है, हम नहीं कहते है कि बाकी के सुख छोड़ो मत छोड़ो , खुद से पक्का बांदके रखो । लेकिन कुदरत के सुख को छोड़ा, तो जो तुने सुख पक्का बांदके रखे है, वो कुदरत के सुख बेवफा हो जाएंगे, तुझे सुख सुख न देंगे । अच्छे बच्चे बनो, प्यारे बच्चे बनो, मीठे हो जाओ, आज नहीं तो कल मीठा होना ही पड़ता है । इसलिए अच्छे बच्चे की तरह सतगुरु का संदेश लेकर, आदेश पाकर अच्छे बनो मीठे बनो, कुदरत को पहचानो । सतगुरू कुदरत से अलग नहीं उसी में समाया हुआ है, वे तो कुदरत के धणी है ।

कुदरत को प्रेम करने वाला जिज्ञासु प्रभात को उनका दर्शन पा लेता है । जब आज गर्मी की, मीठी मीठी ठंडी ठंडी हवाएं चल रही है, कुदरत का ये कोनसा खेल है कि चल तो गर्मी रही है, लेकिन प्रभात को उठने वालो को ठंडी हवा इतनी मिलती है जो सारे दिन का गुजारा अच्छे से हो जाता है । बरकत पढ़ती है सुबुह उठने वालो को, प्यार करने वालो को, कुदरत से इश्क लगाने वालो को कहीं कोई कमी नहीं रहती । हींअ‌ भी सज‌्ण वाह वाह, हुअं भी सज‌्ण वाह वाह । कब ठंडी हवाएं लगती है , उसकी सुगंध पाकर, तन से उनका सिपर्श पाकर, कितने तृप्त हो सकते है, ये तू सुबह ठंडी हवा में निकल के देख, जब बारिश गिरे, बूंदा बूंदी में निकल के देख । जब ठंडिया आहे, ठंडा मौसम आए, sweater ही सही, खुद को लपेटके बाहर तो निकलो, हवाएं भी इंतजार कर रही है, रोड रस्ते बी इंतजार कर रहे है, अच्छी अच्छी कुदरत के धणी, सतगुरु की प्रेरणाएं भी आपका इंतजार कर रही है । बस थोड़ा सा आलस छोड़ना है और active बनना है, आलस छोड़ो एक्टिव बनो, निमाणी वेनती कबूल करो । सोना इतना नहीं सोना, जो मनुष्य जन्म को ही खो दो ।

।।है ही भगवान।।

27-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Balance क्यों बिगड़ता है"

Balance इसीलिए बिगड़ता है कि तेरा मन मनमानी करता है। तेरा मन गुरु मानी कर नहीं सकता, इसीलिए मनमानी पर आ जाता है। कितना भी तू ज्ञान में आगे निकल जाएँ, सुने और सुनाएँ, प्यार करे और कराएँ, शेवाओं की झोलियाँ भर भर करे, फिर भी balance बनता नहीं, फिर फिर टूटने का इन्कान रहता है। क्योंकि तेरा मन बेचैन है, बेलगाम है, आवारागर्दी पर आ गया है। मन की आवारागर्दी पहचानो और मन का balance बनाओ, मन मुख्ता छोड़कर, गुरुमुख बनो, तो देर नहीं दीदार में।

तोखे कै पर पायाँ? तुझको कैसे मैं पाऊँ? अरे कैसे निभाऊँ? कैसे प्यार करुं? तुझको कैसे रिझाऊँ? इतना सारा काम पड़ा है और मनुष्य का मन निकम्मा होके, छोटी छोटी बातों में disturb होता है और बैठ जाता है। मन की गति संभालिए और भक्ति की ओर डालिए। इसके सिवाय मार्ग और कोई भी नहीं है। नर्तन का पाना फिर फिर न होगा। इस बार नर्तन को पा लीया है, दोबारा कब नर्तन मिलेगा, इसका क्या भरोसा। कहाँ है मेरी मंज़िल, कहाँ मैं जा रहा हूँ, अनमोल मेरा जीवन, मैं यूँ ही क्यों बर्बाद कर रहा हूँ।

।। है ही भगवान ।।

28-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मीठा एहसास"

तेरी जिंदगी का ये हक है, फर्ज भी है, प्रेम भी है । एक मीठा एहसास रखना, तेरे लिए जरूरी है । मिठास होगी भीतर, एहसास होगा अंदर तो बाहर भी मीठा एहसास तू सामने वाले की तरफ दे सकेगा । मिठास भीतर नहीं, एहसास आता नहीं, सामने वाले को कुछ मिलता नहीं, जिंदगी कैसे जिएं? तृप्त कैसे रहें ? आत्मा के आनंद का, सद्गुरु वचनों का, सत्संग के एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी ते पण आध, संतन से की गोष्टी बाकी दिन सब आबाद हो जाएगा ।
एक घड़ी परमात्मा का संग ले लिया तो बाकी की घड़ियां आबाद हो जाएगी । " मुंह मिसल जग में शाद रहो आबाद रहो"। सर्व जे लाए मिठो एहसास रख, तो तेरे पास आनंद ही आनंद है । एक मीठे एहसास को जन्म दो, मनमुटाव में, मन की गड़बड़ में, राग द्वेष की गलियों में, नफरत के घेरे में, मीठा एहसास मनुष्य घुम कर देता है, खो देता है, लेकिन ये तेरे जीवन की पूंजी है । जब भी मन कहीं भटकता है, ये एहसास हम खो देते हैं, लेकिन इस एहसास को ध्यान में रखते हुए जब तू हालातों पर, व्यक्तियों पर, किसी भी चीज पर दृष्टि रखता है तो तेरी दृष्टि तो संवर जाएगी पर हालते भी सुधर जाएगी ।

मीठा एहसास रखो, मिठास से खुद को भर दो, जरूरत इसी चीज की है बाकी तो सब चलता ही रहेगा, रुकेगा कुछ भी नहीं, चलता तो रहेगा ही लेकिन मीठे एहसास के साथ जिंदगी में मिठास आ जाएगी । कोशिश करो हर एक के लिए मीठा एहसास रखो । अपनी thinking को change करके भी मीठा एहसास जरूरी है ।

।।है ही भगवान।।

29-Mar-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"समय से बेइंसाफी"

जिज्ञासु न खुदसे बेइंसाफी करता है, न समय से बेइंसाफी करता है। अगर तू समय से बेइंसाफी करता है, समय waste करता है, समय में अपनी साधना नहीं करता, अपने समय में अपना जीवन सफल नहीं करता, तो समय भी तेरे से बेइंसाफी ही करेगा ना। खुदसे इंसाफ करो, समय से इंसाफ करो, तो समय तुझे साथ देगा। पर जे तू बेइंसाफी पर तुला, तो समय भी तेरे साथ बेइंसाफी ही करता है। तुर जी गुथी सौ चोटूँ खाए। समय तुर पर आपको संभाल भी सकता है, बच्चा भी सकता है, तेरी safety में तुझे रख सकता है और समय तुझे खिसकाकर, गिराकर, हताश, हलाख भी कर सकता है। गुरु बीच में है, फिर भी समय तेरे ऊपर मेहरबान हो ही जाता है। लेकिन कब तक समय सतगुरु की सुनेगा! आखिर तो समय गुरु को भी जवाब ही दे देता है।

।। है ही भगवान ।।

30-Mar-2017

।। पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"है खुदा का कर्म आज इंसान बन तो गया, पर जे हरकत इंसानों वाली न रहे तो गुरु क्या करे"

अपनी हरकतों पर दृष्टि रखो, अपने कर्म पर नज़र रखो। वो किस ओर जा रही है, किस ओर उसे जाना चाहिए। जहाँ मन मधुसूदन में लगे, उसी तरफ इंद्रियों को भी मोड़ दो। मन बेचै सतगुरु के पास तो उस सेवक के कार्ज रास। अपने ऊपर दया दृष्टि करो और जीवन सफल बनाओ। दोष दृष्टि छोड़ो, आत्मा की दृष्टि को पकड़ो।

।। है ही भगवान ।।

31-Mar-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इच्छा"

इच्छा क्या है? इच्छा क्यों होती है? कब होती है? क्या इच्छा रखना जरूरी है? जीवन निर्वाह के लिए जो बातें ज़रुरी है, क्या इच्छा उनमें से एक है? अगर नहीं, तो मनुष्य इच्छा रखकर क्यों खुद को परेशान करता है? 

जीवन निर्वाह के लिए उमंग की ज़रूरत है, इच्छा की नहीं। जीवन निर्वाह के लिए पुरुषार्थ की जरूरत है, इच्छा की नहीं। सुजागी की जरूरत है, इच्छा की नहीं। इच्छा है ऐसी भली, गुमाए तुझको गली-गली। शाहुकार / बादशाह होते हुए भी तू इच्छा के कारण फकीर बन जाता है। लेकिन क्यों बनता है? प्रालब्ध तो बनी पड़ी है। इच्छा अपनी जगह पर है, प्रालब्ध अपनी जगह पर है। प्रालब्ध से हर चीज तुझे मिलती है। इच्छा से हर चीज आपसे दूर होती है। प्रालब्ध में रहना logic है, इच्छा करना logic नहीं है। किसी ने छुट्टी नहीं दी इच्छा करने की। इच्छा करें, क्यों न करें - जे इच्छाएँ हमें परेशान न करें। इच्छाएँ परेशान करती हैं, तकलीफ देती हैं, tension देती हैं, राग- द्वेष कराती हैं। पूरी हुई तो मुसीबत, ना पूरी हुई तो भी मुसीबत। इच्छा ऐसी भली है जो गुमाती गली-गली है। ऐसी इच्छा की संसार में जीवन निर्वाह के लिए जरूरत तो नहीं है, fashion बन गया है, इच्छा न करूं तो बाकी क्या करू? परमात्मा की इच्छा करो ना। भगवान की इच्छा करो। यह भी एक इच्छा है। लेकिन शुभ इच्छा है। परमात्मा को पाना,संतुलन में रहना, देह-अध्यास को छोड़ना, इच्छा को तज्जना, सब से प्रेम करना, ये तेरे हिस्से में है। आप जिज्ञासु हो, भगवान के बच्चे हो, अपना मूल्य पहचानो, स्वधर्म पहचानो।

।।है ही भगवान।।

April
01-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्म या आत्मपूजा"

 

जिंदगी जीने के लिए कर्म तो होना ही है, कर्म तेरी सुंदरता है । कर्म इंद्रियों का भोजन है, पर भोजन अगर healthy और स्वादिष्ट होता है तो तेरी इंद्रियां मज़बूत होने लगती है । भोजन में ताकत नहीं तो इंद्रियों में ताकत नहीं । ऐसे ही कर्म भी देह के लिए भोजन का काम करते हैं, मन को भोजन मिलता है । लेकिन कर्म भोजन के जैसा healthy होना चाहिए वो ऐसे कि कर्म में भावनाएं अच्छी होनी चाहिए । कर्म करते समय अगर भावनाओं में राग द्वेष है, तू मां है, मैं करूंगा मैं नहीं करूंगा, भावनाओं में अगर result की इच्छा है,आप अनुभव कर सकते हैं । इसी प्रकार कर्म में अगर भावनाएं अच्छी हैं तो कर्म तेरे तन मन, संसार समाज, सभी को शक्ति देगा । कर्म में भावना होनी चाहिए कि मैं कर्ता नहीं हूं, करण करावन आपे आप, वो भगवान ही है जो करता और कराता है ।

तेरा कर्म अगर आत्म पूजा बन जाए तो उसके आगे कर्म कोई अच्छा हो नहीं सकता, healthy हो नहीं सकता ।
इसलिए आत्मज्ञान पाकर कर्म में भी आत्मिक शक्ति लगा दो । आत्मिक शक्ति लगाने से जैसे तूने शरीर को, मन को भोजन दिया । तन मन तंदुरस्त होने लगता है, आप healthy होने लगते हो, अच्छे होने लगते हो ।

अपने कर्मों की कहानी को खुद सुंदर बनाओ, जो बीत गया सो बीत गया, अब तो सोच विचार । आज की तारीख़ से, अपने कर्म को आत्म पूजा से भर दो, भगवान के निमित्त कर दो,तो आपको बहुत अच्छा लगेगा । नसीब भी खुल सकता है, ढेर सारी कर्म के बाद आशीर्वाद भी मिल सकती है।

।। है ही भगवान ।।

01-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्म पद"

सबनी खाँ पद तुहिंजो उचो। सबसे ऊंचा तेरा पद है, क्योंकि तू आत्मा है। भ्रम में भूल गया है, कहता है मैं देह हूँ, लेकिन तूँ तो सत्तचित्त आनंद रुप है। जब तू निश्चय करता है कि मैं ही वो ही आनंदस्वरुप हूँ, तो तू अपने पद पर आ जाता है। कितने भी तूफान आए, कितनी हालतें आए, पर आपको आपके पद से कोई हिला नहीं सकता। क्योंकि तूफान, हालतें, सब तीन गुणों में हैं। तेरा असली पद तीन गुणों से ऊपर है, तीन गुणों से न्यारा है और सर्व का प्यारा भी है।

इसीलिए जो तू अपनी आत्मा का आनंद लेता है, वो कोई और नहीं ले सकता, जब तक कोई अपनी आत्मा को पहचाने तो। सारी सृष्टि एक ही डोरी से बंधी हुई है। हम सब माला के मोती हैं, एक ही धागे में कई रंग के, कई design के मोती पिरोए गए और गांठ बांधके माला का रुप दे दिया। धागा तो एक है, मोती अनेक हैं। धागा तो वो एक जैसा ही पूरा का पूरा है, मोती कुछ गोल, कुछ square, कुछ कैसे shape, कुछ कैसी shape में हैं। कोई कैसा रंग है, कोई कैसा रंग है। लेकिन आत्मा एक है। धागे के मिसल ब्रह्मसूत्र में तुम सब पिरोए पड़े हो। फिर कौन किसको कहे अपना, कौन किसको कहे पराया। अब लगने लगे सब अपने, लगता न कोई पराया।

।। है ही भगवान ।।

02-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हालतें"

हालतें, मुश्कलातें, कठनाईयां जो भी नाम दे दो, तेरे हृदय के ऊपर नीरसता का कवच आ ही जाएगा । हालातों को भगवान का प्रसाद करके लो, मुश्क्लातों को मौज करके लो । कठनाइयों में किट किट ना करो तो इनका power, इनका effect असर बदलाव में आता है । आपको तकलीफ नहीं देता, आपकी energy बढ़ा देता है।
भगवान अपने बच्चों को छोटी मोटी बातें इसलिए देते हैं ताकि मेरे बच्चे की energy बढ़ जाए, वो मज़बूत हो जाए, strong बन जाए। अब बिना थोड़ी बहुत हालत आए अनुभव बढ़ता नहीं,अनुभा आता नही, strong होता नहीं।
परमात्मा तेरा साथी है वो तुझे अपना मानते हैं इसलिए कहीं तू रुल न जाए, तू all-round न बने इसलिए छोटी मोटी हालतें दे देते हैं ताकि मनुष्य अपने मन से भगवान को प्यार करता ही रहे वरना मन कब आवारागर्दी से निकल जाता है पता ही नही पड़ता।भगवान गुज़ारा करना सिखाता है, थोड़े में भी और ज़्यादा में भी।
थोड़ा है तो strong बनो, हर चीज़ को थोड़ी निपटा सकते हो । कभी कुदरत ज़्यादा देती है तो enjoy करो, भली करो पर थोड़े में भी गुज़र करना सीखो । इसलिए भगवान कभी थोड़ी थोड़ी बातें देते हैं जैसे तुझे आदत आ जाना चाहिए की इस तरह भी चल सकते हैं, इस तरह भी चल सकते हैं । प्रभु प्रसाद लेकर जन्म जीवन सफल बनाओ और all-round बनो, मज़बूत बनो strong बनो । यही हमारी आसीस है।
आयो लाल कयो झूलेलाल।

।।है ही भगवान।।

02-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बहाव"

बहाव में शक्ति है, बहाव में शुद्धता है, बहाव में पवित्रता रहती है। माँ गँगा भी बहते रहते हैं। करोड़ों की सफाई करने के बाद, अनगिनत लोग नहाते हैं, उसके बावजूद भी माँ गँगा साफ, पवित्र, रहते हैं। बशर्तिक आप माँ गँगा में कचरा न फेंको। बाकी तेरे मन की मैल, तन की मैल, वो साफ सुथरा कर देते हैं, पर कभी खुद में मैलापन आने नहीं देते। खुदको भी पवित्र रखो, माँ गँगा को भी पवित्र रखो। इसी में सारे संसार, सारी सृष्टि की भलाई है।

तू एक बाल्टी की पानी में लगातार हाथ धो, पाँव रख, देखो कितना मैला होता है। पर सत्यता में इतनी ताकत है जो मैलापन महसूस ही नहीं होता। इसी प्रकार माँ गँगा से यह सीखो कि तू भी कितनी भी बातें आएँ, कैसी भी हालतें आएँ, पर तेरा तन, तेरा मन, तेरी बुद्धि, कभी दोष न ले। दोष दृष्टि ही तकलीफ देती है, ब्रह्मकार दृष्टि सुख देती है।

।। है ही भगवान ।।

03-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हलत चलत"

 

रहना, खाना, पीना, पहन्ना, कैसा होना चाहिए? जो आपको सदैव सुखी रखे, वैसा होना चाहिए । संसार में, प्रकृति में तकलीफ कोई भी नहीं है, दिखने में कितनी भी आये, पर सब तकलीफ गुज़र जाने वाली होती है, तो तकलीफ कैसे हुई । थोड़ा बहोत तो change ज़रूरी है, वरना मन एक ही routine का, एक ही आदतों का, एक ही बातों का आदती बन सकता है, और बन जाता भी है। इसीलिए थोड़ी बहोत प्रकृति में, कुदरत में, changes आती है, घटावदी होती है । Change के साथ खुद को change करो । बाहर के परिवर्तन के साथ, अगर हम भीतर परिवर्तन करेंगे, तो बाहर का परिवर्तन तकलीफदायक नहीं होगा ।

गर्मियां चल रही है । गर्मी तो होती है, तकलीफ भी देती है कभी कभी। लेकिन सुबह उठके, थोड़ा सा जीरा खा लो। ठंडा पानी पी लो। ठंडा पानी पीने से, तेरे भीतर की सारी गर्मी निकल जायेगी । जीरे में इतनी ठंडक है । थोड़ा सा फुदीने का इस्तमाल करो । परमात्मा ने उसको बहोत अच्छे से बनाया है। ठंडा ही ठंडा, ठंडा ही ठंडा । निम्बू सब से बड़कर, सबका राजा । ऐसे बहोत सारी चीज़ें है, हम आपको kya बताये । आप खुद बहोत समजधार हैं। फकत आलिस् मनुष्य छोड़े, तो उसके पास खज़ाना है। भीतर तेरे माल खज़ाना, क्यों जाए तू डूंडन देश बेगाना । हर चीज़ तेरे भीतर से निकलेगी । फकत समजधारी होनी चाहिए ।

बाहर का temperature, जैसा है, भीतर का तू वैसा ही रख। Temperature temperature से मिलाके चल, कभी गर्मी सर्दी नहीं लगेगी । इतनी गर्मी में, उन चीज़ो का इस्तमाल नहीं करना चाहिए, जो आपको तकलीफ देती है और वायु चड़ जाती है । कभी heart को तकलीफ देती है वायु, कभी दिमाग को, देती तो है ना। ऐसा खाना पीना इन दिनों नहीं खाना चाहिए । सादगी में जीवन को रखो । सब्जी रोटी खाओ, चबा चबा के खाओ । दूध अगर गरम आपको suit नहीं होता, वायु करता है, थोडासा ठंडा करके, पानी को mix करके, जैसे शिव भगवान पर चड़ाते हैं, तू ही शिव, तू ही सागर, तू ही किनारा। खुद को चड़ा दो, मुख में डालके । Sip sip करके पियो, पूरी वायु टूट जायेगी । अनार दाने का इस्तमाल करो । थोड़ा बहोत समय आने पर, जब कभी मूंज होती है, अनार दाने में थोड़ा सा फुदीना और थोड़ा सा काला नामक डालके, थोड़ा सा चूस लो, पानी पी लो। वायु को चड्ने न दो। गर्मी को आने न दो। तकलीफ कहाँ से आयेगी। आती नहीं है तकलीफ, परमात्मा ने प्रकृति बहोत अच्छी बनाई है । अपनी खाली समझ खोलनी चाहिए, Common sense बड़ाना चाहिए, knowledge रखना चाहिए बस सब अच्छा ही अच्छा होता है ।

।। है ही भगवान ।।

 

03-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ठहराव"

बहाव तुझे शक्ति देता है तो ठहराव भी तुझे शक्ति ही देता है। बशर्तिक बात इतनी है, देश-काल-पात्र उसके अनुसार तुझे बहना है, उसके अनुसार तुझे ठहराव में आना ही पड़ता है। जब कोई बात बिगड़ जाए, हालत आ जाए, प्रभु का साथ, प्रकृति माँ का साथ प्राप्त करने के लिए तुझे अपने हृदय में, स्वभाव में, ख्यालों में ठहराव को लाना ही पड़ेगा।

ठहराव जब तेरे ख्यालों में आता है तो तेरे ख्यालों की छंढ-छााँण होती है। तू अपने ख्यालों को check करता है और फिज़ूल ख्याल फैंक देता है, काम के ख्याल रख देता है। ठहराव में आपके भीतर और बाहर का account सही चलता है। वर्ना तू व्यवहार में कहीं ना कहीं तकलीफ उठा ही लेता है। हृदय में ठहराव रखो, बुद्धि में शांति रखो, इंद्रियों में स्थिरता रखो, मुख में संयम रखो, अपनी ज़िंदगी में गंभीरता कभी न छोड़ो। थोड़ा सा मुस्कुराना अच्छा लगता है, पर ज़्यादा हंसी मज़ाक कभी न कभी भारी पड़ सकता है।

।। है ही भगवान ।।

03-Apr-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्मा अमर है"

देह तो आती है, जाती है। सब लीला पई हले। लीला करके जानो, तो लीला है। जाने आने को मानो, तो तेरा जाना आना कायम है। प्रभु प्यारे से जिसका संबंध है, वह आता जाता नहीं, वह तो बस लीला धारी के इशारे पर लीला करता रहता है। संसार में जो कुछ हो रहा है बस लीला पई हले, ऐसी पक्क करो। यही पकता तुझे ब्रह्म पद पर पहुंचा सकती है। ब्रह्म को पकड़ा सकती है। वैसे तो पकड़ने में तू अलग नहीं है। दो नहीं है, जो एक भ्रम है, एक पकड़ने वाला है। है तो एक, पर अज्ञान के बादलों के कारण तू ध्वंध में आ गया और तुझे दो दिखाई देता है, कि ब्रह्म और भगवान अलग है। हकीकत में, तू ही तो है। एक करके जानो, नमक और पानी जब मिल जाते हैं, तो एक हो जाता है। Sugar और पानी मिल जाते हैं तो एक हो जाता है। फर्क स्वाद का है, स्वाद से कोई खारा, कोई मीठा, कोई खट्टा बनता है, पर है तो एक ही ना! ऐसे ही तू है तो ब्रह्म ही ना! पर स्वभाव से कभी तू कैसा है, कभी कैसा है, कभी कैसा है। पर है तो ब्रह्म ही ना! कोई कैसा है, कोई कैसा है, पर है तो भगवान ही ना! उस भगवान पर दृष्टि रखो और अपने जीवन को सफल करो।

॥ है ही भगवान ॥

04-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विचारधारा"

तेरी विचारधारा तेरी प्रेम धारा बन सकती है। तेरा प्रेम किसीको जीवन दान दे सकता है। अपनी विचारधारणाओं में थोड़ासा balance खींच लो। कहीं कोई विचारधारा नहीं मिलती, परेशान होने की ज़रुरत नहीं, विचारों को थोड़ासा ढीला छोड़ो, थोड़ासा समय दो, थोड़ासा बहने दो। साखी भाव में आ जाओ, देखते रहो - कहाॅं जा रही है मेरी विचारधारा ? फिर उसको खेंचो। जल्दबाज़ी विचारों से भी मत करो। थोड़ा ढीला छोड़के, थोड़ा खेंचों। थोड़ा विचारों की study करो, फिर अपने में हिसाब रखो what is what? हर चीज़ हाथ में आएगी, कुछ न छूटेगा, कुछ न बिगड़ेगा, तेरी विचारधारा परमात्मा से मिल-जुलके रहेगी, सृष्टि की रचना से मिल-जुलके रहेगी। ऐसी विचारधारा बनाओ जो भगवान तेरे विचारों में रहे, तेरे साथ रहे ।

।। है ही भगवान ।।

04-Apr-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"वारे वेठो जम जो खातो"

तू अपने कर्म का खाता सतगुरु के वचनों से निपटा ही देता है। न निपटने वाले कर्म भी तेरे निश्चय से निपट सकते हैं, पर थोड़ा सा balance जरूरी है। सतगुरु balance करा के ही छोड़ता है, जब तेरा शौंक देखता है। तेरा शौंक है तो मैं तेरा बैलेंस करा कर ही रहूंगा। इस राह पर चलने वालों को, अपने ही लगन की जरूरत है। तेरी लगन है अगर, कि मैं अपने आतम पद को प्राप्त करूं, तो हो ही जाएगा। आत्मा और तुझ में कोई दूरी नहीं, कोई मजबूरी नहीं, बस गुरु के वचन हृदय बसावे सो पंडित फिर जूण न पावे। करना क्या है, रब को कि पावणा? उथू पटे उथे लावणा। यह समझा सतगुरु को रिझाना पड़ता है। भले रिझाओ नहीं, यह भजन की लाइन है। गुरु खुश है। ऐसा कुछ भी नहीं है। पर तू खुद को फक्त श्रद्धा में रख। शरदा वानम, लभदे ज्ञानम्। ज्ञान निश्चय के लिए जितनी मर्यादा जरूरी है, उतना अपनी मर्यादा में रहना ही पड़ता है। बिना मर्यादा के निश्चय नहीं होता, इसीलिए गुरु तुझे मर्यादा भी सिखाता है। वाणी की मर्यादा ज्यादा न बोलो, आंखों की मर्यादा ज्यादा ना देखो, दिमाग की मर्यादा बंगार खयाल कट्ठा न करो। देह की मर्यादा अपने actions को संभाल के रखो। जो action तुझे किसी न किसी विकार में ढकेल देते हैं, उनसे बच के रहो। अपने हाथ पाओं को भी थोड़ा सा डर दे दो। और कोई डर न मिले, तो गुरू का ही दे दो। डरो! गलत जगह जाने के लिए डरो। गलत कर्म करने के लिए डरो। तेरा थोड़ा सा डर तुझे संसार सागर से पार उतार देगा। यह डर कोई डर नहीं है, यह डर भी सफल डर है, जो मीठा डर है, जो ग्रुरू से मिला कर एक करता है। आप कभी inferiority नहीं रखना कि यह डर भी हम क्यों पाले। यह डर भाग्यशाली को मिलता है और जिसको मिला बस उसका बेड़ा पार है।

॥ है ही भगवान ॥

05-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरा बाणा मीठा लागे"

 

जब भावनाए भीतर में यही होती है कि तिरा बाणा मीठा लागे, तो भावनाओं में शुद्धता ,गंभीरता आती है । जिज्ञासु को अपने लक्ष्य तक पहुंचना ही है, इसलिए शुदध्ता को भीतर लाना ज़रूरी है ।
कस खाओ पर शुदध्ता को अपनाओ । कैसी भी कस खानी पढ़े, भीतर आत्मा का आनंद, आत्मा का निश्चय होना जरूरी है । जिज्ञासु हर वक्त अगर अपनी गंभीरता में रहे तो उसका जीवन सरल हो जाए । जिज्ञासु अगर हर वक्त अपने ही शुद्धिता का ध्यान करे, औरों को न देखकर खुद का ध्यान करे तो वो विजयी बन सकता है ।
मन उसे हरा नही सकता, मन से वो हार मान नही सकता, वो अपनी जीत में खुश रहता है कि पायो रे पायो मैने राम रतन धन पायो और मैं मन के उस पार चला गया, जहां न अहिंकार है, न तकरार है, न विकार है, न गबराहट है, न तू है, न मां है।
आ चलके तुझे मैं लेके चलू एक ऐसे गगन के तले, जहां कोई गम नहीं, कोई तकलीफ नहीं, बस प्रेम, पविञता, गंभीरता ही पलती रहती है।
ऐसे अपना जीवन सफल करो और अपने में खुद को समेटकर, परमात्मा से मिलके एक हो जाओ और विशाल बुद्धि रखो।
Broad Minded बनो, हर वक्त खुश रहना सीखो, जो खुश रहता है, वो ही खुश कर सकता है सभी को ।

।। है ही भगवान ।।

05-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ज़िंदगी चलती रहे"

Train भी चलती रहती है, मंज़िल को वो खुद प्राप्त करती है। हम तो मज़े से सफर करते हैं, tension नहीं करते हैं कि कब मंज़िल आएगी। वो tension train के चलाने वाले driver को होता है। हम तो मौज से चलते हैं, अपनी मस्ती में रहते हैं। ऐसे ही तेरे जीवन की गाड़ी भी चल तो सकती है लेकिन तू जब अपनी seat book करके, टिकट लेके शांति से बैठे, तो ही तो चलेगी ना, तो ही तो मंज़िल आएगी ना। गाड़ी में तू यह कर सकता है, लेकिन जीवन में नहीं करता है। अफसोस की बात ये है कि तू जीवन में क्यों नहीं करता है।

अगर तेरे train का driver इतना मज़बूत है, कितने सारे लोगों को मंज़िल तक पहुंचाता है, तो तेरे एक जीवन को पहुंचाने के लिए सतगुरु काफी नहीं है? माँ कुदरत काफी नहीं है? भगवान निराकार काफी नहीं है? भरोसा क्या है तेरा? किस पर है तेरा ? भरोसा रखो, अपने जीवन की गाड़ी को हल्का करो, driver के हाथ में दे दो। गुरु तेरा मल्ला, गुरु तेरा driver, गुरु तेरा संगी, गुरु तेरा साथी, गुरु तेरा सहारा। सौंप दे अब नैया उसके सहारे, उसके हवाले। हमारे ख्याल से तो ये है। आप अपनी बताओ।

।। है ही भगवान ।।

05-Apr-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Nothing New"

संसार में कौन सी बात न्यू है ? लाके दिखाओ । कौन सा दुख न्यू है ? कौन सा सुख न्यू है ? कौन सी हालत न्यू है ? कौन सी बातें न्यू है ? सारी की सारी पुरानी । कुछ कल हुई, कुछ कल जाएगी । कुछ बीत गई, कुछ आएगी । इसमें मनुष्य को तकलीफ क्यों होती है ? कुछ कल तेरे पास थी आज किसी और के पास है । जो आज किसी और के पास है कल तेरे पास हो सकती है । यह तो सृष्टि का चक्कर है, तीन गुणों का खेल है, भगवान की लीला है ।

लीला जानके जानो, 3 गुण जानो, कुदरत का खेल जानो, अपने कर्मों का हिसाब किताब जानो तो आपको कोई किसी भी हालत से, किसी बात से, कोई तकलीफ ना होगी । वरना तकलीफ है ढूंढते रहो और निपटाते रहो, वरी मिलेगी वरी जाएगी वरी दूसरी आएगी, वरी तीसरी आएगी । इसी प्रकार तकलीफों से, हालातों से, तू छूट नहीं सकता । क्योंकि तेरा शरीर ही 3 गुण का है, तेरे मन में 3 गुण है, तेरी बुद्धि में 3 गुण है, तू 3 गुण का पुतला है, पांच तत्वों का पुतला है, और सारी कुदरत भी पांच तत्व से है, 3 गुण से है, आपस में अरस परस चलती रहती है । तू उससे अलग नहीं हो सकता, ना वह तेरे से अलग हो सकती है । फिर तू क्यों सोचता रहता है यह तकलीफ मिटे, यह मिटे, वह मिटे ।

अपने अहंकार के कारण, अपनी इच्छाओं के कारण, अपनी जिद्दों के कारण, जो तू तकलीफ खुद को दे रहा है, उसे अपने सतगुरु के वचनों से मिटाते चलो । बाकी जो तकलीफ है, भगवान उसे ठीक कर सकता है । पर अब पहले first तू जो इच्छा करके तकलीफ उठाता है के कारण तकलीफ उठाता है, अपने सुबह संस्कारों के कारण तकलीफ उठाता है, उससे तो निपटो, उससे निपट जाओ बाकी काम भगवान का है, सतगुरु का है, वह तो बाकी थोड़ी सी हालत है जो तुझे शक्ति भी मिलती है खड़े रहने की, और हालत है कुदरत निपटा भी देती है । पर जब तक तू अपनी इच्छा इनकार को न देखा, उनसे अपनी तकलीफों को न मिटाया, तब तक माँ कुदरत भी कुछ नहीं कर सकती ।

।। है ही भगवान।।

06-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रिय"

 

प्रिय में प्रिय परमात्मा ही है ।
परमात्मा से प्रिय कौन हो सकता है । तू कभी अपने उसूलों को प्रिय मानता है, कभी खयालों को प्रिय मानता है, वस्तुओं को प्रिय मानता है, संबंध को प्रिय मानता है, लेकिन जो हकीकत में प्रिय है, वो एको ही भगवान । जड़-चेतन में भगवान है, सोन-मिट्टी में भगवान, कण-कण में भगवान । हर व्यक्ति के भीतर में भगवान, बाहर भगवान, तेरे स्वासों में भगवान, तेरे खयालों में भगवान । तोड़के अपने दस्तुरो को कदमों में नित शीश दरो । सतगुरू के वचनों में और चरणों में भी भगवान ही है ।

चारों तीरथ धाम सतगुरू के चरणों मे। हे गुरु देव नमस्कार तेरे वचनों से, तेरे चरणों में।

प्रिय से प्रिय सतगुरू है हमारा, गुरु से प्रिय कौन हो सकता है । जो मुर्दों में स्वास डाले, स्वसों की पूंजी को देते रहे, बरकत डालते रहे,
कदम कदम पर गिरते है तो संभालते रहे । समझ उनके ही vibrations से खुलती रहती है। बुद्धि में निश्चय आत्मा का बढ़ता रहता है। ऐसे तो सतगुरू प्रिय है हमारे और कोन प्रिय हो सकते है।

परमात्मा के रस्ते चलते चलते गुरु की value समझ में आती है । जे तू न सहारा देता तो मैं कैसे रुकता ।
तरण कीन जाना बुडस पे लहरुन में,पर सतगुरु जे रमजून सा अज लगी वायस मां किनारे ।
किनारे लग गया मैं गुरु की रमज से, वरना तो दृष्टी तो उठाते थे, लेकिन परमात्मा को देख नहीं पाते थे।

।। है ही भगवान ।।

 

06-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तू अपने घर में ज़रुर आजा"

तू अपने घर में ज़रुर आजा, खुदी के बदले खुदा को पा जा। सैर करने के लिए निकलते हो उसमें भी आनंद, सफर में भी आनंद, अपने घर में आते हो तो भी आनंद। आनंद से नाता जोड़ दो। परमेश्वर जिस रंग में रखे, जिस जगह रखे, जिस हाल में भी रखे, जैसा भी चलाए, ये तो उसकी मर्ज़ी। होजा खुशी से अपने सतगुरु के हवाले, अब मर्ज़ी पे छोड़ दे तू वो जैसे भी संभाले। ये भी उसकी मर्ज़ी। जब तू उसकी मर्ज़ी, उसकी मर्ज़ी, उसकी मर्ज़ी करके अपने जीवन, अपने जीवन की यात्रा को आगे बढ़ाएगा तो तेरी हर यात्रा सुखद है, सुखमई है, परमात्मा के साथ है, भगवान के साथ है। कुदरत तेरे साथ चलती है, तू कुदरत के सहारे, कुदरत के बीच में रहता है और अपनी ज़िंदगी को आनंदमय बना देता है। ऐसे ही अपनी जीवन को आनंदमय बनाओ और लौट के अपने घर पे आओ, खुदी के बदले खुदा को पा लो।

।। है ही भगवान ।।

06-Apr-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"समय पर इंद्रियों का कंट्रोल में रहना"

ऐसे तो जिज्ञासु को बहुत सारा फायदा है, कई प्रकार की changes है, बहुत कुछ change कर चुके हो, लेकिन फिर भी कोई ऐसा समय आता है जो तू अपनी इंद्रियों पर कंट्रोल नहीं कर सकता । वह होती तो एक आधी घड़ी है, लेकिन एक आधी घड़ी में तेरा पूरा आदर्श खराब हो जाता है । बहुत सारा अच्छा किया एक आधी घड़ी में तूने कंट्रोल को खोल लिया तो तेरे पुरुषार्थ पर पानी पड़ जाता है, मन भी खराब होता है, रिश्ते खराब होते हैं, इंप्रेशन खराब होता है । तू दूसरों को कहता है मेरे लिए इंप्रेशन क्यों बनाते हैं, लेकिन वजह तो तू ही है ना, तेरा जो कंट्रोल निकल जाता है वह वजह बन जाता है । इंप्रेशन बनाने के लिए, इंप्रेशन को पालने के लिए, अपनी आत्मा में इतनी डटे रहो, देह नहीं ब्रह्म स्वरूप हूं, इसमें इतनी डटे रहो, जो गम खा लो । समय पर थोड़ी सी गम खा लो, थोड़ा हजम कर लो यह जरूरी नहीं है कि जवाब देना और इंद्रियों का कंट्रोल खो देना । जवाब न दो, अपने भीतर बैलेंस रखो, और गम खा जाओ । थोड़ा बैलेंस सबसे सुंदर साबित होता है । थोड़ी शांति जब तेरी इंद्रियां लुड़कती है उस समय थोड़ी सी शांति रखो तो तेरी सुंदरता, तेरी शांति और बढ़ जाएगी,  बाकी तो फैसला आपके हाथ में है । दूसरे को दोष ना दो, खुद से दोष निकालो, यही तेरा लक्ष्य होना चाहिए ।

।। है ही भगवान।।

07-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दृष्टि की सफाई"

 

दृष्टि की सफाई, तेरे दृष्टि की ताकत बन जाती है। दृष्टि की सफाई, तेरी दृष्टि भी तेरे प्रेम का बसेरा बन जाता है। दृष्टि की सफाई, किसी के लिए हमदर्दी, किसी के लिए help, किसी के लिए प्रेम, तू किसी के लिए समजधार भी बन सकता है । जब तेरे दृष्टि की सफाई है । दृष्टि की सफाई, किस प्रकार करें? दृष्टि में दोष रहते हैं। तेरी दृष्टि, दोष दृष्टि, देहाध्यास में बन जाती है । दोष दृष्टि साफ सुथरी रह ही नहीं सकती । दोष दृष्टि किसी को help नही कर सकती । दोष दृष्टि किसी को प्रेम नहीं कर सकती । दृष्टि से दोष निकालते जाओ । दृष्टि खुद भ खुद साफ होती जायेगी । आप दोष निकालो । लौट के अपने घर आ जाओ, तो दृष्टि भी तेरी लौट के अपने घर में आ जायेगी । वरना भटकती हुई दृष्टि, दोष दृष्टि बन जाती है । समेट लेती है सारे दिन में औरों का दोष, तेरी दृष्टि समेटती रहती है । जैसे तू घर के आंगन की सफाई करता है, झाड़ू लगाता है, ऐसे ही तू दृष्टि से संसार के विकारों का झाड़ू लगाता है । Please लगाना बंद करो । तेरी health खराब हो रही है, सर दर्द हो रहा है। आँखों के चश्मों का नंबर rough हो रहा है। तंदुरुस्ती खराभ हो रही है, Digesion खराब हो रहा है। इतनी सारी तकलीफ़ें, हालतें, संक्लप्, विकल्प, कितनी सारी खराबियां आ रही है, एक दृष्टि दोष से । दोष मुक्त हो जाओ, दृष्टि के दोष को खतम करो, दृष्टि में आत्म बुद्धि रखो और आत्मा की दृष्टि रखो, संक्लप् विकल्प आत्मा के रखो। संक्लप् किया आत्मा का, तो बहोत अच्छा। कभी विकल्प आया की मैं आत्मा से नीचे तो नहीं आ जाऊंगा, तो भी अच्छा, परवाह न करो, सतगुरु से share करो, गिरने नहीं देंगे । सतगुरु से share करो, दृष्टि को साफ कर लेंगे और तेरी उजली दृष्टि संसार में एक उजाला फैलायेगी, तेरे सत्य की दृष्टि संसार में सत्य के सूरज को लाकर खरा कर देगी । तू अपनी तो भलाई करेगा, लेकिन संसार की बहोत सारी भलाई तेरे से हो जायेगी, अगर तेरी दृष्टि में पाक और पवित्रता है तो।

 

।।है ही भगवान।।

07-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सत्संग सौगात"

सत्संग एक सौगात है। सत्संग एक तेरे जीवन की ज़रुरत है। सत्संग सतगुरु से मिली एक प्यारी, एक मीठी gift भी है। उसी सत्संग से इतनी प्रीत होवे कि तू एक घड़ी भी सत्संग के सिवाय रह न सके। बच्चों के साथ इतना लगाव होवे कि वो दरस पाने को अगर तरफे तो तेरी तरफ सूत समेत होनी चाहिए। सत्संग सबक देता है कि तू देह नहीं तू आत्मा है। सत्संग सबक देता है कि थकान तेरी dictionary में नहीं है। सत्संग पहला सबक ये देता है कि तू देह नहीं तू तो ब्रह्मस्वरुप है।

ऐसे सत्संग से सौ सौ बार, लाखों बार, करोड़ो बार कुर्बान जाएँ। पर सत्संग में ज़रुर पहुंचे। यहीं शुभकामना खुद के लिए भी है और अपने बच्चों और भक्तों के लिए भी है कि नेम, टेम, प्रेम इसको हर हाल में ज़िंदा रखो। उमंगो को हर हाल में तेज़ रखो। जैसे आप अखंड ज्योति जलाते हो, बराबर घी-वाटी का ध्यान रखते हो, ऐसे ही आपको अपने जीवन में उमंगों का ध्यान रखना चाहिए। जहाँ तेरे उमंग तेज़ रहें वहाँ रुको, जहाँ तेरे उमंग ढीले पड़ जाएँ वहाँ से भागो और भागकर गुरु के पीछे भागो। विश्वास करो मेरे पीछे भागोगे तो कभी भी आपके उमंग ढीले नहीं पड़ेंगे। शरीर ढीला भी हो जाएँ तो क्या हुआ, पर उमंग कभी ढीला ना होवे।

।। है ही भगवान ।।

08-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"रहनी, कहनी, करनी पर ध्यान देना "

रहनी, कहनी, करनी पर ध्यान देना जिज्ञासु के लिए जरूरी है वरना जिज्ञासु जिज्ञासु नहीं हुआ। रहनी गुरु मत से टैली करती है| उनके आदर्शो के मुताबिक अगर रहनी कहनी है तो तू सुंदर बनता है सतगुरु सुंदरता का सुख देता है तेरी रहनी कहनी बना कर। गरमी में खाना वैसा खाओ जैसे गुरुमत सिंपल सिंपल लाइट लाइट हल्का पेट भरो ज्यादा सत के ना खाओ तो तंदुरुस्ती सलामत कपडे पहनो इस मौसम में सूटी पहनो, कॉटन| नायलॉन के कपड़े तेरे बारिश और ठंडी में चलते हैं इस मौसम में पाहनोगे तो स्किन खराब हो जाएगी| पोशाक में भी गुरु मत होनी चाहिए| कठिनी,करनी कर्म|
कर्म में भी अगर गुरुमत है तो बेदा पार है| जे तू कर्म अपनी मन से करता है तो बेदा अटक ही जाता है गुरु के इशारे समझो गुरु मत पर चलो तो सब अच्छा ही होगा| जिज्ञासु सुंदरता का रूप लेटा जाएगा। हर तरफ से गुरु का इशारा समाज कर अपने भीतर ज्योति जलाओ, ज्योत जगाओ सृष्टि सुंदर करने का संकल्प रखो, खुद सुंदर हो जाओ फिर देखो आपका जन्म जीवन कैसी सफल हो सकता है और तू खुश रहने लगता है, खुश रहो मुह मिसल जग में शाद रहो, आबद रहो मुस्कुराते रहो तो आपके नींद, खाना, पीना उसूल, आदर्श, संसार, परिवार सारी बातों में रौनक आ जाएगी|

।।है ही भगवान।।

09-Apr-2017

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"देह-अध्यास छोटा, उसके पीछे मुश्किलातें बड़ी"

देह-अध्यास - दो शब्द। पर देह-अध्यासी की हालत सबसे बड़ी हालत, तकलीफ दायक हालत, मुश्किलातों से फसी हालत। देह-अध्यासी न खुश रह सके, न दुखी होने का part-play कर सके। दुखी होता है तो भी tension - मेरा दुख कोई देख न ले। खुश होता है तो भी tension - मुझे किसी की नज़र न लगे। आखिर कब तक देह-अध्यास की दलदल में फसे रहोगे। अपने को ऊपर उठाओ, आत्मभाव में खड़ा कर दो, आत्मपद पर बैठ जाओ और संसार सागर से पार उतरकर सृष्टि को सुंदर करो।

।। है ही भगवान ।।

10-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कण कण वासी,घट घट वासी"

 

पत्ते पत्ते में भगवान है, घट घट में भगवान है, ज़र्रे ज़र्रे में भगवान है, पर देखने के लिए वो आंखे चाहिए जो आंखे सतगुरु वाणी से मिलती है । जब भी तू भटका कण-कण में जे भगवान देखा तो अटका बेरा पार पहुंच गया । मन भटके या तन खफे़ होए, रास्ता एक ही है, इलाज एक ही है कि तू ब्रह्म स्वरूप है । तू जाणी जाण है, जानने वाला है । तू आत्मा है, अपनी को घट घट वासी से अलग ना समझो । ब्रह्म में निवास है ब्रह्म का प्रकाश है । पांचो तत्वों में धरती, आकाश, जल, वायु, अग्नि सब में किसका तेज है ? उसी एक ब्रह्म का पसारा है । तीन गूण कसकी शक्ति से चल रहे हैं ? उसी ब्रह्म के प्रसारे में 3 गुण भी चल रहे हैं मनुष्य कौन सी शक्ति लेके जन्मा है ? कौन सी शक्ति लेके चल रहा है ? उसी को भी वही ब्रह्म शक्ति है । एक ही नूर है, एक नूर से सब जग उपजे कौन भंदे कौन मंदे । कोई बुरा नहीं भले मन के वास्ते । अपने मन से बुराई निकालो तो सारे संसार में तुझे कोई बुरा दिखाई न देगा । तेरे लिए कोई बुरा न होगा । हर बात में भलाई छुपी होती है बलाई बलाई करके देखो तो भलाई निकलती है, जे तू बुराई में दृष्टि रखता है तो तेरे प्रति भी बुराई ही आती है इसीलिए तू देह नहीं तू ब्रह्म स्वरूप है अपना मूल पहचान, हरजी तेरे नाल है खाली गुरमति रंग माण । मनमत डुबा देती है गुरु मत तैरना सिखाती है । तैरो और सब को तैरने के लिए प्रेरित करो । सृष्टि सुंदर करो, घट घट वासी को पहचानो और खुद को उससे दूर न मानो ।

।।है ही भगवान।।

11-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरु महिमा"

 गुरु महिमा अप्रम पार। गुरु महिमा में आप विसर्जन होता है। गुरु महिमा के शिवा आप विसर्जन हो नहीं सकता| गुरु महिमा जानने से तेरा मन, तेरी बुद्धि,तेरा चित्त अहंकार शांत हो जाएगा और ज्ञान निश्चय में देरी नहीं लगेगी| जब  तू ज्ञान सुनता  है या सुनाता गुरु महिमा से वाकिफ नहीं तो भी ज्ञान सुनना और समझाना कठिन काम हैं| पर जब गुरु महिमा होती है तो औखो कम पकही पक सौखोथी पौंडो| जो भी कथिन काम easy हो जाते हैं।गुरु महिमा के शिवे बुद्धि, मन, चित्त, अनहंकार तेरे थंडे नहीं हो सकते। उसको ठंडा करने के लिए अपनी बुद्धि को शांत चित्त करने के लिए अपनी गुरु महिमा को ध्यान दो। तुने  जित्ना गुरु को जाना है और मौन चुप, शांत मैं रहोगे तो गुरु महिमा को और जान पाओगे| ऐवन उंचे को उंचा होक जानिए| अपने ही अंदर महिमा का दीपक जलाओ और भीतर ही भीतर अपने सतगुरु से मिलके एक हो जाओ और शांत पद मैं अपने को शांत रखो। गुरु महिमा से तेरे सारे राग देवेश, तेरे सारे संकट, तेरी सारी बातें अच्छी होती जाएगी और गुरु महिमा मैं तू हल्का होता जाएगा मैं और spirituality के रास्ते पर तू आगे बढ़ेगा।

।।है ही भगवान।।

12-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

तेरे इस जन्म में परमात्मा से मिलकर एक हो जाने से, तेरे भीतर तपस्या आती है, softness आती है और विशेषता आती है । तेरे भीतर ये भावना उठती है या नहीं, खुद को खोजो । जब तेरे भीतर आता है कि मैं सबके जैसा नहीं हूँ, मैं कुछ खास हूँ,  One to all सभी को ये भाव आता है कि मैं कुछ खास हूँ। दिशा तेरी भावनाओं को अगर गलत मिली तो तू ये सोचता है कि मैं कुछ खास हूँ । खास बन कर तू सभी से राग द्वेष निभाता है। छोटा बड़ा देख कर खुद को विखेप् में औरों को भी विखेप् में । जलन की दुनियाँ में रहता है । पर जे तेरी भावनाओं को सही दिशा मिले, तो तू खास नहीं बनेगा । सब से प्यारा, सब से न्यारा, सब का दुलारा बनेगा, विशेष बनेगा । विशेष और खास बनने में फर्क है । खास तू खुद को बनाता है। विशेष तेरेको सारा संसार बना देगा । तेरी बातें सुनकर, तेरा आदर्श सुनकर, तेरा आदर्श देख कर वो खुद चलेंगे और तुझे विशेष बना लेंगे । तू खुद से खास बन सकता है, विशेष नहीं बन सकता । इसीलिए अपने उपर मेहरबानी करो, दया करो और अपने को मनुष्य जन्म की महिमा बताओ । मनुष्य जन्म से जिज्ञासु बनो, धरती का भगवान बनो और सबके प्यारे, दुलारे, विशेष बनो । खास बनने की इच्छा छोड़ो, तो तू विशेष बन जायेगा । खास और विशेष में जो फासले है वो तो तुझे तय करने पड़ेंगे। अब दुखी होके करो या सुखी होके, disturb होके करो या राजी होके लेकिन खास और विशेष का अंतर तो मिटाना ही पड़ेगा। 

।।है ही भगवान।।

13-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मनुष्य महिमा "

 

मनुष्य की महिमा बहुत प्यारी है, न्यारी है, powerful है । अगर मनुष्य अपने में परमात्मा पाने की चाहना पैदा कर दे तो वो जिज्ञासु बन जाएगा । जिज्ञासु अगर अपने को मोक्ष के रास्ते दिखादे तो मुमुक्षु(मोक्ष की कामना करने वाला) बन जाएगा। मोक्ष की चाहना रखे तो मोक्ष का अधिकारी बन जाएगा । मनुष्य अगर जीते जी मोक्ष प्राप्त करले तो वो भगवान का प्रियजन बन जाएगा, भक्त बन जाएगा । लगातार मोक्ष प्राप्त करके निष्काम राहों पर चल पड़े वो तो इस धरती का भगवान बन गया ।

नदिया न पिये कभी अपना जल,
वृक्ष न खाए कभी अपना फल,
अपने तन का, मन का, धन का जे तू निष्कामी बनकर दूजों को दान देता है, ज्ञान का दान देता है, तो तू इस धरती का भगवान ही तो है । भगवान को कहां ढूंढू , किधर ढूंढू भगवान कण-कण में है, घट घट में है, जड़ चेतन में है पर साक्षात दिखाई देता है, जो तपस्वी तपस्या करते हैं, खुद को soft बनाते हैं, खुद को निष्कमी बनाते हैं, मोक्ष के अधिकारी बनते हैं, मनुष्य जन्म सफल करते हैं उसी में तो भगवान का दीदार पाया जा सकता है । सामान्य सत्ता सभी में तो है मिट्टी के जर्रे जर्रे में, कण-कण में, सभी में तो सामान्य सत्ता है पर विशेषता तेरे तप से आती है, तेरे जप से आती है, तेरे आदर्श से आती है, तेरे सतगुरु लगन से आती है ।

तेरे इस जन्म में परमात्मा से मिलकर एक हो जाने से तेरे भीतर तपस्या आती है, softness आती है, विशेषता आती है। तेरे भीतर यह भावना उठती है या नहीं खुद को खोजो । जब तेरे भीतर आता है कि मैं सबके जैसा नहीं हूं, मैं कुछ खास हूं one to all सभी को यह भाव आता है कि मैं कुछ खास हूं। दिशा तेरी भावनाओं को अगर गलत मिली, तो तू यह सोचता है कि मैं कुछ खास हूं खास बन कर तू सभी से राग द्वेष निभाता है छोटा बड़ा देखकर खुद को विखेप में, औरों को भी विखेप में जलन की दुनिया में रहता है । पर जे तेरे भावनाओं को सही दिशा मिले तो तू खास नहीं बनेगा सबसे प्यारा ,सबसे न्यारा, सब का दुलारा बनेगा विशेष बनेगा । विशेष और खास बनने में फर्क है । खास तू खुद को बनाता है । विशेष तेरे को सारा संसार बना देगा तेरी बातें सुनकर, तेरा आदर्श सुनकर, तेरा आदर्श देखकर वह खुद चलेंगे और तुझे विशेष बना लेंगे । तू खुद से खास बन सकता है, विशेष नहीं बन सकता इसीलिए अपने ऊपर मेहरबानी करो, दया करो और अपने को मनुष्य जन्म की महिमा बताओ, मनुष्य जन्म से जिज्ञासु बनो, धरती का भगवान बनो और सबके प्यारे दुलारे विशेष बनो, खास बनने की इच्छा छोड़ो तो तू विशेष बन जाएगा । खास और विशेष में जो फासले हैं वह तो तुझे तय करने पड़ेंगे । अब दुखी होकर करो या सुखी होकर, disturb होकर करो या राजी होकर, लेकिन खास और विशेष का अंतर तो मिटाना ही पड़ेगा।

।।है ही भगवान।।

14-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इंद्रियों का balance"

 

जितना तू अपनी इंद्रियों का balance करेगा, उतना ही आत्मा का निश्चय होगा । इंद्रियां अगर balance में है तो तुझे सुख से सुख मिल सकता है । अगर इंद्रियों में balance नहीं है तो हर सुख से तू दुख को ही प्राप्त करेगा । इंद्रियों में balance है तो तू सर्व को प्रेम, सर्व से धीरज, अपनी राग और द्वेष पर दृष्टि पढ़ते ही उसको तू दूर करेगा । अगर balance नहीं है तो रोज-रोज राग द्वेष तू अपने मन में इकट्ठा करता जाएगा । जन्म सफल और सुंदर बनाना है तो अपनी इंद्रियों का balance करना ही होगा । अगर अपने जन्म को व्यर्थ गंवाना है तो तू देह के दुखों में भी आएगा । Balance न होने के कारण राग द्वेष के दुखों में आएगा । सतगुरु से भी दूर, सत्संग से दूर, हर चीज से दूर दूर हो जाएगा । नजदीक होगा खाली देह अध्यास से, जो तुझे हर वक्त डंक मारता रहता है । इसलिए बच जाओ, प्रेम करो पहले खुद के तन को, मन को ।

सुख देना प्रेम नहीं है, balance करना प्रेम है । आपको गलतफहमी है कि जितने सुख बटोर सकूं उतने अपनी देह के लिए और अपने वालों की देह के लिए बटोर दूं । पर सुख बटोरने में सुख नहीं है, इंद्रियों के balance में सच्चा सुख समाया हुआ है ।

।। है ही भगवान ।।

15-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुण ग्राही दृष्टि"

 

मनुष्य की अगर गुण ग्राही दृष्टि बन जाए तो मनुष्य, मनुष्य नहीं वो परमात्मा का बच्चा बनकर, सबको ब्रह्मकार वृत्ति दे सकता है । जिसकी गुण ग्राही दृष्टि है, उसको ब्रह्म कार वृत्ति भी है ।

गुण ग्राही दृष्टि अगर मनुष्य न रखे, तो भला क्या करे ? अवगुण तो आएंगे ही ना । गुण ग्राही दृष्टि रखने से तेरे अवगुण, तेरे से दूर हो जाते हैं । गुण ग्राही दृष्टि अवगुणों को न आने दे, उसके लिए साधन है, अपनी दृष्टि से आप दोष समेट सकते हैं । झाड़ू वाला जैसे झाड़ू लगाता है वैसे तू भी दृष्टि से, अपने मन की वृत्ति को न पहचान कर, ब्रह्मकार दृष्टि को न देखकर, तू अपनी दृष्टि से, संसार के विकारों का झाड़ू ही तो लगाता है । जे तू अपनी दृष्टि से झाड़ू लगा सकता है विकारों का तो, गुणों का क्यों नहीं लगा सकता ? विकारों का तू लगाए तो, इससे कितना बेहतर है जो तू गुणों का लगा । संसार में गुण भी हैं, अवगुण भी हैं, पर तु क्या समेटता है ? अवगुणों को समेटकर खुद तू एक गलतियों का पुतला बन जाता है, और गुणों को समेटकर तू एक फूल बन जाता है । तुझे क्या पसंद है ?

पुरुषार्थी तू है, समेटना तो कुछ पड़ेगा ही, दोषों को समेटो, गलती के पुतले बन जाओ, इससे तो अच्छा है सब के गुण देखो । गुण ग्राही दृष्टि रखो, दोष मुक्त हो सकते हो, गुण ग्राही दृष्टि, दोष मुक्त होने के लिए एक उत्तम साधन है । उत्तम साधन अपनाओ, सभी के गुण देखो । भले कोई कितना भी अवगुणी है, फिर भी उसमें कोई तो गुण होगा, कोई तो गुण है ही है क्योंकि वो आत्मा तो है ना । आत्मा है माना कोई तो गुण है ना, उस गुण को देखो बाकी उसके सारे अवगुणों को छोड़कर एक गुण को देखो । एक मक्खी का स्वभाव है, मक्खी सारे सुंदर शरीर को छोड़कर जिधर आपको थोड़ा सा जख्म है, उधर जाके बैठ जाती है । मक्खी वाला स्वभाव ना लेकर, गुरु का स्वभाव ले लो । गुरु देखो कितने भी विकारी आए, सब के विकार छोड़कर उसकी जो कोई अच्छी चीज है, उसपर दृष्टि रखके, नहीं भी अच्छी है, तो भी अपनी अच्छाई डालके भी उसको अच्छा करते हैं और अच्छाई पर दृष्टि रखके आशावादी होते हैं कि‌ नहीं, ये आज नहीं तो कल सफल होगा । और तू गुण ग्राही दृष्टि छोड़कर कमियों में रखकर अपने को दोषो की दृष्टि रखकर अपने को सफल नहीं करता औरों को भी तू ऐसे ही discourage (डिसकैरेज) करता है इसलिए अच्छे बच्चे बनो, गुण ग्राही दृष्टि रखो, अपने में गुण आरोप करो , सभी का एक एक गुण ले लो । आज से ये promise(प्रॉमिस) करो कि मैं किसी के अवगुण नहीं देखूंगा पर किसी का भी जो एक गुण है, उसका देख लूंगा । जे उस में कोई भी गुण आपको दिखाई नहीं देता, तो भगवान का दिया हुआ आपके पास बहुत कुछ है । टका पैसा दान नहीं करो, एक गुण बोलो उसके नाम; तेरे vibrations (वाइब्रेशन) से वो गुण उसके पास चला जाएगा, वो कल से अच्छा होता जाएगा ।

 

।। है ही भगवान ।।

16-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"रेहमतें"

 

गुरू ने ऐसी रेहमतें कर दी जो मैं, मैं न रहा । में देह था, शरीर था, अब मैं बह्म में गोते लगाने लगा, आत्मा में लीन हो गया, भक्ति में झुमने लगा । ज्ञान दृष्टि पाकर अंधेरा खत्म होने लगा, उजाले आ गए ।
रेहमतां करंदा है,
झेलीयां भरंदा है,
पीरांदा पीर है मेरा,
वो तो शाही फकीर है,
वो दादी भगवान है, वो सतगुरु है ।

वो दिल में आके आसन बना देते हैं, और हमें अपने आशियाने में जगह देते हैं । कख्ख पयो न सहे हो मूं मथां । एक छोटा सा कांटा भी मेरे ऊपर गिरे उनसे सहन नहीं होता, ऐसा तो मेरा और उनका प्रेम है । प्रेम की गंगा बहाते चलो, अपने सतगुरु को दिल में बिठाते चलो, तो रेहमत ऐसी होगी जो तू शाही फकीर के साथ शाही फकीर बन जाएगा, भरपूर बन जाएगा, दिलवाला बन जाएगा, मतवाला बन जाएगा । 

 

।। है ही भगवान ।।

17-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तबदिलियाँ - बदलाव"

ज़रासी तबदिलि आती है (बदलाव) प्रकृति में, या तो तेरी personal life में थोड़ा भी बदलाव होता है तो तू disturb हो जाता है। मन तकलीफ में आ जाता है। लेकिन अगर मनुष्य बदलाव में खुद को बदल दे फटाफट, देरी न करे तो मन में, हर हालत में खुशी रहेगी। कभी कोई दुख-दर्द की, पीड़ा की टीस नहीं उठेगी। इसलिए अपने मन को हमेशा स्थिर रखो और हर हालत में गुज़रान करना सीखो।

एक जिंदगी में खिंचाव है तो खींचातानी में जिंदगी भारी हो जाती है, जीवन बोझ बन जाता है। पर एक जीवन में खिंचाव नहीं है, गुज़रान करने की अच्छी भावना है तो हर बदलाव को, हर तूफान को हर हालत को तू गले से लगाके शान- मान की ज़िंदगी जीएगा और आगे बढ़ेगा अच्छी उम्मीदों के साथ। तो आने वाला कल भी first class होगा। Golden life आज नहीं तो कल तो आनी ही है।

।।है ही भगवान।।

18-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नम - नम सुख पावै"

जितना तू नम्र होता है, उतना ही तू soft बनता है। जितना soft बनता है उतना ही तू दिलों में महलात बनानेवाला कारिगर बन जाता है।बाहर धरती पर महलात तो अनेकों कारिगर बना डालते हैं, पर किसी के हृदय में अपने प्रेम का महलात बनाना ये किसी भाग्यशाली, किसी सतगुरु के बच्चे का ही काम है। वरना दिल में महलात बनाना easy नहीं है। नम्रता से तू किसके ह्दय तक उतर सकता है। नम्रता से तू मन-मुटाव छोड़ सकता है। नम्रता से तू किसी के साथ ख्याल से ख्याल मिला सकता है। नम्रता से तू ज्योत से ज्योत जगा सकता है। 

वरना ज्योत जली नफरत की आंधी आई, द्वैत का तूफान आया, बि्याई-दुआई की बातें आयी, जो ज्योत जलाई थी बुझने लगी, संकट में आने लगी। आत्मा के निश्चय से संकट दूर किया तो ठीक है, वरना तू कुच्छ नहीं कर सकता। द्वैत की आंधी तुजे डुबा देती है, गिरा देती है। अपने पद से नीचे कर देती है। इसलिए द्वैत को पहचानो, नफरत को पहचानो एक ही भाव से तू इन पर जीत सकता है, वो भाव है नम्रता।नम्रता करो तो तू अमर अजर अविनाशी हो जाएगा और कोई भी बात तुझे तकलीफ नहीं देगी।

।।है ही भगवान।।

19-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"स्वाभिमान"

स्वाभिमान सभी को अच्छा लगता है। लगना भी चाहिए। लेकिन स्वाभिमान है क्या? कभी-कभी तू गलतफ़ेहमी में अभिमान को स्वाभिमान समझ लेता है और स्वाभिमान को पा नहीं सकता। क्योंकि वो दरअसल अभिमान है। अभिमान आता है, तो कुदरत भी रास्ते रोकती है। स्वाभिमान प्राप्त करने के लिए कुदरत रास्ते छोड़ती है। लेकिन अभिमान और स्वाभिमान दोनों का फर्क समझो। स्वः को जाना नहीं, तो स्वाभिमान कहाँ से आएगा? तू अभिमान को ही, अहंकार को ही दूसरा side देकर स्वाभिमान बना देता है। पर जब तक स्वः को जाना नहीं, स्वाभिमान में तू आ नहीं सकता।

स्वः को जानो तू कौन है? तू क्या है? क्या करने आया है? क्या काम है तेरा? किस लिए जन्म हुआ तेरा? किस लिए परमात्मा ने अनेक सुख आपको दिए हैं उसके एवज(बदले)में क्या तुझे देना है? यह सब सवाल हैं जिनका जवाब प्राप्त करना तेरा धर्म है। तू अपने धर्म में आजा। कुछ अपने लिए समय निकाल दे और इन सवालों के जवाब को study कर। कहाँ से भी जवाब ले ले और फिर स्वः को जान कि तू कौन है? तू ब्रम्ह पद में लीन होगा, तू ब्रम्ह स्वरूप होगा। जे स्वः को जानेगा, तो तू आत्म-निश्चय में होगा। आत्मनिष्ठी सदा सुखी। तेरी बुद्धि भी स्थिर बुद्धि होगी। मन तेरा स्थिर होगा। इंद्रियाँ तेरी बेलगाम नहीं होगी। आज्ञा-चक्र तेरा खुला होगा, बंद नहीं होगा। इस प्रकार सव्यं को जानेगा, स्वाभिमान को समझेगा और रखेगा तो अहंकार से बच जाएगा। भ्रमों की दुनिया से बच जाएगा। ब्रम्ह में स्थित हो जाएगा। सबनीं खां पद तुहिंजो उंचो, लालणं तूँ आहीं लासानीं (सिंधी-दोहा)। लासानीं है तू, सैलानी है तू लेकिन ब्रम्ह पद में तू स्थित है। उसी में लीन हो जा।

।।है ही भगवान।।

20-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इच्छा और आशा"

दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। लिखने में मात्रा का फर्क है। लेकिन स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है। इच्छा आपको disturb करती है। आशा disturb को मिटा देती है। इच्छा negative शक्ति देती है, आशा हर वक्त positive mood देती है। इच्छा गली-गली गुमा लेती है, भटकाती है, फकीर बनाती है। लेकिन आशा तुझे स्थिर करती है, गली-गली भगवान दिखाती है और हर वक्त प्रेम भाव जगाती है। इच्छा पूरी होती है तो वैर-विरोध बढ़ता है। आशा पूरी होती है तो परमात्मा की तरफ तू अरदास करता है, कि भगवान तूने ही दिया, तेरे ही सहारे रहूँ। इच्छा छीनने पर मजबूर करती है।आशा दर्या दिल है, वह देना जानती है, छीनना नहीं। इच्छा तेरी आयू रोज़ कम करती है, घटती है तेरी आयू। आशा - तेरी आयू बढ़ जाएगी जब कहीं तू अटकता नहीं तो आयू बढ़ती है। इच्छा तेरी प्रालब्ध से तुझे दूर करती है, emotion देती है। और आशा प्रालब्ध में नैलानी जोराबे (nylon socks) की तरह fit करा देती है, वैर-विरोध समाप्त कर देती है। 

इच्छा न करो आशा भली करो।आशावादी हो के रहो। इच्छावादी ना बनो, आशावादी बनो।भगवान को भी इच्छा पसंद नहीं।आशा के लिए उसको कोई एेतराज़ नहीं। अपना जीवन बनाओ, आदर्श बनाओ, सुखी जीवन जीओ। इच्छा को तज अनछित फल पावे। आशा तो सदाई तेरे साथ थी, है और रहेगी।

।।है ही भगवान।।

21-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Past (भूतकाल) के खड्डे"

देह-अध्यास के कारण कई बार past में ऐसे राग-द्वेष, द्वैत, मनमुटाव हो जाते हैं, जो वो एक खड्डों के मिसल बन जाते हैं। खड्डे कितने भी गहरे हो तेरे past के, फिर भी मेरे सतगुरु दादी भगवान ने ये अपनी वाणी में वादा दिया है, कि वो याने सतगुरु दादी भगवान तेरे को निश्चय कराके आत्मा का, निष्काम प्रेम सिखा के, निस्वार्थ बनाके, पाक पवित्र करके छोडेंगे। और फिर past के खड्डों पर मिट्टी डाल देंगे ऐसी, जो वह खड्डे, एक अच्छा सा,  सुंदर Platform बन जाएगा, जहां तू रुकेगा। मतलब है उनका कि past में की गई गलतियाँ, हो रहे विकार, कई बातें जो आयी-गयी, वो तुझे आत्मा के ज्ञान के बाद परेशान न करेगी, और तू अपनी आगे की जिंदगी को आराम से गुज़ार सकता है। बशर्ती आत्मा का निश्चय करो और गुरु वचनों को सदा ही साथ में रखो।

आने वाले कल यानी कि future, उसकी चिंता करने की ज़रुरत नहीं। क्योंकि उन्होंने कहा, दादी भगवान ने कहा है कि जैसा तेरा nature है स्वभाव है, वैसा ही तेरा future बन जाएगा। future तेरा तेरे स्वभाव के उपर depend करता है। इसलिए अपने स्वभाव को भगवान के भाव से वश करो और अपना future golden बनाओ, और पीछे past में एक अच्छा सा सुंदर platform बनाओ जहाँ तेरी ज़िंदगी आगे और पीछे और अभी first class गुज़रेगी, परमात्मा के साथ गुज़रेगी, सतगुरु के साथ गुज़रेगी।

।।है ही भगवान।।

22-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शौंक"

शौंक आपको किस चीज़ का है, देखना ये है। शौंक ऐसा होवे, जो आपके लिए एक सुंदर platform बना सके, जहाँ आप निस्फुर्नें, निश्चिंत खडे़ रह सको, जि़ंदगी गुज़ार सको। शौंक ऐसा ना होवे जो कोई खड्डा खोद दे। खड्डा खोदके आपको गिरा दे और आप असमर्थ होके रह जाओ। शौंक हकीकत में भगवान का होना चाहीए। उसमें सारे शौंक आ जाते हैं। पर सारे शौंकों में भगवान नहीं आता।

एक चीज़ लेते हो, तो दूसरा भगवान नहीं मिलता। पर भगवान लेते हो तो सब तुझे मिल जाता। बस इतनी अक्ल की बात है। कोई मूर्ख बनके, संसार के शौंक में अपनी जान गँवा देता है और भगवान को भी गँवा देता है। पर कोई सयाना (समजदार) बनके, भगवान के शौंक में, अपनी जिंदगी को खड़ा करता है, तो दुनिया के शौंक उसमें आ ही जाते है।भगवान तेरे शौंक की चीज़ों को, अपने पास रखकर, क्या करेगा? तुझे ही तो देगा। तेरे लिए ही तो बनी हैं। पर तू चाहेगा भगवान को तो सब शौंक free। चाहेगा शौंकों को, तो भगवान मिलेगा ही नहीं, तू सोचता रह जाएगा। इसलिए अपने शौंक को सही दिशा दो, शौंक सही रखो, पहले की चीज़ पहले करो, बाद की चीज़ बाद में करो। बस इतनी सी इल्तजा है। इतना दिमाग अपना खोलके सहज भाव में सुख ले लो। सब तेरे लिए ही है।

।।है ही भगवान।।

23-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सब लीला पई हले"

जो भी है सब लीला चल रही है। लीलाधारी पर दृष्टि रखो, लीला पर नहीं। लीला बदलने वाली चीज़ है, लीलाधारी स्थिर परमात्मा पुरुष है। लीला पर दृष्टि रखेंगे तो बातें भीतर जाती है। लीलाधारी पर दृष्टि रखो तो दिल में फरहत आती है। नूरानी नूर बरस्ता है। अपने प्रभु प्यारे का जहाँ-तहाँ दीदार होता है। जगत में परमात्मा ही है और कुछ नहीं। लीला पर गिनती करोगे, counting करोगे तो आप अपने भीतर भटक जाओगे। भटकना बंद करो और ब्रम्ह में टिकना शुरु करो। अब गुज़रा देह-अध्यास का ज़माना, आ गया निश्चय का ज़माना। निश्चय करो और अपने भीतर झांकी लगाके अपने ही भीतर सतगुरू का दीया जलाओ, आंसन बनाओ और जनम जीवन सफल करो।

।।है ही भगवान।।

24-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्मा पशंती आत्मा"

अपने आत्मा के निश्चय से ही तू सर्व को जान सकता है, सतगुरु को भी जान सकता है। ऐवड ऊंचे को ऊंचा करके जान। सतगुरु पहले दिन, पहला सबक देते हैं कि तू देह नहीं तू आत्मा है। अपने आत्म निष्ठा से वो जिज्ञासु को वाकिफ करते हैं, taste कराते हैं अपने निश्चय से, कि किस प्रकार ब्रम्ह में लीन होने से तू आनंदित हो जाता है। हर चीज से दूर, परमात्मा से मिलके 'एक' महसूस करना, संसार में रहते हुए संसार को भीतर ना लाना। सकल ते मद रयत, सकल ते उदास।

सतगुरु ने अपने निश्चय से थोड़ा सा कणा दे दिया और फिर जिज्ञासु अपने पुरुषार्थ से कण को मण बना ही देता है। जब तक तू अपनी आत्मा को नहीं पहचानता कि मैं ब्रह्म-स्वरूप हूँ, तब तक तू पूर्णता से अपने सतगुरु को भी पहचान नहीं सकता। Result ये आती है कि कभी मन चलता है, कभी बुद्धि चलती है, कभी disturb mind होते हैं। पर जे तू अपनी आत्मा को पकड़ता है, पहचानता है, तो सतगुरु से भी निभाना, प्रेम करना easy हो जाता है। और हर तरह से तू तृप्त रहता है, क्योंकि तूने अपनी आत्मा को जगाया।

अदे कई अब्बे कई, पर मु न कई, त कुच्छ भी न थियो (सिंधी दोहा)। सभी ने किया, सब आत्मा में आ गये, उससे मैं नहीं आया। पर मेरा पुरुषार्थ ही मेरी अपनी जीत है, कि मैं मन के उस पार चला गया और मन को भी साथी बना लिया, सर्व को भगवान देखकर अपना बना लिया, जगत मैल रहा नहीं, अब जगदीश ही जगदीश है, ब्रम्ह ही ब्रम्ह है। ना खोया, ना पाया, संषय मूल्य चुकाया।

।।है ही भगवान।।

25-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Negativity"

Negativity कितनी प्रकार की, कितनी तरफ से, आ ही जाती है। डरना नहीं है। Why fear, God is near ! लेकिन negativity का इलाज तो ढूंढना पड़ेगा ना। वह ढूंढो। हर वक्त खुद को साफ सुथरा रखो। गंदगी से negativity आती है। पांव को हर वक्त साफ सुथरा रखो, हाथों को गंदा न रखो। 

प्रेम हृदय में है, उसको राग-द्वेष के कारण मैला ना करो। Kitchen - खाना बनाना, खाना खिलाना, उसके बाद समापति। First काम किचन साफ करना। आलस ना करो। साफ-सुथरे kitchen में positive energy आती है, positive ख्याल आते हैं। पूरे घर में परिक्रमा दे दो। उधर की चीज उधर, उधर की चीज उधर। परिक्रमा देते-देते चार चीजें ले लो। जहां उसकी जगह है, वहां रखो। चादर ठीक रखो।मैलापन बाहर का, तेरे हृदय में भी मैलापन आ ही जाता है।  अपने बालों को बिखेरके न रखो। महसूस करो, बिखरे हुए ख्याल, बिखरे हुए बाल, तकलीफ देते हैं। जैसे ही तू बालों को ठीक रखेगा, ख्याल भी ठीक होते जाएंगे। 

Negative कोई डराने वाली चीज़ नहीं है, तुझे सँवारने वाली चीज है। खुद को सँवारो, तन को, मन को, व्यवहार को, घर को, रिश्तों को, तो negativity रहेगी नहीं। प्रेम में negativity रहती नहीं है। प्रेम है परमात्मा, परमात्मा प्रेम में आगे रहते हैं। फिर negative चीज तेरे पास कैसे आती हैं। सब negative, positive बन जाएगी। निश्चय रखो आत्मा का, त्याग वैराग में थोड़ा सा मन रखो। खींचा-तानी न करो, नसीब पर भरोसा रखो। अपने पुरुषार्थ को देवता मानो, तो देवताओं के भी आशीष तेरे प्रारब्ध, पुरुषार्थ पर होती है। सतगुरु तो करुणा के सागर हैं। वह तो करते ही रहते हैं। पर प्रकृति का कण-कण तुझे आशीष करेगा अगर तू अपनी रहेनी-कहणी थोड़ी सी ठीक करेगा तो।

।।है ही भगवान।।

26-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सुहाना समय"

सुहाना समय कब आता है ? जब तू सुहाना संकल्प करता है, सुंदर संकल्प करता है, अपनी वाणी से हर वक़्त अच्छा निकालता है। बुरा दिखाई दे, बुरा बोलें, बुरा सोचे, बुरा विचार करें, एक दूसरे पर थोप दें, इनके कारण उनके कारण, क्या अच्छी चीजों को संसार में ला सकते हैं ? शायद नहीं। पर जे तेरे मुख से हर वक़्त अच्छा निकले, बुरा देखकर भी अच्छे का इंतजार करो, बुरे के दुख उठाकर भी प्रेम की दुनिया में आओ और अच्छा संकल्प करो। 

Mood अच्छी रखो। तुर-तुर-तुर-तुर ते mood खराब करना ये सही नहीं है। अपने mood के मालिक बनो, गुलाम नहीं। अपनी रहनी-कहनी को, अपने मुख को, जहाँ माँ सरस्वती आपके लिए बसते हैं,  उसको गंदा न करो, तो अच्छा तो होना ही है। थोड़ी बहुत तकलीफें आती है संसार में। हम भी मानते हैं, हम भी देखते हैं। लेकिन तकलीफों के बाद सब अच्छा होगा यह संकल्प करो। तकलीफ चल रही है, चल रही है, चल रही है, यह चिंतन करने से तकलीफों को हम बढ़ाते जाते हैं। पर अच्छा हो रहा है, गुज़रान हो रहा है, सब ठीक चल रहा है, यही विचार करने से ह्दय में धीरज आता है, महाधीरज आता है, और तू हालातों से समझौता करने की शक्ति को प्राप्त करता है।    

हालत आती है, face तो करना ही है। किस प्रकार करें ? शुक्राने मानकर करेंगे कि शुकर है फिर भी यह तो है, शुकर है फिर भी इतना तो है, करेंगे इस प्रकार अगर, तो आने वाले समय के लिए हम अच्छी प्रेरणा रख पाते हैं। और प्रेरणा से ही, तेरे अच्छे संकल्प से ही, आने वाला कल पक्क अच्छा होगा। आशीष तो कुदरत की, देवताओं की, मनुष्य की अपने आदर्शों की भी आशीष होती है। आदर्शों को ठीक करो। वाणी को सही करो। अजाया सजाया बोल-बोल के, खुद को मैला मत करो।

।।है ही भगवान।।

27-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हस्ती-शक्ती हरी की"

हस्ती-शक्ती हरी की है, तेरी भावनाओं में, तो तू हलका-हलका होके रहता है। हस्ती-शक्ती अगर तेरे अहंकार की है, तो तू भारी-भरकम बन जाता है। हस्ती-शक्ती जब तेरी है तो तू हरवक्त success क्यों नहीं होता? हस्ती-शक्ती हरी की है तो तू success होता चलता है और कभी कोई चीज़ तेरे से टकराती है, तो हस्ती भगवान की तेरे को तुफानोंसे टकराने की शक्ती देती है।

अज्ञान की अपनी तेरी हस्ती-शक्ती तेरेको down करती है ओर तू किसी तूफान के आगे रुक नहीं सकता, ओर तकलीफ उठाता चला जाता है। हस्ती-शक्ती कण-कण वासी की है, घट-घट वासी की है, अपनी शक्ती को बढ़ाने के लिए, हर वक्त तुझे भगवान की हस्ती शक्ती में बरोसा रखना चाहिए, और उसीकी शक्ती मानके चलना चाहिए। देह की शक्ती, तेरे अपने अहंकार की शक्ती, वो आती है, जाती है, बदलती है। पर परमात्मा की शक्ती सदा कायम है और तुझे हर वक्त ऊंचा उठाती है। सबनी खां पद तुहिंजो ऊंचो, लालण आई लासानी, तू सहलानी, मां सहलानी ।

॥ है ही भगवान ॥

28-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"घट-घट वासी, कण-कण निवासी"

घट-घट वासी को अपने भीतर और बाहर, दाएं-बाएं देखो। परमात्मा दूर नहीं है। सो प्रभू दूर नहीं, वो प्रभू तू ही तो है। घट-घट वासी देखने से, तेरे भीतर की शक्ती बढ़ती है। अंदर भगवान देखने से तू शुध्दता और शुभता को प्राप्त करेगा। शुध्दता और शुभता से तेरी शक्ती बढ़ती है और उसी शक्ती से तू अपने आप को पहचान सकता है। मैंने अपने आप को जब पहचाना तो सारा संसार मुझे भगवान-भगवान ही दिखाई देता है। सर्व में पेखे भगवान। सब में वासा मेरे वासुदेव का है, ऐसा जानने से तू अपने ही भीतर एक अलौकिक ताकत को महसूस करेगा और वोही ताकत तू सर्व में बांटेगा।

।।है ही भगवान।।

29-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आज 29 एप्रैल, दादा भगवान की वरसी का दिन है"

सतगुरु से जो मिला वह कैसे भूलें। दादा भगवान ने जो कुर्बानियाँ की, संकल्प किए कि भारत सां भालँ बँलाईदां सीं, पाँणं जेंडियूँन खे जँगाईंदां सीं (सिंधी दोहा)। आज जो उन्होंने कहा, हृदय में उतर गया है और सभी को रहमत मिले यही संकल्प हम भी करते हैं। सबको मिले तेरी रहमतें, सबको मिले तेरी बक्षिसे। हे दाता, हे दादा, कभी कोई दिल उदास ना हो। तेरी सृष्टि में सब शाद और आबाद रहे यही हम संकल्प करते हैं। ज्ञान जो दादा भगवान ने दिया, अपनी तपस्या से, वो छल्ल निश्चय हर एक को मिले। हर एक राही को उसी निश्चय की जरूरत है कि तू देह नहीं, तू तो आत्मा है, तू अजर है, तू अमर है, तू अविनाशी है, तू ब्रम्ह स्वरुप है।

उसी निश्चय को करना है। सभी को करना है। अदे कई अब्बे कई, मुं न कई त कुच्छ न थियो (सिंधी दोहा), ऐसा भगवान का कहना है। उसी कहने के अनुसार तू आत्म-निश्चय कर और मन तू ज्योत स्वरुप है, अपने मन को ज्योती स्वरुप बना ले, तो अंधेरा तेरी जिंदगी में रहेगा नहीं। उजाले ही उजाले होंगे। सतगुरु के आने से आती बहारें हैं। आते उजाले हैं। दिल रोशन हो जाता है। दिल के रोशन होने से संसार में भी रोशनी फैलती रहती है, अंधेरे निकलते जाते हैं। Sprituality और आगे बढ़ेगी। दादा भगवान की आशीष से और ज्ञान बढ़ेगा और हमें उमंगो की भीतर ही भीतर बरकत पड़ेगी और ज्ञान की बारिश होती रहेगी।

।।है ही भगवान।।

30-Apr-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आदर्श"

एक सतगुरु का आदर्श - जो राहगीरों को राह दिखाके जनम-जीवन सफल कराते हैं। आप भी अपने आदर्शों में वही गुरु की झलक ढूंढे। तेरे आदर्शों में अगर सतगुरु की झलक है तो तेरे आदर्श से कहींयोंको उजाले मिलते हैं,आदर्श उनके भी बनते है। एक तू द्वैत जैसी, विखेप जैसी विष से न्यारा हो जाएगा तो संसार को भी तू न्यारा विष से कर सकता है।

।।है ही भगवान।।

May
01-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्रीत"

सच्ची प्रीत दिल से कभी नहीं निकलती, कभी नहीं जाती, कभी नहीं कम होती। वो भीतर सदा ही रहती है। बाहर निकालने का मौका मिला तो बाहर निकलती है, भीतर रखने का मौका मिला तो भीतर ही रहती है।भीतर रखने से भी प्रीत बढ़ती है। बाहर महिमा करने से भी शक्ति बढ़ती है। परमात्मा जिस रंग में रखे, उस रंग में रहना चाहिए।

"जीयं हलाई तूँ वाह वाह! हीयं भी सञण वाह वाह, हूअ भी सञण वाह वाह। हलाई त हलां, बिहाणीं त बस, मुहिंजी वाग् सञण तुहींजें वस" (सिंधी-दोहा)। जैसे भी चलाए वैसे चलो। जींह उथारे, जींह विह़ारे, आहे त उहोई न। है तो वोही। देखते हुए वोही देखता है, खाते हुए वोही खाता है, चलते हुए वोही चलता है, नैनों में नींद उसकी, कंठ में आवाज उसकी, दिल दिमाग में ख्याल उसके, हाथों में कर्म उसके, पांव में जो भी कदम उठते हैं, उसी के उठते हैं। बाकी तो उनके सिवाय पत्ता(leaf) भी नहीं हिलता। ऐसा अपने जीवन को लक्ष्य साधके रखो कि "करण-करावण हार स्वामी, सकल घटा के अंतर्यामी"।

।।है ही भगवान।।

02-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बनना है तो योगी बनो" 

योगी बनने से तेरी कर्म-कहानी पाक-पवित्र हो जाएगी। वरना देह-अध्यास कहीं ना कहीं पटक देता है, झटक देता है। योगी भावना परमात्मा से मिलाप करा देती है, तो तू गिरने से बच जाता है। साथ सतगुरु है तो तू कहीं गिर नहीं सकता, पर तू जब अपने भीतर सतगुरु का एहसास रख तो। गुरु body नहीं है, जो एक जगह गुरु- दूसरी जगह तू। पर गुरु वो एहसास है जो सदा तेरे साथ है। तू जे जिज्ञासु है तो तू भी उड़ता पंछी है, जो तू हर वक्त सतगुरु के पास उड़-उड़ कर पहुंच जाता ही है, मीठी लगन सतगुरु से जब लगती है। लगन तो है, लेकिन मीठी लगन। मीठी लगन होती है तो गुरु की वाणी, गुरु के  दृश्य, गुरु का आदर्श, हर चीज में तेरे को मिठास आता है। वरना मन कहीं ना कहीं कोई ना कोई किट-किट लेके बैठेगा। अपनी लगन की quality को ठीक करो और सद्गुरु को हर वक्त अपने साथ में रखो तो तेरा बेड़ा पार है। मिल गया! भगवान मुझे मिल गया। अपने आप में तू ऐसा विश्वास रख।

।।है ही भगवान।।

03-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरी इको ही झलक मेरे लखांदी मरज़"

सतगुरु की एक झलक तेरे कितने सारे मर्ज़ को, बीमारी को, तकलीफ को खत्म कर देती है। गुरु तू न मिलता तो क्या होता! तू न जगाता तो मैं सोता! गुरु त मुहिंजो मिंठ्हडों आहे, राम थो ङेखारे, बिय़ाआई जो परदो लाए, प्यार सेखारे। ठँप्पे करे थो ठाहै। पर गुरु त मुहिंजों मिंठ्हडों आँहे, रांम थो ढ़ेखारे (सिंधी-दोह़ा)। सतगुरु के वचन राम दिखाते हैं, भगवान दिखा देते हैं।वचनों पर कोई खाली चलता रहे। अपने में आनंद को देखता रहे, तो कोई तकलीफ दूर नहीं है। सब तकलीफ नजदीक होके फिर तकलीफों का सामना भी हो सकता है। उहा खबर को लहंदो शेर असूलं में मां आँहींया केर (सिंधी-दोह़ा)। वो ही पता सतगुरु ने पहले दिन बता दीयाा कि मैं देह नहीं ब्रम्ह-स्वरूप हूँ। एक ही खबर है जो शरीर को, तन को, मन को सुख देती रहती है कि तू शरीर नहीं है।

।।है ही भगवान।।

04-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हस्ती-शक्ती हरी की"

हरी की हस्ती-शक्ती सिध्द करने से तेरी हस्ती-शक्ती सामने आती है। इसलिए हर वक्त हस्ती-शक्ती अपने हरी की रखकर आगे रहना चाहीए। कण-कण वासी, घट-घट निवासी जब तू उसको हाज़िर-नाज़िर महसूस करेगा, उसका एहसास रखेगा, तो कण-कण वासी की शक्ती तेरे पास आती है। जे तू भगवान की हस्ती-शक्ती को नहीं समझता, तो तेरे पास हस्ती-शक्ती देह की रहती है। देह की हस्ती-शक्ती से तो आत्मा की हस्ती-शक्ती आती नहीं ना। इसलिए अपने देह की हस्ती-शक्ती जो बदलनेवाली है, तकलीफ देनेवाली है, उसको मिटाओ और आत्मा की हस्ती-शक्ती को आगे जागरणं करो। तेरा बेड़ा तब पार हो सकता है जब तू अपना दीया जलाएगा। अदे कईं अब्बे कईं, मुं न कईं त केंहं भी न कईं (सिंधी दोहा)। बहुत अच्छा। 

॥ है ही भगवान।।

05-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“बेखबरी”

बेखबरी में जो सुख है वो खबर में कहाँ ! खबरों में कहानियाँ है, परपंच है तू-मां है। बेखबरी में नशा है आत्मा का, प्यार है हर एक के लिए और ज्ञान है जो तू निश्चय करके, सबको बेखबरी में लाके खड़ा करता है। बेखबरी में कोई कर्म नहीं बनता, खबर पड़ी तो कर्म बन जाते है। बेखबरी में तेरी आत्मिक उन्नती और संसार की उन्नती भी होती है। 

॥ है ही भगवान।।

06-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आवाज एक "

जहाँ भी आप रुकते हो, जिस angle पर हो, जो कार्य हाथ में लिया है, सब के साथ आवाज मिलानी है। ये ना सोचो कि मेरे साथ आवाज कोई मिलाए, पर तू खुद आपनी आवाज उनकी आवाज के साथ मिलाता चल। प्रेम की गंगा लुटाता चल। 

॥ है ही भगवान॥

07-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सुहाना सफर"

सफर सुहाना बनाना है हम सबको। सुहाना सफर तब हो सकता है, जब तेरे भीतर त्याग-वैराग है, निश्चय है, सात्विकता है। सुहाना सफर बनाने के लिए सतोगुण ज़रुरी है, सतोगुण में धीरज होता है, और धीरज में बिगड़ी बाते अवश्य बनती है। बात जब बिगड़ जाए, कोई हालत आ जाए, वो देते साथ सदा, वो है कृपानिधान। गुरु कृपानिधान है। गुरु ने हँसीन कर्म करके कृपा लुटाई और मैंने पात्र बनके झोली फैलाई, कृपा झोली में आ गई। अब उनकी कृपा और मेरी जिज्ञासा दोनों मिलके बना मेरा निश्चय। जब निश्चय हुआ तो कृपानिधान का बच्चा खुद भी कृपालू बन जाता है और धीरज के जहाज़ पर सबको बिठा देता है। जो उसके संग में आया, धीरज पकड़ाके निश्चय करा दिया। 

।। है ही भगवान।।

08-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"समर्पण"

जब तक समर्पण भाव जिज्ञासु में आता नहीं, तब तक जिज्ञासु soft बनता नहीं। जब तक soft नहीं बनेगा, आत्म-निश्चय टिकेगा नहीं। कितना भी यत्न करलो पर जब तक समर्पण भाव तेरे भीतर नहीं आएगा, तब तक ज्ञान बताने और सुनाने/ सुनने तक सीमित रहेगा। Practical में आ नहीं सकता। जब तू अपने को disolve करता है, तब जाके देह अध्यास की कडियाँ, जन्मों-जन्मों के देह-अध्यास की धुनी, तेरे मन की किट-किट, तेरे भीतर नस-नस का अहंकार, जाएगा नहीं। ये सब जब जाएँगे नहीं, तो आत्म-निष्ठी तू कैसे बन सकता है। कितनी भी चतुराई करो वाणी की, कितनी चालाकी करो मन से, कितना भी खुद को उँचा मानो, फिर भी आत्म-निश्चय सतगुरु के ख्याल से ख्याल मिला के चलने के सिवाय नहीं होगा। श्रध्दावानम् लबते ज्ञानम्। जहाँ समर्पण भाव नहीं है, वहाँ श्रध्दा की कोई जगह ही नहीं है। 

॥ है ही भगवान।।

09-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अटूट विश्वास"

अटूट विश्वास जिज्ञासु का रास्ता बनाने वाला राहगीर है। विश्वास अटूट नहीं, तो रास्ता नहीं। भटक जाता है जिज्ञासु - कभी अपने बुद्धि में, कभी अपने अहंकार में, कभी स्वभाव में उलझ जाता है, कभी पुराने उसूलों में अटक जाता है। कभी दूसरों के दलीलों में, कभी खुद के Discussion में। लेकीन उलझता जरूर है। उलझन इतनी बढ़ जाती है जो इतना अंधेरा छा जाता है, अटूट विश्वास कब अविश्वास बन जाता है, पता भी नहीं मनुष्य को पड़ता। यह हैरानगी की बात है। मुख में विश्वास - मन में कुबुद्धि, मुख में श्रद्धा - मन में अपनी मर्जी, मुख में ज्ञान:ध्यान:स्नान - अंदर में अंतर व्यापे लोभ-स्वान। कब कैसे कितनीं Changes तेरे में आ जाती है तेरे को ही उसका पता नहीं पड़ता। जैसे नींद में घूस्स(चुहाः) मीठी फूँक देके तेरा कितना सारा मांस पाँव के एड़ियों का खा जाती है, क्या तुझे पता पड़ता है? ऐसे ही तेरा विचलित मन, तेरी energy, तेरी अश्रद्धा, तेरी तकलीफ बन जाती है और अश्रद्धा में, अविश्वास में, तू जी नहीं सकता। अकेलेपन का साँग रचाता है। साँग भी साँगी तू कितना रचाएगा ? आखिर एक दिन तो सत्य में आना ही पड़ेगा। अब नहीं तो कब नहीं। 

॥ है ही भगवान।।

10-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु torch"

सतगुरु torch एक miracle है। मन मोड़ने की, मन को तृप्त रखने के लिए, एक जादू की छड़ी है। सतगुरु torch के सहारे चलने वाले बच्चे कभी ठोकर नहीं खाते। वो तो गिरकर भी संभल जाते है। अंधे मनुष्य को भी सतगुरु torch पकड़ा दो, वो भी इस प्रकार चल सकता है जैसे उसको भीतर की आँख तो मिल गई, पर बाहर की आँख भी मिल गई है। अश्रध्दालू नाश्-जाँणं - अश्रध्दालू को भी सतगुरु torch अगर हाथ में आ गई,उस torch से कार्य कर दिया, तो कस नहीं खाएगा। कस लगती नहीं, कस मिलती नहीं। हमेशा अच्छा होता है, उसके लिए जो गुरु torch साथ लेके चलते है।

॥ है ही भगवान॥

11-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मन के उस पार"

देह अध्यास में तू मन के एक तरफ चलता है - जो तरफ तुझे खड्डे और खाईयों में गिरा देता है। पर गुरु ज्ञान से तू मन के उस पार चला जाएगा जहाँ हर खड्डा हर खाई प्लेटफॉर्म बन जाती है। आपको कुछ करना नहीं पड़ता पर बात को समझना पड़ता है। बात को समझते चलो, What is What, तो आप मन के उस पार चले जाओगे। जहाँ कोई गम नहीं, कोई दुख नहीं, कोई रंजिश नहीं । बस प्रेम ही प्रेम, प्रेम ही प्रेम है। ऐसी प्रेम की दुनिया बनाओ कि हम प्रेम नगर में रहते हैं जो बन आए सब देखते रहते हैं। अपनी चलाओ नहीं, खाली अपनी तरफ दृष्टी रखो।

।।है ही भगवान।।

12-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इंद्रियों का राजा - मन"

मन बहुत ही अच्छा है। जब तू देह-अध्यास में है तो मन को बुरा बना देता है। जब तू गुरु ज्ञान लेकर आत्म-भाव में आता है तो मन को ज्योत-स्वरूप बना देता है। तेरे हाथ में है। तू उसको जैसा बना वैसा वों बनता है, तेरे हाथ में है"। मन को सतगुरु के किले से बाँध लो वरना मन नहीं मानेगा। बाँध लो प्रेम बंधन में, प्रेम डोरी से बाँध लो। यह बंधन अच्छाबंधन है। मुझको भी सुहाता है बंधन कभी-कभी। तो तेरे को बंधन कितना अच्छा लगेगा। लेकिन तू आलसी है। मन देने के लिए भी तू आलस करता है। मन बेचे सतगुरु के पास, उस शेवक के कार्ज - रास। ज्ञान गुरु का हृदय से ना भुलो, वरना मन से धोखा, धोखा, धोखा ही है। 

॥ है ही भगवान॥

13-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“आश्चर्य"

आश्चर्य अज्ञान का रूप है। अज्ञान है तो आश्चर्य है। ज्ञान में तू आश्चर्य नहीं करता। ज्ञान में तू निश्चय करता है। बातें सुनके तू आश्चर्य नहीं करता, बातें सुनके तू रास्ता निकालता है। आश्चर्य अपनी आत्मा पर करो तो तेरा आश्चर्य सफल आश्चर्य है। अपनी आत्मा पर करो आश्चर्य कि यह कैसे जीव से न्यारी है। संसारी पदार्थों में जब आश्चर्य लगता है तो अंधेरा बड़़ता है। आश्चर्य ना लगे तो दुनिया में तेरा बेड़ा पार है। परमात्मा की बूंद-बूंद तेरे को आशीष दे रही है कि तू अपने में रह़ो और साक्षी-भाव में रह़ो। हर तरह से फिट हो जा। फिट हो सकते हो फिट हो जाओ। आश्चर्य न करो, बाकी है ही भगवान।

।।है ही भगवान।।

14-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अमृत वेला (Early Morning)"

अमृत वेले का आनंद जो मनुष्य जन्म में नहीं लिया, तो जन्म व्यर्थ (waste) है। अमृत वेले को मन में ऐसी एक शक्ति आती है, जो तू खुद को ऊँचे पद पर महसूस करता है। जो पद है तेरी अपनी आत्मा का पद - ब्रह्मपद। हर वक्त अमृत वेले का आनंद लेने के बाद तेरे को हर जगह परमात्मा दिखाई देगा। शक्ति का भंडार तू बन जाएगा। जहां भी बैठते हो वहां एक नई शक्ति के साथ बैठते ह़ो और उठते ह़ो। अमृत वेले को महसूस करने के बाद जब तू उठता है तो भक्ति से उठता है। शक्ति और भक्ति का भंडार है अमृतवेला।

।।है ही भगवान।।

15-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

" नेम, ट़ेम और प्रेम "

नेम, ट़ेम और प्रेम - जिज्ञासु के लिए ये तीन नियम हैं, बहुत अच्छे हैं। पहले तू नियम से सत्संग में आता है, फिर time समझकर time पर पहुँचता है| उसके बाद प्रेम की शुरुआत भी होती है। एक वारी प्रेम की शुरुआत हो गई तो तेरे लिए अलौकिक जीवन है, आनंद ही आनंद है। ऐसा जीवन जो खुद आत्म-रस में तू रहेगा, औरोंको भी आत्म-रस में डूबाते चलेगा। आत्म-रस कभी नहीं खुट्टता | हर वक्त रहता ही है | ऐसे आत्म-रस की तलब करो और उसको प्राप्त करो| तेरे ही अन्दर भीतर की चीज है, तुझे मिल जाएगी। 

॥ है ही भगवान।।

16-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एकांत का आनंद"

एकांत का आनंद आता है - जिज्ञासु को। वरना एकांत तो खलती है। तू जिज्ञासु है तो एकांत पसंद है। लेकिन एकांत का फायदा कितना हुआ? निश्चेय में power कितना आया? एकांत में बैठकर मन में संकल्प-विकल्प किए या नहीं ? किए तो कौन से किए? अपने से पूछो, अपने से हिसाब लो। एकांत में सहज समाधि होनी चाहिए। एकांत में ही खोट्टे (व्यर्थ) ख्यालों को study करके cut करने चाहिए। एकांत में जो काम होता है, सवेरे अमृत- वेले (Early Morning) जो यह काम होता है, वह कभी नहीं होता। अमृतवेला साचा नाम।

॥ है ही भगवान॥

17-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पुरुषार्थ (पुरुष के अर्थ)"

भीतर का पुरुषार्थ, बाहर का पुरुषार्थ - very easy। बाहर का पुरुषार्थ- तू कर्म करता है, मजा लूटता है। खुश रखता है खुद को, औरोंको भी खुशी मिलती ही है। लेकिन भीतर का पुरुषार्थ, उसका क्या? भीतर का पुरुषार्थ जब होगा तो उसका effect यही है कि गुरु (तेरे सतगुरु) और तेरे मन के ख्यालों में भेद नहीं रहेगा। ख्याल तेरे और सतगुरु के एक हो जाएँगे जैसे घड़ी में १२:०० बजे दोनों सुइयाँ एक दूसरे में छुप जाती है। वैसे तेरे ख्याल, तेरे सतगुरु के ख्यालों में छुप जाएँगे। अब यूँ न कहो कि मेरे नहीं छुप्पते हैं, तो सतगुरु के छुप्पेे। गुरु के नहीं छुप्पते। गुरु का ख्याल आवाज आसमानी है। अपने ख्यालों को treatment देते चलो। उनकी बीमारी का पता रखो। उसके बीमारी का तू doctor बन जा। अपने ख्यालों की repairing कर। तो ही तू सतगुरु से मिलके एक हो सकता है। अगर ये न हुआ तो दूसरा रास्ता है ही नहीं।

॥ है ही भगवान॥

18-May-2016

 

।।परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

*Setting*

 

जितनी तू setting करता रहता है, उतना ही तू upset हो ही जाता है । लेकिन तुझे ये एहसास हाथ में नहीं आता कि इस प्रकार हर चीज़ को, हर बात को ढीला छोड़ दो । काम लेना है तो नम्रता से लो, हठ से ना लो। काम लेना है तो झुकाव से लो, अहिंकार से ना लो । काम लेना है तो प्यार से लो, तकरार से ना लो । 

 

जितना तू भीतर खुद को अपने अहिंकार में डुबाएगा, उतना ही तू अपनी आत्मा से दूर होता चला जाएगा । इसीलिए संभाल करनी है अपनी वृति की, कि कहीं वह पलटा न खाए, वह आत्मा का रस छोड़कर अहिंकार के रस में डूब ना जाए । संभाल करनी है, लाज रखनी है, पत रखनी है, अपने जिज्ञासु भावनाओं की; जिज्ञासु की भावना यही होती है कि अम्मा रेहजी कीया इन्दो, इहो सांग फकीरी जो सुलाहो किया थींदो ।

 

।। है ही भगवान ।।

19-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ईश्वर को सिद्ध करना"

ईश्वर को सिद्ध करने के लिए तेरा यह जन्म हुआ है। सतगुरु ने तुझे यह जीवन दिया है। इस जन्म में अगर तू ईश्वर को सिद्ध नहीं करता ! ईश्वर सिद्ध कैसे होगा - वो तेरे आदर्श से होगा, तेरे मीठी वाणी से होगा, तेरे भीतर ऊँची भावनाएँ, उससे होगा, ईश्वर सिद्ध बाहर से एक दूसरे के लिए भाई चारे में होगा, ईश्वर सिद्ध गुरु मर्यादा से होता है।

मर्यादा नहीं तो मनुष्य जिंदा होके भी मरा पड़ा है। पर जे मर्यादा उसने अपने जीवन में की, तो मर भी गया तो दिलों में राज करता है। क्योंकि वो भगवान भी है इस धरती का और मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर मर्यादाओं में भी रहता है। अपने परिवार में भी वो श्रृंगार है। भक्तों की दुनिया में वो सुंदर बिंदिया है। अपने देह की देह अध्यास छोड़के, आत्मभाव के दुनिया में भी वो श्रद्धालु बनकर अपने को तृप्त, ख़ुश रख्ता है। अब आप अपने में खुद ही ढूंढो और अपने में practical ईच्छा रखो कि मैं किस प्रकार practical बनूं।

।।है ही भगवान।।

20-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्मविश्वास (Self-Confidence)"

आत्मविश्वास के कमी के कारण, तेरे भीतर आत्मा की उन्नति होती नहीं है। आत्मविश्वास के बिना  तू भीतर झाँक ही नहीं सकता, अंतर्मुखी हो ही नहीं सकता, अपनी गलती को ढूंढ नहीं सकता, अगर ढूंढ भी लिया तो मान नहीं सकता, मान भी लिया तो बना नहीं सकता, बना नहीं सकता तो दूसरे पर थोपता है। ये एक देहअध्यास के मनुष्य के चरित्र हैं। जो चरित्र तुझे चालाक तो बना देंगे लेकिन चतुर्भुज नहीं बनाएंगे। तेरा जनम/जीवन सफल चालाक बनने में नहीं चतुर्भुज बनने में है।इसलिए अपने जीवन की कथा अपने आत्मविश्वास से सींचो। आत्मविश्वास को पहचानो। 

तू देह के अहंकार को आत्मविश्वास समझता है, यह जिंदगी की बहुत ब़डी, भारी भूल है। जो ऐसी भूल करते हैं वह एक बार समय हाथ से निकल जाता है, समय देवता की कृपा हाथ से खिसक्क जाती है, तो उसके बाद no chance। Chance नहीं मिलता खुद को ठीक करने का, खुद को सुधारने का, खुद को सँवारने का। Chance कुदरत घड़ी-घड़ी नहीं देती। इसलिए अगर कुदरत Chance देती है तो ले लो। वरना बिना Chance के तू बन नहीं सकता। फिर तू कितना भी चाहे। इसलिए अपने ऊपर कर सकते हो तो कृपा करो। "किर त पाईं" (सिंधी दोहा)

॥है ही भगवान ॥

21-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्म-धाम, आत्म-नगरी, आत्म-घाट"

सभी सुख तेरी अपनी आत्मा में है। जो नर इस पद से चूके, आए-जाए, जन्म-मरण में आता है, दुख-सुख पाता है। पर जे इस पद पर तू म़जबूती से बैठ गया, तो तेरे लिए ना दुख बना, ना सुख बना, ना मान-अपमान, ना मिलन-जुदाई, ना द्वैत-अद्वैत। तेरे लिए कुछ बना ही नहीं। बस एक ही आत्मभाव। एक आत्म का दीदार। एक आत्मा का निश्चय, एक निश्चय हो जाए, सारे बंधन टूट जाए। मन के बंधनों के कारण तू कितना खफ्फे है। तुझे कहाँ पता पड़ता है!  गुरु को मालुम पड़ता है कि मेरा बच्चा कितना खफ्फे है। उतारना चाहू खफ्फा, उतार नहीं सकता। क्योंकि तू द्वैत से बंधन में है। अद्वैत आत्मा से दूर है। 

उल्टी तेरी चाल है, उल्टी तेरी वाणी है, उल्टा तेरा स्वभाव है। हर चीज अगर मनुष्य की उलटी होवे, तो सीधा उसको कैसे कर सकते हैं? जब तक तू न चाहेगा तो तू सीधा हो नहीं सकता। उल्टी चाल में ज्ञान मिल नहीं सकता, निष्काम प्रेम आ नहीं सकता। तो फिर खाली सा खाली, अधूरा सा अधूरा ही रहेगा। बस, आएं-जाएं दुख पाएगा। देह-अध्यास के दुख-सुख भोगेगा। पर देह-अध्यास से उपर उठने के लिए, तू आत्म-चिंतन करने के लिए, बेकरार नहीं होता। काबू में है तू अपने देह के। हम कहते हैं काबू हो जाओ अपनी आत्मा के। अब इतना बड़ा फर्क तू जब लेके बैठता है, तो तू अपने आत्मा का सुख कैसे ले सकता है। Please अपने आत्मा का सुख लेना जानो। अगर नहीं लिया है तो अब तो ले लो। अब तो ये तू अरदास कर, कि आत्मरस के पीने वाले मुझे रस पिला दे।

।।है ही भगवान।।

22-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सुखसागर"

संसार - गुरु वचनों के हिसाब से सुख सागर है। पर देह-अध्यास के कारण तूने दुख-सागर बना दिया है। देह-अध्यास को छोड़ो, गुरु वचनों को पकड़ो। दुख सागर में डुबकियाँ देने से तो अच्छा है, सुख सागर में तैरते रहो।तैरना कौन जानता है ? दुख-सागर को सुख-सागर कौन बना सकता है ? - एक सतगुरु।

अथा दुख, एक सच्चा सुख, ले सकते हो तो ले लो। तू दुखों को लेना पसंद करता है, पर उस सच्चे सुख को लेना पसंद नहीं करता - जो सुख आए फिर नहीं जाता है।क्षणभंगुर सुख, उसके पीछे तू दौड़ता रहता है, निभा भी नहीं सकता, लेकिन अंधी दौड़ तेरी खत्म नहीं होती। सच्चे सुख की तलाश, सतगुरु के वचनों से होती है। उस सुख की तलाश करो, उस सुख को प्राप्त करो। ऐसे सुख में खुद रहो, औंरोंको को रहने दो। तब तू भाग्यशाली बनेगा। आत्म-निश्चय वाला तू बन सकता है।

आत्मरस को पियो,आत्मरस अमरता को प्राप्त कराता है। देह से छुड़ाके मोक्ष की प्राप्ति देता है। आत्मरस,  अतृप्ति छोड़के, तू तृप्ति में आ जाऐगा, जब तू ये रस पिएगा। छोड़ अमीं रस, विषय ज़हर तो खाता है। अब विषय ज़हर को छोड़कर, तू अमृत का पान कर।

॥ है ही भगवान ॥

22-May-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कुदरत"

कुदरत कुदरत कुदरत मां प्रकृति असको सलाम ही सलाम , कितनी बार सलाम ये नहीं कह सकती हूं , हम ये कहेंगे कि तुझ को मेरा सलाम, हे सतगुरु शुक्रने है तेरे तूने कुदरत से प्यार सिखाया, कुदरत के करीब किया, आज भी मैहर की है ,कुदरत की गोदी में डाल ही दिया है। जहां देखूं जहां नजर करूं बस तू ही तू है , दाएं देखू, बाई देखू , ऊपर देखू , नीचे देखू , नजर तू ही आ वंदा, पंछियों की चूचू में , पेड़ पौधों की खरखराट में , हवाओं के झूमने में बस एक तू ही दिखता , कुदरत को प्यार करने वाला , कुदरत खींचकर अपने करीब रखती है, अपनी गोदी में रखती है यह हम महसूस कर रहे हैं, कुदरत को प्यार करो कुदरत अपनी चदर से तुझे ढक देगी अपने आंचल में तुझे पनाह देगी अपने और करीब करेगी तो दिनों दिन अपनी जिंदगी में अपनी सतगुरु की कुदरत में छाया रहेगा , पते पते से प्यार, जरे जरे से प्यार कण-कण से प्यार झूम रहा है मन आज किसको ना प्यार करूं आज गुरु कुदरत का धनी है कुदरत में समाया हुआ है महसूस करो गुरु मेरे साथ है मैं गुरु के साथ हूं यही मेरी आज की उमंग है , सबकी आसीसे से मन सदा जवान रहे बरकरार रहे थिर रहे।


॥ है ही भगवान ॥

23-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्यार और मोह"

मोह, ममता अच्छी चीज़ है, बुरी नहीं है। लेकिन balance न होने के कारण, मोह में तू possess होता भी है, करता भी है। प्रेम अलौकिक है। अगर वास्तव में, प्रेम तेरा प्रेम है, तो अलौकिक है। तू कहता है, प्रेम अंधा होता है। हम कहते हैं प्रेम को तीजा-नेत्र भी है। आँखे तो है ही दो, लेकिन प्रेम को तीजा-नेत्र है। उसमें सुजागी है। जिस स्थिति में सुजागी नहीं, अंधी है, वह स्थिति प्रेम की नहीं है। वह स्थिति तेरे मोह ममता की है।

प्रेम में मनुष्य रास्ते खुद के लिए भी निकलता है, औरों के लिए भी निकलता है। मोह में रास्ते बंद करना जानता है। प्रेम में तू तृप्त रहता है, मोह की स्थिति में सदाई अतृप्त रहता है। प्रेम- त्याग और बलिदान पर खड़ा है, मोह तेरा स्वार्थ और इच्छा पर रुका हुआ है। तू कहता है प्रेम हो जाता है। हम कहते हैं, जो तेरा प्रेम हो जाता है, वह प्रेम नहीं है। कहीं ना कहीं छुपी इच्छाा है, कहीं ना कहीं छुपा सुख है। पर तू कहता है मुझे प्रेम है। छुपी इच्छा को पहचाना नहीं और अपने temporary emotions को प्रेम का नाम दे दिया।

अब यह भी तो खड्डे बन जाएंगे। जो प्रेम है नहीं वह प्रेम तू सोचता है - वह मोह है, इच्छा है, तेरी वासना है। वासना को कभी प्रेम ना कहो। क्योंकि प्रेम परमात्मा है। इसमें इच्छा-वासना आ नहीं सकती। संसार में भी जो तू प्रेम कहता है, उसको ध्यान से देखेगा तो वह बहुत हद तक temporary emotions हैं, जो तुझे कभी न कभी, किसी न किसी खड्डों में गिराते हैं, इच्छा में गिराते हैं, पथभ्रष्ट करते हैं, जल्दबाजी देते हैं। तेरे temporary emotions तेरे को जल्दबाजी देते हैं और जल्दबाजी में तू अपनी जिंदगी बना नहीं सकता, खराब कर सकता है। लेकिन प्रेम में धीरज है, शांती है, relax है। प्रेम को अपनाओ, प्रेम को ले लो। परमात्मा साथ रहेगा, हमारी यही दुआ है।

।।है ही भगवान।।

23-May-2018

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

अपनी जिंदगी में प्रभु प्रेम की साईन कर ,दो प्रेम की दुनिया में कभी कस नहीं लगेगी , खुद का प्रेम जब तेरा तेरे साथ है तो परिवार का प्रेम भी तेरे साथ है, परिवार का प्रेम तेरे साथ है तो संसार का प्रेम भी तेरे पास ही है, प्रेम तेरा सच्चा साथी है ,प्रेम तेरा भगवान है, प्रेम तेरा सतगुरु है, प्रेम ही तेरा सब कुछ है , प्रेम तू कर सकता है दे भी सकता है ले भी सकता है बस एक ही दा्त
है जब तेरी स्थिति यह हो जाए कि दि्ठो सब विसार अण दि्ठे खे याद कर जब तू देखा हुआ सब भूल जाता है तो ही तो परमात्मा को देख सकता है ।

॥ है ही भगवान ॥

24-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एक ही नूर"

एक नूर से सब जग उपजे। एक ही परमात्मा का नूर है। पर किसको महसूस होता है? किसको एहसास आता है? - जो अपनी दृष्टि-दोष से मुक्त है, उसको एक ही नूर दिखाई देता है, महसूस होता है। एक नूर से परमात्मा व्यापक है। शक्ति एक है। भीतर जाओ, अंतर्मुखी हो जाओ, तो ही तुझे शक्ति का अहसास होगा। कैसे मैं उठता हूँ, तो वो साथ है। बैठता हूँ तो वो साथ है। खाता हूँ तो साथ है। बात करता हूँ तो कंठ में वही समाए हैं। देखता हूँ तो दृष्टि में वही है।

हर चीज में, हर बात में, प्रेम ही प्रेम है। और एक ही नूर है। एक नूर से जब तू संसार को देखेगा तो तेरी दृष्टी अलग ही होगी। कहीं कोई द्वैत नहीं, द्वेष नहीं, विखेप नहीं, तू-मां नहीं और कहीं कोई राग-द्वेष की दीवारें भी नहीं। तोड़ दो सब दीवारें। जंज़ीरों से जकड़े हुए हो राग-द्वेष के। अब वक्त आया है, तोड़ दो सब दीवारें और एक नूर परमात्मा का महसूस करो। सबसे भाईचारा करो। सब तो अपने ही हैं। निश्चय करो आत्मा का, तो लगने लगेंगे सब अपने। कोई पराया महसूस ना होगा। महसूस एक ही नूर होगा, एक ही खुदा होगा, एक भगवान होगा।

।।है ही भगवान।।

25-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“हठ - यानी ज़िद”

हठ्ठी मनुष्य जे अपना हठ छोड़कर जीना शुरु करे तो जीवन अलौकिक है। हठ से जिया जीवन, जीवन हाथ ना आया। दिन तो गुज़रे, रातें भी गुज़री, सब हो भी गया, कोई कार्य न रुका, जैसे तूने चाहा वैसे हुआ, पर फिर भी जीना नसीब नहीं। क्योंकि हठ का कुंडा तेरे भीतर है। वो तुझे हर चीज़ दे तो सकता है, हठ से तू प्राप्त कर सकता है, लेकिन relax नहीं देगा, softness नहीं देगा, आत्म-निश्चय नहीं देगा, त्याग-वैराग कभी नहीं आएगा, सबसे प्रेम करने वाली स्थिति - उससे तू बेखबर रहेगा। दूर दूर तक तुझे प्रेम का एहसास आ ही नहीं सकता। आता है तो बस अपना अहंकार, अपना हठ, अपनी ज़िद, अपनी मर्ज़ी।

जो मनुष्य इस प्रकार ज़िंदा रहते हैं, वह कितने loss में, कितने नुकसान में जाते हैं उनको ही पता नहीं पड़ता। पर जो नम्र भाव में, आत्म निश्चय में, त्याग वैराग्य में, सतगुरु वचनों के सहारे जीते हैं, वह कितना अलौकिक जीवन जीते हैं वह खुद जानते हैं। अच्छा जीवन जियो। अलौकिक जीवन है, तो तू अहंकार वाला जीवन जीने के लिए क्यों मजबूर बनता है। एक तरफ जीवन तुझे मजबूर बना देता है, एक तरफ मज़बूत। फैसला तेरे हाथ में है।

।। है ही भगवान।।

26-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गाड़ी"

एक तेरे सफर करने वाली गाड़ी,  एक तेरे जीवन की गाड़ी। किसकी कीमत? किसकी ज़रुरत? तेरे सफर करने वाली गाड़ी को तू कितना ध्यान देता है। समय पर garage में भेजता है, समय पर उसको बराबर petrol देकर खाना खिलाता है। हर चीज़ का ध्यान तू अपनी गाड़ी का करता है। लेकिन क्या आपने अपने जीवन यात्रा की गाड़ी का उतना भी ध्यान किया? - नहीं ! अपने जीवन को सतगुरु के garage में भेजा? गुरु वचनों से petrol भरा ? गुरु प्रेम से उसको, अपने जीवन यात्रा की गाड़ी को, गुरु प्रेम से maintain किया?

जीवन यात्रा की गाड़ी किस प्रकार अच्छी रह सकती है, यह आप खुद सोचो। तेरे सफर की गाड़ी को petrol और पानी चाहिए, हवा चाहिए, तो जीवन यात्रा की गाड़ी को क्या चाहिए? खुद सोचो ! उसको भी अगर वह चीज़ें ना मिली तो जीवन यात्रा की गाड़ी तेरी रुक जाएगी और जीवन में तकलीफ आएगी। अपने आत्मा के निश्चय से तू हर चीज़ सही कर सकता है, all rounder बन सकता है। हर गाड़ी को, हर हालत को, हर स्थिति को तू बराबर face कर सकता है, उसका ध्यान रख सकता है। लेकिन चाहिए क्या ? - आत्मनिश्चय, आत्मविश्वास और आत्मप्रेम।

।। है ही भगवान।।

27-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मुरली"

भगवान श्री कृष्ण की मुरली, क्या है बोले, प्रेम-प्रेम-प्रेम !

दादी भगवान की मुरली, क्या है बोले, प्रेम-प्रेम-प्रेम !

मुरली इतने अच्छे सुर कैसे निकाल सकती है? है तो simple, सोचने वाली बात है, उसने खुद को फक्त खाली करके रखा है। खाली है तो सुर निकलते हैं। लेकिन सुर निकालने वाला कृष्ण भगवान की तरह सुर निकाले, आज भी निकलेंगे। खाली हो जाए अगर मनुष्य, तो मनुष्य से भी कई अच्छे सुर निकल सकते हैं।

मीठा बोल सकता है, सही बोल सकता है, control में बोल सकता है। एक दूसरे को ऐसी वाणी देके balance करा सकता है। लेकिन मुरली की तरह, खाली होवे ना। खाली नहीं है तो कोई सुर मनुष्य का निकलता नहीं है। जहाँ आया वहाँ बोल दिया, जैसा आया वैसा ही बोल दिया। आगे ना सोचा, पीछे ना सोचा। ना अपने हृदय को देखा, ना दूसरे के ह्दय को देखा कि चोट कहाँ लगी।

ऐसे कुछ मनुष्य की हलत-चलत होनी चाहिए, जो चोट ना उसको खुद को लगे, ना उसके सामने वाले को। ऐसा भी हो सकता है, लेकिन कोई ध्यान दे, गुरु से वसूली करे, तो easy हो सकता है। खुद की मगज़मारी करेगा तो रोज़-रोज़ out होता है मनुष्य, रोज़-रोज़ फिर तैयार होता है, आगे के लिए नहीं करुंगा, फिर मन कोई न कोई मुसीबत ले लेता है। इसीलिए, गुरु वचनों को रखना संभाल के, यह गवाने की चीज़ नहीं है। हम लाए हैं ब्रह्मकार वृती गुरुद्वार से, इस वृत्ती को रखना मेरे मनवा संभालके। इसकी संभाल जितनी तू करेगा,  कुदरत तेरी संभाल उतनी ही करेगी। जिसकी वृति अच्छी है, उसकी कुदरत उसके साथ है। सतगुरु भी उसके साथ ही है।

।। है ही भगवान।।

28-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तू और कुदरत"

तू और कुदरत दो नहीं, एक है। पर तेरे अहंकार ने तुझे कुदरत से दूर करके अपने छोटे दायरे में खड़ा कर दिया है। इसलिए तू ज़र्रे ज़र्रे ups down, दुख सुख, मान अपमान के चपेटों में आता रहता है। सतगुरु कुदरत के धणी है। वो तुझसे अलग नहीं है। पर जो सतगुरु के आज्ञाचक्र में चलता है, वो कुदरत से जुड़ जाता है, सतगुरु में समा जाता है। पर जे वहां पर भी तूने अहंकार के कारण खुद को अलग कर दिया,तो तू कई हालातों के चपेटों में आ जाता है। तुझे पता नहीं पड़ता। मनुष्य जन्म मिला सतगुरु में समाने के लिए, surrender करने के लिए, पर तू जे अपना ढी़ल्ल दिखाए तो कुदरत और सतगुरु क्या करें?

मन मस्ती के कारण तू कहीं प्रकार की कस्स खा सकता है, पर जानकर भी तू अनजान रहना चाहता है, क्योंकि तू गहरे अंधेरे में हैं। गहरे अंधेरे से एक श्रद्धा निकाल सकती है, बुद्धि नहीं। गहरे अंधेरे से विश्वास, सतगुरु में विश्वास निकाल सकता है। तेरे अंधेरो को चीर कर रोशनी की किरण को कायम कर सकता है। पर तेरी होड, तेरा हठ, तेरी ज़िद, तेरी नासमझी, तेरी बेसमझी, मनुष्य को जब घेर दे तो गुरु क्या करें?

।।है ही भगवान।।

29-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्ज़-मर्ज़"

जितनी तेरी चादर है उतना पाँव लंबा करो, ज्यादा मत करो। प्रालब्ध के दायरे में चलो, बाहर मत निकलो। हर चीज में भरोसा रखकर थोड़े में गुज़ारा करो, तो तेरे भरोसे में बरकत पड़ेगी। मस्त होके रहने के लिए, शांतमय  होके रहने के लिए, तुझे अपने से गुज़ारा करना पड़ेगा। वरना सारी जिंदगी तेरे व्यवहार को सिद्ध करने में चली तो जाती है, पर व्यवहार तू अधूरा सा अधूरा छोड़कर संसार से चला जाता है। अधूरा व्यवहार छोड़कर कोई जाए तो वाषना तो लटकी है ना, ख्याल तो भटकते है ना, चक्कर तो वही चलता है। जन्म-मरण में आए जाए दुख पाए। जिस ख्याल से मनुष्य प्राण त्यागता है, उसी ख्याल के हिसाब से भटकता भी है, जन्म भी लेता है। अब तू अपना फैसला कर।

एक कर्ज़-मर्ज़ के कारण तू कितने कर्म बनाता है, कितनी तकलीफें सहता है, कितना जन्म चक्कर बनाता है। खुद को तकलीफ ना दो, आदर्श सही रखो। जितना है उससे गुज़ारा करो।लेने देने के बाज़ार से उपर उठकर भगवान में मन रखो, आत्म-निश्चय करो, तेरा जन्म सफल और सुहेला होगा। आदर्शों में shining आएगी और सबको प्रेम करने में तू success रहेगा॥ क्योंकि कर्जों-मर्जों का तुझे tension न होगा, simple सादगी जिंदगी में  तू तृप्त भी रहेगा। आत्म-निश्चय करके आत्मधन का तू धणी बन जाएगा। प्रेम खजाना भी लुटा सकता है जब तेरे भीतर कोई tension नहीं, कोई ख्याल नहीं, कोई व्यवहार नहीं। तो तू प्रेम खजाना भी लुटाएगा और दुनिया को मस्त भी करेगा।

॥ है ही भगवान ॥

30-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मर्यादा"

एक मनुष्य मर्यादा ना करे, तो वो मनुष्य कहलाने के काबिल ही नहीं है। एक जिज्ञासु जे गुरु मर्यादा ना करे तो वह जिज्ञासु हुआ ही नहीं। जब तक तू जिज्ञासु नहीं है, तब तक आत्म-निश्चय हो नहीं सकता। मर्यादाओं को पालन करके तू जितना सुख प्राप्त कर सकता है, वो तू जानता नहीं है। पर जब मर्यादा पूरी करता है, मर्यादाओं में चलना सीखेगा, तो ही तुझे यह रस आ सकता है ना। तू चला ही नहीं मर्यादा में तो तुझे क्या मालूम कि इसमें कितना आनंद है। एक वारी मन को मोड़कर खुद को, खुद के अहंकार को भूलकर मर्यादाओं की गलियों में आके तो देख। सुख है मर्यादा की गली में। मर्यादा में मनुष्य मन के उस पार जा सकता है जहाँ सच्चा सुख है। मर्यादा की नाव है, तो तू जा सकता है। बिना नाव के तू उस पार तो नहीं जा सकता ना।

मर्यादा की नाव ही एक ऐसी नाव है जो तुझे मन के उस पार पहुँचा सकती है और अश्रद्धा से श्रद्धा दे सकती है। पर तू जब कांख्खी होवे ना, गुर्र्जाऊं होवे ना। तुझे नशे में यह भी नहीं पता पड़ता कि मर्यादा की, श्रद्धा की कोई ज़रूरत है भी या नहीं। जब मर्यादा और श्रद्धा की ज़रूरत महसूस करोगे तो ही तेरे जीवन में यह दोनों बातें आ सकती है, और मर्यादा में रहकर श्रद्धा में डूबकर तू अलौकिक आनंद को प्राप्त कर सकता है। जबतक मर्यादा और श्रद्धा दोनों तेरे में नहीं है, तो तू कागज वाली बारिश में भीग रहा है, जो तेरा भीगना असफल है।

।।है ही भगवान।।

31-May-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“पांच तत्व - धरती, आकाश, जल, वायू, अग्नि"

पांच तत्व पूरी प्रकृति में, पांच तत्व का बना तेरा पिंजरा जिसमें नारायण बोले। पांच तत्व पूरी प्रकृति में घट-घट वासी, कण-कण वासी, ज़र्रे-ज़र्रे भगवान, हर वक़्त भगवान, हर जगह भगवान, घड़ी-घड़ी भगवान बसते हैं और तेरे पांच तत्व के पिंजरे में नारायण हर वक्त, हर घड़ी बसते हैं। तेरे अपने स्वभाव के कारण तुझे प्रकृति में परमात्मा महसूस नहीं होता और तेरे अपने पिंजरे में नारायण दिखाई नहीं देता। दोष एक ही है तेरे स्वभाव में जो अहंकार फसा है, ज़िद्द फसी है, present-past-future तीनों काल बसे हैं, इस-उसकी निंदा और शिकायत बसी है। नं बस्सा है एक भगवान। बाकी हर चीज़ तेरे स्वभाव में फसी पडी़ है। जब तक स्वभाव को भगवान के भाव से वस नहीं किया, तब तक ना तू प्रकृति में पुरुष देख सकता है, ना तू अपने पिंजरे में नारायण देख सकता है।

जनम-जीवन यूँ ही व्यर्थ चला जएगा, इसीलिये बदले ना दुनियां, बदल जाएँ हम। Change करो खुुद को, अपने स्वभाव को change करो। भगवान के भाव से वस में करो। जब स्वभाव वस में हो गया तो Golden future is waiting for you और कुदरत भी तेरेको नेक कर्मों के लिए, आतम दीदार कराने के लिए, तेरे को चुनेगी और तेरे part play कराएगी।  वरना तेरी आयू यूहीं बीत जाऐगी जे तू सतगुरु की शरणः में नहीं आयाजी।शरणः लेनी ही पड़ती है, सबक नहीं तो नहीं मिलता। बिना शरणः लिए आत्म निश्चय नहीं होता, खाली कागज़ी बारिश और theory का ज्ञान इस- उससे मनोरंजन, इस-उससे मन रखना, मन तोड़ना, मन जोड़ना, अज्ञान की बातें खाली ज्ञान का Cover चडा़के अपने में रखनी पड़ती है। पर जे तू अपने स्वभाव को Change करता है तो हर चीज़ तेरे लिए बदल जाएगी।

।।है ही भगवान ।।

June
01-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कृपा"

कृपा गुरु की बरस रही है, बरसाने वाला बरसा रहा है। फिर भी प्यासा क्यों है कोई? रोज़ बहत है यह अमृतधारा, तो भी प्यासा सकल संसारा। गुरु की कृपा - उसके सिवाय निश्चय नहीं होता। गुरु की कृपा के सिवाय तू ध्यान नहीं लगा सकता।गुरु की कृपा के सिवाय सिमरन याने सच्चा सुः का मरण, संशय-भ्रमों का नाश, भेदभाव का मिटाना, अंतःकरण को साफ करना, शुद्ध और बुद्ध बनना, पाक-पवित्र होना, यह सब गुरु कृपा से ही होता है।

गुरु कृपा करे, एक नज़र डाले, तो निहाल कर दे। सारी बातें छिन(एक पल) में आ जाएगी। पर कृपा पाने के लिए तुझे अपने हठ और ज़िदों को छोड़ना पड़ता है यह कोई विरला छोड़े, नसीब वाला कोई इशारे समझे, नसीब वाला कोई हठ छोड़े, नसीब वाला कोई कृपा पाए। दाणा-पानी मेरे सतगुरु दा कोई खांव्णं वाला खाए, गुरु कृपा में खुद को नहलाए और अपना जीवन सफल बनाए।

॥ है ही भगवान ॥

02-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हाज़िर-नाज़िर भगवान"

जो भगवान का प्यासी है, काँखी है, उसे चाहता है, उसे परमात्मा हाज़िर-नाज़िर प्रतीत होते हैं, महसूस होते हैं। इक घड़ी भी दूर नहीं रहते। चलता हूँ - चलते हैं, खाता हूँ - खाते हैं, सोता हूँ -  सोते हैं। उसके सिवाय इक घड़ी भी तू, एक कोई छोटी सी बात भी कर नहीं सकता। वो तेरे इतने समीप हैं, इतने साथ हैं, नेरे ते नेरा मेरा साजन। सदा बसत हम साथ, मेरे साथ है। यही विश्वास मनुष्य को उंचाई तक, बुलंदियों तक पहुँचा देता है।

भगवान में विश्वास रखनेवाले बच्चे success को छूते हैं। Success उनके कर्म, उनके धर्म में, उनके प्यार में पड़ जाती है। वो ज़्यादा सोचके, चिंता करके कोई कर्म-धर्म नहीं करते। सहज जो भी आया हो गया। इसी प्रकार अकर्ता मनुष्य हाज़िर-नाज़िर भगवान को देखते हुए हर चीज़ कर गुज़रता है। उसे पता भी नहीं पड़ता कि कब हुआ, कैसा हुआ। पैगमबर जब-जब धरती पर आते हैं तो उनके disciple नशे में चूर रहते है।

।। है ही भगवान।।

03-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विश्वास"

विश्वास करामत की करामात है। पर देखता कौन है? जो श्रद्धा रखता है, जिसका विश्वास अंधा विश्वास है, जिसका विश्वास पूर्ण विश्वास है। ड़िसाँ हर घड़ीयं नवाँ चमत्कार पहैंजे सतगुरु देव जां (सिंधी दोहा)। विश्वास रखना ही पड़ता है। जिस किसी field में आप रुके हो, पर विश्वास के सिवाय उसी Field में तू कुछ कर नहीं पाता। विश्वास इतना ज़रूरी है।

Doctor में तू विश्वास रखता है, तभी जाके doctor तेरा इलाज कराता है। Tablets में तू विश्वास रखता है, खा लेता है, वह कभी side effect करती है, चलता है! पर जिज्ञासु गुरु में इतना विश्वास क्यों नहीं कर सकता? विश्वास की हर वक्त जय होती है। अविश्वास में मनुष्य के भीतर uneasiness आ ही जाती है। विश्वास में तू सरल, सुगम, सुहेला, सुंदर बनता जाएगा। अविश्वास में तू heavy बन जाता है, भारी बन जाता है क्योंकि अपने जीवन का भोझ तू अपने उपर रखता है पर गुरु के उपर नहीं रखता। इसलिए विश्वास के सहारे चलो फटाफट किनारे लगो।

।।है ही भगवान।।

04-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अब नहीं तो कब नहीं"

यह एक ऐसी line है जो तेरे आलस को तुरंत तोड़ देती है, पर जे तू आलस छोड़ना चाहे तो। जो छोड़ना ही नहीं चाहता उसे तो कोई छुड़ा ही नहीं सकता। पर छोड़ना चाहो तो हर वक्त यह कहो अभी-अभी करना है, कल किसने देखी है, अब नहीं तो कब नहीं। इसीलीए तेरे भीतर होश और जोश दोनों आ जाएँगे। एक के सिवाय काम नहीं चलता। कुछ एक मिले या होश या जोश, तू कहे काम चलादो, हम तो नहीं चला सकते।

होश पहले ज़रूरी है, होश के बाद अगर जोश ना आया तो होश किस काम का हुआ? जोश आ गया और फिर होश में तू नहीं रहता है तो जोश मैं तू कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है, क्या से क्या कर गुज़रता है, तो जोश है पर होश नहीं है, यह भी तो नहीं है। इसलिए ज्ञान निश्चय करो, आत्मनेष्ठी बनो, त्याग वैराग में मन रखो, discussion मत करो, कुबुद्धि मत रखो, झूठ मत बोलो, प्रेम के दुनिया में रहो, थोड़े में गुज़ारा करो, चादर जितना पाँव लंबा करो। ऐसा निश्चय करो और फिर तेरे में जोश तो रहेगा ही रहेगा पर होश की भी कमी नहीं रहेगी। तेरी जिंदगी सुजागी में गुज़रेगी बहुत अच्छा लगेगा।

।।है ही भगवान।।

05-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शरण"

शरण पय की लाज सतगुरु रखते हैं। शरण पय की सबक की चिंता भी सतगुरु करते हैं। शरण परे पर दया दृष्टी, दिव्य दृष्टि भी सतगुरु डालते हैं। गुरु राग से छुड़ाए, द्वेत से छुड़ाए, प्यार सिखाए, व्यवहार न कराए, अहंकार छुड़ाए। गुरु क्या नहीं कर सकता ? कर सकता है, सब कर सकता है, पर जब तू चाहेगा कि गुरु मेरे लिए कुछ करे तब गुरु करने में तेरे प्रति समर्थ हैं। वरना तो वो सर्व समर्थ हैं, पर तेरा भाव, तेरा प्रेम, तेरी मेहनत-पुरुषार्थ, तेरे लिए सब कुछ है। जो सतगुरु तेरी मेहनत, तेरा पुरुषार्थ, तेरा प्रेम, सब देखकर तुझे आसीस देते हैं। जिज्ञासु को अपनी ओर खींचकर  सबक देकर प्रेम की दुनिया में goodbye करते हैं कि अभी जीयो और जीने दो।

।।है ही भगवान।।

06-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मानिख की टेक्क, वृती सब जान"

मनुष्य किसकी आधार लेकर चलता है? देह अध्यास में देह अध्यास का आधार लिया तो तैर नहीं सकता, डूबने के Chances ज़्यादा ही हैं। इसीलिए परमात्मा का आधार सबसे पहला आधार है। भगवान का आधार लेकर सारी दुनिया को प्यार करो, सारी दुनिया से बैठो, उठो, खेलो। पर भगवान का आधार सबसे पहले लेना चाहिए।

इसीलिए यह line बनी है : मनुष्य-मनुष्य को दे नहीं सकता जब तक बीच में देह अध्यास है। देह अध्यास तेरा छूटे, भगवान बीच में आए, तो मनुष्य-मनुष्य के लिए प्रेम और कुर्बानी कर सकता है। वरना देह-अध्यास में कुर्बानी का अंग होते हुए भी तू उस पर नज़र नहीं डालता। कुर्बानी तुझे भाती नहीं। जो भी है, सब मुझे चाहिए। जो है, मेरा है। कब तक तेरा बनेगा ? कब तक बनी रही है ? कब तक बनी रहेगी ? हाथ पकड़कर तेरे को कोई प्रभु की ओर लगा ही दे, तो ही तेरा बेड़ा पार है।

।।है ही भगवान।।

07-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आलसी वृत्तियाँ"

एक मनुष्य किसीको भी दूर कर सकता है। यह मुझे अच्छा लगता है, यह मुझे अच्छा नहीं लगता। किसीको भी तू दूर कर सकता है, किसीको पास बिठा सकता है। पर भीतर में तेरे अालसी वृत्तियाँ पल रही हैं, उसपर तेरा ध्यान क्यों नहीं जाता ? ये आलसी वृत्तियाँ ही तेरी उन्नति में रुकावट है, तेरे प्रेम में रुकावट है। यह आलसी वृत्तियाँ तुझे आराम से जीने नहीं देती, जीवन बिताने में रुकावट है। किसके साथ तू बैठे, उठे, चले, तेरे आदर्शों में रुकावट है।

यह आलसी वृत्तियाँ क्या है - Time पर उठना है तो उठते नहीं हो - हा उथा तो (हाँ उठता हूँ)। खाना है खाते नहीं हो - रखो खाता हूँ। यें नहीं कि थाली आई, हाथ जोड़के ले लिया, हाथ जोड़के खा लिया। भटकता तेरा मन है तो भटकता तेरा कर्म भी है। किसके कारण? मन के आलस के कारण। आलस - हाथ ऊपर उठाने का आलस, झुकने का आलस, मुड़ने का आलस, मन में कोई चीज़ किसीकी अच्छी लगती है वो तू ले नहीं सकता, मान नहीं सकता, यह भी एक आलस।

आलस कितने प्रकार के हैं, मैं क्या क्या बताऊ ! आप जब भीतर जाएँगे तो आपको अथाह आलस मिलेगा।  जिज्ञासु बनेंगे तो उस अथाह आलस से ऊपर उठेगा और आदर्श अच्छा बनेगा और तू चमकेगा, आत्मा में आ जाएगा। वरना आलस तो सभी को रुला देता है, Time waste करा देता है, Energy खत्म करा सकता है, आदर्शों को आग लगा सकता है। इतना जान सको तो जानो और आलसी वृत्तीयों पर विजय प्राप्त करो।

।।है ही भगवान।।

08-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संग का रंग"

(As the company, so the colour)

जिज्ञासु अपने को शांत वातावरण में रखता है। शांत वातावरण तू किसको कहता है? कोई मनुष्य तेरे आगे नहीं, कोई कर्म तेरे हिस्से में नहीं। तूने मान लिया मैं अपनी शांति में बैठा हूँ। पर उसी शांति में timepass के साधन तो तू पाल रहा है॥ timepass कर रहा है phone पर, timepass कर रहा है TV पर, timepass कर रहा है गपशप में, timepass कर रहा है इस उससे discussion में, timepass कर रहा है परचिंतन में।

बुद्धि भटकती है, मन भटकता है। जिज्ञासु जो एकांत का वातावरण लेता है वह तो गया फिजू़ल। नाम में तूने एकांत ले ली पर timepass के साधन नहीं छोडे़, तो एकांत तेरी एकांत न रही। पर जिज्ञासु एकांत में बैठ कर अपने से अपने निश्चय की उन्नति के लिए study करे, खुद की खुद से। मेरी शक्ति कहाँ leak होती है? मेरी शक्ति बढ़ क्यों नहीं रही है? मेरे में त्याग वैराग की कमी अभी तक किस लिए है? मैं किस लिए, किस वक्त और क्यों out होता हूं?

यह Study करना तेरा अपना धर्म है। अपना धर्म मानता नहीं, जानता नहीं। औरोंका धर्म, पर-चिंतन जो भी बातें मैंने बताई वह तू कर्म धर्म लेके बैठता है तो तू जिज्ञासु कैसे हुआ? जब तक जिज्ञासु नहीं है तब तक ज्ञान भी नहीं है। जिज्ञासु बनो जिज्ञासु के लक्षण आरोप करो और ज्ञान की प्यास को बढ़ाओ। ज्ञान ले लो, प्रेम कर लो और अपना जनम-जीवन सफल बना दे दो।

।।है ही भगवान।।

09-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जीव की जलन"

देह अध्यास में जीव की जलन क्या होती है? कुछ मिले तो भाता नहीं, जो ना मिले उसके लिए तरफता रहता है। कोई सामने आया तो सुहाता नहीं। क्यों आया ? ना आया तो क्यों नहीं आया ? मेरी Value नहीं । मतलब एक ही चीज को पकड़कर आप उसी स्थिति को कईं दिशाएं देते हैं, opposite - opposite. यह तेरे मन का स्वभाव जन्मों-जन्मों से चला आ रहा है, तकलीफ तेरे को कोई नहीं देता। जलाता तेरे को कोई नहीं है, लेकिन तू यह क्यों समझता है कि सारी दुनिया मेरे को देख कर जलती है।

सारी दुनिया को सब कुछ है। जो तेरे पास है वह उनके पास भी है। तू तेरे ख्याल को ठीक कर, बीमार ख्याल को ठीक कर, ठीक ख्याल को तंदुरुस्त कर । वो बहता है negative में, बहने ना दे, ऊँचा उठा, ऊपर उठा, positive mood रख, positive सोच, अद्वैत में सोच। दूसरा है ही नहीं, जलेगा कौन ? दूसरा है ही नहीं, Value कौन करेगा ? दूसरा है ही नहीं, विखेप कहाँ से आएगा ? इसी प्रकार अद्वैत-मत को पकड़ो, और भीतर के ख्यालों को तंदरुस्त करके, अपनी तंदरुस्ती का ध्यान करो। जो तेरे लिए तंदरुस्ती ज़रूरी है, मन का power ज़रूरी है, देह का power भी ज़रूरी है। तन मन की शक्ति अगर तेरे साथ है तो, तू धरती आसमान एक कर सकता है। बहुत कुछ तेरे से हो सकता है।

।।है ही भगवान।।

10-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जीव की तृप्ति"

इस जीव को तृप्ति तब आती है जब आत्म निश्चय होता है। आपने इसको तृप्त करने के लिए कितने साधन अपनाए ? क्या-क्या नहीं किया ? कहीं करतापणा करके, कहीं गलत आदतें भी डालके, कहीं सुठैं सडांवणं दां चाह इस व्रती को पकड़के, चादर से पैर लंम्बे किया। अपने प्रालब्ध के दायरे से बाहर निकला। जितना है, उतना नहीं किया। कर्जा-मर्जा लेकर अधिक किया।

मतलब आपने क्या-क्या नहीं किया? इस जीव को तृप्त करने के लिए कि कहीं मैं ऐसी स्थिति में आ जाऊ जो बाकी मेरे लिए कुछ ना रहे कि ये दु:ख बाकी है, ये सुख बाकी है। मैं पूरा का पूरा सबकुछ संसार का निचोड़ ले ही लूं। सोचा तों यही, पुरुषार्थ भी यही किया। लेकिन क्या यह हुआ? होता नहीं है। तृप्ति अपने निश्चय में है। सतगुरु के आत्म प्रेम में है, उनके दीए हुए वचन, आत्मज्ञान में है। जब तुझे अपनी आत्मा की पहचान मिल जाती है, और तू उसमें खड़ा उतरता है, स्थित हो जाता है, तब तू  तृप्त होने लगता है। तृप्ती गुरु वचनों से तेरे पास आ सकती है, पदार्थों से नहीं। तृप्ती त्याग-वैराग से तेरे पास आ सकती है, मान-अपमान से नहीं। तृप्ती मैं देह नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ इस एक भाव से आ सकती है, अनेक बुध्दीयों से नहीं। अपने को आत्मा के ज्ञान से भर दो, त्याग वैराग से अपनी सुंदरता को बढ़ा दो। आत्म-निश्चय से तू तृप्त रहेगा, शान मान में भी रहेगा, अंदर के आनंद में भी रहेगा, गुरु से निभाएगा,गुरु का प्यार ले सकता है, दे भी सकता है, मन खुश रहेगा।

।।है ही भगवान।।

11-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"All-rounder बनो"

एक मनुष्य शक्ति का सागर है। अथाह शक्ति एक मनुष्य में होती है, पर अपनी शक्ति को पहचानता नहीं है। संशय रखता है कि मैं यह सब नहीं कर सकता हूँ! इतना सब मैं कैसे करुं ! ये तू-मा का लफड़ा है, counting की बाज़ार है। वरना counting से ऊपर उठे अगर मनुष्य तो हिम्मत और शक्ति का धणी है। हर चीज को turn दो। तू एक कर्म करता है, तो दूसरा कर्म तेरे से खिसक जाता है। दूसरा करता है तो फिर अगला कर्म तेरे से खिसक जाता है। पर जे तू ध्यान दे, अपनी शक्ति में भरोसा रखे, तो तू हर कर्म पर खड़ा उतर सकता है।

दिन शुरू हुआ जो ज़रुरी-ज़रुरी-ज़रुरी है वो तो तेरे से पक ही पक हो सकती है, अगर तू ध्यान दे तो। सुबह सवेरे पहले योग अभ्यास करो, ठंडी हवा खाओ, Walk करो, सत्संग सुनो, अपने काम पर निकलो और फिर बिना time waste कीए काम सुबह से ही जल्दी जल्दी करो। सुबह तू काम शुरु होते ही, आलस करता है, अभी तो पूरा दिन पड़ा है, अभी तो आधा दिन पड़ा है। फिर शाम हुई तो तेरा दिमाग गर्म होता है। जल्दी जल्दी निपटाऊं, ये करूं, वो करूं। पर जे तू सुबह से लगातार बराबर काम करता जाए, निपटाता जाए, तो शायद शाम/संध्या तेरे लिए सुहेली होगी। तू संध्या को relax में होगा कि मेरे दिन का पूरा ही काम हो गया है। ध्यान देना है, प्रेम से करना है। कर्म को भी प्रेम करो, जिसके साथ कर्म करते हो उसको भी प्रेम करो, खुद को भी प्रेम करो।

।।है ही भगवान।।

12-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरी मानो"

ये एक मनुष्य की ऐसी स्थिति है जिससे वो खुद भी खफे रहता है, तंगदिल बन जाता है। मानने को तो सामने वाला तेरा मानना चाहता है, पर उसका मन नहीं मानता। तो वह क्या करे ? जब तक किसी का मन मानता नहीं और वह ज़बरदस्ती मनवाता है तो 4 दिन का खेल है। वो फिर अपनी ज़िद पर, अपनी बात पर अड़ जाएगा।

तू ज़ोरी से किसको कुछ मनवाता भी है, तो फल निकलता नहीं है। इसलिए ढीला छोड़ो, कुदरत में भरोसा रखो कि सामने वाला भी कुदरत का प्राणी है। कुदरत उसको छोड़ेगी नहीं, सही रास्ता देकर रहेगी। फिर निमित मात्र आप ज़रूर कहो कि मेरी मानो, तो आपको यह फायदा होगा। पर जब आप मेरी मानो, मेरी मानो, मेरी मानो को रटते रहते हो तो तेरीे मानने वाली बात की value रहती नहीं। Be careful ! इसलिए अपने को संयम में रखो और सलाह दो। संयम में रखो और आदेश दो। संयम में रखो और प्रेम करो।

।।है ही भगवान।।

13-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सलाद(salad) में सुख"

एक वज़न है मनुष्य का जो बीमारियां भी देता है, आलस भी देता है, मन को चिड़चिड़ आती है, ना चाहते गुस्सा करता है, उसको कोई अच्छा नहीं लगता, प्यार के मैदान में प्यार नहीं कर सकता, परिवार को सुख दे नहीं सकता, परिवार से सुख ले नहीं सकता। जब तेरा वज़न ज्यादा है, मोटापा है, तो सूक्ष्म दृष्टि से देखो यह सब तकलीफें आपके पास है ही है। घटाना तो है ही, आज नहीं तो कल। कभी ना कभी तो वज़न घटाना ही है। आज क्यों न करें ! कितने easy-easy रास्ते हैं, क्यों ना अपनाएं !

सबसे पहला सुंदर रास्ता है पेट भर के सलाद खाओ। बड़ा-बड़ा काटोगे तो शायद इतना नहीं खा सकते।  इसलिए chopper में उसको chop करो, पतला करो, हर चीज़ डालो। काकडी डालो (cucumber), गाजर डालो (carrot), जो आपको पसंद आती है चीजें, कच्ची (raw) खाने के काबिल हो वो डाल दो। हल्की सी मिर्ची डालो (chillies), नींबू डालो (lemon), मिठास देने के लिए थोडा सा खजूर डालो (dates), 2-4 शेंगदाने डालो (peanuts), ज्यादा मत डालना। Mix करके आप उसको बड़ा कटोरा, बड़ा प्याला खाने के बाद फिर चपाती को हाथ लगाओ । दौड़-दौड़ के वजन तेरे पास आया। उड़-उड़के वजन तेरे से निकल जाएगा। यह promise है और दुआ भी है। तंदरुस्त बनो और संसार-समाज के अच्छे-अच्छे कार्य करो।

।।है ही भगवान।।

14-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पुदीने पर दया दृष्टि डालो"

पुदीने ने कहा - हम इतने गुणकारी है तो भी मनुष्य मुझे लाता तो है, लेकिन green से काला बना देता है, फिर dustbin में डाल देता है। अब मैं क्या करुँ? हमें complaint मिली है, आपको ध्यान देना पड़ेगा। पुदीने जैसी गुणकारी चीज़ तेरे लिए कहाँ है ? हल्का भी है, सस्ता भी है, possible भी सबके लिए है। पुदीना पीसकर उसको अपने स्वादअनुसार बनाइए, हल्का सा पानी, थोड़ी सी इमली (tamarind), थोड़ा सा नींबू (lemon), थोड़ा सा गुढ़ (jaggery), गुढ़ ना खाना हो तो sugar-free, थोड़ी सी चाट मसाले की। तुर-तुर डालो (थोड़ी-थोड़ी डालो) मसाले ज़्यादा नहीं डालने चाहिए। पुदीना का स्वाद खत्म हो जाएगा।

अगर आप इस प्रकार पुदीने की एक छोटी कटोरी खाना खाने के साथ खाते हैं, तो आपकी table की, आपकी थाली की सुंदरता की बात ही कुछ और होगी।  खाना खाने के बाद हल्का महसूस करोगे और मोटापा तेरे पास आने से घबराएगा। पुदीना खाओ और फलो-फूलो,  मुस्कराओ, सबको प्रेम करो।

।।है ही भगवान।।

15-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तंदरुस्ती"

हर वक्त अपना ह्रदय, अपने सर को ठंडा रखो, अपने पेट को नरम रखो, और पाव तेरे हल्के से ताजे़ तवाने होने चाहिए, गरम होने चाहिए, ठंडे न होने चाहिए। सर-ठंडा, पेट-नरम, पाव-गर्म, ये तेरे तंदरुस्ती का राज़ है। ये होगा तब, जब तू सबसे पहले अपनी आत्मा के निश्चय में आएगा, all rounder बनेगा, तंदरुस्ती पर ध्यान देगा, खाने-पीन को, उठना बैठना, बात करना, तेरी वाणी भी शांतमय होनी चाहिए। 

गुस्सा भी किसको करो तो please शांती से करो। गुस्से का फल भी निकलेगा और तेरा blood pressure high भी न होगा, दुगना फायदा । आए गुस्सा किसके लिए, उसके साथ पहले table पर एक cup चाय पी लो, बाद में गुस्सा करो। आधा गुस्सा तो शांत हो जाएगा। हर साधन अपनाओ, लेकिन खुद को खुश रखो। इच्छाएँ पूरी करके तू खुश नहीं रह सकता। ये मत समझो कि जितना ज़्यादा मिले उतना लेलूं और अपने को खुश रखो। Selfish मत बनो, स्वार्थीपणा मत रखो पर निस्वार्थ भाव, निष्काम प्रेम, समत्व बुद्धि, मन की स्थरता, एकाग्रता, दिल में परमात्मा के हिसाब से भावनाए। ऐसी सब बातों से खुद को भर दो और फिर अपने जीवन को अच्छी राहों पर छोड़ दो।

।।है ही भगवान।।

16-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हरिद्वार"

(हरि का द्वार, सतगुरु का द्वार)

जो भी तेरे दर पे आया उसके भाग्य खुल गए।  वो तप में आगे तो आया, सबक शुरू तो किया। आज शुरू किया है, चिंता ना करो, कभी तो तू पूरा करेगा, कभी तो तू आगे बढ़ेगा। Serious हो जाओ, खुद के लिए। थोड़ीसी चंचलता बाकी है। उसको छोड़ते हो, तो तेरे वारे न्यारे हैं। भाग्यशाली बनते हो, जे तू चंचलता छोड़ता है। मुस्कराना चंचलता नहीं है, पर -

  • Past में जाना चंचलता है

  • Future में जाना चंचलता है

  • Repetition करना चंचलता है

  • औरों की बात करना चंचलता है

  • चाई-चुगली करना

  • उस-उसकी बात को याद करना चंचलता है

ऐसी चंचलताओं से मुक्त हो जाओ। मुक्ति तेरे द्वारे खड़ी है। बस सतगुरू वचन ले लो, हरि के द्वारे आ जाओ और खुद को सफल बनाओ, मुक्त बनाओ।

।।है ही भगवान।।

17-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तपस्या"

मनुष्य को ऐसी तपस्या करनी चाहिए। वृत्ति, ढीली वृत्ति है कि कोई मुझे प्यार करे तो मैं करूं। पर यह वृत्ति देवताओं वाली वृत्ति है कि कोई करे या न करे, मैं सबको प्रेम करूं। भगवान की वृत्ति तो यह है। उसमें वृत्ति है ही नहीं। वो तो जड़-चेतन, मिट्टी-सोना, कण-कण में, घट-घट में, भगवान प्रेम करते हैं। प्रेम का दान दो, शक्ति तेरी बढ़ जाएगी। औरों की चिंता न करो, परचिंतन न करो। चिंता करो तो पहले खुद की चिंता करो कि मुझे खुद में समाना है, खुद का दर्शन करना है और खुद्दी के बदले खुदा को पाना भी है। ऐसी वृत्ति देवताओं से बढ़कर तेरे को भगवानपणें में लाके खड़ा कर देगी।

।।है ही भगवान।।

18-Jun-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"जप"

जप तेरा ऐसा होना चाहिए कि गुरुमुख नाम झट्टे इक बार। झट्टे - हम कहते हैं, झट्टे। झट्टे माना उसको बरोबर पकड़ो। जप तू करता है, कभी तू भूल जाता है, पर जब तू भगवान को पूरा पकड़ता है, तो तेरे भीतर अजपा जाप चलता रहता है। पहले तेरे खयालों की parade चलती है। जब तूने भगवान को पकड़ा तो फिर तेरा जप चलता रहेगा। तू जप न जप, पर जप तेरा चलता रहेगा। ऐसा जाप जपो जो तेरी तपस्या automatic होती जाए - तन की, मन की, इंद्रियों की, बुद्धि की। तप! तप! तप! तपस्या में तपते जाओ और हरि के गुण गाते जाओ, और हरि से मिलके एक हो जाओ, तो जन्म-जीवन तेरा सफल रहेगा।

।।है ही भगवान।।

19-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरु तेरा तू गुरु का"

इसमें कोई शक-शंका है नहीं। एक बारी तेरा हाथ जिसने पकड़ा वो फिर कभी भी बेसहारा हो नहीं सकता। कुदरत चलाती है ज़रूरत के अनुसार। सतगुरु part play करते हैं याँ part play करवाते हैं, ज़रूरत अनुसार। कभी भी मन में शंका न आनी चाहिए, कि हम पास हैं, या दूर हैं। पास रहो या दूर रहो, पर मन में सतगुरु की तस्वीर को समाते रहो, उसके ज्ञान को अपना बनाते रहो, उसकी आदर्शों की चुनरी को अपने ऊपर डालते रहो।

खुद में खुद को पहचानो। जब तू पहचानता है खुद को, पहचानना शुरू करता है, तो ही तू अंतर्मुखता में आता है। अंतर्मुखता में जब तक आया नहीं तब तक एक भी विकार तू अपना पकड़ नहीं सकता। जब तक अपना विकार न पकड़ा तो तू दूसरों का विकार छोड़ नहीं सकता। जब तू दूसरों का विकार नहीं छोड़ता तो तू जिज्ञासु बन नहीं सकता, मोक्ष के रास्ते आ नहीं सकता, अपनी पहचान की पहचान पा नहीं सकता। इसीलिए अपने भीतर झांको और सतगुरु के आदर्शों की चुनरी में खुद को ढ़क दो ।

ढकीं मुहिंजा डोलणां, ऐभ न खोलणां, नंगड़ा निमाणींअ दां, जीवें तीवें पलजी करे, वङा थींदौं (सिंधी दोहा)। पर जो जिज्ञासु बनेगा वो जल्दी बड़ा हो जाएगा। फैसला आपके हाथ में है।

।।है ही भगवान।।

20-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"विशालता"

विशालता का भाव जब तक मन के अंदर आया नहीं तब तक तू हदें तोड़ता नहीं। खयालों की हदें, अपने विचारों की हदें, उसूलों की हदें। कई बातों की हदें तूने भीतर से बनाके रखी हैं। बाहर की, धरती की हद तेरी हद नहीं है। वो तो तू एक दिन छोड़के जाएगा।

पर जो तूने भीतर से हदें बनाके रखी है, वों कहाँ छोड़ेगा? मरते दम तक तेरे भीतर की हदें छूटेगी नहीं। गुरु महर करे, गुरु कोई करुणा करे, तेरे को कोई सद्बुद्धि आए जो तू गुरु की सुने, तो ये मन की हदें टूटती है और तू बेहद का मालिक बनके अपने को सृष्टि का जीते जी तो राजा समझता है, स्वांस छोड़ने के बाद भी तू कहीं अटकता नहीं, और तू झटक-झटक के, अपना समय पूरा करके, लेंगे जन्म दुबारा।

वरना हदें तो तू बनाता है, दुबारा जन्म भी तेरा कठिन ये जन्म भी तेरा कठिन। है तो ये असलियत पर कोई असलियत को चाहता है तो गुरु की सुनेगा, असलियत से मुख मोड़ता है, तो वो नहीं सुनेगा। अब जो भी कर तेरा फैसला ।

।।है ही भगवान।।

21-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

" अपनी शक्ति को बढ़ाओ "

इस उस के पचरे में पड़ने से शक्ति तेरी leak होती है, तू कमज़ोर हो जाता है। पर जे तू अपनी शक्ति को बढ़ाना चाहता है, तो इस उस के पचरे में जाना बंद करो । परमात्मा तेरे साथ है, सतगुरु कदम कदम पर तेरे लिए torch लेकर खड़े हैं । तेरा पहरा देते है, नींद फिटा कर भी तेरे पहरे पर पहलवान बनकर रुके हुए है, पर तू खाली कदर कर । 'कदर वन्यी पुछ कदर वारन खां, बेकदरण खे कल केरी अथई' कदर करना चाहते हो तो सतगुरु से पूछो कि उसने कैसे कदर की है, क्या क्या कदर की है, वरना तू कदर नहीं करता तो सब गया पानी में, बेकार हो गया । अपनी मेहनत को सफल बनाओ, अपने समय को सफल बनाओ और हर कदम पर कदर करो । परपंच न करो, दूसरे के पचरे में ना जाओ ।

।। है ही भगवान ।।

22-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संसार के दुख"


संसार में ध्वंधों के कारण ही दुख आते है, पर जे मनुष्य ध्वंधों से ऊपर उठे तो दुख ढूंढ के दिखाए । ध्वंधों से ऊपर तू आत्म निश्चय से हो सकता है । संसार में सब सुख सुविधाएं हैं लेकिन आत्म सुख है नहीं । आत्म सुख के बिना ध्वंध जाते नहीं, जब तक ध्वंध जाते नहीं तो तू सुखी हो नहीं सकता । ध्वंधों से उपरांत हो जाओ और हर ध्वंध को तोड़ डालो । ध्वंध तो ध्वंध ही है, दुआं है, जूठ है, सत्य नहीं है। 'सत जान्ही संसार खे मूर्ख नाना दुख सहन था'। सत जानते हो, मुर्ख बनते हो, दुख सहते रहते हो । वरना संसार को सत न समझो, ध्वंधों से खाली हो जाओ, एक सतगुरु की शरण ले लो, तो फिर आप ढूंढ़ के दिखाओ कि दुख न तेरे लिए है, न तेरे वालों के लिए कोई दुख है।

।। है ही भगवान ।।

23-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपनी खोज"

 

अपनी खोज में जो मनुष्य लग जाए, कि मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? सृष्टि क्या है? सृष्टि की रचना क्या है? रचैता कैसा है? क्या रचना की है? कैसे पांच तत्व चल रहे है? इन सब बातों को जब कोई खोजे, तो जो जो खोजे, सो सो पावे। कुदरत, सतगुरु समाए हुए हैं कुद्रत में, धणी है कुदरत का । तेरी खोज सुनकर सतगुरु जो कुदरत के धणी हैं, वो चैन से बैठ नहीं सकते । तुझे हर वक्त, हर घड़ी, हर समय पर, हर कदम पर, तेरे खोज का जवाब देते रहते है और तू खोजी बनके खोजता रहता है । जब तेरी अपनी खोज बंद हो जाती है, सारे सवाल पूरे हो जाते है फिर तू भी निश्चय करने लगता है कि अहम ब्रह्म असमयी तत्व मसी ।
ठीक है ?

।। है ही भगवान ।।

24-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरी दृष्टि से भगवान देखो"


देखा मैने भगवान को परमात्मा को, अपने सतगुरु के आदर्शो से। देखा मैंने भगवान को उनके मीठे नूर से जो उन्होंने मुझमें और तुझमें समा दिया है, कोई खाली नहीं है, सबके अंदर लाल है। पर मूर्ख गन्ड(गांठ) खोले नहीं, तो कर्मी भया कंगाल भी है। आलस न करो, अपने पर दृष्टि रखो, सतगुरु से दृष्टि लेकर अपने में दृष्टि रखो, और फिर देखो गुरु के मुख से क्या निकलता है । तेरे आदर्शो में क्या प्रतीत होता है तुझे।

अपने परमात्मा को ढूंढना ही तेरा लक्ष्य है। भगवान को ढूंढो। दीयों में जैसे तेल है, मेंहदी में जैसे रंग है, हर चीज में कहीं न कहीं, कैसे न कैसे, वो समाए हुए हैं, आप खाली जान लो, खोज करो ।

।। है ही भगवान ।।

25-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आदर्शों में कमियाँ"

आदर्श की कमी, ज़िंदगी की कमी बन सकती है। इसलिए आदर्शों को ठीक रखना चाहीए। Ordinary मनुष्य और जिज्ञासू के जीवन में बहुत फर्क है। उस फर्क को समझो। फासले तय करो। हर वक्त यही विचार करो, कि मैं एक जिज्ञासू हूँ, मेरा जीवन कैसा होना चाहीए? जैसे जिज्ञासू का जीवन होना चाहिए, वैसे अगर न हुआ तो क्या फायदा हुआ, तेरे ज्ञान की राहों का। मेरे सतगुरु, मैं तेरे द्वारे आयी, तेरे ही राहों पें चलती रहूँगी। ऐसा वादा रोज़ खुद से लेना पड़ेगा।

।।है ही भगवान।।

26-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरे सतगुरु की मुरली क्या हे बोले, प्रेम - प्रेम - प्रेम"

प्रेम बिना जीवन अधूरा। जीवन अधूरा है तो मनुष्य अधूरा है। अधूरे जीवन में मन की शांति नहीं, हर वक्त परेशानी ही परेशानी। फिर भी मनुष्य समझ नहीं सकता परेशानियाँ कहाँ से आती है। तेरी ही create की हुई परेशानियाँ, अपनी ही है, लेकिन अज्ञान के कारण है। अज्ञान का पर्दा उठाओ। बादल जैसे सूर्य को ढक लेता है, चंद्रमा को ढक लेता है, ऐसे ही तेरे ज्ञान को अज्ञान के बादलों ने ढक दिया है। अब सत्य का सूरज उग आया है। बादलों की नहीं चलेगी, सत्य के सूरज का दर्शन होगा और तेरा आदर्श बनेगा अधूरापन भी जाएगा।

।।है ही भगवान।।

27-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सच्चे सुख को पहचानो"

पहचान अगर सच्चे सुख की है, तो तू  आगे-पीछे सुखी हो सकता है। पर जब पहचान ही नहीं है तुझे, तो तू सुखी कैसे हो सकता है ?

  • सच्चा सुख है धीरज में

  • सच्चा सुख है नम्रभाव में

  • सच्चा सुख है गम खाने में, कस्स खाने में। भगवान के वचन है कस्स खाओ, पर प्रेम नहीं छोड़ो।

  • सच्चा सुख है अपने खुद को जानने में, आत्मरस पीने में। आत्मा के रस में जब तू डूब जाता है तो बाकी के रसों की तुझे कोई चिंता नहीं रहती।

हीयं भी संजण वाह वाह, हूअं भी संजण वाह वाह ।

जीयं हलाईं तीय हलां, जीयं करीं तीय शुखुर आ।

शुखुर मुहिंजा साईं जीअं तूँ हलाईं,

खट्ट ते वियाँरी यां पट्ट ते वियाँरी, मान कराईं अपमान कराईं,

मां समजाँ मेंहर आ सागी (सिंधी दोहा)।

।।है ही भगवान।।

28-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपनी हस्ती को जो सतगुरु के कदमों में पहुँचा दे"

हस्ती तेरी भटक रही है, मन लटक रहा है, स्वभाव-संस्कार भटक रहे है, आदर्श तो रुल्ले पड़े है। ऐसी स्थिती में जिज्ञासू का जीवन सुरक्षित नहीं है। अपने जीवन की सुरक्षा को ढूँढ़ो। अपनी Safety को जानो, कि तेरी Safety किसमें है। हर मनुष्य की Safety अपने ही निश्चय में है जब तू अपना निश्चय करता है, तब जाके तू चौ-तरफ से Safe हो जाता है। अपने-पराए का भेद मिटना, नीचे-उपर ना देखना, आत्मा ही आत्मा का दीदार करना, अपने पराये से भेद मिटाकर सबको प्रेम की दुनिया में रंग देना ही तेरा कर्तव्य है, और धर्म भी है।

।।है ही भगवान।।

29-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सच्चाई"

जितनी तेरी अपने ह्रदय की सच्चाई, उतनी तेरी आत्मा की उन्नती। इस हाथ दे, इस हाथ ले। जितनी सच्चाई तू रखता है, अपने निश्चय के लिए, उतनी ही तेरी उन्नति होती है, तेरे निश्चय के लिए, मान सको तो मानो। तेरी सच्चाई के सिवाय प्रेम हो नहीं सकता, निष्काम प्रेम बिल्कुल नहीं हो सकता। तेरे भीतर की सच्चाइयाँ, तेरे भीतर का संग, यही उमंग तुझे अपने भीतर झाँक कर और नई दिशा में ले जाकर enjoy कराता है।

।।है ही भगवान।।

30-Jun-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शिकायत और शुकराने"

शिकायत जैसे poison को क्यों ज़र्री-ज़र्री-ज़र्री-ज़र्री करके पीते हो? जब की अमृत साथ में ही पड़ा है, वो क्यों नहीं पीते ? शुक्राना क्यों नहीं मानते ? शिकायतों का ढेर रखकर अपनी ज़िंदगी को क्यों खराब करते हो? शिकायतें poison है, और शुक्राने तेरे अपने भीतर की शक्ती को बढ़ाने के लिए एक साधन है। उसी शक्ती को बढ़ाने के लिए शुक्राने अपनाओ, शिकायत को छोड़ो। शिकायत न कर तू, न कर तू पुकार, सदाईं शुखर कर, शुखर में गुज़ार। (सिंधी दोहा)

किसी एक का भी नाम तेरे मुख पे आया तो मांना शिकायत आ गयी। परहेज़ - परहेज़ ज़रूरी है। जितनी तू परहेज़ खुद करेगा, उतनी तुझे औरों से भी करनी पड़ेगी। द्वैतवाले से मत बोलो पर अद्वैती को मत छोड़ो। प्रेमवाले से प्रेम करना ज़रूरी है, पर जो प्रेम की भाषा नहीं जानता है, उसको भाषा पहले सिखाओ, बाद में उसको प्रेम करो। सारे कर्तव्य जो भी तेरे हैं, आत्मा की कुरसी पर है, तो सब अच्छे ही होते हैं। और अच्छा करने के लिए सतगुरु का दरबार चाहीए, सतगुरु चाहीए।

॥ है ही भगवान ॥

July
01-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मृत्यु शरीर और स्वभाव ,संस्कार,कर्म "

मृत्यु शरीर को क्यों अग्नी देव के सुपुर्त करते हैं - क्योंकि ये धर्म है। मृत्यु शरीर से अब कुछ हो नहीं सकता। प्राण निकलने के बाद तो सब परमात्मा को अग्नीदेव के द्वारा सुपुर्त करते हैं। अगर तेरे स्वभाव से कुछ हो नहीं सकता, तेरे कर्म से जो कुछ हो रहा है, जैसे की नहीं हो रहा है। कितनी सारी बाते हैं, जो तू अपने में ढूँढ कर देख की तू कहता है, मैं करुँगा लेकिन वो हो नहीं सकती।

ऐसे स्वभाव को, संस्कार को, कर्म को क्यों लगाके बैठा है, अपने सीने से, उसको भी सुपुर्त कर दे ना अग्नी देव को। जीते जी खलास कर दे और नया जन्म, नया स्वभाव, नई मंज़िले सब नया-नया ले ले।

।।है ही भगवान।।

02-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जीवन को बहारों में भर दो"

वैसे भी मौसम सुहाना है, बहारें easy हो गई है, फकत तू अपने मन के suffocation को रोक थाम कर ले। आपको मालुम नहीं कि यह Suffocation आता कहाँ से है? ये तेरी अपनी ही पैदाईश है। तभी तो तेरे को ही ज़्यादा तकलीफ दे रही है, औरों को तो मालुम पड़ जाएगा।

लेकीन तकलीफ तो तुझे सहन करनी पड़ती है, सुननि नहीं पड़ती है। इसलिए तू अपने को मोड़ दे, आत्मा से, भगवान से, जोड़ दे, तो एक छित्त गिरे या दस।जिस ऊपर तेरा हाथ है स्वामी, वो कैसा दु:ख पावे। वरना तुर जी गुंथ्थी, साै चोटुँ खाए।

॥ है ही भगवान॥

03-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पिंजरे का अभिमान please छोड़ो"

शड्ड पिंजरे जो मान पखियरा, शड्ड पिंजरे जो मान ❨सिंन्धी भजन❩ । देह अध्यास को तू इस प्रकार बयांन करता है, ठीक है, कभी ना कभी छोडूंगा। पर पिंजरे का मान तू किस प्रकार करता है? पिंजरे को देह अध्यास समझके, उसको गले से चिपका दिया है। अब देह अध्यासी पिंजरा बनकर तेरी आत्मिक उन्नति में, तेरे हर शुभ कार्य में वो तेरे को disturb करता रहता है।

इसीलिए सबसे पहले पिंजरे का मान छोड़ो और उसको (पिंजरे को) आत्मा का रंग लगा दो, आत्मा के गीत गाओ, आत्मा के भजन गाओ। आत्म के साज पर जो छेड़ी मुक्ति की ये तान शरणागति के संत तूने कर दिया कमाल (भजन)। हर पैगंबर आते हैं, कमाल करने के लिए आते हैं। फिर चाहे वो शरणागति में बैठके करे या संसार के किसी भी कोने में करें, या शहंशाह में करें, सृष्टि के कहीं से भी करें लेकिन पैगंबर ने किया है कमाल।

गुरु ने किया क्या हंसी कर्म जो हम रहें ना हम और गम रहें ना गम (भजन)।गुरु ऐसे हंसीन कर्म करके सभी को झोली भर-भर के दे रहा है और खुद पूरा ही खाली करके खुद को जब लौटता है तो उसको सुकून होता है। ऐसे पैगंबर को धरती का भगवान, आज के युग का भगवान कहते हैं।

।।है ही भगवान।।

04-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सत-सत-सत कर प्रब्भ स्वामी"

सत में जब तू रहता है, चलता है, टिक जाता है, तो असत की कोई शक्ती तेरे उपर हाव्वी नहीं पड सकती। सत का अभाव नहीं रहता, प्रभाव बढ़ जाता है, तो तेरे भीतर आत्मिक उन्नती होती है। आत्मिक उन्नती होने से तेरे कण-कण में निश्चय भी तू कर सकता है और खुद की खुदी को मिटा भी सकता है।खूद की खुदी को मिटाओ, निश्चय करो, आत्मबल में रहो, तो कोई तकलीफ तेरे में आ नहीं सकती।

।।है ही भगवान।।

05-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपने आप को पहचान्ना"

पाण सु़ज़ायर्ण आयो सो भली करे आयो, कम ना हुयुस को बियों मिठा (सिंन्धी दोहा)। अपने आप को पहचान्ना सबसे ज़रुरी कार्य है, उस कार्य को आगे रखो और अपनी पहचान को सलामत रखो। तेरी पहचान तेरी अपनी पहचान है, जिसके कारण तेरी उन्नति भी होती है, और तू संसार में fit होने लगता है। नैलानी जोराबे (nylon socks) की तरह तू fit हो जा। जो भी संकट आते हैं वो चले जाते हैं। और क्या सुनाते हो बोलो। सब संकट दिल से दूर, दे ज्ञान भरपूर। ड़ेहिं हथरा मुखे पहेंजो पांण भुंलाईंदा विच्च सीर मां पार् पक्क उतारिंदा (सिंन्धी दोहा)।

।।है ही भगवान।।

06-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"छोढ़् स्याँरपअ सकली मनां, तू क्यों निपटाए मूर्ख मनां"

सब स्यारपअ, चतुराई, चालाकी अब सतगुरु को भेंट करदो, उनको दे दो। और क्या चाहिए तुझे ! उनको देके तू ज़िंदगी में खुश रह सकता है, खुशाल हो सकता है। अपने भीतर झांककर अपना कोई कर्तव्य अधूरा न छोड़ो। अधूरा छोड़ने से ज़िंदगी अधूरी रह जाती है। प्रेम-प्रेम में सब अच्छा ही होता है, अच्छा होने लगता है। ठीक है !

।। है ही भगवान ।।

07-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँं भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

लहिरुन में थई बे्डी पुरानी , लहिरुन में थई बे्डी पुरानी,हां जी हां, हां तारींदा,विच सीर मां पार उतारींदा,विच सीर मां पार उतारींदा,बांह खाँ वठी मूँखें तारीदा ,अल्हा तारीदा , पक तारीदा , सच तारीदा , विच सीर मा पार उतारींदा।कई बार मनुष्य किसी ऐसे चौराहे पर खुद को खड़ा मानता है , जहां तू समझता है रास्ता नहीं लेकिन सतगुरु की करुणा , सतगुरु का निष्काम प्रेम ,torch  बनकर , तेरी जिंदगी में सामने आते ही  कई रास्ते दिखा देता है।आशावादी बनो,इच्छा वादी ना बनो,इच्छा में रास्ते कट होते हैं,आशा एक ऐसी मिठडी मुरली है जिसमें बंद रास्ते खुले हुए मिलेंगे।करुणा जो बरसे सतगुरु से वो तुझे पूरा डुबाएगी।प्रेम भावना से मनुष्य को चलना चाहिए,हीन भावना से नहीं ।

।। है ही भगवान।।

08-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँं भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

धीरज और संतोष की कदर जे तू जान जाए तो बेड़ा पार हो जाएगा । तेरी भागदौड़ तेरी जिंदगी से थोड़ी सी दूर चली जायेगी । धीरज, संतोष, प्रेम इन बातों को जब तू seriously नहीं लेता, इसलिए तो अंधी दौड़ में लगा रहता है । अधीरज में आके खुद को, आरों को तकलीफ देता रहता है, लेता भी रहता है ।
तकलीफ देने वाला समझता है मैं तकलीफ ले रहा हूं। मुझे सब तकलीफ दे रहे हैं। ये नहीं सोचता की मुझसे भी तकलीफ किसी को मिल रही है । अंतर्मुखी नहीं होता, अंतर्मुखी हो जाए तो धीरज और संतोष का मालिक बन जाए । मालकी सच्ची लेते नहीं है तो आने जाने वाली माल्की से काम चलाना पड़ता है वरना तू तो शाहों का शाह है, बे परवाह है, बादशाह है ।
एक मनुष्य अपने तप में आ जाए तो किसी चीज से कम नहीं ।

 

।। है ही भगवान।।

09-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गदेले वारा खडा"


गादियां बिछी पड़ी है खडो के भीतर।मनुष्य समझता है गादियां बिछी पड़ी है , मज़ा आ रहा है , आनंद आ रहा है।सामने देखते ही,चलो गिरो, एक दूसरे के पीछे गिरते जाओ । गादी वाले खडो में तू गिरा,दूसरे के लिए रास्ता छोड़ा,फिर वो गिरा उसके लिए रास्ता छोड़ा । ये खड्डे क्या है ? यह गादियां क्या है ? ये गिरना क्या होता है ? ये खड्डे , गहरे खड्डे , तेरे एक तो राग - द्वेष , अहंकार , तकरार discussion ,Tension.जैसे 36 प्रकार के भोजन तू परमात्मा को चढ़ाता है , तो कई प्रकार के खडे तू खुद के लिए भी खड़ा कर देता है । गादियां ऐसी बिछी पड़ी है , अहंकार में गिरने के बाद , पता थोड़े ही पड़ता है कि खडे में गिरा हूं , फिलहाल तो चोट भी नहीं आती क्योंकि गादियां बिछी पड़ी है । राग - द्वेष , परमात्मा से दूर करता है लेकिन तू नासमझ है, समझता नहीं है । मनुष्य जन्म इन खडो में गिरने के लिए नहीं मिला , खड्डो से बाहर आने के लिए मिला है । शांति नहीं मिलती , satisfaction नहीं मिलता।धन मिलता है , दौलत आती है , थोड़ी लात भी लगाके जाती है , इसको ज्यादा , उसको कम । मेरे नसीब में इसने कटौती की , मेरे नसीब पर इसने डाका डाला , सारे दिन यही बातें , परपंच , बेचैनी , खुद के लिए बेरहमी ,करे तो मनुष्य क्या करे? जाए तो कहां जाए? एक काम कर सकता है , वठ सतगुरु जी तू ओट, रखी प्रेम ऐं प्यार सच्चो , तू पहिंजे मन खे ठाह ऐं पहिंजे मन खे मोड़ , वेंदा सब दुख तुहिंजा विसरी , जे मालिक दर ईदें , जे आतम निश्चय में ईदें । आतम निश्चय करो , सब दुख दूर, सौली - सौली गा्ल आहे , मगज में छो नथी वेहे । विहारिणी त पवंद ई। अज् न त सुभाणे , सुभाणे न त परींह । डालनी तो पड़ेगी ये बात दिमाग में कि आतम निश्चय के सिवाय संसार में , कोई काम हो नहीं सकता ।

।। है ही भगवान।।

10-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इंसाफ का घर भगवान का मंदिर"

 

मनुष्य इंसाफ का घर बना भी सकता है, बिगाड़ भी सकता है । फैसला उसी के हाथ में है ही है, क्योंकि तू एक मनुष्य है, मन का ईश्वर है, तेरे हाथ में सभी कुछ है। तेरे हाथ में है जीवन बनाना पर तू हीरा कौड़ी के लिए न गवाना । जो खुद से इंसाफ करता है, उससे कभी कोई बेइंसाफी हो नहीं सकती । जो खुद से बेइंसाफी करता रहता है वो कभी भी खुद को इंसाफ दिला नहीं सकता ।

गुजारत उहा आहिंया जो खाली अक्कल में जहिंजे अचां । मैं ऐसी एक पहेली हूं जो किसी के अकल में खाली आ सकूं । अकल में उतारो दिल में आप ही उतर जाएगी । दिल में जब उतर जाती है तो सर्व में वो बात छा जाती है । सर्व में पेखे भगवान । दिल से जो भी चीज निकलती है परमात्मा का रूप होकर निकलती है, तू धीरज शांति संतोष प्रेम मिठ मोहब्बत इन बातों को ध्यान में रखते हुए चलते चलो, रास्ते खुले मिल जाएंगे, दिशाएं सही मिल जाएगी, पहेलियां सुलझ जाएगी, सब अच्छा लगने लगेगा, मौसम सुहाना सफर लेकर तेरे लिए इंतजार करेगा कि है ही भगवान ।

॥ है ही भगवान ॥

 

11-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शुद्ध आहार - संस्कारी मार्ग"

 

संस्कारी मार्ग तुझे, तेरा जीवन दिला सकता है, शुद्ध आहार तेरी दिशाएं खोल देता है, बंद रास्ते खुल जाते हैं, दिशाएं भी अपना रुख छोड़कर, तेरे तरफ, तेरे सुख के लिए, तेरी दिशा तेरे लिए torch लेकर खड़ी है । सतगुरु दिशाएं भी देते हैं, रक्षा भी करते हैं, प्रेम प्याला भी पिलाते हैं, मंजिल पकड़ाते हैं।

उहा खबर को लगंदो शेर, असुल में मां आहियां केर । ऐसी खबर कोई शेर दिल ले सकता है कि मैं कौन हूं, मैं क्या हूं, क्या काम है मेरा, क्या दिशा है मेरी, किस ओर जाना है मुझको, क्या पहचाना है मुझको। पहचानू तो क्या पहचानू ।

भजन-"पहचान, पहचान सके तो पहचान, कण कण में बसे हैं भगवान । अंबर में तू है, धरती में तू है, आकाश में तू है, हवा में तू है, जल में तू है, कण कण में तू है, घट घट में तू है, राग द्वेष वाले हृदय में तू है, मैं करता हूं क्यों अज्ञान, मैं करता हूं क्यों अज्ञान। पहचान सके तो तू पहचान, पहचान सके तो तू पहचान, कण कण में है भगवान।"

हर वक्त खुशी, हर वक्त हंसी, हर वक्त भगवान की कण कण में, शब्द शब्द में, राह राह में, मिट्टी सोने में, सब में है ही भगवान । है ही भगवान । है ही भगवान ।

॥ है ही भगवान ॥

12-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पसण चाहीं जें प्रीतम खे, त कर वैराग वैरागी"

 


परमात्मा को अगर अंदर की आंखों से देखना चाहते हो तो थोड़ा सा वैराग, थोड़ा सा त्याग, जरूरी है जिज्ञासु के लिए । बिना त्याग वैराग के जिज्ञासु का जीवन संपूर्ण हो नहीं सकता । इसलिए त्याग वैराग के सिवाय निश्चय आ नहीं सकता ।

तुहिंजे त्याग ते आहे तुहिंजे मन् जे मौझुन जो मदार । तेरी त्याग की ताकत पर तेरे आज के आनंद का आधार बाकी है । पर तु समझे न‌ तब । समझते एक हो, बोलते दूसरा हो, चाहते तीसरा हो, जवाब चौथा देते हो, result पांचवी बताते हो । Continuity कोई आपके कार्य में, आपके आदर्श में, आपके प्रेम में है ही नहीं । अगर हो जाए तो बेड़ा पार हो जाए । अपनी link बनाए रखो, हर वक्त उसी link के सहारे आगे पीछे, दाएं बाएं चलते रहो ।

आहे असांजो ढिसण पसण कम, कीन जुगाए हिन-हुन जो गम। सैलानिन जो सैर सा मतलब, वसवं हुझे यां वैरानी, तू सैला…
सत्संग में आते हैं, फायदे के तौर पर हर एक मनुष्य तृप्ति चाहता है । हर कोई कहता है पुरूषार्थ करूँ, सत्संग की मेहनत करूँ, तो तृप्त हो जाऊंगा । सत्संग का फल तृप्ति बाद में निकलेगा पहले मैं पुरुषार्थ करता हूँ । हम कहते हैं सत्संग का फल तृप्ति पहले तेरे साथ में पहले दिन चलेगी, बाद में तेरा पुरूषार्थ धीरे-धीरे धीरे-धीरे तू करता चल, आगे बढ़ता चल । पहले तो तृप्ति में आजा और बाद में पुरुषार्थी बनता जा । पहला पुरुषार्थ तेरा यही है कि गुरु के द्वारे तेरा आना ही बहुत है, बोल कि ना बोल बस पछताना ही बहुत है । उसके बाद तृप्ति तेरे साथ चलेगी तृप्ति शिखर पर ऊँची चोटियों पर नहीं बैठेगी तेरे साथ तृप्ति तेरा साथी बन कर तेरे साथ चलेगी । तुम्हारा सहारा बन जाएगी और तू तृप्त होके खुश रहेगा । इस सत्संग में फायदा पहले मिलता है risk थोडी भी नहीं है । Risk तब होवे जब तू पुरुषार्थ पहले करे और तृप्ति बाद में मिलती नहीं तो risk है । पर जब तृप्ति तुझे पहले मिल जाए और फिर तेरा पुरूषार्थ चालू भी हो जाए, Continue भी हो जाए, तो बाकी क्या चाहिए । ऐसे 'गुरु तां वञा लख दफा कुर्बान, जेह दिनों आहे डाई दस अहिरो'। ऐसे सतगुरु पर सौ बार, लाख बार कुर्बान जिसने ऐसी पहेली बुझा के दी, जिसमें कोई risk नहीं, कोई chance नहीं की हम कभी सत्य को पा सकें या ना पा सके । सत्संग में आओ, सत्य तो पकड में ही आ जाएगा ।

 

॥ है ही भगवान ॥

13-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

 

सत्संग में आते हैं, फायदे के तौर पर हर एक मनुष्य तृप्ति चाहता है । हर कोई कहता है पुरूषार्थ करूँ, सत्संग की मेहनत करूँ, तो तृप्त हो जाऊंगा । सत्संग का फल तृप्ति बाद में निकलेगा पहले मैं पुरुषार्थ करता हूँ । हम कहते हैं सत्संग का फल तृप्ति पहले तेरे साथ में पहले दिन चलेगी, बाद में तेरा पुरूषार्थ धीरे-धीरे धीरे-धीरे तू करता चल, आगे बढ़ता चल । पहले तो तृप्ति  में आजा और बाद में पुरुषार्थी बनता जा । पहला पुरुषार्थ  तेरा यही है कि गुरु के द्वारे तेरा आना ही बहुत है, बोल कि ना बोल बस पछताना ही बहुत है । उसके बाद तृप्ति तेरे साथ चलेगी तृप्ति शिखर पर ऊँची चोटियों पर नहीं बैठेगी तेरे साथ तृप्ति तेरा साथी बन कर तेरे साथ चलेगी । तुम्हारा सहारा बन जाएगी और तू तृप्त होके खुश रहेगा । इस सत्संग में फायदा पहले मिलता है risk थोडी भी नहीं है । Risk तब होवे जब तू पुरुषार्थ पहले करे और तृप्ति बाद में मिलती नहीं तो risk है । पर जब तृप्ति तुझे पहले मिल जाए और फिर तेरा पुरूषार्थ चालू भी हो जाए, Continue भी हो जाए, तो बाकी क्या चाहिए । ऐसे 'गुरु तां वञा लख दफा कुर्बान, जेह दिनों आहे डाई दस  अहिरो'। ऐसे सतगुरु पर सौ बार, लाख बार कुर्बान जिसने ऐसी पहेली बुझा के दी, जिसमें कोई risk नहीं, कोई chance नहीं की हम कभी सत्य को पा सकें या ना पा सके । सत्संग में आओ, सत्य तो पकड में ही आ जाएगा । 

 

॥ है ही भगवान ॥

14-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरा भाणा मीठा लागे"

सत करे भायाँ तुहिंजो भाणो, तुहिंजे हुक्म अग्या रहाँ मां निमाणो। तू न्यारा भी बन और निमाणा भी बन। फिर आप देखो, आपकी भीतर की स्थिरता कभी भी भंग न होगी। सदाईं परमात्मा तेरे साथ रहेंगे। हर हालत में, तूँ एक ही बात पर स्थित रहेगा कि तेरा भाणा मीठा लागे। भगवान का जो भी प्रसाद मिलता है उसको स्वीकार करो। जैसे भी हालत आए, स्वीकार करो। मन की मस्ती को कभी खराब न करो। हर वक्त मन की मस्ती में परमात्मा बसे रहें। मुझे मेरी मस्ती कहांँ लेके आई, जहाँ मेरे अपने सिवाय कुछ भी नहीं हैं। सब मैं ही मैं हूँ, दूजा भाव न कोई।

।। है ही भगवान ।।

15-Jul-2016

॥ पूूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

गुरु प्रेम रोग है, गुरु प्रेम रोग है,
जिसे लग गया समझ,
प्रभू संग योग है
गुरु प्रेम रोग है...

सतगुरु प्रेम का रोग देता ही इसलिए है ताकि सबको यह रोग लगे, और सब झूम उठे।

झूमते झूमते तेरी जिंदगी बदल जाएगी, तब तुझे एहसास होगा कि प्रभु मेरे अंग संग है।

संग निमानण माण है, मेरा सतगुरु मेरे साथ सदा ही है।
हाज़र नज़र प्रभु को देखते है, तो मन तृप्त रहता है, और तृप्त मन हर वक्त, हमेशा खुद को भाग्यशाली महसूस करता है।
अपनी गलतियों को ठीक करो और उजालों में चलना सीखो । अंधेरों में भटकना बंद करो । मिठ मोहब्बत में अच्छे से चल सकते हो ।

आत्मा के निष्चय से तेरे वारे न्यारे बन जाते है और जो आत्मा में रहता है, वो सदा ही सुख में, संतोष में अपने जीवन को आगे बढ़ाता है।
जब आए संतोष धन, सब धन धूल समान।

।। है ही भगवान ।।

16-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मोहाब्बत"

ये मोहाब्बत की बातें हैं, जिस किसीके समझ में आए, वो मालामाल हो जाए। ये मोहाब्बत की बातें हैं, मोहाब्बत जिसके हिस्से में आए वो नफरत जैसे विकार से छूटता जाए। मोहाब्बत बांधने वाली चीज़ नहीं, लुटाने वाली चीज़ है। लूटो और लुटाओ। प्यार करो और औरों को करवाओ। इतना अच्छा लगेगा कि प्रेम में तू सारी दुनिया से एक हो सकता है। जो एक बूझे तो पाक है। मोहाब्बत में मनुष्य मज़े में रहता है, प्रेम में रहता है।

।। है ही भगवान ।।

17-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सवेरा ही सवेरा"

 

जब जागे हम भगवन तब से हुआ सवेरा । अंधेरे मिट गए हृदय के और उजाले आ गए मेरे जीवन के । जीवन की बगिया खिलने लगी, मुस्कुराने लगी जब साथ सतगुरू का हृदय में पा लिया । साथ सतगुरू का, आदर्श सतगुरू का, आसीस सतगुरू की जब भी हृदय में उनकी छवि उतरे तो आसिस से दिल भर आता है कि कैसे आसीस करके उन्होंने अपने चरणों में, अपने वचनों में लगा दिया । आसीस करो हे मेरे गुरुवर तेरी मीठी मुस्कान कभी न बिसरे

तेरे ज्ञान के ये दंग प्यारे-प्यारे,
तेरे हाथों के इशारे प्यारे-प्यारे,
अब मुझे है भगवन से वो लेना वो लेना'
ये विशालता का आनंद लेना,
ये समता का सुख है लेना,
ये निशचय में सब negativity निकल ही जाती है, उस निसचय में तू जूम उठेगा
अपने सतगुरू के सहारे...
सहारो का सहारा है, सहारा है हमारा ओ मेरा सतगुरु, प्यारा सतगुरु ।

एक ही सहारा है, मेरा सतगुरू । एक ही किनारा है मेरा सतगुरू, सतगुरू के सहारे जीवन बहुत ही अच्छा निकलता है और सरलता का मार्ग मिल ही जाता है, मान ना मान तू है भगवान, ऐसी अलख की दुनी जब तू जागता है तो अदृश्य आनंद मिल ही जाता है। दृश्य सुख भी मिलता है, अदृश्य आनंद भी मिलता है और अपने सतगुरू से सच्चा सुख प्राप्त होता है, जो सुख आने के बाद फिर कभी ना जाए । हरी भगत भी पागल देखे गोबिंद के मतवाले पिए पीयारे प्रेम का प्याला और बैठे है जगत बिसारे । तू भी मांग वो ही पागलपन जो उतरे नहीं खूमार । अपने संसार में सुखी रहने के लिए बस एक ही श्रद्धा की कमी है । श्रद्धा वानम लबते ज्ञानम । श्रद्धा की रूठी देवी को मनाके तो देख अंतकरण में ज्ञान की ज्योति को जलाके तो देख ।

 

।। है ही भगवान ।।

18-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हर वक्त खुश रहो"

हर वक्त खुश रहने के लिए तुझे किस चीज़ की ज़रुरत है? अपने निश्चय की ज़रुरत है। निश्चय के सिवाय तू हरवक्त खुश नहीं रह सकता और जो खुश नहीं रहता वो दूसरों को खुश कैसे कर सकता है। अतृप्ति बड़ती जाती है, फैहलती जाती है। इसीलिए खुदको खुश करना ज़रुरी है। शाद रहो, आबाद रहो, खुदको खुशहाल रखो। अपनी कमियों को जो पहचान लेता है तो वो कमियांँ दूर कर सकता है और खुश रह सकता है। अपनी इच्छा को अपनेसे दूर रखना है। जीवन में इच्छा plus हुई तो आनंद minus हुआ।

अब फैसला तेरे हाथ में है कि तू इच्छा को importance देता है या आनंद में रहना सीख लेता है। मेरे ख्याल से इच्छा तो ऐसी बलि जो घुमाए गली-गली। बाकी तो सब अपने आप से हो रहा है। इच्छा की कोई ज़रुरत ही नहीं है। प्रालब्ध में पक्क रखो, कुदरत में भरोसा रखो, सब अपने आप हो रहा है। इसीलिए देखो तो बस भगवान देखो। हाज़रा हजू़र देखो।

।। है ही भगवान ।।

19-Jul-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"इच्छा और आशा"

दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। लिखने में मात्रा का फर्क है। लेकिन स्थिति में बहुत बड़ा अंतर है। इच्छा आपको disturb करती है, आशा disturb को मिटा देती है। इच्छा negative शक्ति देती है, आशा हर वक्त positive mood देती है। इच्छा गली-गली गुमा लेती है, भटकाती है, फकीर बनाती है, लेकिन आशा तुझे स्थिर करती है, गली-गली भगवान दिखाती है और हर वक्त प्रेम भाव जगाती है। इच्छा पूरी होती है तो वैर-विरोध बढ़ता है। आशा पूरी होती है तो परमात्मा की तरफ तू अरदास करता है, कि भगवान तूने ही दिया, तेरे ही सहारे रहूँ।

इच्छा छीनने पर मजबूर करती है, आशा दरिया दिल है, वो देना जानती है, छीनना नहीं। इच्छा तेरी आयु रोज़ कम करती है, घटती है तेरी आयु, आशा-तेरी आयु बढ़ जाएगी, जब कहीं तू अटकता नहीं तो आयु बढ़ती है। इच्छा तेरी प्रालब्ध से तुझे दूर करती है, emotion देती है, और आशा प्रालब्ध में नैलानी जोराबे की तरह fit करा देती है, वैर विरोध समाप्त कर देती है। इच्छा ना करो, आशा भली करो। आशावादी होके रहो, इच्छावादी ना बनो, आशावादी बनाे। भगवान को भी इच्छा पसंद नहीं, आशा के लिए उसको कोई एेतराज नहीं। अपना जीवन बनाओ, आदर्श बनाओ, सुखी जीवन जीओ। इच्छा को तज, अनछित फ़ल पावे।

।। है ही भगवान ।।

20-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जित्त देखूं उत्त तूं ही तूं, तूं ही तूं, तूं ही तूं"

साकार रूप तू, निराकार रूप तू, सोम्य रूप तू, sober रूप तू, सब तू ही तू। मैं मैं न रहूँ, तू तू न रहे, हम राम में ऐसे रम जाएँ। पानी में मिली नमक डली जैसे, हम अपने सतगुरु में इस प्रकार अंदर ही अंदर समा जाए। संभालो अपने को, फिर देखो नज़ारा। ग़ुम्म होईके वैख्ख नज़ारा।

गुम्म होईके वैख्ख नज़ारा, आप सारा! आप सारा!
म्हेंबूब की सूरत में, ओ सच्चे साईय जे सूरत में।

गुम्म होने से तू हल्का हो जाता है, प्रिय बन जाता है, और सबसे सुंदर बन जाता है। सृष्टि को सुंदर करने की क्षमता रखता है, और अपने में आपको ढूंढ लेता है कि मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ ? अपने आप को ढूंढना है। दूजा भाव ना होवे। दूसरे को ढूंढना और खुद को ढूंढना - ये easy है अपने को ढूंढना है। परमात्मा प्यारे से जिसका संबंध है, उसको हरदम आनंद ही आनंद है। अपने आनंद को बढ़ाओ, अपने आनंद की सीमाओं को बढ़ाओ, और लक्ष्य को भेद दो, लक्ष्य को आगे रखो। जैसे अर्जुन ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लाल आँख पर दृष्टि रखी, ऐसे तू भी अपनी दृष्टि, अपनी मंज़िल की तरफ रख। मंज़िल तेरी क्या है, कौन सी है, उसको विचार करके, उसमें अपना मन रख के अपने को खुश रखो।

खुश आहियाँ, खुश आहियाँ, संजण तुहिंजे ख़ुशीअ में खुश आहियाँ।
मस्त आहियाँ, मस्त आहियाँ, मां पहँजीअ आत्म मस्ती में मस्त आहियाँ।

और अपने को कभी ना नीचे करो, ना कभी अपने को ऊंचा मानो। सदा ही समता का पाठ पक्का करो, तो समता में जो सुख है वो कहीं नहीं है।

।।है ही भगवान।।

21-Jul-2016

॥परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

अलख जो पतो


गुरु भक्ति के सिवाय, गुरु प्रेम के सिवाय, गुरु से सच्चाई के सिवाय, अलख का पता मिल नहीं सकता । पता मिल भी जाए तो तू उस पते पर पहुॅंच नहीं सकता । जब तक देह-अध्यास गया नहीं तब तक भगवान मिलके भी दूर है । देह-अध्यास निकल जाए तो तेरी सारी मजबूरियाॅं निकल जाएगी।
कण-कण वासी, घट-घट वासी परमात्मा भगवान है ही है । रब नू देखन वाली आखें सतगुरां ने दे दी और अलख का पता देकर उसमें टिका दिया । धन्य है वो सतगुरु, वो मेरे दादी भगवान जिसने ऐसा difficult काम easy easy easy कर दिया ।

जे कदहिं तुहिंजो हथडो मुहिंजे सिररे ते हूंदो, औखो कम पक्क ई पक्क सवलो थी पवंदो।
ऊंचो हथ आसीस जो जे मूं मथां हूंदो, औखा कम पक्क ई पक्क सवला थी पवंदा ।
सतगुरु का सहारा है, हाथ है, तो कोई परेशानी नहीं, हर कार्य, हर कर्म अच्छे से निभता है, गुज़र जाता है । हर कर्म अपना करेंगे ऐ गुरु तेरे लिए, दिल दिया है जान भी देंगे ऐ गुरु तेरे लिए ।
फूल क्या चीज़ है तेरे कदमों में हम जान अपनी भेट चढ़ा जाएंगे।
ऐ गुरु ऐ गुरु हमको तेरी कसम हम कभी भी आलस नहीं करेंगे ।

श्री शारदा शरणम के बच्चे कभी आलस नहीं करेंगे, खुद को change करेंगे, सृष्टि की ओर दौड़ेंगे और अपने सतगुरु से किए वादे सृष्टि सुंदर करेंगे वो पूरा निभाएंगे। हम यही चाहते भी हैं, असीस भी देते हैं, उनकी असीस भी हमारे ऊपर है । जब तक जान में जान है, उनका यज्ञ आगे बढ़ता रहे ।

 

॥ है ही भगवान ॥

22-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“सबसे पहला हक्क़"

पहला हक्क़ मेरा, मेरे तप पर है। तपस्या - वो मेरा जन्म-सिद्ध अधीकार है। कोई रुकावट मेरी तपस्या में, कोई रुकावट मेरी बंदगी में, कोई रुकावट मेरे आत्म निश्चय में आ नहीं सकती। रुकावट को रुकावट लग जाती है, पर मेरे पास आती नहीं है। सहज और सरलता से आत्म निश्चय हो सकता है जे तेरी लगन है। लगन सतगुरु से ला बैठे अब जो भी होगा देखा ही जाएगा। उन्हें तो अपना बना बैठे, अब जो होगा देखा जाएगा। होगा क्या ? हो हो के सब अच्छा ही होगा, first class होगा।

जब तू देह नहीं तू ब्रम्ह स्वरुप है, आत्मा है, तो खोने और पाने के लिए कुछ रहता नहीं है। पाया कहे सो मश्करा, खोया कहे सो झूठ कूर। ज्ञानी ज्यों का त्यों भरपूर है। अपनी भरपूरता पर दृष्टि रखो, पूर्णता पर दृष्टि रखो और पूर्ण होते जाओ। माना की प्रकृति पूर्णता में नहीं आती, फिर भी इतनी अपूर्ण तो नहीं रहती जितनी तेरी पदार्थों को पाने की प्यास रहती है, और उसाट्ट बढ़ती है। प्रकृति-माँ इतनी अपूर्ण नहीं है, नकी तेरा मन इतना ही अपूर्ण है। पूर्णता में आ जाओ, बरकत पड़ जाएगी, ज्ञान-धन में भी बरकत, संसार में भी बरकत, तेरी तंदुरस्ती में बरकत, तेरे घर परिवार के प्रेम में बरकत। बस बरकत ही बरकत। जे तू ब्रह्म निश्चय में है, तो तू बरकत ही बरकत में है।

॥ है ही भगवान ॥

23-Jul-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"आवाज़"

मनुष्य अपनी आवाज़ को जे balance में रखता है, तो बाज़ी जीत जाएगा। मनुष्य अपने आवाज़ को थोड़ा मिठास में रखता है, तो हर दिल के भीतर महलात बना सकता है। मनुष्य अपने आवाज़ को सुंदर शब्दों में cover करता है। सुंदर शब्दों से उसकी आवाज़ अगर गूंजती है, तो संसार में, समाज में सुंदरता से वो अपनी यात्रा कर सकता है। उसकी यात्रा सुखद होती है। लेकिन मनुष्य सब की तरफ ध्यान देता है, अपनी आवाज़ की तरफ ध्यान दे नहीं सकता। कई बातों में आवाज़ को थोड़ा डीला करना चाहिए, वहाँ तीखा कर देता है। जहाँ नम्र-भाव होना चाहिए, वहाँ अहंकार कर देता है। जहाँ शब्दकोश से अच्छे शब्दों के साथ, अपनी आवाज की सुंदरता को प्रकट करना चाहिए, वहाँ मनुष्य कटू शब्द बोलने लगता है। अब इस change को सुधारना है। गुरु वचनों के साथ, अपनी तपस्या के साथ, अपने गुरु की आशीष के साथ इन बातों को सुधारकर, खुद को नया जीवन, नया जन्म जिज्ञासु दे सकता है। खाली शैंक रखे और अपने आप में आ जाए।

॥ है ही भगवान ॥

24-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जीना"

सच्चा जीना, सही जीना, जो मिला सतगुरु से तुझे उसको सभी में बाटना - यही सही जीवन है। अलौकिक जीवन जिज्ञासु ही प्राप्त कर सकता है। जब तू जिज्ञासु है तो तू परमात्मा का एक हिस्सा है और अलौकिक जीवन पर तेरा हक़ बनता है। केवल आदर्शों की कमी न होनी चाहिए। आदर्श साफ-सुथरे, व्यहवार clear, बुद्धि नेक, आत्म बुद्धि, निश्चय आत्म बुद्धि, खुद निश्चय करो, औरों को निश्चय कराओ, यही बुद्धि सही और सरल है। बुद्धि में सुख-बुद्धि है तो बुद्धि काम की नहीं, किसी नाम की नहीं। सुख-बुद्धि को अपनी बुद्धि से minus करो, तो नाम और काम, शेवा और प्रेम, भक्ति और भाव, सब तेरे ही तो है।

॥ है ही भगवान ॥

25-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"घर के भीतर मैल-मिट्टी, भंगार पलने ना दो"

दिवाली की सफाई में तकलीफ ना होगी, जब तू रोज़ की रोज़ सफाई सच्चाई से कर लेगा। भंगार इकठ्ठा करके दिवाली में ना फेंको। पहले ही भंगार पर ध्यान दो। जो भी चीज़ तेरे काम की नहीं है तो निकाल दो। किसी और के काम में तो आ सकती है ना। ये भी एक अच्छा स्वभाव है, good manners हैं, helpful स्वभाव है। दूसरे को तेरा भंगार भी help कर सकता है। पर तू निकाले तो ना! दिवाली की सफाई first class होगी। अभी से भंगार निकालदो और मन की सफाई, तेरे खयालों का भंगार निकालदो, व्यवहार की सफाई, तेरे चोपड़े clear कर दो। बहुत-अच्छा लगेगा और तू अपने आदर्शों के साथ संसार में सुखमय संसार को प्राप्त कर सकता है।

॥ है ही भगवान ॥

26-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"All round बनो"

 

हर बात से निभाना सीखो,हर चीज़ को प्रेम करना सीखो।
अभी दिन त्यौहारों के आ रहे है,बड़े प्यार से हर त्योहार मनाओ,हर देव की इज़्ज़त करो, प्रेम करो। मांगने से तो अच्छा है उनकी चरण वंदना करो , पूजा करो।मांगो नहीं, वो खुद भी देते है।हर बात में अव्वल नंबर रहो। अभी श्रवण के महीने की आरंभ हो रही है, आप हर उपवास भी पकड़ो, देवो से भी आसिस लो, तो ज्ञान बढेगा।ॐ नमः शिवाय कितने प्यार से हम गाते है, तो उपवास भी ॐ नमः शिवाय के अभी दिन है , सोमवार का उपवास पकडो,भगवान शिव को राज़ी करो , सृष्टि में सुंदरता आयेगी।देखो आपने अच्छे से हवन किए , ॐ नमः शिवाय कहा , आयो लाल झूलेलाल कहा, बारिश अच्छी आयी, हर चीज़ अच्छी होगी , तेरे बच्चों को भी सब अच्छे रास्ते मिलेंगे, तेरेको भी अच्छे रास्ते मिलेंगे।all round बनो सबको प्रेम करो।श्रावण महीने की बधाई हो, और आसिस भी है, खुश रहो सबसे निभाओ, ये ही हम कामना करते है।

॥ है ही भगवान ॥

27-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Pillars"

त्याग, वैराग, धीरज, प्रेम, संतोष, समानता - सब तेरे निश्चय के pillars हैं। Pillars मज़बूत तो building मज़बूत। इसी प्रकार तेरे ये सारे pillars अगर मज़बूत हैं, तू ऐसे तप में अंदर ही अंदर खुद को देह-अध्यास से दूर कर रहा है, तो तेरे तप से तेरे सारे pillars मज़बूती पकड़ लेंगे और तेरा निश्चय कभी भी कमज़ोर ना होगा। तू देह नहीं, ब्रम्हस्वरुप है, तू आनंद स्वरुप है, ये भाव हर वक्त जड़-चेतन में, मिट्टी-सोने में, मानव-धानव में, हर प्रकार से तेरा निश्चय बरकरार रहेगा, मज़बूत रहेगा।

॥ है ही भगवान ॥

28-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जड़ चेतन की आसिस"

 

जड चेतन की आसिस spirituality की राह में चलने वालों के लिए जरूरी है।जब तू नम्र भाव रखेगा तो ही तो ऊंचे पद को प्राप्त होगा।ऊंचे पद को प्राप्त करने के लिए बहुत बड़ी सीढ़ी नहीं चाहिए पर ऊंचे पद को प्राप्त करने के लिए नम्र भाव, नम्रता, झूकना, मुडना, ये चाहिए।झूकाव नहीं तो उठाव नहीं, नम्र भाव नहीं तो आत्म निश्चय नहीं।अगर धीरज नहीं तो फिर कामयाबी नहीं।सर को तू पांव बना ले फिर चल इस नेक राह में।इतना नम्र भाव रखो, इतना प्रेम भाव रखो, धीरज रखो,समाने वाले को मौका दो। तेरे धीरज से उसको मौका मिलता है, फिर एक chance लेने का, तू देता जा मौका,तेरे को क्या तकलीफ़ है। तू तो भगवान का बच्चा है, तू तो strong है, तू तो धीरज वान है, फिर धीरज वान से अगर कोई थोडा सा धीरज लेकर अपने को ठीक करता है,अपने को change करता है तो सौदा बुरा नहीं है।तुम धीरज करते रहो change होने वाले change होते रहेंगे।भले तुर तुर तुर तुर करके भी होवे तो भी क्या हुआ?आशावादी होके रहो। आशावादी होके रहने से तेरे भीतर गहरी शांति होगी और वो गहरी शांति दूसरो को vibration अच्छा देगी।

॥ है ही भगवान ॥

29-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुस्से की quality"

गुस्सा किसको किया, आँखे बड़ी-बड़ी करके, गला फाड़ फाड़के। उस गुस्से से कोई return नहीं, कोई समझता नहीं। चुप हो जाते हैं, लेकिन भीतर खुद भी गुस्सा करते हैं। लेकीन गुस्सा करो, उसके पहले face को smiling करो। थोड़ा face smiling होवे और थोड़ा गुस्सा होवे। गुस्से करनेवाले को गुस्सा करना आना चाहीए। पहले सीखो फिर गुस्सा करो।

अगर तू smiling face लेकर किसीको दो शब्दों में गुस्सा करता भी है, तो उसका नसीब खुल जाता है। वो कहता है, मैंने बात को समझा। और जो तेरा smiling face है, गुस्से में वो सामनेवाले को एक थधांण देता है, relax देता है, कि ये मुझसे इतना नाराज़ नहीं है। खाली मुझे समझा रहा है। और जब तू taunting thoughting करता है, बड़ी-बड़ी आँख़े, बड़ा-बड़ा गला फाड़के गुस्सा करता है, तो सामनेवाला समझता है कि ये मुझसे नाराज़ है। ये इसका danger रुप मैं सहन नहीं कर सकता। इसलिए गुस्सा भी करो तो भगवान पकड़के, बाद में गुस्सा करो। मुस्कुराहट पकड़के बाद में गुस्सा करो। थोड़ा मेरे को पकड़ाे और गुस्सा करो। देखो गुस्सा success हो जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

30-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अच्च कुर्बानीअ जी कतार में"

ज़र्रे-ज़र्रे मैं, minute-minute में, श्वांस-श्वांस में, कदम-कदम पर अपने सतगुरु को ध्यान में रखो। गुरु सत्य है, गुरु नित्य है, बाकी सब कहानियाँ हैं। सत्य एक सतगुरू स्वामी हैं जो हमें भी सत्य में टिकाते हैं। प्रेम, धीरज, संतोष ये उन्हीं का खज़ाना है जो हमें भी कुणका देते हैं। अब कुणके को आप मणका बना लो, ये तेरा नसीब।

दिया तो गुरु ने संतोष, पर मैं असंतोष में क्यों आता हूँ ? दिया तो धीरज, मैं अधीरज में क्यों आता हूँ ? प्रेम क्यों नहीं कर पाता हूँ ? क्योंकी - तूने गुरु का ज्ञान तो लिया, पर अज्ञान वापस नहीं किया। तो तू ये सब कैसे कर सकता है ? प्रेम तो हुआ, पर देह-अध्यास फिर भी मीठा लगता है, फिर भी अच्छा लगता है। जब देह-अध्यास तेरे को अच्छा न लगे, तब संतोष तेरा permanant हो जाएगा, धीरज permanant हो जाएगा, और देह-अध्यास खुदी-खुद जाता रहेगा कि अब मेरा कोई यहाँ काम नहीं। पर जब तक तू देह-अध्यास से काम लेता है, इस-उसकी निंदा करता है, चाई-चुगली करता है, tension करता है, भगवान में विश्वास नहीं करता, तब तक देह-अध्यास काम करता है, तो संतोष काम में ढीला हो जाता है, धीरज सो जाता है, निश्चय चला जाता है। अब आपको क्या करना है, ये आप खुद ही सोचो, आप समझदार हो। निश्चयवान बनो, धीरजवान बनो, संतोषी बनो और प्रभू में खुद को समा दो।

॥ है ही भगवान ॥

31-Jul-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"करुणामई ममता"

ममता तो तेरे पास है। किसके पास नहीं है ? मोह से कोई भी खाली नहीं है। ममता सभी के पास है। लेकिन ममता के साथ-साथ अगर तुझे करुणा भी आ जाए, मैत्रीत्व-भाव हो जाए, मुद्दता आ जाए, तो तेरी ममता सफल ममता बन जाएगी। सफल ममता तेरा जीवन सफल करेगी और तेरा सफल जीवन सभी का जीवन सफल करेगा, सृष्टि को सुंदर करेगा और सृष्टि में सफलताएं बढ़ती जाएगी। तेरे एक छोटे से change में अगर समाज में कुछ change आ सकती है तो तेरी छोटी सी change कहीं अच्छा काम करे, कुर्बानी करे, तो तुझे क्या फर्क पड़ता है ? फरक निकालो, अपने लिए सोचना थोड़ा पीछे छोड़ो, selfish मत हो जाओ, स्वार्थी न बनो, सभी के लिए सोचो, त्याग, तपस्या, प्रेम में रहो। वही त्याग, तपस्या, प्रेम तेरे लिए वरदान बन जाएगा और सृष्टि गुणगान करेगी, change हो जाएगी।

॥ है ही भगवान ॥

August
01-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"धीरज"

धीरज जिज्ञासू को है भी, पर समय पर वो भीतर से धीरज नहीं निकालता, अधीरजता में आ ही जाता है। शेर दिल, मज़बूत मनुष्य, उत्तम जिज्ञासू, आज्ञाकारी भक्त - वो हर वक्त धीरज के लिए ever ready रहता है। धीरज के लिए ever ready ना रहेगा, तो महा-धीरज कैसे कर सकता है? महा-धीरज ना होगा तो surrender सतगुरू को कैसे कर सकता है ? जे तू गुरू को surrender नहीं करता है, तो आए दिन तू अपने अहंकार को ही surrender कर रहा है, अपनी बुध्दि को महत्व देकर उसी के surrender में चल रहा है। भीतर सखा को ढूँढो ज़रूरी है, लेकीन बाहर सखा तेरा सतगुरू है, उसके आज्ञाचक्र में, उसके आगे नम्र-भाव में, जब तक तू रहा नहीं तब तक जन्म-जीवन सफल होता नहीं। अपने मंज़िल को पकड़ाे, और आज्ञाचक्र को मज़बूत करो, तो ही तेरा काम बन सकता है।

॥ है ही भगवान ॥

02-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दृष्टी-दोष"

ये भी दृष्टी-दोष है, जो तू अपनी दृष्टी से औरों की तोल-नाप करता रहता है। इसलिए तू किसीसे fit होने में success नहीं होता। उसकी दृष्टी से, उसकी स्थिती से, उसकी तोल-नाप करो। अपनी स्थिती से उसकी तोल-नाप ना करो। जब तू आत्मनिश्चय में आएगा, तो एवड-उँचे को ऊँचा होके जानेगा। जब तक तू खुद शांत-स्वरुप, स्थित नहीं होता, दूसरे को जान नहीं सकता।

॥ है ही भगवान ॥

03-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मैं और मेरा सतगुरु"

एक हो जाओ, एक से हुआ अनेक, फिर अनेकता से एक होना है। सतगुरु तू एक है। पानी में मिली जैसे नमक डली, ऐसे मैं खो जाऊँ गुरु की ह्रदय की गली। सतगुरु के ह्रदय की गली में अगर तू एकवारी खो गया है, सतगुरु के समुंद्र जैसे ममता में एकवारी तू डूब गया है, सतगुरु की छाया में अगर तू शरण में आ गया है, तो तू कभी अपने को देह नहीं मानेगा, और जुदा नहीं मानेगा।

सतगुरु और तू एक है, एक करके जानो, यही तेरा सबसे बढ़कर नसीब है। ये भेद अगर मिट्ट गया तेरा कि गुरु और मैं एक ही हैं, तो जिंदगी तेरी सीधी, सरल, सफल बन जाएगी, सुंदरता तेरे पास दौड़ती आएगी, संसार-समाज में तू हर angle पर success हो जाएगा। वरना तू गुम नहीं हुआ तो प्रगट कैसे होगा?

खोई हुई चीज़, जब मिल जाती है, तो खुशी होती है, जब चीज़ खोई नहीं, तेरे पास है, तो खुशी नहीं देती। एकवारी चीज़ गुम हो जाए, और फिर तुझे मिल जाए, तो वो चीज़ भली पुरानी भी है तो खुशी देती हैं। ऐसे ही तू सतगुरु का ज्ञान सुनता है, श्रध्दा भी रखता है, प्रेम भी है, हर चीज़ है, पर तू गुम नहीं होता। अगर तू एकवारी गुम हो जाए, तो मैं अपने बच्चे को ढूँढ लूँ, और खोई हुई चीज को प्राप्त करके मुझे बहुत खुशी होगी।

॥ है ही भगवान ॥

04-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“बेखबरी plus सुजागी"


बेखबरी सुख देती है, खबर कभी-कभी तड़पाती है। लेकिन बेखबरी के साथ अगर आपको सुजागी है, तो हर खबर आपको सुख देगी। कभी कोई खबर आपको तड़पाएगी नहीं, तकलीफ नहीं देगी, क्योंकि सुजागी आत्मा की है ही है। हर खबर को अपना रंग तू सुजागी में चढ़ा देता है। फायदा ढूंढ लेता है, वाह-वाह करता है, हा-हा तो तूने छोड़ दी है। न ठहाके लगाने वाली हा-हा, ना तकलीफ देने वाली हाय-हाय, तो हर खबर तुझे balance में रखेगी, पर जे सुजागी आत्मा की साथ में है।

संसार मे नूस-नूस न करो खबरों की। पर जे कभी कोई चीज़ सामने आती है, दिखाई देती है, तो why fear God is near ! भगवान तेरे साथ है, तू किसी भी खबर के लिए ready रहेगा कि हीयं भी सजंणं वाह-वाह, हूअं भी सजंणं वाह-वाह (सिंन्धी दोहा) । राजी हैं हम उसी में, जिसमें तेरी रज़ा है। हर बात में वाह-वाह, हर बात में मज़ा है। एसे मजे में रहो, और आत्मा का निश्चय करो, आत्मा का निश्चय करके अपने मन को स्थिर बनाओ। स्थिर मन से संसार में जब तू चलता है, तो संसार के लिए तू भी वरदान बन जाता है।

॥ है ही भगवान ॥

05-Aug-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"लड़खड़ाना, गिरना, उठना, संभलना"

चार चीज़ों में जिसको आनंद आया वो भाग्यशाली बना। लड़खड़ाओ - क्या बड़ी बात है। जो लड़खड़ाएग नहीं, वो स्थर भी नहीं होगा। लेकिन तू लड़खड़ाने में डर जाता है, पीछे हट जाता है, मैदान छोड़कर भाग जाता है। ऐसी चीज़ें गिरावट की तरफ लेकर जाती हैं।

गिरना - गिरकर उठने में कोई खराबी नहीं। गिर गया तो क्या हुआ? बोलो नहीं मैं गिर गया, बोलो बच गया। जब तू गिर भी जाता है तो भी डरो नहीं, बोलो बच गया, अनुभव लिया गिरते कैसे हैं ! साथ जिसका सतगुरू को है, हाथ जिसका अपने भगवान को है, तो गिरते भी गिरता नहीं।

उठना - गिरकर fast उठो। "हाए मैं मरा, हाए मैं गिरा", समय waste, energy waste ! गिर तो गया, गिरने के बाद क्रिया करो, फटाफट उठो। कुछ लगा ही नहीं, कुछ हुआ ही नहीं, मैं क्यों डरूं ? Why fear सतगुरू is near ! तो गिरना कैसा, उठना कैसा, लड़खड़ाना कैसा ?

क्योंकि पीछे संभालना भी तो आ ही गया है न। फिर संभालो, फिर सुजागी रखो। संभालने में कमी न छोड़ो। चौ तरफ भगवान देखो, संभाल हो जाएगी। Everything is God, every where is God ! हर चीज़ में वासा मेरे वासुदेव का। भगवान जब हर चीज़ में है, जड़-चेतन में है, तेरी दृष्टी में भगवान को मज़बूती से पकड़ो, दृष्टी-दोष निकालो, और लड़खड़ाना-गिरना हर चीज़ तेरी तुझे मज़बूत करेगी। कहीं कोई शिकायत न रहेगी, हर बात में तू आगे भागेगा। पहेले अंधी दोड़ में, अब अच्छी दोड़ में।

॥ है ही भगवान ॥

06-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरु का वादा"

वादा किया था हम सबने, वादा कर रहे हैं हम सब, मिलकर सृष्टी सुंदर करेंगे हम तेरी। जो तूने किया, लक्ष बन गया हमारा। जो गली आपने दिखाई उसी में मंजि़ल पाई हमने। सतगुरु का लक्ष, हमारा लक्ष बन गया। लक्ष तक पहुँचने में कभी-कभी जिज्ञासु को, गुरु-भक्त को, देरी हो जाती है। कारण ढूँढो, कारण एक ही है कि तू आलस नहीं छोड़ता, दिल में दर्द नहीं जगाता सत्य की राह पाने का, दिल में ममता नहीं जगाता हर एक राही को आत्मा का निश्चय कराने का।

ह्रदय के भीतर अगर चाहना है, तो जहाँ चाह है वहाँ राह है। पर कहीं रुकावट नहीं है। रुकावट बनती है तेरी अपनी सुख-बुध्दी, रुकावट बनती है तेरा अपना ही आलस। Active बनो, आलस छोड़ो। समय की कीमत जो नहीं करता, समय तेरी भी value नहीं करता। तू समय की पूजा कर, waste न कर समय को, यही समय की पूजा है। समय की पूजा तू करेगा, समय तेरा साथ देगा। वरना तू सत के मार्ग पर आकर भी आलस नहीं छोड़ता, समय नहीं निकालता, समय की value नहीं करता, तो अपनी मंज़िल पर पहुँच नहीं सकता, सतगुरु के वादों को निभा नहीं सकता। 

मिलकर वादा करो कि निभाऐंगे हम जो किया है वादा हमने। तुझे ही देखेंगे हम घट-घट में, प्रेम करेंगे सर्व में, समता-भाव जगाऐंगे ह्रदय में। निश्चय तेरा लेकर हम भी निश्चय में अपने जीवन को आगे बढ़ाकर सृष्टी को सुंदर करेंगे, यही कामना करो। आशीष गुरुदेव की हो ही जाएगी। दादी भगवान तुझे कदम-कदम पर साथ देंगे, जब तू सृष्टी उनकी सुंदर करने में एक कदम आगे बढ़ेगा, सौ कदम वो आगे आएँगे, ये उनकी तरफ से वादा है। लेकिन तू भी एक वादा कर कि ऐ गुरु-ऐ गुरु तेरे वचनों पे हम मिट्ट जाएँगे, लेकिन मंजि़ल को ज़रूर प्राप्त करेंगे।

॥ है ही भगवान ॥

07-Aug-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"मेरे सतगुरु की महिमा अपरम्पार"

मिले जब दादी भगवान से पहली बार- मन में तूफान, दिल में सतगुरु के लिए खोज लेकर जब तू दादी भगवान के पास पहुँचा, अथाह सवालों का जवाब खिन्न पल में बैठे-बैठे आपको दे दिया।

अंदर में महसूस हुआ कि ये कौन हैं? ये कहाँ से आए हैं? इतनी age तक बड़े हुए, इक सवाल का जवाब किसीने देकर satisfy नहीं किया, मन शाँत नहीं किया। आज हम किसके सामने खड़े हैं ? किसका दर्शन कर रहे हैं जो अनेको सवालों के जवाब बनकर, फक्त जवाब ही नहीं, मार्ग बनकर सामने खड़े हो गए। मार्ग ऐसा दिया, पहले दिन दिशाएँ बदल गई, दिशाएँ महेरबां हो गई, रास्ते कुर्बान हो गए कि तूने सत्य को समजा, अब हम आपके साथ हैं, अाप सत्य के मार्ग पर निकल पड़ो।

निकल पड़े जो सत्य के मार्ग पर तो कदम-कदम पर साथ दिया दादी भगवानने। एक कदम भी न छोड़ा उन्होंने। हर कदम पर torch लेकर खड़े हो गये, तूफ़ानों में हाथ थामा। दिल दड़की, दिल को संभाला, पाँव लड़खड़ाए, पाँव को मज़बूत किया, ह्रदय को परमात्मा के प्रम में भर दिया।

क्या कहूँ कथा मैं तेरी, अनंत है तूँ मेरा। अाज दूँदूं मैं तुजे तेरे सतसंग में, तेरी छवी सदा रहे हमारी। तुझको छत-छत प्रणाम। दादी भगवान को मेरा प्रणाम।

॥ है ही भगवान ॥

08-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दादी भगवान का अपना निश्चय जो हमने महसूस किया"

ज़र्रे-ज़र्रे परमात्मा देखना और दिखाना, हर हालत के लिए ever-ready रहना, सब के बीच में रहना, अपने कुटुंम्ब-परिवार को संभालना और न्यारा भी रहना, सर्व को प्रेम से सींचना और अपने ह्रदय को खाली भी रखना।

ना छोटा, ना बड़ा देखा, उँच देखा ना नींच देखा, देखा तो बस एक ही ब्रहम देखा। सदाईं उनके मुख से यही शब्द निकलते हैं - निराकार साकार रुप धारे आयो जग में। निराकार ही है, जो साकार रुप धारण करके जड़-चेतन में समाया हुआ है, जड़-चेतन में उसी का वास है, उसी के वास को महसूस करो, और अपने देह को भूलाते चलो।

उन्होंने अपने देह को भुलाया। भूल गये सुख-दु:ख, लाभ-हानी, मान-अपमान बस एको ही ब्रहम लखाया, सबमें दिखाया प्यारा राम।

॥ है ही भगवान ॥

09-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दादी भगवान ने कहा"

दिमाग पर कभी बोझा मत डालो, दिमाग तेरा सच्चा साथी है। Excess बोझ डालकर उस साथी को ढीला ना करो। रो़ज़ routine में जब तू सारे दिन की दस बातें दिमाग में संभालके रखता है, वहाँ वे table पर pen और paper रखते हैं, और आज की जो भी ज़रुरी बातें, ज़रुरी काम उस paper पर लिख देते हैं।और फिर एक-एक काम करके cut करते हैं। काम जल्दी भी होता है, दिखने में भी आता है, दिमाग को ज़ोर भी नहीं डालते हैं।

दिमाग में उन्होनो बताया relax ज़रूरी है। Relax में ना रहोगे तो निश्चय कैसे होगा! कई प्रकार की रुकावटें निश्चय में आती हैं। वो तेरी अपनी ही बनाई creation है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि अपनी creation बंद करो और रास्ता सरल-सुगम बनाकर इंद्रीयोंको हल्का रखो। सबसे पहले दिमाग को हलका रखो तो निश्चय में आसानी होगी और तू सफल बन जाएगा।


॥ है ही भगवान ॥

10-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Late Comer"

हर वक्त, हर angle पर, हर काम में, हर बात में तू late हो जाता है। ये नहीं है कि ये तेरी मजबुरी है, पर late होना, late करना तेरी पुरानी आदत बन गई है। दादी भगवान ने कहा late comer होते हो, तो इससे अच्छा है 2 minute before time आ जाओ। दिमाग को भी ठँडा रखेगा और ह्रदय भी धक-धक ना करेगा। Tension भी ना होगा, काम भी अच्छा होगा, सफलता भी मिलेगी क्योंकि before time आया तो मन शांत रहा।

Late comer आनेवाले बहुत बार अपनी बातों को उलझा देते हैं, success हो नहीं पाते, tension लेते हैं, मुस्कुरा नहीं सकते, क्योंकि तू हर काम में देरी करता है। जल्दबाज़ी ना करो, पर देरी भी तो ना करो। थोड़ा ध्यान दो, सुजागी रखो, तो तेरे सारे कार्य बहुत अच्छे हो जाएँगे।

ⅼⅼ है ही भगवान ⅼⅼ

11-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दादी भगवान का कहना है कि तू निरासक्त-भाव से कर्म के लिए ever ready रहो"

तू या तो कर्म आसक्त-भाव से करता है या तो कर्म को ही छोड़ देता है। आसक्त-भाव से कर्म में success नहीं मिलती। निरासक्त-भाव से कर्म में ready रहने से कर्म दूसरे को तृप्ती देता है, खुद को भी तृप्त करता है कि जो भी हुआ सब परमात्मा से हुआ। आसक्त भाव से कर्म किया तो बंधन में आता है। आसक्ती छोड़के कर्म करो तो बंधन भी नहीं, थकावट भी नहीं, तू-मा नहीं।

कर्म मैंने किया तो भी ठीक है, आधे में किसी और ने किया तो भी बुरा नहीं। हर तरफ से तू adjustment कर सकता है जब आसक्ती रहित है। अब आसक्ती रहित का मतलब ये नहीं है कि कर्म छोड़के बैठो और कहो मेरी आसक्ती नहीं है। आसक्ती नहीं होने के कारण तू कर्म और अच्छे-अच्छे कर सकता है। संसार-सागर में रहके तू कर्म करते हुए न्यारा रह सकता है, और समाज को भी खुश रख सकता है, खुद को भी खुश।


॥ है ही भगवान ॥

12-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अब नहीं तो कब नहीं"

जो कार्य तेरे हिस्से में है, आलस ना करो। अब करो, बाद में करुँगा कहेगा, तो होगा नहीं, देरी हो जाएगी। समय signal समय पर देता है लेकिन तू कार्य signal के बाद करता है। कार्य का समय निकल जाता है, आपको success नहीं हाथ आती। चिड़-चिड़ा हो जाता है, किट-किट करता है, उसके उपर थोपता है, इसके उपर थोपता है, पर खुद नहीं देखता कि मैंने समय पर signal नहीं लिया, और समय पर कार्य नहीं कीया। बाद में-बाद में करनेवाला ही, बाद में-बाद में कहनेवाला ही तो कभी-कभी बरबादियों की तरफ बढ़ जाता है। न चाहते हुए भी तू किसी-ना-किसी खड्डे में गिरता है। पर जे तू समय पर कार्य करे, समय पर उठे, समय पर बैठे, समय पर तू अपना हर कार्य सरलता-पूर्वक करे तो बरबादियों के खड्डे तेरे लिए नहीं रहेंगे। तू सदाईं शाद-आबाद रहेगा, मुस्कुराता रहेगा और तृप्त रहेगा, सफल जीवन जीएगा।

॥ है ही भगवान ॥

13-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दादी भगवान - सत्य के सिपाई"

सत्य की डोर जहाँ उनको खींचे वहाँ वे पहुँच जाते। सत्य की डोर जो कर्म उनसे कराए वो कभी ये नहीं सोचते कि मेरे काबिल है या नहीं। जो भी आया सहज भाव में कर दीया। कभी-कभी मनुष्य अपने काबिलीयत के अनुसार कर्म चाहता है। नहीं मिलने पर दु:खी-सुखी होता है और अपने काबिलीयत पर शंका करता है। ये भी एक दु:ख का कारण है।

हमने अपने दादी भगवान को देखा, उन्होंने कभी ऐसी शंका नहीं की। समय पर मट्टी भी उठाई, cement भी उठाया, फूल भी उठाए। जो भी चीज़ सामने आई कभी minus plus नहीं किया, counting नहीं किया। सहज सरल भाव से कर्म, कर्म के लिए किया, कर्म खुद के लिए नहीं किया। कर्म कर्म के लिए करो तो तुझे तृप्ती आती है, counting नहीं होती, फल पर दृष्टी नहीं जाती। पर जे कर्म अपनी खुशी के लिए करो, तो तू कभी नाखुश हो जाता है, अतृप्त रहता है, Success भी नहीं जाता। उन्होंने जो मार्ग दिखाया, करते हुए भी तू कर्ता नहीं। तू कर्ता नहीं तो गिनती क्यों करता है ? गिनती नहीं करता तो फल की इच्छा क्यों करता है ? हरवक्त एको ब्रम्ह, एक ही आराधना कि मैं ब्रम्हस्वरुप हूँ, सतगुरु मेरा सबसे ऊँचा, जिसने लखाया मुझमें ही मेरा प्यारा राम। यही उनका आदर्श है।

॥ है ही भगवान ॥

14-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“निष्काम जीवन”

हम कहेंगे निष्काम जीवन बनायें। मैंने अपने सतगुरु दादी भगवान को निष्काम में, तप में तपते देखा। कहीं मेहर भरी निगाह उठी, मेहरबान ने मेहरबानी की, निगाह से किसको भर दीया, कृथार्थ कर दीया। कहीं मुख खुला, दो वचन से किसकी life ऐसी बनी, सोचा भी न था। कहीं मेहरवाले ह्थ्ड़े उठें, मेहरबान ने सर पर हाथ गुमाया, दो जहान की खुशियाँ तो मिल गई, पर अपने आप को भूल गया। कहीं ऐसे कदम बढ़ गए जहाँ कोई प्यासी प्यास में बैठा था और उनके कदमों को खैंच लिया, अपनी प्यास बुझाई, जीवन बनाया। जहाँ जिसने पुकारा वहाँ पहुँच गए। अलख की धुनी जगाने, अलख का पता देने। कहीं भी पीछे न हट्टे। तपते रहे, निष्काम भी करते रहे। हर चीज़ सत्य के मार्ग पर उन्होंने खोल-खोलकर अपने आदर्शों की किताब बनाई। वाणीं दे देकर ग्रंथ बना दीया। ऐसे सतगुरु को मेरा बार-बार प्रणाम।

॥ है ही भगवान ॥

15-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।


"१५ अगस्त - आज़ादी का सुनहरा दिन"
I Love My India !

'जन गण मन अधिनायक जय है
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड उत्कल बंगा
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंगा
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे.. जय हे.. जय हे
जय जय जय जय हे'

भारत माता की जय !

भारत माता सबको आशीष दे, अपने India के बच्चों को आशीष दे, कि वो भारत माता की लाज बने, आदर्शों पर चले, अपने देश की सेवा करें। मेरे देश की धरती सोना उगले, चाँदी उगले, हीरे मोती उगले। वो तो उगले लेकिन हम संकल्प करते हैं, कि मेरे देश की धरती के बच्चे होनहार बने, अच्छे बने, आदर्शी बने, सोने मोती हीरे चांँदी से बढ़कर बने, अपने देश की लाज बने, विश्वास बने, अपने भारत माता का प्रेम बने।

एक एक बच्चे को यही दुआ है, कि अपना जीवन अपने भारतमाता की कुर्बानियों में लगा दो। उनकी कुर्बानियाँ याद करो, जिन्होंने कुर्बानी देकर आज़ादी दिलाई। उनकी कुर्बानियोंको व्यर्थ जाने ना दो।थोड़ीसी कस्स खाओ, खयालों की कस्स खाओ, अपने दस्तूरोंकी, अपने ईच्छाओं की थोड़ीसी कस्स खाओ। पर भारतमाता की शान में कस्स नहीं खाना। मेरे बच्चों यही हम दिल से दुआ देते हैं।

'हर कर्म अपना करेंगे
ऐ वतन तेरे लिए
हर करम अपना करेंगे
ऐ वतन तेरे लिए
दिल दीया है, जान भी देंगे
ऐ वतन तेरे लिए
दिल दीया है, जान भी देंगे
ऐ वतन तेरे लिए'

भारतमाता की जय !

I Love My India !

॥ है ही भगवान ॥

16-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।


"साधारण जन्म और उत्तम-अतिउत्तम अलौकिक जीवन"

ये ऐसा जन्म और ऐसा जीवन हमने श्री शारदा दादी भगवान का देखा। जन्म से तो वे साधारण घर में, आदर्शी घर में, आदर्शी माँ-बाप के through आदर्शी एक छोटी बच्ची ने जन्म लिया जो 'शारदा' बनके हम सब के बीच में खड़े हो गए। कब बडे़ हुए, बच्चों के दादी बन गए, school के teacher, supervisor बन गए, इसलिए नाम आया 'दादी', जो थे दादी भगवान हमारे। सत्य का मार्ग पकड़कर, उसी एक साधारण बच्ची जो 'शारदा' नाम से कही गई, सत्य का मार्ग पकड़कर, सतगुरू का हाथ थांमकर, अपने गुरुदेव को दिल में बसाकर, उन्होंने जगाई श्रध्दा सारे संसार में। आज भी जगा रहे हैं, कल भी जगाई। विश्वास है, भरोसा है, अपनी माँ प्रकृती पर कि आगे भी वो जगाते ही रहेंगे, जगाते ही जाएँगे।

तूफान कई आए, उन्होंने तूफानों में खड़े होकर दिखाया। इल्ज़ाम भी आए फिर भी ह्रदय को साफ-सुथरा रखा, मुख को हर वक्त बंद रखा। यही इनका धीरज, महाधीरज और जो उन्होंने दिल ही दिल में अपने सतगुरू को surrender किया, वो आज धीरज, महाधीरज, surrender करने की भावना हम सभी बच्चों को एक शक्ती देती है। उसी शक्ती के सहारे चल रहे हैं, चलते ही जाएँगे।

उनकी भक्ती अपरम्पार, ह्रदय से दिखे ना दिखे, ह्रदय से उन्होंने जो भक्ती में भिगो दिया खुदको, वो महसूस कराया अपने बच्चों को। जो हम सब उनके बच्चे हैं, उनकी भक्ती को शत्त-शत्त, उनके निश्चय को बारम्बार प्रणाम करते हैं, और यही कामना करते हैं कि हम उनके ही बताए हुए मार्ग पर चलते रहे। यही उनसे आशीष चाहते हैं।

॥ है ही भगवान ॥

17-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अकर्ता भाव"

अकर्ता भाव को दादी भगवान ने सिध्द करके दिखाया। Soldier के जैसा खड़े होते हैं, सिपाही के जैसा ever ready होते हैं, हर कर्म के लिए, हर हालत के लिए। हर कर्म निभाते हैं - मर्यादा-सहित, प्रेम-सहित, सतगुरू-आदर्शों के सहित, भक्तों की ख़ुशी के सहित, उन्होंने हर कर्म अपना निभाया। अकर्ता भाव से निभाया। महसूस नहीं हुआ कि वो कर रहे हैं। ज़र्रे-ज़र्रे अपने साकार गुरू की महिमा, उनको आगे रखना, निराकार के गुणगान करने से कभी ना थके। प्रकृति में जो भरोसा, जो प्रेम उन्होंने रखा, वो सब आज फल हम बच्चों को मिल रहा है कि सारे प्राकृति के सहारे चल रहे हैं।

कर्म कोई भी हो - छोटा या बड़ा, कभी counting नहीं करते हैं। कर्म किया उन्होंने, नाम किसका भी आया, हम खफे होते थे, लेकिन दादी भगवान कहते हैं, निराकार को और ज़्यादा देना है। नाम रुप आ गया तो बंधन आ गया, बंध लग गया। और कैसे देंगे ? निराकार देते रहे, किसी भी रूप में लेते रहे, जो उनकी लीला वो सर-आँखो पर, और उसकी लीला अपरम्पार। पक्का कराया उन्होंने कि कर्म हो जाए, करो नहीं। होने के बाद नाम रुप में न जाओ। कर्म कर्म के लिए होवे, सतसंग के लिए होवे, समाज के लिए होवे, संसार के लिए होवे, सतगुरू के आदर्श के लिए होवे। कर्म अपनी कीर्ती के लिए ना होवे। कर्म जे अगर अपनी कीर्ती के लिए हुआ तो बांध आ गया। निराकार उससे ज्यादा कैसे दे सकता है ? तूने नाम रुप का कर्म में बांध नहीं लगाया तो रास्ते खुले हैं। रोज़ ताज़ा मिलता है, ताज़ा तू बाँटता है।

कर्तापणे में तकलीफ ही तकलीफ है। अकर्ता भाव में तकलीफ आके भी कोई तकलीफ नहीं है, तकलीफों को भी प्रेम हो जाता है। बस सिर्फ झाँकने के लिए, दर्शन करने के लिए, उनके पास आए और चले गए। Counting में तकलीफ नहीं, तो तकलीफ में तकलीफ नहीं, प्रेम ही प्रेम है। मिलकर यही अरदास करो अपने गुरु से, सभी को ये अकर्ता भाव दे, प्रेम भाव दे, कि हर एक की dictionary से थकान शब्द दूर हो जाए।

॥ है ही भगवान ॥

18-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“हर कार्य धीरज से होवे"

धीरज मिठास है। धीरज बिगड़ी बात बना देता है। धीरज टूटे हुए रिश्ते जोड़ देता है।धीरज मन खुश रखता है। जब कोई बात बिगड़ जाए, हालत कोई आ भी पढ़े, तो भी धीरज का साथ कभी ना छोड़ना। हालतें favourable हो जाएगी, मन तेरा ज्योत स्वरुप हो जाएगा और सर्व में तुझे भगवान दिखाई देगा। भगवान देखते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो। बहना सीखो, रुकना नहीं।

हालत आए चाहे जैसी, लुट ना पाए मन की मस्ती। कर्म मेरी इच्छा अनुसार होवे, या विरुद्ध होव, तो भी जानना चाहिए, कर्म कर्म के लिए होता है। मेरी इच्छा और रुचि के लिये नहीं। बस कर्म कीएजा। फल की इच्छा ना कर। कर्म एक जीवन के लिए प्रसाद है। कर्म अपने जीवन की तृप्ति है। जीवन की satisfaction है। इसीलिए no-counting. बस only धीरज धीरज धीरज। जीवन की गाड़ी left गई तो भी क्या, right गई तो भी क्या। Ups down भी आए तो भी क्या। थी थी थी थी लाल छाँ थींदो, जेको थींदो सुठ्ठो ही थींदो।

।। है ही भगवान ।।

19-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कस्स खाओ, प्रेम ना छोड़ों"

ये मेरे सतगुरु श्री शारदा दादी भगवान जी का कहना है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में भाईचारा इतना मज़बूत रखा, कि कहीं भी हर चीज की कस्स खा सकते थे। पर प्रेम की कस्स उन्होंने कभी नहीं खाई। धन-दौलत, पदार्थ, ख्यालों की कस्स, मैं जीता ये कस्स, जीत के भी हार-जाना, जीत-हार से ऊपर उठ जाना, दोनों की meaning को छोड़ देना। ये उनकी पहचान है कि उन्होंने कभी भी, किसी से वैर-विरोध नहीं किया। ज़िंदगी में उलझने भी आई, प्यार से सुलझ गई, तूफान आए, मज़बूत बनाके चले गए। कई तरह की हालतें आई, हाल-चाल पूछके चलीगई। कुदरत ने हर तरफ से भरपूर रखा, शान-मान से रखा। क्योंकि उन्होंने हर वक्त, हर कदम पर, हर कोने में कस्स खाई। कस्स खाना कोई मजबूरी नहीं, बहादुरी है।

ख्यालों की कस्स खाओ, तो ख्यालों में सतगुरु बस जाते हैं। कस्स खाकर कैसी मजबूरी ! किसी पदार्थ की कस्स खाओ, तो परमात्मा बर्कत पड़ती है, जहाँ-तहाँ भगवान दिखाई देता है। कस्स कैसी हुई, मजबूरी कैसी, हर तरफ से boldness मिलती है अपने निश्चाय से। जो निश्चय उन्होंने किया और कराया, उसको शत्-शत् प्रणाम करते है। निश्चय के आगे, कोई राग-द्वेष टिकता नहीं, तकलीफें रुकती नहीं। वो दिखाई भी दे तो अपने जगह पर, तू अपनी जगह पर। एेसी ही लीला उन्होंने रचाई। हम सबके लिए आज "ग्रंथ-साहब" छोड़ा है, कि तू भी उसी लीला का हिस्सा बन और प्रेम में ज़िंदगी आगे बढ़ा, और मेरा लिया हुआ वादा, तेरा दिया हुआ वादा, "सृष्टि सुंदर करेंगे" उसको निभा।

॥ है ही भगवान ॥

20-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“सतगुरु झिणके तो मीठा लागे"

दादी भगवान ने पक्क कराया कि गुरु के घात्त में भी प्यार छुपा है। सतगुरु की एकों ही झलक, भक्त की लखांँदी मरज़ दूर हो जाती है। गुरु डाँटे तो ह्रदय से डर निकल जाता है। गुरू फटकार दे, तो भक्त हर angle पर, हर हालत में fit हो जाता है। इसीलिए तेरी शरण में जो आ गया, तो भव से उसे छुड़ा दिया, मज़बूत बनाया, निर्भय होके भजो भगवाना।

उन्होंने अपने सतगुरु में जो विश्वास रखा, हर हालत में उनको अपना माना, कदम-कदम पर श्रध्दा और विश्वास के सहारे, मज़बूती से अपने सतगुरु को मन में बसाकर, आँचल में खुद को छुपाकर, हर हालत से बाहर निकले। अपने बच्चों के लिए आशिर्वाद दिया है कि मेरे बच्चे भी हर हालत में, फूल की तरह खिलेंगे और खुलेंगे। हम उनके ही आँचल के सहारे सृष्टी सुंदर करेंगे। सतगुरु के आँचल से जो भी हवा आए, उन्होंने कहा है, प्रणाम करो, नमस्कार करो। गुरु दूरदृष्टी रखते हैं, भक्त की दृष्टी इतनी दूर नहीं जाती, इसीलिए दादी भगवान ने कहा, भक्त को श्रध्दा नहीं अंधीश्रध्दा चाहीए। Love is blind! भक्त को विश्वास नहीं, अटल-अडोल विश्वास चाहीए। भक्ती से काम नहीं चलेगा, अनन्य भक्ती चाहीए। दादी भगवान ने कहा, और कोई कार्य करो ना करो पर एक-एक में जड़-चेतन में, उसी निराकार की शक्ती को महसूस करो, जो आद से है ही है। उसका भी ना होता नाश। तू वही शक्ती है, उसी शक्ती में खुदको गुम करो, फिर गुम होइके वैख नज़ारा।

॥ है ही भगवान ॥

21-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“करुणा"

दादी भगवान की छत्र-छाया में रहकर करुणा क्या होती है, महसूस किया। करुणा उनके अखियों से बरसती है, हम निहाल हो जाते हैं। करुणा वाणी बनकर उनके मुख से बारिश हुई। ग्रंथसाहेब के सामने नतमस्तक करो तो भी तू निहाल है। करुणा उनके आदर्शों से, उनके खयालों से, विचारधाराओं से, सागर बनकर छोलियाँ मारी, भक्तों के ह्रदय में बो्ढ़ा-बो्ढ़ हो गई। इतनी करुणा बरसी, हर एक ह्रदय शुक्रानें गाने लगा।

उनके इशारों से सत्य की राह पाकर हर भक्त ने गाया - खुले मेरे किस्मत के ताले। हाथों का इशारा पाकर भी हर ह्रदय ने तृप्त होकर गाया - तेरे ज्ञान के ये ढ़ंग प्यारे प्यारे। कदम-कदम पर बच्चों को मज़बूत किया। खोल-खोल के हर एक के ह्रदय में कूट-कूटकर सत्य भरा। संदेश दिया सत्य के दीवाने कभी discourage नहीं होते। हर वक्त खुद को positive mood में रखो, negativity की तरफ निहारो नहीं। तेरे लिए only positive mood है, negative नहीं। अच्छी आदतें डालकर उन्होंने हम पर उपकार किया है। तेरे अहसान का बदला चुकाया जा नहीं सकता। सतगुरु, हे दादी भगवान, कर्म तूने किया है ऐसा, जो भुलाया जा नहीं सकता। तेरे हर इशारे, तेरे हर कर्म, तेरे हर खयाल, तेरी हर विचारधारा, तेरे ऊँची भावनाओं को कोटी-कोटी प्रणाम।

॥ है ही भगवान ॥

22-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“निभाना"

निभाना तो दादी भगवान के रगों में जैसे blood बनकर आज भी दौड़ रहा है। निभाया उन्होंने अपने परिवार से, निभाया सतगुरू से, निभाया सत्य के मार्ग पर चलने से जो कई कठिनाइयाँ आई भी तो निभाते चले, निभाया अपने भक्तों से। आज भी योगखेम का भार अपने सारी संगत का लेकर, संगत से निभा रहे हैं। सारी संगत को प्रेम देकर, ह्रदय में बैठकर, तृप्ती बनकर, संगत से निभा रहे हैं। हमसे तो निभाया ही है, निभा रहें है, आशा है मेरे गुरुदेव, हमें तो कोई शक्ती नहीं, हम तो निभाना नहीं जानते, प्रेम नहीं जानते। माँ छा जा्णाँ इश्क मंजा, माँ छा जा्णाँ प्रेम मंजा"|

तू ही निभाएगा, तू ही संभालेगा। भरोसा है तू मेरा, विश्वास है मेरा, प्रेम है मेरा। तेरे सहारे यह यज्ञ चल रहा है, चलता रहेगा। आसीस है आपकी, होती रहेगी, अपने बच्चों पर अन्नख पक्षी की तरह दृष्टी डाले हुए तू खड़ा है, तू खड़ा रहेगा। तेरे चरणों में, तेरे वचनों में जो सुख है, जो आनंद है, कहूँ कैसे कथा ये तो अनंत है।

॥ है ही भगवान ॥

23-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।
"शरीर की तपस्या, मन की तपस्या, वाणी, बुध्दि की तपस्या"

दादी भगवान ने हर तपस्या करके दिखाई और अपने सभी बच्चों को इससे - इस रास्ते से वाकीफ़ भी किया। शरीर कभी तप किया, हँसते-गाते ज्ञान सुनाया, सबको निष्काम प्रेम दिया। कहिओं के कर्म के guide बन गए, रास्ता दिखाया, मंज़ि़ले बताई। खुद तप करके अपना समय, अपनी नींद, अपनी routines, थोड़ी-बहुत बिगाड़के भी सब को तृप्त करते हैं। अच्छी ज़िंदगी गुज़रती है तपस्या में, ये उन्होंने अच्छे से समझाया कि शरीर ये न करे, तो और क्या करे ? ये न करेगा, निष्काम न करेगा तो शरीर सकाम में, किसको दु:खी, किसको सुखी, कहीं फायदा, कहीं नुकसान ही तो ढूँढेगा। तो इससे अच्छा है, अपनी तपस्या में रहो और गुरु वचनों से निष्काम जीवन बना दो। निष्काम करते-करते बहुत अच्छे से ज़िंदगी बीतती है।

कहीं कभी कोई शरीर के ऊपर दुख- बिमारी की हालत आई, 8 से 10 महिने में वो तो गुज़र गई, लेकीन उन्होंने हमें उस period में क्या दिया ? कितना दिया ? क्या-क्या दिखाया, सिखाया ? उस period में भी सभी को मालामाल कर दिया। कभी मुख़ से, कभी दृष्टी से, कभी हाथों के इशारों से। सब के अवतार बन गए। परमात्मा से संबंध क्या होता है, ये उन्होंने लखाया मुझको प्यारा राम। सब मेरा मीठा नूर है । ये उनकी पक हम सब बच्चों की झोली में डाल दिया। कि जेडां थी नज़र मांँ दौरायाँ, मिठे नूर खे थी पायाँ (सिंन्धी दोहा)। सो प्रभू दूर नहीं, सो प्रभू तू ही तो है। ऐसा दिया संदेश, प्रेम का दिया वरदान, अलौकिक आदर्श, एकता का बीज बोया, द्वेत का धुआँ उड़ा दिया, अपने छोटे से सत्संग को शुध्द बुध्द कर दिया, निहाल कर दिया अपने बच्चों को। आज हम भी यही भीतर ही भीतर, उनके आदर्शों को, उनकी तपस्या को, उनकी मीठी वाणी को, नमन करते हैं कि हे सतगुरू आसीस करो, तेरे प्रेम में, तेरे सभी बच्चे, तेरे आदर्शों पर खड़े उतरें, यही दुआ चाहते हैं।

॥ है ही भगवान ॥

24-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सभी को अपना बनाना, सर्व में पेख़े भगवाना"

दादी भगवान का स्वभाव - सत्य का भाव। उनका स्वभाव सत्य की एक कहानी है जो उन्होंने अपनों को पराया नहीं किया, लेकीन सभी को अपना ज़रूर किया। तभी तो वो सबके आँख के तारे, मन से दुलारे, प्यारे प्रियतम, सर्व के बन गए। जहाँ भी रुकते - अपनापन। किसी भी field में, अजनबियों के साथ भी, जब रुकते थे, रुकते हैं, आगे भी बच्चों के रुप में वो ही रुकेंगे। हम सभी बच्चों ने भी यही पक्क की है, कि हम भी उनकी तरह कभी कहीं कोई पराया नहीं देखेंगे। उनकी बातें याद करते-करते मन में एक शक्ती आती है, प्रेम की छोलियाँ और उठती हैं, जड़-चेतन में दीदार होता है, सर्व से प्यार भी होता है। 

जब उनके शरीर की तब्यत थोड़ी-सी ढ़ीली थी, वे जब hospital में सब sisters/nurses के बीच में रुकते थे, कहीं ये ना लगा कि वो घर से कहीं दूर हैं, या अपने परिवार से अलग हैं। जहाँ बैठे, वहाँ परिवार बना दिया। भजन को सिध्द कर दिया - 'जात हमारी आत्मा, परमेश्वर परिवार और घर मेरा सारा संसार'। परमात्मा जहाँ रखे, उनका कहना कि वो मेरा घर है। जिनके बीच में रखे वो मेरा परिवार है। न किसी चीज़ से कभी वो खफे होते, ना विखेप, ना आश्चर्य, ना इंतज़ार। ऐसी स्थिती के मालिक को मेरा-प्रणाम। जब कहीं भी कोई उन्हें कुछ दिनों के बाद देखता, तो न्योछावर जाता, कुर्बान हो जाता। फिर चाहे कोई समाज में मिले, पाँव छूकर शुक्राने मानता, या कोई hospital में nurse/ doctor मिले, वही पर भी वो खुश होके दिखाते, कि हम आपसे मिलके खुश होते हैं।

अब ऐसा क्या था ? कितना था ? कब तक रहेगा ? ऐसा था सत्य की ज्योती, अखंड ज्योती, अखंड ब्रह्म नायक वो ही थे, वो ही हैं, वो ही रहेंगे। कभी खुद के रुप में, कभी अपने बच्चों के रुप में, लेकीन रहेंगे तो वो ही। ज्योत एक जगी, संसार के राह को रोशन किया, कर रहे हैं। ज्ञान का प्रकाश, उजाला फैलता जा रहा है। उनकी प्रेरणा - मेरी सृष्टी 🌏 सुंदर करो। एक ही उनका प्यार भरा संकल्प सभी के ह्रदय में घर कर गया और लगन अपने दादी भगवान से सभी लगा बैठे हैं, कि उनका कुणका दिया हुआ हम मण करेंगे, और ज़रुर करेंगे। Time बदलेगा, मनुष्य का मन बदलेगा, स्वभाव में बदलाव आएगा समाज में, युग बदलेगा, यही अपने सतगुरु से आशीष चाहते हैं। आशीष करो गुरुदेव, तेरी प्रेरणा के सहारे, हम आपका यज्ञ और बढ़ाए और सर्व तक पहुँचे, यही दुआ दो।

॥ है ही भगवान ॥

25-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"२५ अगस्त - दादी भगवान के वरसी का दिन"
"आज २०१६, २५ अगस्त का दिन श्री शारदा दादी भगवानजी की दसवीं वरसी"

आज उनके सभी भक्तों ने मिल-जुलकर, यात्रा के १० साल पूरे किए। इस साल सभी को, उनके सभी बच्चों को, सभी भक्तों को, हम बधाई देते हैं, कि आपने साथी बनकर कितना साथ निभाया। आपने कदम-कदम पर साथ चलकर जो सहयोग दिया, उसके लिए हम बहुत खुश हैं, शुक्रिया भी मानते हैं, कि आज के युग में आपने इतना सत्य का साथ दिया।

दादी भगवान ने जो कहा मुख़ से - "मेरी सृष्टी 🌏 सुंदर करो", आज वो काम उनके बच्चों ने बखूबी निभाया, और उनकी आसीस से आगे भी, और अच्छा, और अच्छा निभाते रहेंगे।

१० वर्ष पहले जो ज्योत - ज्योत में समाई थी, उनके सब बच्चों में, ज्योति ज्योत में समाई, और मशाल बन गई। आज उनकी ज्योति मशाल बन गई है। सबको मिले तेरी रहमतें, सबको मिले तेरी बक्षिसें। हे दादी भगवान सब तक तेरी निश्चय की कथा पहुँचे कि तू देह नहीं तू ब्रम्ह है। ये प्रसाद सब तक पहुँचे, ये आसीष आज हम सारे बच्चे आपके चाहते हैं। है खुदा का कर्म, आज इन्सान हम, आपने इन्सान बनाया, देवता बनाया, भगवान बनाया। आपने खुशियाँ दी, दोनों जहाँन की खुशियाँ दी, ज़िंदगी झूम उठी। कैसे झूमें ना हम दिलों जान से, जब खुदा पा लिया हमने ईमान से। गा उठे तेरे बच्चे, तेरे भक्त झूम उठे। झूमते-झूमते निश्चय करेंगे, झुमाते-झुमाते सभी को निश्चय कराऐंगे और तेरी कथा, अनंत कथा सभी को सुनाएँगे, कि दादी भगवान ने कैसे सबको ज़िदगी दी है।

भ्रम सारे मिटा दिए आपने, एक ईश्वर की आपने, शक्ती का, अापने भक्ती का, प्रेम का रास्ता बताया, उसी रास्ते पर चलकर हम आपकी सृष्टी 🌏 तक पहुँचेंगे। बिना ज्ञान हर कोई धोखा खाए, प्यासा आए, प्यासा जाए। लेकिन आपने हे गुरुदेव, हम सबकी प्यास बुझा दी, हम सब तृप्त हैं, तृप्त रहेंगे और तृप्ती बाँटते जाएंगे।

एक ही गीत गाएँगे कि -

दादी तो बसे हैं कण-कण में, हम सब के जीवन में।
नाम कोई भी लिजिए, ईश्वर तो है एक।
नाम कोई भी लिजिए, ईश्वर तो है एक।
सतगुरू प्यारे से संतों, लेकर आँखें देख।
दादी भगवन से प्यारे, लेकर आँखें देख।
चाहे माटी हो यां सोना, हर श्ए में बसे सलोना।
इसके ही नूर से देखो, भरपूर है कोना कोना।
ये दादी तो बसे हैं कण-कण में, हम सबके जीवन में।
ये दादी तो बसे हैं कण-कण में, हम सबके जीवन में।
श्री शारदा शरणम् शरणम्, श्री शारदा शरणम् शरणम्
श्री शारदा शरणम् शरणम्, श्री शारदा शरणम् शरणम्।
॥ बोलो शारदा दादी भगवान् की जय ॥

॥ है ही भगवान ॥

26-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरा निश्चय"

मेरा निश्चय यही है कि सात समुँदर मसीं करुँ, लेखन सब वड़राय, लेकिन गुरु महिमा लिखी ना जाए। वाणी करे न सग्ंदी, तुँहिंजो कढ्हें भी वर्णन। इस जु़बान को ताकत नहीं सतगुरु की महिमा पूर्णता से कर सके। जितनी कहो, जितनी भीतर से निकले, फिर भी अधुरी सी लगती है, कि वो तो और इससे उपर हैं। उनकी महिमा करने से, उनके दिन मनाने से शक्ती बढ़ती है। भीतर की आत्मिक शक्ती बढ़ती जाती है, देह अध्यास छूटता जाता है। उनकी महिमा, उनकी वाणी के गुणगान करने से, भक्तों का आपस में भाईचारा और संसार के बीच में भी भाईचारा मज़बूत होता है। परिवारों में उनके आदर्शों से खुशहाली आती है, ह्रदय झूमने लगता है, खुश रहने लगता है, शक्ती बढ़ती है, भक्ती बढ़ती है, प्रेम बढ़ता है, त्याग-वैराग में कमी नहीं आती। खज़ाना भरपूर रहता है त्याग-वैराग, संतोष से।

संतोष धन उनका दिया हुआ, सुखी कर देता है, और उनसे मिला हुआ वरदान, निष्काम ज़िंदगी, निष्काम प्रेम बाँटने की भावना, उस्थती से बने स्थिती, यही मज़बूती से पकता कराई। इसी पकता के साथ, इसी प्रेम के सहारे ज़िंदगी बीतती जाए, यही कामना गुरुदेव से prayer करती हूँ ।

॥ है ही भगवान ॥

27-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"खाना - खाने-पीने की इज्ज़त"

खाना जब waste करते हो, dustbin में डालते हो तो कहते हैं खाने की इज्ज़त नहीं हुई। बराबर है। लेकिन क्या आपने ध्यान दिया है कि जब आप अधिक खाते हो, ज़्यादा खाते हो, वो भी खाने की इज्ज़त नहीं क्योंकी तेरे भीतर digestion power अधिक नहीं। जितना तू हज़म कर सकता है, उतना खाया तो हुई इज्ज़त। उससे ज़्यादा अंदर भेजा, कहीं पर तेरा खाना जलकर तेरी acidity बन गया, कहीं जलकर कोने में सड़ रहा है, कोई ना कोई बिमारी पैदा कर देगा। अंदर कचरा क्यों करते हो।

प्रेम से जितना एक मनुष्य को खाना खाना चाहिए, उतना खाना खाने की आदत डाल दो। अगर ज़्यादा खा लिया है, आदत डाल दी है, तो भी, अब कुछ बिगड़ा नहीं। धीरे धीरे धीरे धीरे थोड़ा कम करते जाओ। जितना तू ज़्यादा अनाज खाएगा, उतना ही वज़न बढे़गा। वजन को कम करने के लिए बड़ी तकलीफ तुझे उठानी तो पड़ेगी ना। वज़न है तो बिमारियाँ है, तकलीफें है। इसलिए हर चीज़ की इज्ज़त करो। ज़रुरत से ज्यादा बाहर ना फेंको, ना अपने अंदर भेजो। तो ही तेरी तंदरुस्ती अच्छी रहेगी। धीरे-धीरे, कम-कम-कम करते जाओगे, तो कम खाने की आदत पड़ जाएगी। थोड़ा fruit लो, थोड़ा salad लो, अपने तंदरुस्ती के दोस्त बनो, दुश्मन नहीं।

॥ है ही भगवान ॥

28-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दर्द"

दर्द एक ऐसी चीज़ है जो दवा भी बन सकती है। लेकिन दर्द में तेरा स्वार्थ ना हो, परमात्मा का प्रेम हो। दर्द दिल में तू जगा, सत्य की राह पाने का, तो साथ देंगे तुझको निराकार, जे तेरी श्रध्दा है अपार। दर्द के सिवाय तू संसार में आधा अधुरा है। दर्द है तो तुझे मन की स्थिरता प्राप्त होगी। दर्द है तो तू किसी सामनेवाले की ह्रदय को परख सकेगा, समझ सकेगा, उसका दर्द मिटा सकेगा।

दर्द दिल में है तो तू निष्काम राहों पर चलने में कामयाब रहेगा। जब तेरे ह्रदय में दर्द ही नहीं, तो तू दूसरे का दर्द किस प्रकार समझ सकता है ? इसीलिए आत्म निश्चय करो, उसके लिए दर्द जगाओ कि मैं निश्चय करुँ, और सतगुरु की राहों पर चलूंँ। तभी तेरा उध्दार है, और तेरा श्रृंगार है। सत्यम, शिवम, और सुंदरम सब तू ही है, तेरे से ही है, लेकिन first दर्द है। दर्द जगाओ और सर्व को अपना बनाओ।

॥ है ही भगवान ॥

29-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सुहाना सफर"

अपने जीवन का सफर सुहाना बनाने के लिए, कोई ज़्यादा कष्ट उठाने नहीं पढ़ते हैं। बस थोड़ासा ध्यान। खाना-पीना, उठना-बैठना, ख्यालों पर दृष्टी, अपने मुख पर दृष्टी। ख्याल भंगार के जो तेरे लिए ज़रुरी नहीं हैं, उसको ज्ञान दृष्टी से आप निकाल सकते हैं। जब भी कोई ख्याल आए, तेरे से टकराए, जिस ख्याल का कोई काम नहीं, तू झटका देकर मैं देह नहीं, मैं ब्रह्मस्वरुप हूँ, ख्यालों को बाहर कर दे।

अपने खाने पीने पर जब ध्यान देगा, तो आपके ख्याल भी अच्छे बनते जाएँगे। सात्विक ख्याल, सात्विक खाना, सात्विक कर्म, यही है तेरा सफर जीवन का जो सुंदर है। उलझनों को तू सुलझा सकता है ज्ञान से। नफरत को तू प्रेम में बदल सकता है ज्ञान से, अपने निश्चय से। अपना निश्चय करो और अपने सफर को सुहाना बनाओ।

॥ है ही भगवान ॥

30-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"व्यवहार की सफाई "

व्यवहार की सफाई जब तक मनुष्य के जिंदगी में नहीं है तब तक मनुष्य को मन की शांति, संतोष मिलना ही नहीं है । जब तक शांति ना मिले मनुष्य अपना जीवन कैसे जी सकता है ? व्यवहार उलझन में क्यों आता है ? क्योंकि बहुत बार आप कई बातों में waste करते हो । घर ग्रहस्त में भी wastage बहुत सारी होती है । excess में खरीदारी करने का शौंक, जरूरत नहीं है तो भी चार चीजें लाने का शौंक, marketing करने के सिवाय मनुष्य का गुज़ारा नहीं होता । जरूरत नहीं है, काम चल सकता है तो भी तू कुछ न कुछ खरीद के आता है

व्यवहार तेरे काम काज में भी अगर साफ सुथरा नहीं है, तो success थोड़ी सी दूरी पर है । अगर जितनी चद्दर है उतने पांव लंबा करो, जितनी तेरी capacity है उतना काम करो । कर्जे में क्या रखा है । मन मायूस होता है,tension आते हैं, दोस्ती दुश्मनी बदलती रहती है । तू भी बुरा मानता, सामने वाला भी बुरा ही मानता है, रिश्ते खराब होते हैं । कर्जा अच्छी चीज़ नहीं है, प्रालब्ध पर भरोसा रखके तू चल नेक राह में । कुदरत माता बहुत ही मदद करती है जो उसके ऊपर छोड़ते है, उसको साथ लेके चलते हैं ।

क्या फरक पड़ता है, थोड़ा कम किया तो बरकत ज्यादा पड़ेगी । दिखने में तू बड़ा आदमी न आए तो क्या हुआ, मन से तो बड़ा है न, मन की खुशी में तो बड़ा है न । अपने व्यवहार को ठीक रखो,clear करो । देने वाली चीजों को दे दो, लेने वाली चीजों को ले लो । और अपना व्यवहार सरलतापूर्वक करो तो तेरी जिंदगी अच्छी गुजरेगी और Golden Future Is Waiting For You, सुनहरा भविष्य तेरी सफाई के साथ, सच्चाई के साथ, अच्छे व्यवहार के साथ, आ ही जाएगा ।

॥ है ही भगवान ॥

31-Aug-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"श्री शारदा दादी भगवान और मेरी गंगा मैया"

गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे,
मेरे सतगुरु तेरी ज्ञान कहानी रहे, ज्ञान कहानी रहे
मैया ओ गंगा मैया, मैया ओ गंगा मैया
ओ गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे
मेरे सतगुरु तेरी प्रेम कहानी रहे, प्रेम कहानी रहे
मैया ओ गंगा मैया, दादी मैया, ओ दादी मैया
मैया ओ दादी मैया, मैया ओ दादी मैया।

अपनी गंगा मैया को प्रणाम करते हुए, सतगुरु भगवान को प्रणाम करते हुए, मैं माँ गंगा का जल लेकर, अपनी संगत को छंडा डाल रही हूँ। अपनी सृष्टि को छंडा डाल रही हूँ ताकि दादी भगवान के बच्चे सृष्टि की तरफ भागे, ठंडे होकर भागे, relax होकर भागे और सृष्टि सुंदर करें। उनको दिया हुआ वादा हम सब पूरा करें। गंगा मैया पर हम यही मन में भावना लेकर, डुबकी लगा रहे हैं। अपनी संगत की डुबकी, अपनी सृष्टि की डुबकी, कण-कण की डुबकी लगाते हुए आनंदित हो रहे हैं, आनंद आ रहा है। ब्रह्म कुँड को सब नमस्कार करो और मन में महसूस करो कि आप सब मेरे साथ हो, मेरे पास हो। मेरी गंगा में, मेरी मैया के साथ हो।

२००६ - २००६ में जब हम गंगा मैया पर आए थे, बुझे-बुझे मन से पूजा की, पाठ किया और अपने मीठी सतगुरु की यादों को गंगा मैया में अर्पित किया। कामना की थी कि हे माँ, हे गंगा मैया इतनी शक्ति देना, कि अपने सतगुरु के सपने सजा सकूँ। संतों का सहारा, संतों का संग प्राप्त करने में सफल रहूँ, यात्रा आरंभ हुई थी।

आज २०१६ में १० साल की यात्रा के बाद, उसी जगह खड़ी हूँ, खुश हूँ। आज मन बुझा नहीं है, आज ह्रदय जलता हुआ दिया है। आज जीवन एक मशाल है क्योंकि मैंने अपने सतगुरु को उनके भक्तों के ह्रदय में पाया है। उनके भक्तों के आँखों में दर्शन किया है। उनके साथ का सहारा लेकर जब हम चले हैं, तो खड़े उतरे हैं। नाज़ है खुद पर और अपने साथियों पर जिन्होंने खुशी दिलाई। हे सतगुरु महर तो आपकी है, हम सभी पर, तू ही हमारी रथ का सारथी है, सच्चा साथी है। तेरे इशारे यह यज्ञ चलता है, चल रहा है, चलता ही रहेगा। तेरा साथ है, किसी चीज़ की कमी ना रहेगी, हर तूफान शांति की गठरी लेकर आएगा, ठंडी हवाएँ लेकर आएगा। बस इतनी सी इल्तजा है कि आप, आपके भक्त, जो मेरे बच्चे हैं, उनकी मुस्कुराहट का ध्यान रखना।

गंगा मैया में आते रहें, यज्ञ चलता रहे। सब बच्चे मुस्कुराए, त्याग वैराग में भरपूर रहें, आत्म निश्चय में अव्वल नंबर रहें, निष्काम ज़िंदगी में सबसे ऊपर रहें, सृष्टि की ओर भागते रहें, थकान शब्द मेरे बच्चों के कभी dictionary में ना आए, everfresh रहें, उनके जीवन में हर वक्त morning रहे। प्यार जो तूने दिया, सबको यह शक्ति देना कि कुणके से मणका बनाएँ। आपके आदर्शों पर खड़े उतरें, यही अपनी गंगा मैया पर रुककर पलव थी पायाँ।

ओ मुहिंजी बे्ड़ी अथई विच्च सीर ते
पलव पायाँ थी माँ ज़िंदपीर ते
पलव पायाँ थी माँ गंगा मैया ते।

॥ है ही भगवान ॥

September
01-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एक ही नूर"

एक नूर से सब जग उपजे। एक नूर देखने से तेरे ह्रदय में relax आ जाती है। भिन्न-भिन्न भगवान देखा, भिन्न-भिन्न शक्तियाँ देखी, भिन्नता में भगवान दिखाई नहीं देता। एक ही नूर है, जो One became many, एक से हुआ अनेक। एक पर दृष्टी रखो तो अनेकता में भी वही एक शक्ती महसूस होने लगेगी, और एक नूर पर दृष्टी जब आती है तो मन की शांती गहरी हो जाती है।

बदलाव में भी तू भिन्नता में नहीं आता, भेद भ्रमों में नहीं आता। बदलाव को भी महसूस कीया है कि changeable ही है पूरी प्रकृति। फिर मैं दृष्टी को बदलाव में क्यों डालूँ ? नूर से क्यों हटाऊँ ? ऐसा तेरा निश्चय है, तो तू अनेकता में भी एकता महसूस करेगा। वरना एकता है, तो भी तू अलग-अलग देखके अशांत होता रहता है। प्रेम करो परमात्मा के ज़र्रे-ज़र्रे से। उसकी ही झलक-फलक जड़-चेतन में महसूस करो। तो ही तेरा लक्ष, तेरी मंज़िल, तुझे मिल सकती है। जन्म सफल हो सकता है, एक ही भगवान देखने से।

॥ है ही भगवान ॥

02-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“तेरा अपना धर्म”

सतगुरु पहले दिन, पहला सबक देते हैं कि तेरा अपना धर्म है, स्वधर्म है, स्वः को जानना। खुद को जानना कि तू देह नहीं है तू आत्मा है। उसके बाद तेरा अपना धर्म ये कहता है, कि आप जब देह थे तो जो आदतें, जो routines आप में थी, अब धीरे-धीरे-धीरे-धीरे करके बदलाव लाना है। अपनी आदतों को बदलना है। थोड़ी-थोड़ी करके भी रोज़ अपनी एक आदत को छोड़ते जाओ। तू सुखी हो जाएगा। तू सर्व को सुखी करेगा।

तू दुखी करना नहीं चाहता, लेकिन तेरी आदतें तुझे दुखी करती है, तू फिर सबको दुखी कर सकता है। तेरा अपना धर्म है, अपनी तृप्ती को ढूँढना और अपनी आदतों को ठीक रखना। तभी तो जाके संसार में बदलाव आ सकता है। तेरे एक की आदत जब change हो जाए और बदलाव संसार में आए तो सौदा अच्छा है, please अपने को change करो और संतोष धन को प्राप्त करो।

॥ है ही भगवान ॥

03-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हकीकी तपस्या"

हकीकत में तपस्या एक ही है - गुरु वाक्यम सत्यम। जब तू गुरू वाक्य सत्य करके उठाता है, तो तू सत्यम, शिवम और सुंदरम् बन जाता है। गुरु वाक्य सत्य के बिना देह-अध्यास जाता नहीं। देह-अध्यास गए बिना आत्म-रस आता नहीं। आत्म-रस आए बिना तृप्ती मिलती नहीं। और तृप्ती जब नहीं मिलती है, तो तू स्वभाव से किट-किट, मन से खफे, परेशान, तन से बीमार।

इसलिए एक सरल रास्ता यही है, कि एक तरफ सत्संग का नेम-टेम और प्रेम, दूसरी तरफ सत्संग में आने के बाद गुरु वाक्यम सत्यम। गुरु वाक्यम सत्यम किया तो रथ पर, तेरे जीवन के रथ पर, भगवान विराजमान हो गए। राह दिखाते हैं, रास्तों में कष्ट-कशाला आए भी तो उठा लेते हैं, और जिंदगी आराम में गुज़रती है। प्रेम सिखाते हैं, प्रेम दिलाते हैं, प्रेम की पहचान देते हैं।

॥ है ही भगवान ॥

04-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आपकी सच्ची सुंदरता"

एक मनुष्य की सच्ची सुंदरता किसमें है ? क्या देह-अध्यास में ? क्या देह-अध्यास के जो भी तू देह को बातें देता है, उसमें तेरी सुंदरता है ? निखार आता है ? देह को तू कितना भी सजाले लेकिन तेरी हकीकी सुंदरता तेरे ख्यालों के पीछे छुपी हुई है। तेरे ख्यालों का रंग तेरे चेहरे पर आता ही है। तू चेहरे को कितना भी रूपवान बना, क्या भी लगा, कितना भी artificial रस्ता ले ले, लेकीन ख्यालों की रंगत तेरे चेहरे पर न आए ये हो नहीं सकता।

जैसे तेरे ख्याल हैं, वैसे तेरी रेखाएँ तेरे चेहरे पर दिखाई देती हैं। जैसे तेरे ख्याल हैं, वैसे तेरा आदर्श सामने दिखाई देता हैं। ख्यालों को ठीक करो। गुरु ज्ञान से, गुरु प्रेम से, सत्संग के नियम से अपने ख्यालों का इलाज करो। भंगार के ख्याल जितने तू भीतर रखेगा उतनी ही तेरी सुंदरता को दाग लगते हैं। घर तो खराब होता ही है लेकीन तेरी सुंदरता भी खराब होती है। जिसको तू प्रेम करता है, जो तुझे अति प्रिय है तेरी सुंदरता, वो तेरे ख्यालों के पीछे छुपी है। ख्याल अच्छे रखो। डीठ ख्याल ना रखो जो सुंदरता को आगे आने ही ना दे। सुंदरता का रास्ता रोक दे, ऐसे जिद्दी ख्यालों को छोड़ते जाओ और खुद को अति सुंदर बनाते जाओ।

॥ है ही भगवान ॥

05-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निडरता और नम्रता"

निडरता और नम्रता दोनों में गहरा संबंध। दोनों में इस तरह संबंध है, जो जब दोनों साथ चले तो जीवन स्वर्ग बना दे। पर जे दोनों बहने अकेली-अकेली अलग-अलग दिशाओं में चलना शुरु करें तो जीवन अच्छा नहीं नर्क बन जाता है। निडरता अगर आपने भीतर रखी और नम्रता को बाहर निकाल दिया, तो निडरता तेरे को किसी से भी प्रेम नहीं करने देती है। सबको तू order में चलाना चाहता है। सबके ऊपर तू हावी पड़ जाता है, भारी पड़ जाता है। कोई तेरे आगे रुक नहीं सकता। चाहते हुए भी तुझसे प्रेम कर नहीं सकता। तेरा प्रेम कबूल नहीं कर सकता, क्योंकि तेरे पास निडरता है। जिसके कारण तू कइयों को तकलीफ में डालता है।

निम्रता - अगर निम्रता भीतर है तेरे, और निडरता नहीं है, तो तू फकत निम्रता करते-करते-करते-करतेे, कभी-कभी थक जाता है। तू कहता है मैं आखिर कितना सहूँ, कितना झूकूं, कुछ तो मेरी भी life है। पर निडरता तेरे पास नहीं है तो तू कुछ तो life जी नहीं सकता। बस मरा सो मरा। पर जे तेरे भीतर निडरता और नम्रता दोनों रहेंगे तो सुरंदे की तार से नए-नए संगीत की आशा है। तू कहीं निडरता कहीं निम्रता रखकर allround बनेगा। सबको प्रेम भी करेगा, अपना भी जीना सीख लेगा, औरों के लिए रास्ता छोड़ेगा, हर चीज़ तेरे से अच्छी होगी, जे नम्रता और निडरता दोनों का संगम एक साथ होगा तो।

॥ है ही भगवान ॥

06-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मन मुखता"

मन मुख़ी सदाईं दु:खी। जो मन के कहने पर चलता है वो कभी अपने लक्ष तक नहीं पहुँच पाता। मन पर विजयी होनेवाला जिज्ञासु सफलताओं की सीढ़ीयों पर चढ़ता जाता है। मन मुख़ी कईं प्रकार के दोखे खाता है। मन-मत डुबाए, गुरु-मत तारे। तू चलना मेरे मन सतगुरु के सहारे। कई प्रकार के दोखे खाता है मन मुख़ी, मन मत पर चलनेवाला। तृप्त कभी नहीं रहता, निष्काम प्रेम नहीं कर सकता, अपने भीतर झाँक नहीं सकता, अपनी गलतियाँ समझ नहीं सकता, मान नहीं सकता। किसी के साथ प्रेम निभा नहीं सकता क्योंकी मन मुख़ी को संयम balance नहीं रहता।

इतनी सारी बिमारीयां - कारण एक - तेरी मन मुखता है। निवारण कर सको तो तेरा जन्म और जीवन सफल हो जाएगा और तू कहींयोंको सफल बनाने में सहयोगी बन जाएगा। लेकिन मन मुखता तेरा जीवन नष्ट करेगी। संभालके जो चलते हैं, वो तर जाते हैं।मन मुख़ी तो डूब ही जाता है।

॥ है ही भगवान ॥

07-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

कौरव-पाण्डव की लड़ाई, तेरी ज्ञान-अज्ञान की लड़ाई है। जीवन संग्राम है, कड़ी धूप में तू air condition की हवा चाहता है। प्रकृती अपने धर्म में चलेगी। मनुष्य की सुख बुध्दी है जो चाहता है, प्रकृती समरस रहे। प्रकृती परिवर्तनशील है - मन की प्रकृती, तन की प्रकृती, बाहर की प्रकृती, घर की प्रकृती, प्रकृती अपने गुणों में वर्णित है। 'थिर मन ब्रम्ह है, अथिर मन संसार'। संसार में रहते तू असंसारी हो जा। प्रकृती विचलित होवे, मैं अपने गुण को न छोडूॅं, अपनी स्थिरता को न छोड़ूॅं, अपने स्वधर्म में रहूॅं। यह निश्चय एक Art है, जो हमें सब बंधनों से, सब कैदों से, सब कर्मों से, प्राप्त हुई हथकड़ियों से मुक्ति दिलाता है। 'अपना सत् चित् आनंद रुप कोई कोई जाने रे'।

।। है ही भगवान ।।

07-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पत्र पुष्प फल तोए"

पत्र - तेरा तन, पुष्प- तेरा मन, फलम - तेरे अंत: करण, तोए - तेरे नैनों की धार। तन - प्रभु को अर्पण, सतगुरु को अर्पण। मन बेचे सतगुरु के पास, उस सेवक के कार्ज रास। फलम तेरे कर्मों का, अंत: कर्म का फल मिलता ही रहता है चाहे कर्म सत हो या बद हो। समर्पण ईश्वर को कर दो, तो ईश्वर तुझमें, तू ईश्वर में। फल कौन दे ? फल कौन ले ? नैनों की धार सुख में बहे, दु:ख़ में बहे या प्रेम में बहे, राग-द्वेष, नफरत में बहे। पर जे ईश्वर-प्रेम में बहे, तो ईश्वर मुझमें, मैं ईश्वर में, सतगुरु स्वरूप सामने।

दो है नहीं, एक ही एक। तेरे भीतर ही है सब पत्र, पुष्प, फल, तोऐ सब तेरे भीतर ही है। भीतर सखा, भीतर तेरा दोस्त और दुश्मन। इसीलिए लौट के अपने घर में आजा, अंर्तमुखी होजा, अपनी ही सफाई पर लग जा। तन को, मन को, बुध्दी को, फल की भावनाओं को, नैनों से निकली धार को, हर चीज़ की quality सही करो, साफ-सुथरी करो तो ईश्वर एक तेरे ह्रदय में बसे हुए हैं।सतगुरु तेरे साथ है। ईश्वर और सतगुरु में अंतर नहीं। निराकार ही साकार रूप धारे आयो जगत में। जगत में जगदीश दिखाया सतगुरु ने।

॥ है ही भगवान ॥

08-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दीवानापन"

दीवानापन हर मनुष्य में होता ही है। अपने दीवाने पर, अपना दिल दीवाना जो बना है उसपर दृष्टी रख। वो कौनसा दीवानापन चाहते हैं ? वो permanant दीवानापन चाहती है। तेरी दिल धोखा खाना नहीं चाहती। तेरा ह्रद्य भरपूर रहना चाहता है। तू फकत उसको दीवानगी का सही मार्ग बता दे। दीवानगी का दो मार्ग हैं - एक तू देह की दीवानगी पर आ ही जाता है, एक आत्मा की दीवानगी है। देह में तेरी दीवानगी कभी-कभी counting में चली जाती है। कम-जास्ती में चली जाती है, अच्छे-बुरे में चली जाती है। पहले और बाद में, तेरी और मेरी इसमें भी चली जाती है। लेकीन आत्मा की दीवानगी सीधी चाल चलती है। सतगुरु मुहिंजो आहे आत्म। वो दीवानगी sprituality की तरफ जाती है, और जब मनुष्य ईश्वर प्रेम में, ईश्वर की दीवानगी में मगन हो जाता है, तो दुनिया से दूर नहीं होता। दुनिया की दीवानगी में चला जाता है तो ईश्वर से दूर हो सकता है।

फैसला आपके हाथ में है, कहाँ तेरा जन्म सफल होता है, कहाँ तुझे सुख मिल सकता है, कहाँ तू किसी खड्डों में भी गिर सकता है। अपने मन को ज़रा संभालो, अपने मन को थोड़ासा मार्ग दिखाओ। मन तेरा बुरा नहीं है, लेेकिन मार्ग सच्चा और सही नहीं है। सतगुरु से मार्ग मिलता है, और मार्ग दोष भी कट जाता है। साथ जिसके सतगुरु हैं, वो भगवान ही भगवान देखते हैं, तो कष्ट कहाँ से आएँगे। कष्ट आकर भी तेरी हिम्मत बढ़ाएंगे, शक्ती बढ़ाएँगे, रास्ता दिखाएँगे, अनुभव बढ़ाएँगे, तुझे और उत्तम बनाएँगे। तू एक उत्तम जिज्ञासू बन जाएगा,जे प्रभू की दीवानगी में आकर संसार को सुखी करेगा तो।

॥ है ही भगवान ॥

09-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हरिद्वार सफर"

आज गंगा मैया पर खड़े होकर सफर पूरा कर रहे हैं। आपको छँडा डालते हैं। गंगा मैया से आशीर्वाद लेकर निकल रहे हैं। बहुत अच्छा लगा। यही आशीष चाहती हूँ गंगा मैया, कि इसी दिन, इसी अगस्त में, इसी दिन, हर अगस्त में बुलाते रहना। शक्ति देना कि तेरे द्वारे आऊँ और अपने सतगरु की यादों को ताजा करके जाऊँ। अपने यज्ञ के लिए, अपने बच्चों के लिए, आंचल भी फैला के जाऊँ, पलव पाके जाऊँ॥ सतगुरु प्यारे ने वैसे तो आना-जाना मिटा दिया, जीवन का राज़ समझा दिया। लेकिन आनंद भी आता है यह कहते हुए कि माँ मैं आई हूँ, माँ मैं जा रही हूँ। आप साथ रहना, सफर सुहाना बनाना।

आनंद का कोई कोना ना छोड़ो, प्रेम दिल में रखो, इज़हार मुख में रखो। तभी प्रेम सफल होता है। हर चीज़ का आनंद लो, स्थिरता का आनंद, आने-जाने का आनंद, थिर रहने का आनंद, सफर सुहाना बनाने का आनंद। कहीं कोई कस ना खाओ। मूँ मिसल शाद रहो, आबाद रहो, सफर सुहानाें भणाईंदा रहो, मुस्कुराईंदा रहो। चलते रहना तेरी ज़िंदगी है, रुकना तेरा शान नहीं।

बोल गंगा मैया की जय।
हर हर महादेव की जय।
सारी संगत की जय।
सब देवी देवताओं की जय।
सारी सृष्टि की जय।

॥ है ही भगवान ॥

10-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कण-कण में भगवान"

ऐसा निश्चय होवे कि कण-कण में भगवान है। भगवान कौन है ? वह एक शक्ति, वो शक्ति कहाँ है ? वह तू ही है, तेरे भीतर है, बाहर भी है, दाए भी है, बाएँ भी है, हर तरफ हर दिशा में, हर रास्ते में वही एक शक्ति है। कण-कण वासी है, घट-घट निवासी है, उसी शक्ति से तू कहीं दूर नहीं। तेरे रग-रग में, तेरे नस-नस में, उसी शक्ति में समाई हुई है। तू उसी में समाया हुआ है, वह तुझमें समाई हुई है। फर्क इतना है कि तू देह-अध्यास के कारण, अपने अहंकार के कारण, अपने विकारों के कारण, तू उस शक्ति को महसूस नहीं कर सकता।

बादल अज्ञान के तेरे side हो जाए, अंधेरा सतगुरु के वचनों से उजालों में बदल जाए तो तू शक्ति का दर्शन कर जाए। अपने शक्ति का दर्शन करो जो हर वक्त है, हमेशा है, देह के होते हुए भी है, देह के पहले भी थी, देह छोड़ने के बाद भी वह ही शक्ति है ही है। उस शक्ति की पहचान कर।

शक्तिअ पँहजीअ खे कर याद। अपनी शक्ती को याद करो जो तू भूल चुका है। कण-कण में अगर तू भगवान देेखे तो विखेप की, तकलीफ की, परेशानियों की सारी खिड़कियाँ तेरे जीवन से बंद हो जाए। खुले द्वार मिलेंगे तुझे प्रेम के लिए। प्रियतम दौड़ता आएगा सतगुरु के रुप में, भगवान के रुप में, हर घट-घट में तू अपनी उसी शक्ति का अहसास करेगा, महसूस करेगा। यह सौदा बुरा नहीं है। अच्छा है कर लो, खुला था बाज़ार तो सौदा नहीं किया, हुई हटकार तो सौदा याद आ जाएगा।

जब तकलीफें बढ़ जाएँगी, वृध्दावस्था की और तू बढ़ेगा, मन और डीठ हो जाएगा, जिद्दें और मज़बूत हो जाएँगी। आज तेरी चलती है, कल न चलेगी तो तू क्या करेगा। उसी शक्ति का सहारा अब लेगा तो शक्ति तेरे साथ रहेगी, वरना तेरी अधूरी ज़िंदगी आगे जाके तेरी परेशानियाँ और बढ़ाएगी। समझ ले और कयो मुँह संतन साँ व्यापार। सत्य से व्यापार कर दों। सत्य के व्यापारी बनाे। संसार में भी रहो, लेकिन सत्य ना छोड़। हमारी तो यही दुआ भी है, और आशीष है, कि तू सत्य का सौदा करे।

॥ है ही भगवान ॥

11-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निष्काम जीवन"

निष्काम जीवन तृप्ती देता है, शक्ति बढ़ाता है, खुशहाली देता है, विशालता बढ़ा देता है, हदों से बेहदता में लेकर जाता है। निष्काम जीवन जीवन सफल बनाता है। निष्काम जीवन के बाद तू relax हो जाता है, जैसे अापने भगवान से किया वादा कि नाम जपूंगा मैं तेरा, वह भी पूरा हो जाता है, और इस जीवन में जीवन उपयोगी बन जाता है। कितनी relax है, कितनी शांति है, कितना धीरज आ जाता है, गुरु प्रेम में। गुरु प्रेम के बाद ही, निष्काम प्रेम शुरु होता है। जो स्वाद चखे औरोंको स्वाद चखाएँ ऐसी कोई अंदर ही अंदर बात करो जो तेरे भीतर नस-नस में सभी के लिए दर्द जाग उठे। सभी को प्रेम करने की इच्छा ही सब इच्छाओं का अंत कर देती है। जो इच्छाएँ तुझे सताती है, तंग करती है, उन इच्छाओं का अंत और निष्काम प्रेम की इच्छा भी आ जाए, वो उसकी शुरुआत तेरा जीवन बन जाती है।

॥ है ही भगवान ॥

12-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

नदी अपनी मस्ती में बहती, लहराती, गाती, सबको तृप्त करती, बंजर में हरियाली लाती है। वैसे तू भी सबके लिए प्यार रख सकता है। जो प्यार करता है, उसे लगता है आगेवाला मेरे को प्यार करता है, प्यार की ऐसी अनुभूती है। सब हद-हद कहते हैं, कभी बेहद में आजा, मन को मोड़, हद को तोड़, प्रभु से अपने को जोड़। यह प्रेम ही परमात्मा है। भगवान ने इतनी नियामतें दी हैं, जब तक तू उनको नहीं जानता, कमियाॅं देखता है, तब तक प्यार नहीं कर सकता। तुम्हें ऐसा लगे कि गुरु ने, परमात्मा ने इतना प्यार दिया है जो full हो गया है। जो full है, वही प्यार कर सकता है। सच तो प्यार overflow होता है जो सबको तृप्त करता है। सदा शुक्रानों में रहें, नियामतें गिनते रहेंगे तो कयामत आएगी ही नहीं। यह प्यार गुरु से, परमात्मा से शुरु होता है और सारी सृष्टि में फैल जाता है। है ही परमात्मा, परमात्मा के सिवाय बाकी कुछ बचता ही नहीं। यही स्वर्ग है, यही वैकुंठ है, यही परमधाम है, जहाॅं आनंद ही आनंद है।

।। है ही भगवान ।।

12-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आप विसर्जन"

आप विसर्जन प्रेम में होता है। जब तू प्रेम में खो जाए तो आप विसर्जन तेरे शरीर का भुलावा, भूल जाना अपने देह को, अपने देह-अध्यास को वो स्थिति तेरी आ सकती है, मगर प्रेम में। देह-अध्यास को भुलाना, भूल जाना ज़रुरी इसीलिए है क्योंकि देह-अध्यास तेरे सारे सुखों के बीच में तुझे ढंक लगा रहा है। ढंक लगा रहा है वो तुझे सुखों में, वो तुझे प्रेम में, वो भगवान के रास्ते में भी तेरा देह-अध्यास ढंक लगा रहा है।

देह-अध्यास को फ्कत change करो। भगवान के भाव में उसको लाकर खड़ा कर दो। पहले तेरा भाव है कि तू देह है, अब तेरा भाव बन जाए कि तू ब्रम्ह-स्वरूप है। बस इतनी सी बात है, इतनी छोटी सी बात को तय करने के लिए आप अपने जीवन में कितनी कठिनाइयाँ देख रहे हैं। प्राप्त कर रहे हैं, उन कठिनाइयों को जो तुझे तकलीफ ही नहीं औरोंकों भी तकलीफ देती है। पर जे तेरा देह-अध्यास चला जाए, तो सभी को सुख मिलेगा, तुझे भी गहरी शांति मिलेगी।

॥ है ही भगवान ॥

13-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

ना वो ठगे, ना ठागे जाए, नानक नाम वसे जिस मन माहि। परमात्मा का भक्त सत्य सरलता में रहता है, उसको कोई ठगता नहीं, वह किसीको ठगता नहीं। अगर तू कहे, तू सरल है, तेरे को किसी ने ठगा है तो तू सरल नहीं है, तू मुर्ख है। कहीं ना कहीं लोक वासना, शास्त्र वासना, देह वासना में फंस गया है। अपनी कमज़ोरियों के कारण किसीसे अपने को ठगवाता है और अपनी वासना पूर्ति के लिए किसी न किसीको साधन बनाता है, मतलब तू भी ठगता है।

अज्ञानी अपने व्यवहार से अपने को सफल सिध्द करना चाहता है पर ऐसा हो नहीं सकता, व्यवहार की सफलता उसके हाथ में नहीं है। मन चाही सफलता न पाकर, मनुष्य निराश हो जाता है, भूल जाता है। गीता में पढ़ा है - कर्म पर अधिकार है, पर फल पर नहीं। देहध्यास में पूरा दम लगाता है, जैसे उसका व्यवहार सिध्द होवे, वह सफल होवे, यह सब अपने को ठगना है, इसमें सरलता नहीं है। सरल व्यक्ति प्रभू परायण हो जाता है, शुभ-अशुभ से ऊपर, सरल वो है जो अपने आप में है।

'आस न करे और की, आप करे उपकार'। सरल व्यक्ति मूर्ख नहीं होता है, सत्-असत् की पहचान है उसको, पर वो भावुकता में नहीं आता है, Right - Wrong के झंझटो से दूर है। जो Right - Wrong के झंझटो में पड़ता है, वो खुद ठगता है और दूसरे को भी ठगाता है। जिसको कुछ चाहिए, उसे कोई ठग सकता है, जिसको कुछ चाहिए ही नहीं उसे कौन ठगेगा ? सत्य सरलता में रहने वाला, संप्रदाय की, ऊंच-नीच की, स्त्री-पुरुष की, सब द्वन्द्वों की विषमताओं में वह किसी को बाॅंधता नहीं है। आत्मा में कोई बंधन नहीं, कोई लेप नहीं, वह निर्लेप है। एक है, उसमें दूसरा है ही नहीं जिसको तू ठगे और ठगाए। जहाॅं - तहाॅं एक ही ज्योती है, जो सबको ज्योती स्वरुप कर देती है।

।। है ही भगवान ।।

13-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ज्ञान-दृष्टि"

जहाँ तक जाती दृष्टि है, फैली सृष्टि है, सर्व मम्म रूप है। सब मेरा ही रूप है। ऐसा करके जब तू जड़-चेतन पर दृष्टि रखता है, तो भगवान की भावनाएँ तेरे भीतर उत्पन्न होती है। भगवान की भावनाओं के साथ तेरी तो भलाई होती है, पर सभी की भलाई होती है। सर्व की भलाई के लिए तुझे आत्मा का निश्चय करना ही पड़ेगा।

जब तक आत्मिक दृष्टि, आत्मिक शक्ति, आत्मिक बुद्धि, आत्मिक विचार यह एक मनुष्य के भीतर नहीं है, तब तक मनुष्य अपने ही स्वार्थ से टकराता रहता है, दुखी-सुखी होता रहता है। अब यह ऐसी स्थिति है, जो तू आत्मिक विचारों से खुदको भर दे, आत्म का दीदार कर दे, तो यह स्थिति तुझे तो सुखी करेगी। लेकिन तेरे आस पास जो भी है, सभी को सुखी करेगी। आज ज़रुरत आतम-निश्चय की है। बाकी तो संसार में सभी के पास सभी कुछ है। किवलीअ खे कण, हाथीअ खे मण। किसको झोपड़ी, किसको महल रहने के लिए तो दिया ही है ना। गुज़ारा तो हो ही रहा है पर जो अतृप्ति फैली है, वो आतम निष्ठा, आत्म विचार, आत्मिक power, यह संसार में कम पड़ गए हैं। उसको बढ़ाना तेरा भी फर्ज़, तेरा भी धर्म है।

॥ है ही भगवान ॥

14-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

मनुष्य को संसार आश्चर्यवत लगता है। संसार के अनेकों विषय हैं, किसी भी विषय की गहराई, वह नाप नहीं सकता है। आखिर बेअंत-बेअंत कहके, आश्चर्य-आश्चर्य कहके चुप करता है। मैनें दुनिया देखी है, मैं दुनिया को जानता हूँ। अपनी जानकारी से, उलझनों को सुलझाने में झूझता है, कहीं सफलता, कहीं असफलता। असफलता से प्राप्त निराशा, सफलताओं पर पानी फेर देती है। निराश और हताश मनुष्य कभी प्रकृती को, कभी प्रारब्ध को दोष देकर मजबूरी को अपना आधार बनाता है।

जो प्रभू का बन जाता है, वो लाचार और मजबूर नहीं रहता, उसके लिए समसयाॅंए नहीं। पर सब हालतों में प्रभू का प्यार समझता है। वह हालतों से झूझकर शक्ति नहीं गॅंवाता, पर झूमता, हसता, गाता सब स्थितीयों से समझौता करता, अपना सफर सुहाना बनाता है। परमात्मा उसके साथ है। नसीब को या किसी व्यक्ति को दोष देना नहीं पड़ता है, उसके लिए सारी दुनिया आश्चर्य नहीं एक राख की मुठ्ठी है। 'आश्चर्यवत आत्मा जानी, जगत आश्चर्यवत ना रहा'। गुरु हाथ पकड़के ईश्वरीय सृष्टि की सैर कराता है। जहाँ कोई द्वन्द्व नहीं, कोई झगड़ा नहीं, कोई तू मैं नहीं, तृप्ति-तृप्ति है। एक की झलक से जीव धन्य-धन्य हो जाता है। एक बूंद ब्रम्ह् ज्ञान की, मस्त करे दिन रैन।

।। है ही भगवान ।।

14-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सच्ची होशियारी, सही मार्ग"

सच्ची होशियारी है कि तू हर तरह से अपने कार्य पूरा करे। अपने देह को भी संभालके रखे, परिवार को सजा के रखे, व्यवहार को साफ-सुथरा रखे, समाज में भी अहम हिसा ले। समाज भी तेरा ही अंग है। अपने खाली घर को अपना घर ना समझो, सारी सृष्टी तेरा अपना घर है। हर तरफ से तू fit हो सकता है आत्मा के निश्चय में आए तो।

हर चीज़, हर बात, हर एक से प्रेम करना, हर एक के लिए कुछ अच्छा कर्म तेरे से हो जाए, ये शरीर, मन, बुध्दी की स्थिती बन जाए, वो सब हो सकता है। लेकीन देह-अध्यास में तेरी शक्ती सिमित है और आत्म-निश्चय में तेरी शक्ती असीम है। उसकी कोई सीमा नहीं, वो हदों में नहीं। बेहदता में जब शक्ति आती है, तो तू कार्य भी बेहदता में कर सकेगा ना। वरना हदों में ही तेरा जीवन ऐसे ही नष्ट होगा। हदों से ऊपर उठो, बेहदता आ जाओ, जीवन को सही मार्ग, सही दिशा देते जाओ, जो सतगुरु के वचनों से मिलती रहती है ।

॥ है ही भगवान ॥

15-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

ब्रम्ह-भाव में दुख बना ही नहीं है। जीव-भाव में ज़र्रे दुखी, ज़र्रे सुखी। दुख से बचने और सुख को पाने के लिए जीव यत्न करता रहता है। पर सदा के लिए दुखों से मुक्ति मिले और सुख की प्राप्ति हो, यह हो नहीं सकता। क्योंकि अपने अहंकार की वजह से अपने ही हाथों से लगाई हुई आग में खुद झुलसता है, उसे पता नहीं रहता उसे क्या चाहिए ? एक बार मनचाही चीज़ मिली, फिर खाली क्यों? उसका आपा, उसका अहंकार, उसकी इच्छा, उसको नाच नचाती रहती है। किसी बिमारी की right पहचान नहीं, तो उसका इलाज उस बिमारी को बढ़ाता है। वैसे दुख के कारण की पहचान नहीं, कि दुख का कारण उसका अहंकार है, उसका विकार है, उसका जीव-भाव है, उसकी मुर्खता है, संसार की सत् भावना है। दुख निवृत्ति के लिए जो भी यत्न किया जाता है, सुख प्राप्ति के बदले दुख को बढ़ाता है।

।। है ही भगवान ।।

15-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शुकरानों में शक्ति"

शिकायत शक्ति को निचोड़ के फेंक देती है, और शुकराने शक्ति को समेट कर तेरे भीतर जमा-पूंजी बढ़ा देता है। इसीलिए शिकायत ना कर, ना कर तू पुकार, पर सदाईं शुखुर में गुज़ार, सदाईं शुकरानों में अपने जीवन को भर दो। यहाँ-वहाँ से भरेले पर दृष्टि रखो। आधा glass खाली, आधा भरपूर है। तू दृष्टी भरपूर पर रख तो शुकराने ही निकलेंगे और तेरा जन्म-जीवन सफल हो जाएगा। तृप्ति भी आती है तो शुकरानों से आती है। तू किसीको प्यार करे या किसीसे निभाए, शुकराने दिल में है तो निभा सकता है। वरना तू जहाँ-तहांँ शिकायत का poison लेकर सभी को तकलीफ देता है, खुद भी तकलीफ उठाता है। Please खुद को साफ-सुथरा रखो शिकायत से, और शुकराने का रंग चढ़ा दो।

॥ है ही भगवान ॥

16-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

रोशनी हो तो अंधेरा टिक नहीं सकता। वायू आई तो मच्छर भाग गए, जैसे ही तू निश्चय में आ जाए, मन स्थिर हो जाएगा। वायू रहित स्थान में दीये की लाट हिलती नहीं, वैसे विकार रहित मन ज्योती स्वरुप बन जाता है, स्थिरता आ जाती है, हिलता नहीं। सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ, सब द्वन्द्वों से मुक्त होकर जीव हल्का होकर, चित आकाश में प्रकाश स्वरुप बनकर, सब बंधनों से, सब विकारों से मुक्त होकर, आत्मा की उड़ान में, अपने आप में तृप्त हो जाता है। प्रकृती के साथ है पर प्रकृती से न्यारा। प्राकृतिक परिवर्तन उसका परिवर्तन नहीं। प्रकृती विकारी है, बदलने वाली है। सूखे पत्ते की तरह विषय विकार रुपी हवा के झोंके से कभी इधर, कभी उधर पलटती रहती है। जीव अपने को प्रकृती तत्व मानता है तो उसका भी विकारों में विकृत होना स्वाभाविक है। पर आत्म तत्व को जानने से विकारों में वृत्तियों का बदलना उसके लिए अस्वाभाविक है। Emotion में आना, कभी रोना, कभी हंसना, अहंकार की वजह से कभी चींटी, तो कभी ऊंट बनना, ब्रम्ह् भाव में, आत्म भाव में शक्य नहीं होता, वह तो सिर्फ दृष्टा भाव में है। करुणा, मुद्दता, मैत्री, धीरज उसके साथ है, जो 'कलयुग माने जानेवाला युग' को परम धाम सच्चखंड, स्वर्ग और वैकुंठ बना देता है।

।। है ही भगवान ।।

16-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सोना चाँदी हीरा मोती-उनसे बढ़कर तेरी तंदुरुस्ती"

अपनी तंदुरुस्ती पर अगर तू ध्यान नहीं देता, तो तू आतम-निश्चय कैसे कर सकता है, गुरु से कैसे निभा सकता है ? जी आहै त जहान है, जी खुश है तो जहान खुश दिखाई देता है। पर तेरा जी, तेरी तंदुरुस्ती, तेरा शरीर तकलीफ में है, तो तू सारे संसार को भी तकलीफ देता फिरेगा, और तुझे कोई भी खुश दिखाई नहीं देगा। इसीलिए तंदुरुस्ती पर ध्यान देना ज़रुरी है। तंदुरुस्ती को अगर ध्यान में रखें तो सबसे पहले अपने शरीर के वज़न पर ध्यान दो।

Weight - जिसकी weight ज़्यादा है, उसपर अगर ध्यान ना दिया, तो कई बीमारियाँ तेरे पास दौड़ती हुई आएँगी। फक्त थोड़ी सी age उपर आने दो। सही यह है, हम दुआ करते हैं कि उसके पहले तू संभलजा, बीमारियों का जंग शुरु होवे, हमला शुरु होवे, उसके पहले तू सावधान हो जा। सावधानी की पहली सीढ़ी है तेरा वज़न संयम में होना चाहिए। तेरी height के अनुसार, age के अनुसार, knowledge रखो और वज़न सही रखो। वजन को कम करने के लिए, अनाज को थोड़ासा कम करो।

ऐसे महसूस होता है, कि तू जहाँ चार चपाती जोश में बिना मुख में चबाए हुए, अंदर भेजता जाता है, उसके बदले में अगर आप दो चपाती अपनी थाली में रखो और छोटे-छोटे गठी खाओ और चबा-चबा के खाओ, खाने के ऊपर आधा घंटा पानी न पियो, अनाज कम करो, तो शायद तेरा वज़न easily कम हो सकता है। उसकी जगह पर थोड़ासा soup पी लो तो ज़्यादा तू खाना भी नहीं खा सकता। जितना तू अनाज कम खाए और चबा-चबा के खाए, वो भी तेरा तंदुरुस्ती का अच्छा-सा एक step हो जाएगा और तू अपने वज़न को कम करके खुश रहेगा। आज के लिए इतना ही कि तू खाना चबा-चबा के खाएगा।

॥ है ही भगवान ॥

17-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

तू अपने अनुमानों पर चलता है, सफलता और असफलता से विचलित होता है, न प्रकृती को जान पाता है और न अपने को। पर जैसे ही प्रभु को खोजने में लगता है तो जगत आश्चर्यवत् नहीं रहता। अपने पर ही आश्चर्य लगता है कि जिसे मैं खोज रहा था वह सुख स्वरुप, आनंद स्वरुप, शांत स्वरुप मैं ही तो हूँ। 'प्रभु को खोजन मैं चली, मैं आपा भूल गई'। जो रास्ता प्रभु पाने को कठिन लगता था, गुरु के मिलने से, सही मार्गदर्शन से, वो सरल हो जाता है। संसार जिसको सत् मानके बैठे थे वह एक नाटक सा लगेगा। अभी कोई डर नहीं, दूसरा कोई है ही नहीं, तो डर किसका ? गुरु ने अभी अजर अमर बना दिया। 'मैं न मरबो, मरता है संसार, मुझे मिला प्रभु जीयावण हार'।

।। है ही भगवान ।।

17-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तंदुरुस्ती"

तंदुरुस्ती के लिए फल fruit ज़रुरी है, सलाद ज़रुरी है। जो अपने routine में, खाने-पीने में फल fruit को जोड़ देता है उसीको तंदुरुस्ती का फल, अच्छी तंदुरुस्ती, मिल जाती है। लेकिन फल fruit खाना खाने के कुछ समय पहले खाना चाहिए। बाद में नहीं, साथ में नहीं। पहले खाओ तो सही, संपूर्ण फल मिल जाएगा। जो सलाद अपने routine में जोड़ देता है, वो सलाद खाके सुखी हो जाता है। लेकिन सलाद भी खाना खाने के पहले शुरु करो और फिर खाना शुरु करो। चबा-चबा के खाओ, फल खाओ, सलाद खाओ, चपाती अच्छे से खाओ।

Light दाल थोड़ा सा, उसको भी chance दे दो। सब्जी में ज़्यादा तड़का न डालो, हल्का सा तड़का। उसके ही पानी में बनाओ तो भी अच्छा। थोड़ासा पानी डालो, रसदार बनाओ तो भी अच्छा। नमक कम खाओ, मिर्ची limit में खाओ। ये तंदुरुस्ती का राज़ है। जब तंदुरुस्ती संयम में है, तो मन संयम में है। मन संयम में है, तो तेरी जीवन संयम में है।

॥ है ही भगवान ॥

18-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

जिज्ञासु की प्रभु पाने की खोज, उतकंठा (जिज्ञासा), गुरु की तपस्या का आकर्षण, दोनों मिलकर सत्य को प्रकाश में लाते हैं। अकेला गुरु कुछ नहीं करता, अकेला शिष्य कुछ नहीं करता।कितने ही व्रत-नेम, जप-तप, साधन करो सत्य को पाने के लिए, पर जब तक गुरु से प्रेम का योग नहीं बनता तब तक सब थोथे। वाक्-चातुर्य कितना भी करे, कितने भी शास्त्र कंठस्थ करके सुनाऍं, पर वो श्रोत नहीं खुलता जहाॅं से सत् का झरना बहे, असत् टिके ही नहीं। सब साधन का मूल है दुर्लभ सतगुरु प्रेम। गुरु का प्यार lift का काम करता है। गुरु का प्यार मतलब वचनों से प्यार, वचनों पर मर मिटना, ना की गुरु को यह दें वह दें। यह लेना और देना देह अध्यास और अहंकार हो जाता है, ज्ञान से और भी दूर हो जाते हैं। गुरु के प्यार को प्रेम से खरीदा जाता है, ना की पदार्थों से ।

।। है ही भगवान ।।

18-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तंदुरुस्ती"

तंदुरुस्ती के लिए, good health के लिए खाना समय पर खाना ज़रुरी है। तू खुद से धोखा बहुत ही कर रहा है। नाश्ते के time late उठता है, सो जाता है। नाश्ता lunch के time के आसपास खाता है, lunch शाम के चाय के समय खाता है, और रात का खाना सोने के time पर खाता है। सब गलत। इसी प्रकार खाओ और फिर बीमारियों को invitation देते रहो।

आलस - आलस तेरा तंदुरुस्ती का दुश्मन कहलाता है। जो foundation से अपनी तंदुरुस्ती को संभालते हैं, वो सुबह early morning जल्दी उठते हैं। जल्दी उठकर सबसे पहले आपको हल्का सा कुनकुना पानी पीना चाहिए। यह ज़रुरी है। अच्छी तंदुरुस्ती है पानी पीना आपको allowed है तो दो glass तक तो कम से कम पी सकते हो। और पियो। अच्छे से पियो, अच्छे से जियो। उसके बाद तेरा दिन जब जल्दी शुरु होता है तो भूख भी लगती है। ९ बजे के करीब-करीब आपको नाश्ता तो लेना ही चाहिए। आप यह न सोचो कि भूख कम है, मैं कैसे खाऊ। कम खा लो ना, थोड़ा सा खा लो। लेकिन नाश्ते का period पूरा करो। जल्दी नाश्ता खाओ, तेरी तंदुरुस्ती में कभी नीरसता नहीं आएगी। क्योंकि सुबह तेरे शरीर को अच्छे से समय पर भोजन मिल जाएगा तो वो सुस्त नहीं होगी। हाँ तू taste के कारण ज़्यादा खाएगा, tasty बनाके ज़्यादा खाता है तो आलस आता है। फिर खाके तुझे नींद आती है। लेकिन तू स्वासों को दे। खाना स्वासों के लिए खा। उसको स्वासों को चलाने के लिए तू जब अपने capacity के अनुसार खा लेता है हल्का-हल्का तो नींद आती नहीं है, तू पाण active बन जाता है।

नाश्ता जल्दी लिया तो lunch भी आप जल्दी ले सकते हो। बीच में हल्का सा fruit खा लिया। और lunch १ से ज़्यादा से ज़्यादा २, २ बजे तक complete करो। और night में भी सोने के पहले कम से कम २ घंटा तो जल्दी night में खाना खाना चाहिए। या तो light-light खाना खाओ। अपनी खाने की routine में soup को थोड़ा जोड़ दो। Soup अमृत समान है, जीवन की कथा करें और अमृत ना पिए तो कैसे अच्छा लगेगा। Soup पीना ज़रुरी है। वो भी तेरे भीतर के शरीर की सफाई करता है। इसीलिए उसको भी थोड़ा सा chance दे दो।

॥ है ही भगवान ॥

19-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Digestion Power"

एक power तेरे मन का है जो तू छोटी-मोटी बातें, छोटी-मोटी हालतें digest अभी कर सकता है। क्योंकि सतगुरु तेरे साथ है। अब उसके साथ शरीर का digestion power - वह भी तो संभालना है। उसका power बढ़ाएँगे तभी तो तू हर चीज़ खा सकता है, हज़म हो सकती है। समय पर भूख लग सकती है, समय पर खाकर, भोजन लेकर, तू blood बना सकता है और active ज़िंदगी जी सकता है।

वो होता है तेरे शरीर का भी digestion power सही होना चाहिए। उसके लिए सुबह ठंडी हवा खाना, थोड़ासा walk करना, greenary पर पाँव रखना, यह ज़रुरी है। योग-अभ्यास में अपने मन को लगाना, अपनी शक्ति के अनुसार, देह की शक्ति के अनुसार, योग अभ्यास में रहना, exercise करना यह भी तेरे शरीर के digestion power में कमी रहने नहीं देता।

Tension ना लो। Tension से तेरे शरीर का digestion power ढ़ीला पड़ जाता है। असाँखे चिंता न काईआ, सतगुरु भगवान, दादी भगवान वेठो आ। अपने को मज़बूत करो यह एहसास दिलाकर कि भगवान कहाँ नहीं है। तो जो चिंता नहीं करोगे, प्रेम में चलोगे, उससे भी तेरा power बढ़ सकता है। हकीकत में ज्ञान है तो तन और मन का power रोज़ बड़ता जाता है। मन का power तो ज्ञान से बड़ता ही है, पर तन भी तेरा ब्रम्ह-स्वरुप हो जाता है और शरीर की शक्ति भी बड़ जाती है, यह विश्वास रखो और खुद महसूस करो। Exercise करो, प्राणायाम करो, ठंडी हवा खाओ, walk करो, हल्का खाना खाओ, tension-less हो जाओ, परमात्मा में भरोसा रखो, तन मन का power बढ़ जाएगा।

॥ है ही भगवान ॥

20-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'करुणा, मुद्दता, मैत्री, धीरज' इन चार पहीयों से निश्चय की चारपाई बनती है। ज्ञानी सुख पथ सेज पर सोता है। यह ऐसी सूक्ष्म वृत्तियाॅं हैं जो सूक्ष्म दृष्टी से समझ में आती हैं, अन्यथा अर्थ का अनर्थ बन जाता है। कोई दीनहीन मेरे सामने आवे, मैं उसे मदद करुॅं, वह मेरा शुक्रिया माने, बार-बार उसे याद रहे, मैंने सहायता की, इसको करुणा कहने लगते हैं। यह करुणा नहीं, अज्ञान की instinct - superiority complex, इनको satisfy करते हैं। सतगुरु करुणा करके हमें अपनी असलियत बताता है, दीनहीन नहीं बनाए रखता। शेर सोहम् की गर्जना कराता है, यह पक कराता है, जो तू है सो मैं हूॅं।

।। है ही भगवान ।।

20-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दूध"

कई लोगों की शिकायत रहती है कि दूध भाता नहीं, हज़म होता नहीं। दूध हज़म करने के लिए उसको थोड़ासा light करें। एक cup दूध बनाने के लिए चार साबित काली मिर्च बिना कुटेली, एक cup पानी, उसमें थोड़ासा boil करो। ४ मिर्ची, एक cup पानी में boil होने के बाद आधा cup जब बच जाता है, उसमें एक cup दूध डालो। Elaichi भाती है तो डाल दो, शक्कर पीते हो तो डाल दो। वरना ज़रुरत नहीं। काली मिर्ची वाला दूध, काली मिर्ची निकाल के भले फेंक दो और दूध को पी लो। ज़्यादा गर्म नहीं पियो। हल्का सा ठंडा करके पीयो। फिर देखो दूध कैसे हज़म होता है और दूध की शक्ति मिलती है।

दूध गाय का है तो light ही है। अगर भैंस का दूध है या कोई thick diary का दूध है, तो इसी प्रकार थोड़ा light करके पीयो और दूध के आगे और पीछे कुछ वक्त, ना कुछ खाओ, ना कुछ पीयो। तो दूध जिन बच्चों को हज़म नहीं होता, उन लोगों को भी हज़म हो सकता हैं। दूधवाली कोई भी चीज़ खाकर, उसके आगे पीछे कुछ time छोड़ दो। आधा घंटा ही सही, पौना घंटा ही सही, लेकिन छोड़ दो। तो दूध की चीज़ easily आपको भा जाएगी।

दही - घर में बनी हुई दही जो आप सुबह बनाते हो, दोपहर तक बन जाती है वो ज़रुर भाती है। Health के लिए दही, पनीर, दूध सब अच्छा है। उससे health अच्छी हो जाती है, ताकत मिलती है। लेकिन हर चीज़ limit पकड़के लेलो, quality और quantity को संभाल के लेलो, तो तेरा बेड़ा पार है।

काली-मिर्ची वाला दूध weight को कम करता है। जिन बच्चों की weight ज़्यादा है, वो काली मिर्ची डालके अगर दूध पीएँगे तो उनकी weight ज़रुर कम होती जाएगी। Paneer खाना है तो एक टुकड़ा रात को paneer खाओ। ज़्यादा मत खाओ जो चढ़ जाए, उससे नींद अच्छी आती है। दही और लस्सी - उसका भी उपयोगी बनों, उसको भी chance दे दो। आपके भीतर को ठंडा रखेगी। अच्छी health के लिए जो जो चीज़ें अच्छी हैं उसको लेते जाअो।

॥ है ही भगवान ॥

21-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

अज्ञान अंधेरा है, अपना खज़ाना दिखाई नहीं देता, बाहर ढूँढते रहते है। भंवरे की तरह एक फूल से दूसरे फूल पर, बंदर की तरह एक डाली से दूसरे डाली पर नाचता रहता है, कहीं मन स्थिर नहीं होता है। कल्पना में तुमने जिस सुख का अनुभव किया, ज़रा सोच, हकीकत में उसका कैसा आभास है। कितना समय उस सुख में रह सका ? कभी सुख में, कभी दुख में यह चंचल मन तुम्हें Black mail करता रहता है और तू सच्चे सुख से दूर होता जाता है। काश ! इस हकीकत को जान सके कि इस मन को, या औरों के मन को बाहर का सुख देकर तृप्त नहीं कर सकता। यह सुख सुरके का पाणी है, जिससे प्यास नहीं बुझती, बढ़ती है। तृप्ती नहीं आती है, तृष्णा बढ़ती है। सच्चा गुरु हकीकत बताता है। संसार का सुख प्राप्त होवे ऐसा आशीर्वाद देकर संसार में नहीं फॅंसाता है, पर सच्चा सुख देकर सदा के लिए तृप्त कर देता है। आत्मा पहले ही प्राप्त है, गुरु भ्रम छुड़ाता है। प्राप्ती की प्राप्ती होती है, यहाॅं कुछ खोना नहीं पड़ता है। 'ना कुछ खोया ना कुछ पाया, मैं ज्यूॅं का त्यूॅं भरपूर'।

।। है ही भगवान ।।

21-Sep-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"क्रोध-गुस्सा"

गुस्सा तेरी तंदुरुस्ती के लिए हानिकारक है। तेरे गुस्से का तेरे तन और तेरे मन पर बुरा असर पड़ता ही है। गुस्सा मनुष्य क्यों कराता है ? क्या गुस्सा करके जो तूने चाहा वो permanent हो गया ? हमेशा के लिए उसने समझा ? नहीं ! तेरे गुस्से को शांत करने के लिए सामने वाला कहता है, ठीक है, मैंने समझा। ताकि तू ठंडा हो जाए। लेकिन बाद में तू भी वहाँ, वो भी जहाँ था वहाँ। फायदा हुआ ? गुस्से का फायदा हुआ ? नहीं होता है !

गुस्सा करने का कोई फायदा नहीं होता। क्योंकि तेरा गुस्सा निस्वार्थ नहीं है, निष्काम नहीं है, स्वार्थ-बुद्धि में है। तंदुरुस्ती पर भी खराब असर डालो, और वो बात भी ना होवे जिसके कारण तू गुस्सा किया, तो पुराना fashion अभी तक क्यों करते हो ?गुस्सा करना, अहंकार करना अब पुरानी बातें हो गई हैं। फेंक दो। New चीज़ रखो - नम्रता। नया fashion - नम्रता। नम्रता में तू अमरता को प्राप्त करेगा, तंदुरुस्ती को भी कायम रखेगा। पेड़ को भी जब फल लगते हैं तो वो झुकने लगता है।

माना कि तेरे में चार से चालीस गुण हैं, पर तू झुकता नहीं है। गुणों का अहंकार करता है तो गुणों से फल नहीं निकलता। अगर तेरे गुणों से अछा फल निकले तो संसार को कितनी नियामतें मिले। दादी भगवान ने कितनी नियामतें दी हैं। तू भी तो उनका ही बच्चा है। दे तो सकता है, पर देने के काबिल नहीं रहता क्योंकि controlling power तेरे में नहीं है, और तंदुरुस्ती भी तेरी ढीली पड़ गई है। क्योंकि गुस्सा कर करके तू age के पहले aged हो गया है। ज़रा अपने तन और मन को संभालो, आयू को संभालो। तेरी आयू यूँही बीत जाएगी। इसीलिए ब्रम्हज्ञान की, ब्रम्हनिश्चय की शरण में आओ जी।

॥ है ही भगवान ॥

22-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जिसके दिल में प्रभु की याद है, उसके लिए सारी सृष्टि तिल मात्र है। 'जिसके ह्रदय में प्रभु का सिमरन होगा उसका सफल क्यों न जीवन होगा'। सफलता की कुंजी उसके पास है। परमात्मा को प्राप्त किया, प्रकृती की पूर्णता-अपूर्णता उसकी अनुकूलता-प्रतिकूलता उनके लिए मायने नहीं रखती। जब तक तू प्रभु प्रेम में भीगा नहीं, तब तक प्रकृती की छोटी-मोटी बातें तेरे को चेन से जीने नहीं देंगी। तीन लोकों का सुख तेरे आगे होवे फिर भी मन शांत न रहेगा। जब तुम्हारा मन छोटी मोटी टक्के पैसे की बातों से हिलने लगे, कभी नौकर से, कभी मालिक से, कभी बड़ों से, कभी छोटों से, कभी विषयों से, कभी पदार्थों से, कभी प्राप्त-अप्राप्त वस्तुओं से, कभी संसार के मान-अपमान से, तो अपने आप से पूछें मैं प्रल्हाद हूॅं या हिरण्यकश्यप ? जिज्ञासु की कतार में तो हूॅं पर जीव-भाव को कत्ल कराने के लिए तैयार हूॅं या उसका रक्षक बन बैठा हूँ ?

।। है ही भगवान ।।

22-Sep-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

“घड़ी”

घड़ी फकत पहनने के लिए नहीं है, तेरे देखने के लिए है| ग्ररी-ग्ररी घड़ी देखो ,क्योंकि "वक्त वंनईँथों वंहँदों प्यारा, कर्म वंनईँथों थहँदों"| अपने वक्त कों यूं बर्बाद मत करों|वक्त भी एक शक्ति है, टाइम-वेस्ट किया, मतलब शक्ति waste किया| ग्ररी-ग्ररी घड़ी देखने से, तेरी routine सही-दिशा पकड़कर चल सकती है, वरना तूं हर-वक्त यही करता है, महसूस कहता है कि time तों गुजर-गया, मैं यें करता तों अच्छा था, मैं वों करता तों अच्छा था | लेकिन, अब समय गुजर गया|

रोज तेरी यही एक बात हैं, समय तेरा आज-भी चला गाया,आने-वाले कल में भी तूं अगर सुझाघ नहीं है, तों कल भी जा सकता है, आनेवाले फिर कल भी जा-सकते हैं |क्योंकि, सुझाघी का दीपक नहीं है|सुझाघी का दीपक जलाओं,  बाद-में दीवाली के दीयों की तैयारी करों| दिवाली तक अपने सुझाघी के दीपक कों बराबर मशाल बनाके रखो| सत्यंम-शिवम-सुंदरम,खूद सुंदर बनोगे, तों घर-भी चमकेगा, परिवार भी चमकेगा , तेरा आदर्श भी चमकेगा और तूं संतोष-धन को प्राप्त होगा,जों तेरे लिए जरूरी है| टाइम वेस्ट ना करों, घड़ी देखों, ऑल-राउंडर बनों और परमात्मा में अपने कों समा दों|

॥ है ही भगवान ॥

23-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

आँखें देखे तो प्रभु के सिवाय किसी को भी न। अंदर की ऑंखों से वही एक नूर देखें। कोयल की मधुर ध्वनी या कौवे की कर्कश काॅंव-काॅंव सब में ओम की झंकार मिले। एक ही अनहद नाद सुनाई दे। वायु से स्पर्श, वायु से गंध, सब में प्रभु का पैगाम होवे।सब ज्ञान-इंद्रियों और कर्म-इंद्रियों से प्रभु की पहचान मिले। कोई प्रशंसा करे या निंदा करे, प्यार से या धिक्कार से बात करे, सबमें भगवान का प्रेम छलकता दिखाई दे। यह तभी होगा, जब सबसे भलाई निकालेगा। हर एक परिस्थिती से, हर एक व्यक्ति से, हर एक पदार्थ से, तेरा अनन्य भाव होगा, किसीसे शिकायत न होगी।

तेरा अपना आत्मस्वरुप है, तेरा अहित नहीं हो सकता। हर जगह परमात्मा की आवाज़, अनहद नाद तुझे सुनाई देता है, तू कान बंद करके खड़ा है तभी सुनने में नहीं आता है। ज़रा माया का पर्दा हटा, पर्दा हटा तो आप हुआ। एक बार प्रभू की पहचान कर ले, जिसको तू ढूँढ रहा है, वह तेरे साथ है, नेरे से नेरा। प्रभू को जाना तो उनकी सारी सृष्टि बहुत छोटी होकर मुठ्ठी में समा गई। 'आश्चर्यवत आत्मा को जाना, जगत आश्चर्यवत न रहा।'

।। है ही भगवान ।।

23-Sep-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

“Tension”

जब तक तेरे दिल-दिमाग में tension है, तब तक तू अपनी तंदुरुस्ती को सही दिशा में चला नहीं सकता। क्योंकि tension ही बीमारियों का कारण है। लेकिन तू tension किस चीज़ का करता है ? भगवान अगर तेरे साथ है तो डरने की क्या बात है ! डर नहीं तो tension कैसा ? प्रालब्ध में भरोसा है तो प्रालब्ध में बहुत सारी बातें आ जाती हैं। फिर tension कैसा ? दिल में अगर धीरज है तो काम, business, service, kitchen कहीं भी, किसी भी कोने में तू कार्य कर रहा है, चाहे घर में या बाहर, tension नहीं है, कुदरत पर भरोसा है तो वो अच्छा ही होता है। फिर तू हर चीज़ को समय भी दे सकता है। Tension कैसा !

Tension करने के लिये तेरे पास कोई topic ही नहीं है। फिर भी तू ढूंढता फिरता है। अपने ही गले में tension की वरमाला डाल देता है। यह तेरे प्रीत की रीत नहीं, अपने को प्रेम करो। Tension की दलदल में न जाओ। परमात्मा सब अच्छा ही करता है। भगवान जो भी करता है, अच्छे के लिए ही करता है। तेरे tension करने से कुछ बनता नहीं, इसीलिए tension छोड़कर पुरुषार्थी बनो, विश्वासी बनो, प्रेम मय बनो।

॥ है ही भगवान ॥

24-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सबसे जीता, अपने से हारा। जीत प्राप्त कर, तेरे को लगता है अभी सुख से, चैन से जीऊॅंगा, पर ऐसा होता नहीं। पहले से बड़ी इच्छा तेरे मन में आ गई, यह महत्वकांक्षा तेरी हीनता की निशानी है। जीत प्राप्ति से पहले जो कमियाॅं दिखाई देती थी उससे आज बढ़कर कमियाॅं हैं, यह हीनता की अनुभूती तेरी हार है। 'Much wants more' अपनी कमियों को पूरा करने के लिए पहले से बेचैन। तेज़ दौड़, अंधी दौड़, दौड़ते-दौड़ते, थक कर, हताश होकर, निराश होकर गिर जाता है पर तृप्ति नहीं मिलती है, क्योंकी उल्टी चाल है। करना था सो ना कियो, पड़ियो लोभ के फंद।

।। है ही भगवान ।।

24-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पकड़ो और पकड़ाओ"

पकड़ने वाली चीज़ क्या हो सकती है ? भगवान के अलावा तू कुछ भी पकड़ेगा, आए-जाए दुख पाएगा। भगवान को पकड़ेगा तो दुख दूर। पकड़ाएगा अगर भगवान तो दुआ देगा तुझको जिसको तूने पकड़ा दिया भगवान। जे तू किसी को अहंकार पकड़ाता है, तो वो गिरकर भी तुझे कोई दुआ न देगा। तुझे भी कभी न कभी गिरा देगा। इसीलिए दादी भगवान ने कहा, पकड़ो और पकड़ाओ। एक भगवान पकड़ो, एक भगवान पकड़ाओ।

भगवान को पकड़ने से तेरे इस हृदय में शुद्धता, प्रेम, पवित्रता कायम रहती है। निश्चय होता है कि जहाँ-तहांँ मेरा भगवान ही है। हर चीज़ में, हर कोने में, वासा मेरे वासुदेव का है। फिर तू क्यों अपने में देह-अध्यास को रखके बैठा है। देह-अध्यास अगर है, तो प्रभु नहीं है। प्रभु है तो देह-अध्यास रुक नहीं सकता। इसीलिए भगवान को पकड़ो और देह-अध्यास को छोड़ते जाओ, जनम-जीवन सफल करते जाओ।

॥ है ही भगवान ॥

25-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सृष्टी में जो दिखता है वह तेरे ख्याल का साकार स्वरुप है। कोई प्यारा लगता है, कोई अप्यारा लगता है, कोई दूर लगता है, कोई नज़दीक लगता है, तुझे वही दिखाई देता है जो तू देखना चाहता है। तुझे भी पता नहीं पड़ता तेरे unconscious में कितने ख्याल दबे पडे हैं, जो साकार रुप लेके आते हैं। प्रकृती में तीन गुण, पाँच तत्व, विकार अपना नृत्य करेंगे, यह सब समुंद्र की उछाल है। कभी यहाँ, कभी वहाँ लहरें उठती हैं, उसीमें समा जाती है, बुदबुदे बनते हैं, फूटकर उसीमें समा जाऍंगे। यह प्रकृती तत्व की पहचान है, उसको जाने तो किसी भी परिवर्तन पर आश्चर्य नहीं लगेगा, But natural है। प्रकृती को रोकने के बदले, बदलने के बदले, अपने को बदलें। प्रकृती के अनुकूल अपने को बना ले।तेरी प्रकृती तेरे को प्रारब्ध से मिलती है, पर प्रकृती का गुलाम न बन जा। प्रकृती के अधीन न हो जा, पर जीव भाव में यह तेरे वस में नहीं है।

।। है ही भगवान ।।

25-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"छोड़ो कल की बातें"

कल की बातें छोड़ो, आज नईं कहानी लिखो सतगुरु वचनों से, अपने नए उमंग से, सच्चाई से, सफाई से। कल जो हुआ आज किस काम का। Past is past. मनुष्य अगर समझे कि past is past, आगे future की बात सोचे कि मुझे ज्ञानदृष्टि से रहना है, मुझे अपने ज्ञान की मंजि़ल को प्राप्त करना है। बस future की बात इतनी ही है। आगे जो भी तू बातें सोचता है, वो सब तेरी अपनी ही इच्छाएँ हैं, अपना कर्ता-भाव है, अपना ही सब देह-अध्यास है। देह-अध्यास को छोड़कर बाकी आज के आनंद की बात करो, तो देखो हर तरफ से तुझे भगवान ही भगवान दिखाई देंगे।

॥ है ही भगवान ॥

26-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

रंग बदलती दुनिया में तू भी रंग बदलता है। यह तन-मन नाच नचाता है। कभी चींटी बनता है, कभी हाथी। पर अपने स्वरुप की पहचान मिल गई तो तू प्रकृती के अधीन नहीं होगा, प्रकृती तेरे अधीन रहेगी। शांत, सुंदर, आनंदमय, ज़र्रे-ज़र्रे तेरे को प्रकृती से भी प्रभु का पैगाम मिलेगा। चिड़िया की चीं-चीं, कोयल की कू-कू, कौवे की काॅंव-काॅंव में एक ही आवाज़ सुनाई देगी - "है ही परमात्मा"। तू भी उसीमें समा गया। यह जगत दूषण नहीं भूषण है मेरा। कमियों पर नज़र है तो दूषण है, नियामतों पर नज़र है तो भूषण है।

।। है ही भगवान ।।

26-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मुठ्ठी में आपकी तकदीर"

जब मन में भगवान का डेरा है, अंदर सतगुरु का स्थान है, वास है, नस-नस में भगवान-भगवान तू अंदर बसाके बैठा है, तो तकदीर में कोई कमी नहीं रहेगी। तेरी तकदीर तेरी मुठ्ठी में रहेगी। क्योंकि तू भगवान को जब साथ में लेता है, तो एक तपस्वी जीवन तेरे आगे आता है। उसमें तेरेको कस्स नहीं लगती, पर सारे कार्ज तेरे अच्छे हो जाते हैं, easy हो जाते हैं। भगवान को साथ में रखो, पास में रखो और अपनी तकदीर के मालिक बनो। तेरी तकदीर तुझको ढूंढे, तेरी तकदीर तेरे पास रहेगी और तेरा साथ देगी।

॥ है ही भगवान ॥

27-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

भगवान का भक्त सैलानी बनकर सैर करता है, उतार-चढ़ाव में नहीं जाता, उसे प्रभु पाने की लगी है, नशे में चलता है। मंज़िल उसको अपने आप बुला लेती है, मंज़िल उसके नज़दीक आ जाती है। बस उसे एक ही तात है कहीं मेरा मन न चले, मन का हिलना ही पाप है। 'स्थिर मन ब्रम्ह है, अथिर मन संसार'। बदलने वाली चीजें, संसार बदलता रहे न, यह मेरा स्थिर मन क्यों बदले ? बाकी किसी पीड़ा का पता नहीं, कभी मन चला तो पीड़ा लगेगी। यह प्रभु पाने की प्यास, उतकंठा, प्रभु से मिलाकर एक कर देती है।

।। है ही भगवान ।।

27-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बदलाव में ही ब्रह्म निश्चय"

ब्रह्म निश्चय आप सोचते हो, हो गया। बोलने से, सुनने से ब्रह्म निश्चय होता नहीं। लेकिन जीवन में बदलाव ज़रुरी है। जिसका जन्म दिव्य, जिसका कर्म दिव्य, जिसका प्रेम दिव्य, व्यहवार दिव्य, वो ही ब्रह्म निश्चय में टिक सकता है। बदलाव इतना ज़रुरी है जितने तेरे body में प्राण चलते हैं, बदलाव उतनी ही ज़रुरी है। बदलाव के सिवाय शांति नहीं, बदलाव के सिवाय भक्ति नहीं, बदलाव के सिवाय शक्ति भी नहीं। जब तू बदल जाता है तो तू शक्ति का सागर है। बदलता नहीं तो वहीं का वहीं तालाब के पानी के जैसा, खड़ा-खड़ा अपनी हदों में पड़ा रहता है। बदलाव में मन change होता है, कर्म change होते हैं, ख्यालात change होती है, तो तू बहने लगता है, रुकता नहीं। बहना तेरा शान है, रुकना तेरा शान नहीं।

॥ है ही भगवान ॥

28-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

संसार में जिस सुख को ढूँढता है, उसका खज़ाना तेरे पास है, जाने-अनजाने तू उस खज़ाने को पाना चाहता है, पर एक भ्रम है, तेरी प्रकृती दुसरों से विचित्र है, तुझे काम पूरे करने हैं, अपना काम भूल गया। 'करना था सो ना कियो, लोभ में पड़ गया।' अब समय चला जाएगा, मूर्ख अंधा रोता रहेगा। तू भगवान के साथ है, तो तू सुख सागर में है। इस मनुष्य जन्म की कदर कर, खाना खाके, बच्चा पैदा करके, पालन करके पशु-पक्षी भी जीते हैं। हे मनुष्य, तूने अपने में और पशुओं में क्या फर्क देखा ? अपनी कदर कर, मनुष्य जन्म की Value समझ। कभी रोना, कभी हसना, इस चंचलता में अमूल्य समय न गवाॅं। गुरु तो रोज़ बुलाता है, तू आलसी क्यों बना ?

।। है ही भगवान ।।

28-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"भीतर की शांति"

शांति सरोवर में नहाया करो। ज़रा शांति। जब तेरे भीतर अढोल्टा् आती है, एकाग्रता आती है, तू चुप है, शांत स्वरुप है, तो बाहर छौलीयुँ मांणिन छाॅल, पर लाहुँत्ती त लँगे व्याँ। बाहर कितना भी शोर, कितना भी आवाज, पर तू अपनी शांति को पकड़कर पार उतर सकता है। भीतर की शांति के लिए, तुझे खुद पे नाज़ करना होगा, कि मैं अद्वैत का वासी हूँ, अद्वैत मेरा लक्ष्य है, अद्वैत ही मेरा प्रेम है। ऐसी लगी अद्वैत की आग जो जलाया जाए उनको तो बच्चे न उनकी राख।

ऐसी अद्वैत की आग जीवन में भी लग सकती है, पर जब तू इतना तीव्र शौंक रख कि इसी जन्म में अद्वैत को सिद्ध करुं। समझेगा पहले अद्वैत तो ही तो जीवन में सिद्ध करेगा ना। समझा ही नहीं तो सिद्ध कैसे करेगा। जन्म भी तो तेरा अद्वैत को सिद्ध करने के लिए हुआ है ना। तभी तो द्वैत से तुझे खुशी नहीं आती, तभी तो द्वैत से तुझे तृप्ति नहीं आती, तभी तो द्वैत में तुझे कोई मंज़िल नहीं मिलती। अद्वैत में हर चीज़ मिलती है। अर्थ ये बनता है कि तूने जन्म अद्वैत को सिद्ध करने के लिए लिया है। यह सिद्ध करके दिखाया सतगुरु ने और चलने की राहें भी दी, शक्ति भी दी। तू खाली कुर्ब कर अपने ऊपर। कुर्बानी कर सच्ची कि मैं अपनी आत्मा को पकढूँ बाकी सब चलता है, चलता ही रहेगा। तू बीचों बीच पानी पी ले, आत्मा का निश्चय करके अद्वैत को सिद्ध कर और शांत कर, माैंन कर, चुप कर।

॥ है ही भगवान ॥

29-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

दत्तात्रय ने देखा, दो चूड़ीयाॅं साथ में हैं तो खनकती हैं, भनकती हैं, आवाज़ करती हैं, एक हस्ती की है, दो बकरियों की तरह मैं-मैं करती हैं। पर एक चूड़ी प्लास्टीक (plastic) की है, एक शीशे की तो आवाज़ नहीं। दोनों अपने धर्म में, दोनों अपनी मस्ती में। शीशे की चमक को अपनी हस्ती है, plastic की dullness को अपनी मस्ती है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है तो प्रकृती से कहाॅं भागेगा पर दो साथ होवे या 20 होवे, अनेक में एक करके जानो, एक ही आत्मा है। झुकने में, मुड़ने में, मरने में उसकी अपनी हस्ती है।

।। है ही भगवान ।।

29-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सहज समाधि"

सहज समाधि, success समाधि, वैसे तो कभी समाधि में बैठता है, तो मन १० दिशाओं में घूमता है। पर सहज समाधि - उसको समझो। चलते, उठते, बैठते, खाते, पीते समाधि में खुदको महसूस करो कि हस्ती-शक्ति हरि की है। मैं कुछ नहीं करता। जो कुछ हो रहा है, मैं साक्षी-भाव में महसूस कर रहा हूँ कि देह से कुछ भी हो रहा है। आँखें अपना काम, नाक, कान, हाथ, पाँव सब अपना-अपना काम, श्वाँस अपना काम कर रहे हैं। लेकिन मैं अलग साक्षी-भाव में हूँ। अपने साक्षी को पकड़ोगे, तो समाधि सहज हो जाएगी, कभी भंग ना करनेवाली वृत्ति, तेरी अखंड वृत्ति बन जाएगी। अखंड वृत्ति से कभी तू परमात्मा से अलग ना होगा। सदा तेरे साथ बस्ते रहेंगे तेरे भगवान।

॥ है ही भगवान ॥

30-Sep-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मैं आत्मा हूँ, ब्रह्म स्वरुप हूँ, साखी हूँ, तो कोई गुण, कर्म, मुझे बाॅंध नहीं सकता। आत्मा में तू झुक सकता है, मुड़ सकता है, निश्चय की गर्जना कर सकता है तो चूड़ियों की खनक, भनक और झंकार तेरे लिए नहीं है। तेरे साथ एक है, 20 है, या 20 हज़ार है, तू अकेला है, अनेक में एक, एक में अनेक। गुरु ने बताया तेरे जैसा हुआ न होगा। जब है ही एक, एक ही आत्मा, तो मेरे जैसा कौन होगा। अपने आप में समा जा, गुम हो जा, डुबकी लगाके वो सत्य फल प्राप्त कर, सत्य में टिक जा। "आप सत्, कीए सब सत्, दूजा भाव न होवे"।

।। है ही भगवान ।।

30-Sep-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नूरानी नज़र"

नूरानी नज़र पत्थर पर पड़े तो प्रभु बना दे। नूरानी नज़र जहाँ भी पड़ती है, वहाँ नूर ही नूर दिखाई देता है, परमात्मा का स्वरुप ही स्वरुप समझ में आता है। तेरी दृष्टि नूरानी होवे, जिसमें आत्म का नूर होवे, सतगुरु का स्वरुप समाया होवे, तो तेरी नज़र भी कभी धोखा नहीं खाएगी, सबको धोखेबाज़ी से बचाएगी। तेरी एक नज़र किसीका जीवन बन सकती है, तेरे में भरोसा रखता है कोई कि इसने मेरे ऊपर नज़र डाली, यह गुरु का बच्चा है, मेरे को गुरु की बातें सुनाईं, भजन सुनाया, आँखों का पानी सुखाया, दिल का दर्द समझा दिया, लक्ष्य पकड़ा दिया, अब मैं शाद आबाद हो गया।

तेरी नज़र भी अच्छा कार्य कर सकती है। सतगुरु तेरी दृष्टि में भी तो है ना, तो तेरे से क्यों न करेंगे। तू ही सृष्टि सुंदर करके सबको प्रेम देता है, और सबका प्रेम receive भी कर। Only देनेवाला दातार खुद को अहँकार में मत मान। जो कोई प्रेम करता है, तो उसके प्रेम करने की भी इज़्जत रखो, प्रेम रखो। उसमें भी तूँ विश्वास रख कि यह मुझे प्रेम करता है, मैं भी प्रेम करता हूँ। विश्वास की कमी के कारण समाज में कई दुख-दर्द फैले हुए हैं, पर जे कोई अपनी नज़र बनाए, दृष्टि सवारें तो समाज के बहुत सारे दुख-दर्द दूर हो सकते हैं। विश्वास और मज़बूत पक्का संसार में हो सकता है। भरोसा रखो एक दूसरे में भगवान देखो और एक दूसरे में भरोसा रखो तो जीवन की नैया बहुत अच्छी चलेगी।

॥ है ही भगवान ॥

October
01-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

गुरु ने बताया - अपने को देह मानके बेठा है, अपने इस देह-अध्यास को छोड़ो। यह अध्यास ही सब कष्टों का कारण है। इस अध्यास को छोड़ना ही कष्टों का निवारण है। कृष्ण अर्जुन से कहता है, 'निरंतर मेरे में ध्यान लगाकर तू युद्ध कर, कर्म फल के बंधनों से मुक्त हो जाएगा।' अर्जुन के लिए लड़ाई के मैदान में युद्ध है, तुम्हारे लिए जीवन संग्राम है। इस संग्राम में कोई व्यक्ति-विशेष तेरा शत्रु नहीं है, पर तेरे विकार तुझे डराते हैं, यही बड़े शत्रु हैं।

।। है ही भगवान ।।

01-Oct-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"दृष्टी-दोष"

ये भी दृष्टी-दोष है जो तू अपनी दृष्टी से औरों की तोल-नाप करता रहता है। इसीलिए तू किसीसे, fit होने में success नहीं होता। उसकी दृष्टी से, उसकी स्थिती से, उसकी तोल-नाप करो। अपनी स्थिती से, उसकी तोल-नाप ना करो। जब तू आत्मनिश्चय में आएगा, तो एंवढ उँचे को ऊँचा होके जानेगा। जब तक तू खुद शांत-स्वरुप, स्थित नहीं होता, दूसरे को जान नहीं सकता।

।। है ही भगवान ।।

02-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

हम प्रेम की सृष्टी में रहते हैं। प्रेम की दुनिया में पीड़ा नहीं भासती, प्रेमी अपने नशे में चलता है। दुनिया का नशा टूटता है, पर यह तो दिन-दिन होत सवायो। कोई पत्थर लगाए या कोई हलवा खिलाए, सबमें प्रभू का प्यार दिखाई दे। तनदुरुस्ती है या बिमारी है, कोई प्यार करे या धिकार, सबमें प्रभू का प्यार दिखाई दे। अपनी हस्ती मिटाकर मैं भगवान का बन जाऊॅं, मन का भ्रम छुट जाता है। मन तू ज्योत स्वरुप है, आनंद स्वरुप है, प्रेम स्वरुप है।

।। है ही भगवान ।।

02-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"निश्चय ही Safety"

तेरा निश्चय तेरी ही safety है। कितना भी आप कहीं से भी खुदको ठीक रखना चाहो, न्यारा और प्यारा रखना चाहो, राग-द्वेष न करना चाहो तो भी संसार तीन गुण से हैं, त्रिपुटी में है। कुच्छ न कुच्छ हो ही जाता है। किसीका दोष नहीं, लेकिन जब तू आत्मा के निश्चय में है, spirituality की तरफ तेरे कदम बढ़ रहे हैं, तेरी दिशाएँ ज्ञान की तरफ है, सतगुरु तेरे साथ है, तो हर मुश्किलात में निश्चय तेरे आगे रहेगा, मुश्किल काम मुश्किल न लगेगा, हालत-हालत न लगेगी, गिरते-गिरते कदमों को थाम लेंगे तेरे सतगुरु, संभाल लेंगे तुझे तेरी प्रकृति माता, गिरते-गिरते तू बच्च जाएगा। मुख्ख में कटु शब्द आते आते भीतर हज़म हो जाएँगे, निकलेंगे नहीं, किसको तू देगा नहीं। कटु शब्द दिया तो कर्म बन गया लेकिन तू कर्म से बच्च जाएगा, अगर तू अपने आत्मा के निश्चय में है तो। आत्मा का निश्चय तुझे कितनी सारी तकलीफों से बचाता है। आत्मा का निश्चय प्रेम सिखाता है। प्रेम संसार में दुर्लभ चीज़ है लेकिन तेरे आतम-निश्चय के आगे बिल्कुल नज़दीक है प्रेम तेरा। पहचान भी तेरी प्रेम से होती है। हर चीज़ तेरी प्रेम से शुरु होती है और पूरी होती है।


।। है ही भगवान ।।

03-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मन तू ज्योत स्वरुप है, आनंद स्वरुप है, प्रेम स्वरुप है - जैसे असलियत जानी, भ्रम-भेद सब मिट गए, कोई द्वन्द ही न रहा। जब दूसरा ही न रहा, जब देह नहीं, रंग रुप नहीं, मैं-मेरा नहीं, तब तू सब कुछ है। मन के भ्रम की हस्ती खत्म हो गई, सच्ची शक्ती जागृत हो गई, यह जन्म सफल हो गया। 'बहुत जन्म बिछड़े थे माधव, ये जन्म तेरे लेखे'। बुंद सागर से मिलके सागर हो गई। तू प्रभू से मिलकर प्रभू रुप हो गया।

।। है ही भगवान ।।

03-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरी इको ही झलक"


झलक में फलक है। बस एक झलक सतगुरु की मिल जाए तो बेड़ा पार हो जाता है। इक झलक सतगुरु की मिल जाए तो मन पत्थर से पानी बन जाता है। एक झलक सतगुरु की मिल जाए तो तेरा जीवन कहांँ से कहांँ पहुंँच सकता है। इको ही झलक, मेरे लख्खाँ दी मर्ज़्। लांँख तकलीफें हैं, कितनी भी मुश्किलातें हैं, पर शक्तिशाली अपने सतगुरु को ध्यान में रखने से, तेरी अपनी शक्ति जिसका तू धणी है, वो जागृत होती है। अपनी शक्ति को जागृत करो और भक्ति को मज़बूत करो। ज्ञान तेरे से दूर नहीं, ज्ञान ध्यान मैं नहीं जाणा, बस इक आँस है तुम्हारी। इक अांँस से सतगुरु के ज्ञान भीतर चला जाता है, शक्ति जाग उठती है, भक्ति strong होती है, ज्ञान दृष्टि अपना स्थान ले लेती है और तू संसार में एक आदर्शीं जिज्ञासु की तरह अपने जीवन को आगे रखता है। जिज्ञासु बनो, जिज्ञासा रखो और सफर आत्मा का आगे बढ़ाओ।


।। है ही भगवान ।।

04-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

प्रियतम से जो मिला वह सब प्यारा है। ज़रा ध्यान से देखो, प्रकृती से, प्रारब्ध से, तेरे हिस्से का तेरे को मिला, पर तू उसको सुख रुप बनाए या दुख रुप, जैसे तू उपयोग करेगा वैसा फल तेरे को मिलेगा। बादाम तेरे हाथ में आ गए, उसका सही उपयोग करके उसको अमृत बनाया या दुरुपयोग करके ज़हर बना दिया। निराकार से विचार शक्ती मिली, सही समझ मिली, उससे अपने को खोजा, अपने को जाना, या दूसरे को पहचानने में waste किया ? मेरा निश्चय मेरे को सही और सदा के लिए certificate दे सकता है।

।। है ही भगवान ।।

04-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भवानजी के अमृत वचन ।।

“अब नहीं तो कब नहीं"


ऐसी विचारधारा जब तेरे हृदय में आती है, तो तू active बन जाता है, तेज़ घोड़ा बन जाता है। वर्ना खुदसे वादे करते रहो - हांँ अभी करता हूँ, हांँ अभी उठता हूँ, हांँ अभी जाता हूँ। ख्यालों में मगज़् चल रहा है, मन दौड़ रहा है। बस मुख खाली बोल रहा है, बाकी practical में तू बहुत सारा पीछे है। इसीलिए सतगुरु ने वचन दिया - अब नहीं तो कब नहीं। अब नहीं करोगे तो बाद में जो कहता है करुँगा, वो कभी नहीं करेगा। क्योंकि बाद के बाद भी बाद में ही करुंगा बोलता है। उसके बाद भी बाद में ही करुंगा बोलता है। यह बाद बात बनाती नहीं, ये बाद बात को बिगाड़ देती है।

तेरे कईं कार्य बिगड़ जाते हैं, समय गुज़र जाता है, पर तू समय पर कुछ कर नहीं पाता। क्योंकि तेरी पुरानी आदत है - हांँ बाद में करता हूँ। बाद शब्द क्यों बोलते हो ? बस करना है तो उठ जाओ और लग जाओ अपने कार्य पर। आशीष परमात्मा भी करते हैं, प्रकृति-माता भी करती हैं और सतगुरु तो आशीष करते ही रहते हैं कि तू तेज़ घोड़ा बन, धरती का घोड़ा बन, आसमान का पँंछी बन और चींटी बनना न भूलना। कईं रास्ते चींटी बनकर तेरे मिल सकते हैं , only घोड़ा और पंँछी बनेगा तो चींटी वाला रास्ता कैसे ले सकता है? तू allround बन। तुझे सब आना चाहिए - उठना, झुकना, मुड़ना, मरना, बड़ा होना, छोटा होना, सुख्यंम् होना। तुझे हर चीज़ आनी चाहिए, तभी तो तू गुरु का बच्चाँ है।


।। है ही भगवान ।।

05-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

बुदबुदा कितना भी सुंदर लगे, पर कोई उसकी हस्ती नहीं। उसमें वायु भर गई, सुंदर दिखता है। जैसे फटा, सागर से मिलके एक हो गया। यह मन अहंकार की वायू के कारण अपने को something मानके बैठा है, पर उसकी हस्ती नहीं। जब गुरु वह हस्ती मिटाता है, ब्रह्म से मिलके उसीमें लीन हो जाता है। 'थिर मन ब्रह्म है, अथिर मन संसार'। यह थिरता गुरु से प्राप्त होती है। गुरु के इशारे से, आत्मा से, आत्मा प्राप्त होती है। 'आत्मा पशंति आत्मा'।

।। है ही भगवान ।।

05-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तू मेरा, मैं तेरा, ये भेद सनम आज मिला"

जब तू कहीं और था, मैं तुझसे बेखबर था, बड़ा मुश्किल गुज़ारा था। अब जब सतगुरु ने महर कर दी, हकीकत बताई हकीक़त वाले ने, कि तुझमें और परमात्मा में भेद नहीं। शक्ति वोही है। निराकार भगवान कहो या साकार सतगुरु कहो, या तू खुद जिज्ञासु बनके झोली फैलाके सतगुरु के द्वारे खड़ा है तो भी शक्ति एक है। अलग नहीं है। जब एक शक्ति पर पकता होती है, तो ही तृप्ति के दिन शुरु होते हैं। शक्ति का सागर तू भी बन जाता है। जब तू शक्ति का सागर बनता है। तभी तो तेरे से भक्ति भी होती है। भक्ति के सिवाय ज्ञान नहीं, ज्ञान के सिवाय भक्ति नहीं। इसीलिए भेद मिटाओ, अद्वैत को सिद्ध करो। द्वैत बुद्धि ना रखो। भगवान को अलग ना समझो। सों प्रभु दूर नहीं, सों प्रभु तू ही है। तू ही तू, तू ही तू, तू ही तू। है ही भगवान। है ही भगवान। शक्ति का सागर तू भी बन जाएगा जब जड़ - चेतन में भगवान का एहसास करेगा। महसूस करो कि कण-कण में, मिट्टी के ज़र्रे-ज़र्रे में, जड़ - चेतन में, मानव-दानव में, हर चीज़ में भगवान ही हैं। भागवान खा सिवाए कुच्छ बणीयो ही नाहे। भगवान है तो ब्रह्म-निश्चय है। भगवान् देखेगा तो ही ब्रह्म-निश्चय होगा। ब्रह्म-निश्चय के सिवाय तू अधूरा है। अपने को संपूर्ण बनाओ, पूर्णता की तरफ बढ़ो। सुंदर बनाओ। सत्यम् शिवम् और सुंदरम्। खुद जियो, औरों के लिए भी रास्ता छोड़ते हुए जीते चले जाओ।

।। है ही भगवान ।।

06-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'अंतरमुखी सदा सुखी, बाहर मुखी सदा दुखी'। अगर कोई बाहर से चुप करके बैठे, पर मन शांत न हो; चेतन मन चुप लगे, पर अर्धचेतन और अचेतन में तुफान हो; कभी मालूम पड़े, कभी न मालूम पड़े; यह तुफान क्यों और कैसे; तो यह अंतरमुखता नहीं! भली मन चले तो चले, पर अपने उध्दार में लगा हुआ है। अपनी भूल सुधारने में चाहे किसीसे बात करनी पड़े, चाहे चुप रहना पड़े, अपनी सुधार की लगी रहे, यह अंतरमुखता है। बाहरमुखता में दूसरा तो है ही है, जो मेरी उध्दार में रुकावट है, इतना बड़ा भ्रम है। सारा जगत अपना दोष दूसरों पर थोपता है, इसीलिए तो दुखी है। 'राजा भी दुखिया, प्रजा भी दुखिया' ! यहाॅं गुरु ने अंतरमुखी किया!

।। है ही भगवान ।।

06-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बहते रहना"


बहते रहने में तेरी success है। पानी बहता भला। भले ही गंगा-मांँ का पानी हो, तो भी बहता है, तो ही तो तू उसमें डुबकी लगाता है। बहता है गंगा-मांँ का पानी तो ही तू अंजलि लेता है, तो ही तू कईं कार्य करते हो। पर जे माँ-गंगा का पानी ही कहीं रुककर कुछ खड़ा हो जाए, बहे ना, तो उसमे तू क्या करेगा? है तो माँ का पानी। फिर भी खड़े पानी में, रुके पानी में, तालाब जैसे पानी में तू नहाएगा तो नहीं, पूजा तो नहीं करेगा। इसीलिए तेरा भी जीवन अगर रुक जाता है तो किसी काम का नहीं है। पर जे जीवन चलता रहे, बहता रहे, तो वो हर कार्य के लिए अच्छा सिद्ध हो सकता है। बहना सीखो। लेकिन खड़े रहना नहीं। खड़े रहने में गंदला पानी हो जाता है। तू पाव को भी डाल नहीं सकता, उस पानी को छू नहीं सकता। और हकीकत में निश्चय में तू आता है तो ही तू सब कार्य कर सकता है। चलता भी है, फिरता भी है, घूमता भी है और तू अपनी ही धुन में अपना जीवन, अपने जीवन की नाव बहते पानी में लेकर अपनी मंजिलों की तरफ बढ़ता ही जाता है। मंजि़ल तेरी तरफ बढ़ती ही जाती है। एक दूसरे के करीब आके तू मंज़िल में समा जाता है, मंज़िल तुझमें समा जाती है।


।। है ही भगवान ।।

07-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

दादा भगवान ने बताया है, जहाँ तुझे निराकार ने रखा, अगर वहाँ तू खुश नहीं, तृप्त नहीं, तो कहीं भी, कभी भी, तृप्त नहीं होगा। जब तू प्रकृती में Fit हो जाए, हाय-हाय बंद करे, उसके बाद अपने उध्दार की सोचेगा। परम आनंद को पाने की जिज्ञासा होगी, नहीं तो कभी कीर्ति, कभी कामिनी, कभी कंचन पाने के लिए अपने को व्यस्त कर दिया। दुर्लभ मनुष्य जन्म हीरे जैसा Colour में मिला दिया। माया तेरे को बाहर दिखाई देती है, पर माया तेरे भीतर है। कभी हँसता है, कभी रोता है, दुखी-सुखी होता रहता है, Timepaas होता है, परम आनंद को नहीं पा सकता है। जानवर को यह समझ नहीं मिल सकती। मनुष्य तीव्र जिज्ञासा रखकर, गुरु की शरण लेकर, गुरु वचन पर चलकर मंज़िल प्राप्त करता है।

।। है ही भगवान ।।

07-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"धीरज"


धीरज के जहाज़ पर जो चढ़ता है वो अवश्य पार उतरता है। पुरुषार्थ भीतर का होना चाहिए। बाहर हालत कैसी भी हो, बातें कैसी भी हो, लेकिन भीतर की स्थिरता कभी भंग ना होने पाए। कस्स बाहर की लगी तो चलता है। पर कस्स अपने एकाग्रता की लगती है, संतोष-धन की लगती है, तो जिज्ञासु loss में जाता है।नुकसान मत उठाओ, प्रेम की दुनिया बसाओ। हम प्रेम नगर में रहते हैं, जो बन आए सब देखते रहते हैं।


।। है ही भगवान ।।

08-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सपने में कर्म हुआ, सपने में फल पाया। Future की चिंता कौन करे ? भरोसा पल का नहीं, सौ बरस का सोचें, कैसी मूर्खता होगी ? न Past, न Future, अभी की घड़ी जिसमें मैं पूरी शक्ती को समेट कर आत्मा में लगाऊँ। निरंतर निश्चय है, निष्ठा नज़दीक आ जाएगी। ओम ओम कहत ओम ही रहीयो। ध्याता ओम को ध्येय (Aim) मानकर ध्यान करता है। ध्यान करते करते, ध्याता और ध्येय एक हो जाता है और ध्यान गुम हो जाएगा। चल कबीरा वहाँ जहाँ ओम भी थक जाए। श्रध्दा से गुरु को अपना आधार मानकर, साथ जानकर, वचनों पर विश्वास रखकर, अपना रटन चालु करें, तो मंज़िल दूर नहीं नज़दीक है।


।। है ही भगवान ।।

08-Oct-2016

 ।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“हकीक़त"


हकीक़त बताई हकीक़त वाले ने। हकीक़त क्या है - हकीक़त यही है कि मैं देह नहीं, मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। जब मैं देह नहीं हूँ, तो विख्खेप की सारी खिड़कियाँ बंद। मैं जब देह हूँ, तो विख्खेप दाएँं-बाएंँ, नीचे-ऊपर, सब तरह से आ ही जाते हैं। विख्खेप को आने ना दो। खिड़कियाँं सब बंद रखो। शरीर जब ढ़ीला पड़ता है, blood कम पड़ता है तो तू दो दो घंटे में कुछ न कुछ खाता है। ताकि blood बराबर बनता रहे। पर मन कमज़ोर होता है तो मन को तू क्या दो दो घंटे में खाना देता है ? नहीं देता। बोलता है सुबह सत्संग जाके आया हूँ ना। या तो आज सत्संग नहीं गया तो क्या हुआ। कुछ time सतसंग में नहीं जाता हूँ तो क्या है। अच्छा नहीं गया। घर में खाना दिया? वाणी पढ़ा? गीता पढ़ा? diary पढा़? phone पर भी थोड़ा सत्संग सुना? नहीं। कुछ भी नहीं।

पर मैं अपने देह से ऊपर हूँ। ऐसे देह से ऊपर कैसे हो सकते हैं। जब तू विख्खेप-रहत है, तो तू देह से ऊपर उठ सकता है। विख्खेप रहत तू कब बन सकता है। जब मन तेरा strong है। मन तेरा strong कब बनेगा। जब उसको तू बराबर खाना-पीना देता रहेगा। भूख़ा पेट तो काटने को दौड़ता है ना। ऐसे ही भूख़ा मन भी काटने को दौड़ता है। उसकी भूख़ मिटाओ, उसको हर वक्त कोई-न-कोई विख्खेप आने के पहले थोड़ा-बहुत dose देते जाओ। कभी वाणी पढ़ो, कभी तू भजन गा, कभी सत्संग सुन, कभी कुछ, कभी कुछ। लेकिन विख्खेप से ऊपर उठो। हालत कैसी भी आए, Loss हो या फायदा हो। लेकिन मुझे विख्खेप नहीं चाहिए। ऐसा कसम लो, ऐसा व्रत रखो जो ले ना सके कोई।

।। है ही भगवान ।।

 

09-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

आदि सच, जुगाद सच, है भी सच, होसी भी सच। ये सच क्या है? अपनी-अपनी कल्पना से अपना-अपना भगवान बनाके रखा। कोई बोले मेरा भगवान सच है, जैसे संकल्प से संसार बन गया, वैसे कल्पना से भगवान बना दिया। परम्परागत, जुगों-जुगों तक, युग-युग तक मानके बैठे, यह मेरा धर्म, यह मेरा गुरु, यह मेरा भगवान। गुरु वह जो ह्रदय की अंधेरी गुफा में रोशनी करे, उसे ही सतगुरु कहेंगे जो सत् में टिकाए।

।। है ही भगवान ।।

09-Oct-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"Relax"

Relax - आत्मा की relax सबसे powerful relax है। आनंद देती है, कर्म के लिए प्रेरणा भी देती है, साथ-साथ relax भी देती है। आतम-निश्चय वाला हर वक्त खुश रहता है, परमात्मा की प्रेरणा में रहता है, अपनी relax की खुशी में रहता है। भगवान के ऊपर, हर चीज़, हर बात छोड़ देते हैं तो भी relax होते हैं। पर जे तू भगवान को हाज़िर-नाज़िर याद करके, उसकी बात को आगे रखके, तू अपनी relax को भगवान में समा देता है तो relax का आनंद और बढ़ जाता है। अपनी relax में रहो, अपने आनंद के छोलियों में रहो और अपने में परमात्मा को ढूंढो।

।। है ही भगवान ।।

10-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मनुष्य हदें बनाता है। कहीं कुल-परिवार की, कहीं मत-मतांतर की, कहीं गुरु-गोसाईं की, कहीं धर्म-अधर्म की। सतगुरु प्रतीत कराता है कि ये हदें हथकड़ियाँ हैं, उन्होंने तेरे को बाँधके रखा है। गुरु के इशारे से जब हथकड़ियों को तोड़ता है, उसे पता पड़ता है, यह हथकड़ियाँ भी भ्रम थी। गधे के गले पर हाथ फिराने से, समझता है मैं बँधा हुआ हूँ, गुरु उल्टी तरफ हाथ घुमाता है, गधा समझता है रस्सी खुल गयी, वैसे गुरु की ललकार से भ्रम की रस्सी, जो भ्रांती थी, असत् थी, वह न रही। अभी साधक अपने को बेहद में पाता है। पूरी सृष्टी कृष्ण का विराट स्वरुप है। गुरु दिव्य दृष्टि देता है, जिससे जिज्ञासु दिव्य विभुतियों को जानकर, अपना पुराना जन्म भुलाकर, दिव्य जन्म प्राप्त करता है। फिर सत् ही सत् है। आप सत् कीए सब सत्।

।। है ही भगवान ।।

10-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अहंकार और निम्रता दोनों में फर्क"

अहंकार तुझे डूबा देता हैं, निम्रता- तूँ तर् जाता हैं| अहंकार प्यार छीन लेता हैं तुझसे, और निम्रता प्यार का वरदान दें देती हैं| अहंकार नफरत पैदा करता हैं, और निम्रता नफरत कों दूर कर सकती हैं| अहंकार में बाहर से पावर हैं, भीतर से खोखलापन हैं| निम्रता में, भले बाहर से आपकों दिखाईंदें कि यह जुक गया, पर भीतर से powerful हैं निम्रता में| और मनुष्य कों क्या चाहिएं|
पावर के लिए हीं तों तूँ अहंकार करता हैं| पर पावर-करने के बाद अहंकार में पावर रहता नहीं हैं| पर निम्रता में पावर रहता हैं| अपने फर्क कों समझो कि मैं अहंकार क्यों कर रहा हूँ और निम्रता क्यों नहीं कर रहा हूँ|  अपने हृदय से हाल-चाल करों, और फिर अपनी भूलों कों सुधारों यही तेरा लक्ष्य होना चाहिएं, यही तेरा आदर्श भी होना चाहिएं|
आदर्श करों और अपनाओं अपने प्रेम-कों| प्रेम खजाना जों भी लुटाएं जग उसका दीवाना| निम्रता के बाद हीं तुझसे प्रेम की अंदर में उम्मीद कर सकते हैं| जब तक निम्रता नहीं हैं, तो प्रेम आ नहीं सकता|

||है ही भगवान||

11-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मैं अजर अमर अविनाशी हूॅं, मेरा कभी न होता नाश। मैं सर्वव्यापी पर एक हूॅं। जब हूॅं ही एक तो द्वन्द कहाॅं, मैं द्वन्द रहित हूॅं, द्वन्दों में होता है, विकार दो से होते हैं, दूसरे से होता है। प्रकृती में अनेकता है, पर मेरे में नहीं। सूरज ने कभी अंधेरा नहीं देखा, हवा के आगे मच्छर टिक नहीं सकता है। मैं आत्मा, ज्योति स्वरुप हूॅं, अज्ञान रुपी अंधेरा मेरे पास आ नहीं सकता है। भ्रम था, गुरु ने भ्रम छुड़ाया, अभी संसार में वह सतभावना नहीं रहेगी। रस्सी को साॅंप माना, डर गए, किसीने रस्सी को उठाकर, हिलाकर दिखाया, अरे! यह साॅंप नहीं रस्सी है, भ्रांती छूट जाती है। थोड़ी-थोडी करके नहीं, एक झटके से !

।। है ही भगवान ।।

11-Oct-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

“उतार-चढ़ाव"

उतार-चढ़ाव ज़िंदगी में आते रहते हैं, जाते भी रहते है। ये उतार-चढ़ाव तेरे ज़िंदगी के हिस्से हैं। इनको ग़ैर ना मानो। अपना ही मानो। अपना मान के चलोगे तो उतार-चढ़ाव में तू कहीं disturb ना होगा। उतार-चढ़ाव शक्ति बढ़ाते हैं, अनुभव भी कराते हैं, झुकना भी सिखाते हैं, मुड़ना भी सिखाते हैं। कभी-कभी मनुष्य की ज़िंदगी में ये सब बातें ज़रुरी होती तो हैं, पर तू रखता नहीं अपनी life में।

झुकना नहीं आता, मुड़ना नहीं आता। सबसे प्यार करना नहीं आता तो कभी-कभी उतार चढ़ाव तेरी ज़िंदगी में आते हैं, तो हालतें तुझे सिखा देती हैं। परमात्मा हालतों के रुप में आपको प्रसाद भेज़ देते हैं। थोड़ा-बहुत प्रसाद लेकर परमात्मा का, अपने भीतर के स्थिरता को एकाग्रता को ढूंँढो। हालत आए चाहे जैसी पर स्थिरता ना मिटे तेरे मन की। मज़बूत बनो, शौंक रखो कि हर हाल में, मैं खड़ा हो सकता हूँ, लड़खड़ाता नहीं हूँ। हर हाल में प्रसाद पाकर अमर रहता हूँ, परेशान नहीं रहता। हर हाल में अपने भगवान को साथ में रखता हूँ, मैं अकेला नहीं रहता।

।। है ही भगवान ।।

12-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

संसार को सत् जानते हैं, तो दुखी-सुखी होते हैं। डर, शक, वहम, गुमान, इज्ज़त, बेइज्ज़ती सब भासता है। जीव-भाव में सब होता है, ब्रह्म भाव में कुछ भी नहीं। कोई हालत हिलाएगी नहीं, कोई मौत मारेगी नहीं। यह बातें मेरे से परे, परे अति परे हैं। ब्रह्म निष्ठा के लिए ये बातें अपने में आरोप करें, यही ध्यान है, यही समाधी है, यही धारणा बन जाएगी, मैं अजर हूॅं, अमर हूॅं, अविनाशी हूॅं। ओम-ओम कहते ओम का रुप बन जाऍं। मेरा कभी नाश नहीं होता, मैं सर्वव्यापी, सदा के लिए हूॅं।

।। है ही भगवान ।।

12-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“अंग-संग सतगुरू”

सदा बस्त सब साथ| गुरू सब के साथ हर वक्त हमेशा रहते हीं है| तुझे दिखाईं दे यां ना दें , ये तेरी नैनों का आँखों का , है कसूर| हृदय में महसूस होवें यां ना होवें, ये है तेरे हृदय का कसूर| इंद्रियों में सतगुरू की शक्ति पहुंचती हीं हैं| तुझे पहुंचे या ना पहुंचे, यह तेरे देह के आलस का हैं कसूर|
अपना कसूर , अपनी गलती, सतगुरू पर ना डालों। सतगुरू हर वक्त, हर हंद, हमेशा Eveready रहते हैं। पर जब तूं कहीं ढीला पड़ता हैं, तो गुरू भी खुदको relax में रखकर और wait and watch करके तेरा इंतजार करते हैं कि कब मेरा बच्चा लौटेगा। आलस ने तेरे सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। अब आलस छोड़कर सतगुरू कों हर वक्त, हर हंद, हमेशा अपने साथ में महसूस करों। पास मैं हैं वों तेरे, साथमें चल रहे हैं तेरे, सोते हों तों, सों रहे हैं तेरे साथ और तुझे क्या-चाहिएं।

।। है ही भगवान ।।

13-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

संतो का संग मस्तक रेख मिटा देता है, सूली को कांटा बना देता है। मन की प्रकृती उलझती है तो गुरु को उत्तरदायी मानता है। गुरु ने कहा सतसंग में प्रेम, नेम-टेम रख; ज्ञान आपे ही लगेगा, तू शांत कर, धीरज कर। विकारों से ऊपर उठने के लिए शांती की, धीरज किया, पर माया की दौड़ तेज़ कर दी, वहाॅं शांती और धीरज क्यों नहीं ? अगर माया की तरफ शांत करें, प्रकृती में परमात्मा प्रतीत करें, तो मन खुद ब खुद राम रस में डूबता जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

13-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“सतगुरू सच्चा सहारा हैं ”


गुरू का सहारा कभी ना भूलो| सतगुरू सच्चा सहारा हैं, वों होता हमारा हैं| पराया ना समझो, अपना हीं मानों| गुरू के हाथ हजार, गुरू की नज़र अपरंपार, उनकी मेहर-दृष्टि सबसे ऊंची, सबसे ऊपर।

मेहरबान मेहर कर रहे हैं। तूँ अपनी झोली फैला हीं दें, झोलीयाँ बरदा हैं, आसीस करदा-हैं, पिरोंधा पीर मेरा, शाही फकीर मेरा, वों सतगुरू प्यारा हैं । हर वक्त ख़ुशी देनेवाला, वों खुशियाँ दे रहा हैं, तूँ खाली लेलें। प्रेम के नगर में रहों, जों बन आता हैं, उसको देखते चलो। करने से ज्यादा, देखने का काम करों, तभी जाकर तु आत्मा के निश्चय में पहुंच सकता है।

 

॥ है ही भगवान ॥

 

14-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सत्य के आगे असत्य टिक नहीं सकता। जगत के प्रति सत भावना भले तेरे को सुंदर लगे, प्रिय लगे, पर सत्य नहीं है, शिव नहीं है, सुंदर भी सदा के लिए नहीं है। क्योंकि संसार परिवर्तनशील है, कभी तेरे को प्रिय लगता है, कभी अप्रिय।कभी किसीको पाने के पीछे पड़ता है, कभी किसीसे उबकर छुड़ाने का यत्न करता है। विषयों के पीछे पड़ता है, फिर उन्हीं से उबकर छूटने का यत्न करता है। अंत में हाथ कुछ नहीं लगता है। यही निराशा, जो चाहा वो तो मिला ही नहीं, क्या यही है मनुष्य जीवन ? यही है उसकी सफलता ? इस रंग बदलती दुनिया में हमेशा तेरा भी रंग बदलता रहता है। तू प्रभु का ऐसा रंग अपने पर चढ़ा जो कभी छूटे ना, चाहे धोबी सारी उमरिया धोए। तेरा रंग दूसरे पर चढ़े, पर तेरे पर किसी का रंग न चढ़े। शिव वही है, सुंदर भी सदा के लिए वही है।

।। है ही भगवान ।।

14-Oct-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"मनुष्य के पैरों ने दी complaint"

Complaint आई है कि आप अपने पैरों की, पाँव की सफाई नहीं करते हो। पैरों ने कहा है कि सबसे ज़्यादा काम हम करते हैं। फिर भी पता नहीं मनुष्य हमें ही क्यों मैला छोड़ते हैं। साफ ही नहीं करते। इसीलिए तो बहुत सारी बीमारियाँ आ जाती हैं। पाँव ने कहा, हम क्या कर सकते हैं! बीमारियों को रोक नहीं पाते, digestion power को strong नहीं कर पाते। क्योंकि मनुष्य घाई-घाई में, पूरा तो नहा लेता है, लेकिन पैरों की सफाई बाद में सोचता है। बाद में करुंगा, बाद में करुंगा। पाँव के नीचे की skin कड़क कर दी है। एड़ियों को खुला छोड़ दिया है। कोई इलाज करता ही नहीं।

Please अपनी बीमारियों को रोको, खाना खाओं तो भी पहले एक दृष्टि अपने पाँव पर डालो कि मेरे पैर साफ़ हैं जो मैं खाना खा रहा हूँ। जब तक पाँव की सफाई नहीं की, खाना मत खाओ। पाँव की सफाई नहीं की, मंदिर में मत रुको। पाँव की सफाई नहीं की, गुरु के आगे मत जाओ। पाँव की सफाई नहीं की, तो अपने आत्मा का दर्शन तू कैसे करेगा। माना कि मन अपने दी करो सफाई तो ही देगा प्रियतम दिखाई। पर फिर भी अगर तू तन की सफाई नहीं करता, तो मन की कितनी भी की है, तन की सफाई के कारण तेरी आत्मा का दर्शन जल्दी होगा। तन की सफाई ना होगी तो कहीं ना कहीं रंडक-रुकावट पढ़ ही जाएगी। इसीलिए अपने तन पर भी ध्यान दो, मन पर भी ध्यान दो, बुद्धि पर भी ध्यान दो। अपनी हर angle से ध्यान में अपने को रखो और आदर्श मज़बूत करते जाओ। सत्संग में भी आओ और अपने तन-मन की सफाई का पूरा ध्यान रखो। तू पाक-पवित्र जीवन जीएगा और आनंद में रहेगा।

।। है ही भगवान ।।

15-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भवानजी के अमृत वचन ।।

भगवान का बनके, गुरु का बनके, उचित-अनुचित, निषेध कर्मों में अपनी कर्म पत्रिका बनाता है, निराकार से सहन नहीं होगा। साधारण ग्रामिण मनुष्य दोष करता है, दूसरी ओर पढ़ा लिखा वकील दोष करता है, वकील को माफी नहीं मिलती। वह नहीं कह सकता गलती हो गयी, कायदे कानून की पहचान नहीं। उसी तरह सतसंग में निष्ठा के लिए आते हैं, सतसंग में तू शांत करके बैठे, उठते ही मन बंदर की तरह उछले, न कोई नियम, न कोई संयम। सतसंग में तू मनुष्य बनने के लिए आता है। अगर नियम, गुरु की मर्यादा, सतसंग की मर्यादा, संयम, आँख ने दूसरा क्यों देखा, पर-स्त्री, परपुरुष को क्यों देखा ? भगवान क्यों न देखा ? अपने लिए इसको but natural न समझ, अगर गलत विचार आते हैं तो पश्चाताप कर, खून के ऑंसू बहा !

।। है ही भगवान ।।

15-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरुदेव का कहना"


आप अपने सर को हर वक्त ठँंडा रखो और पाओं को गर्म रखो, पेट को नर्म रखो। तंदुरस्ती की यही निशानी है। तंदुरुस्ती का गहरा राज़ यही है कि तू हर वक्त सर ठंँडा रख, पाँव गर्म रख़ और पेट नर्म रख़। प्रकृति तीन गुण से है। तेरी तंदुरुस्ती भी तीन बातोंं से है।

प्रकृति जिसमें तू रहता है, वो त्रिपुटी में है। तू भी अपने देह की त्रिपुटी में रहता है, पर balance नहीं करता। Tension लेके, उल्टा-सीधा खाके, तू सर को गर्म कर देता है। आप सोचोगे, दिमाग़ से तो खाता नहीं, फिर सर गर्म क्यों होता है? तेरे सर का पड़ोसी पेट है ना। पेट को तूू बराबर नहीं रखता। उल्टा-सीधा खिलाता है , कम-जास्ती खिलाता है। कभी भूख निकालता है, कभी excess खाता है। कभी चना चबाने को डालता है, कभी एकदम खिचड़ी खाता है। बीमार पड़ेगा तो खिचड़ी ही खाएगा ना। Balance नहीं करता। मनुष्य का बस इतना ही दोष है। सर - पेट का balance नहीं होता, तो पाओं का कैसे होगा। वो भी बेचारे कभी ठँंड्डे पड़ जाते हैं, कभी ज़्यादा ही गर्म हो जाते हैं। Circulation सही नहीं चलता। इन सब बातों का ध्यान कौन रखेगा? इन सब बातों का ध्यान तुझे खुदको ही रखना है। खुद ही देखो।

Tension ना लो। प्रालब्ध पर भरोसा रखो, मांँ कुदरत पर भरोसा रखो। सर को ठंँडा करो। पेट के साथ बेइंसाफी मत करो। आप उसको ज़्यादा जगह मत दो। वो बिचारा बाहर की तरफ दौड़ता है। तू उसमें और ज़्यादा डालता जाता है। वरी वो बिचारा बाहर की तरफ दौड़ता है, तू और डालता जाता है।

Please कदर करो अपने पेट की। उसको अपनी जगह पर रहने दो तो ही अच्छा लगेगा। पाँव भी तेरे अच्छे रहेंगे। पेट की गर्मी ना सर में जाएगी, ना पाँव में जाएगी। अपने से इंसाफ करने वाले को ही माँ कुदरत इंसाफ देती ही है। गुरु भी ध्यान देता है, परमात्मा परमेश्वर तेरे भीतर प्रगट होते हैं जब तेरा भीतर का तन शुध्द, पाक, पवित्र रहता है, तो तेरे नस-नस में वास करते हैं, तेरे प्रभु। तुझे अपना बनाकर तेरे ह्रदय में आसन ग्रहण करते हैं तेरे प्रभु, तेरे सुवामी। अपने स्वामी की कदर करो, भीतर मन के अंदर तो मंदिर बना दिया, अब तन को भी इतना शुध्द रखो,जो तन तेरा तीर्थ बन जाए।

॥ है ही भगवान ॥

16-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

गुरु उम्मीद नहीं छोड़ता है, पर तू कायर है, विकारों को पकड़ नहीं सकता है, गुरु को पकड़ने नहीं देता है। तो शेरों की संगत छोड़कर, भेड़ों की भीड़ में जा बैठ। उन्हीं का रुप हो जा। बैठता है शेरों की महफिल में, बकरी, भेड़, गीदडों जैसी आवाजें करता है। अपने असली स्वरुप को पहचान, कायर और कमज़ोर न बन। संयम से समझौता कर, कहीं कीर्ति, कहीं कामिनी, कहीं कंचन में अपने को बर्बाद न कर, यह अपने से धोखा है। और कोई धोखा दे तो भगवान, गुरु उसकी रक्षा करें। जो खुद को धोखा दे, उसे गुरु क्या करे, हरी क्या करे ?

।। है ही भगवान ।।

16-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“समय की संभाल"

तेरे समय की संभाल कौन कर सकता है? तेरा समय तू जहाँ-तहाँ बहुत बार waste कर रहा है। समय waste, energy waste. पता ही नहीं पड़ता अहंकार में कब कितना समय लगा दिया। बोलता ही जाता है, discussion करता ही जाता है। तेरे को पता नहीं पड़ता कि तेरा समय कितना फिज़ूल चला गया। अब तेरे समय की संभाल कौन करे? प्रेम करेगा। प्रेम के सिवाय तेरे समय और energy, दोनों की संभाल नहीं हो सकती है। पर जब हृदय में प्रेम है तो प्रेम में तू अहंकार करता नहीं। अहंकार नहीं करता, तो समय बर्बाद नहीं होता। इसीलिए तू अंहकार छोड़के प्रेम की दुनिया में चले आ।

सतगुरु राम-नाम की नैया लेकर तुझे पुकार रहे हैं कि आओ मेरी नैया में, मैं ले जाऊंगा उस पार। जहाँ तकलीफ नहीं, परेशानी नहीं। बस प्रेम ही प्रेम, प्रेम ही प्रेम बसते हैं। प्रेम में जब तू चलता है तो तुझे बड़ी बात भी छोटी लगती है और तू उन बातों के पीछे, time waste नहीं करता। पर जे प्रेम नहीं है, दिल में द्वेष है, तो फिर बड़ी बात भी छोटी ना लगके, छोटी बात बड़ी लगती है। अब फैसला तेरे हाथ में है। यहाँ सब विकार दे दे, बदले में तू प्यार लेले। इसी प्यार से फिर तू जि़ंदगी गुज़ारते चलो।

।। है ही भगवान ।।

17-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सुधारक अपने चाहिए, दूसरों के नहीं। जिसने अपने को सुधारा उसके लिए पूरी दुनिया ठीक-ठीक-ठीक है। प्रकृती में तीनों गुणों का होना but natural है - रजोगुणी, सतोगुणी, तमोगुणी। किसी भी गुण में मनुष्य तो दुखी-सुखी होता है, फिर किस गुण को अच्छा बोलेगा, किसको ना ? प्रकृती में ये गुण चलेंगे, हम उनके अधीन न हो जाऍं। गुण में जीनेवाले अपने को ठीक, दूसरे को नाठीक समझता है, फिर गुणों के अधीन होकर दुखी-सुखी होता है।

।। है ही भगवान ।।

17-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“तेरे हाथ और पाँव के नाखून"

उन बेचारों का क्या दोष है। वो कहते हैं मनुष्य हमें मट्टी देता ही रहता है। नाखून इतने छोटे, तू मट्टी भीतर डालता ही जाता है। चलो कामकाज में पड़ भी जाती है, no problem. फिर तू साफ क्यों नहीं करता! काटता क्यों नहीं है ! मट्टी निकालता क्यों नहीं है ! वही मट्टी, तू खाना खाता है, नाखून बड़े हैं, तो खाने में तेरे germs तेरे भीतर जाते हैं। इतना तो तू समझता है, बताने की ज़रुरत तो नहीं है। पढ़े लिखे सारे हैं! फिर भी नज़र अंदाज छोटी-छोटी बातों को क्यों करते हैं। क्यों खुद के लिए problem खड़ा करते हैं।

नाखून को समय पर काटो और हल्के-फुल्के हो जाओ। आप महसूस करो जब तेरे हाथ पाँव के नाखून बड़े हैं, तो तू भारी-भारी लगता है। काटके तू free हो गया। मट्टी निकालके fresh हो गया। फिर देखो आप श्वाँस भी अच्छे से लोगे और हल्के-हल्के रहोगे। हल्का होने के लिए, अगर तुझे कुछ करना पड़ता है तो क्यों न करें। हल्का होना है, साफ-सुथरा रहना है और आनंदित रहना है। शरीर की तरफ ध्यान दो और अपनी आत्मा की जागृती में जो भी रुकावटें हैं, उसको दूर करते जाओ।

।। है ही भगवान ।।

18-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

वास्तव में मैं गुणातीत हूॅं, गुण अन्त:करण में उत्पन्न होते हैं, मैं अंत:करण थोडी हूॅं। मैं देह नहीं, अन्त:करण नहीं, तभी शुध्द सोहम् रुप, आत्म स्वरुप हूॅं। ये गुण तेरा असली स्वरुप होता तो सदा के लिए होता, पर बदलते रहता है। कभी-कभी अंतरमुखी होकर, अपनी पहचान करना चाहता है, कभी बाहर मुखता में, कर्मों में रत (busy) रहके timepass करता है। कभी न अंतरमुखता, न बाहर मुखता, आलस्य, पशुओं की तरह time बीत जाता है।

।। है ही भगवान ।।

18-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मेरी सृष्टि सुंदर करो"

दिया है वादा हम सभी ने कि करेंगे हम सब तेरी सृष्टि को सुंदर। अब सुंदर - क्या सृष्टि रंगों से सुंदर नहीं? क्या सृष्टि पदार्थों से सुंदर नहीं? क्या धन दौलत से सुंदर नहीं? व्यक्ति परिवारों से सुंदर नहीं? सबसे सुंदर है। सृष्टि में कोई कमी नहीं है। वो सुंदर ही सुंदर है। लेकिन जो सृष्टि की सुंदरता सतगुरु ने अपने हृदय में रखकर, आदेश दिया है अपने बच्चों को कि जाओ मेरी सृष्टि सुंदर करो, वो कुछ अलग ही कार्य है। उसके लिए आपको बाहर की चीजें, बाहर की बातें, बाहर का धन-दौलत, उसकी कोई ज़रुरत ही नहीं। लेकिन उसके लिए चाहिए जो सृष्टि सुंदर करना चाहे, उसका तपोबल, उसकी तपस्या कि उसके भीतर जब ना राग रहे, ना द्वेष, ना बिआई, ना दूआई। अपने में रहे, अपने भगवान में रहे, यह तप है, इसी तप से ही तू सृष्टि सुंदर कर सकता है। तू प्रकृति का pillar बन सकता है।

।। है ही भगवान ।।

19-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

अंतरमुखता सतोगुण की निशानी है, बाहर मुखता रजोगुण में होती है, तमोगुण में कोई भी मक्सद नहीं, बस जीना है। साधक को अपनी पहचान के लिए, सतोगुण में रहना पड़ता है, पर वह मंज़िल नहीं, मंज़िल तो गुणातीत होना है, जो मेरा असली स्वरुप है। गुरु जब आईने में मुझे अपना स्वरुप दिखाए तभी पता पड़ता है कि अपने असली स्वरुप को छोड़कर मैंने कैसे नकली नकाब पहनके रखा है।

।। है ही भगवान ।।

19-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“जीवन की कदर"

कदर वन्यी पुच्छ कदर वारन खाँl जिन्होंने अपने जीवन की कदर की है, उनसे ही कदर पूछनाl कदर करना अपने जीवन का जरूरी हैl तूने खुद अपना कदर नहीं कीया , तो दूसरा कोई तेरे जीवन का कदर कैसे कर सकता हैl फिर तेरा मन disturb होता है कि सामने वाला मेरा कदर नहीं करताl पर तू यह नहीं विचार करता कि मैंने भी तो अपने मनुष्य जन्म की कदर नहीं की हैl मनुष्य जन्म में आईके जिनीं ना जानियो ज्ञानl ज्ञान जानना तेरा जरूरी हैl ज्ञान मिलता है सत्संग सेl सत्संग जाना भी जरुरी है, ज्ञान सुनना भी जरूरी है, ज्ञान भांटना भी जरूरी है और अपने हृदय में स्थिरता को प्राप्त करके स्थिर मन में रहना भी जरूरी हैl सब बातें तुझे मिल सकती हैं जो तू अगर सत्संग में जाएँ और आत्मा का निश्चये करे, तो आत्मा के निश्चय के under तुझे सब कुछ मिल सकता हैl

॥ है ही भगवान ॥

20-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'मैं मैं न रहूँ, तू तू न रहे, हम राम में ऐसे रम जाऍं। जीअरा हरी नू ध्याए, हरी रुप हो जाए।' जिससे प्रेम होता है उसे क्या अच्छा लगता है, प्रेम पात्र उसीके अनुकूल, अपने लिए ढाॅंचा बनाके अपने को उसमें fit करना चाहता है। दुनिया में सबकी अपनी-अपनी विचारधारा है, सब पंथ, मत-मतांतर, राजनीति-समाज, व्यक्तिगत जीवन सबका अलग-अलग ढाॅंचा बनाते हैं। अपना-अपना दृष्टिकोण है, किसको ठीक कहें, किसको गलत ? सबके होते, एक बात सबके लिए मान्य है - है ही परमात्मा।

।। है ही भगवान ।।

20-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अमर बूटी"


अमर बूटी उन्हँन खादी, बी चिंता सब मिट्टाइआ। असाखे चिंता ना काईआ, छो त दादी भगवन वेठोआ। अमर बूटी आत्मा की है, आतम-निश्चय की है। आतम-निश्चय जब तू करता है, आतम-निश्चय जब तू किसीको करवाता भी है, तू महसूस करेगा कि तेरी शक्ति अपरम्पार है। शक्ति का तू धणी बन जाएगा। शक्ति का महासागर बन जाएगा। दु:ख तेरे नेरे ना आए, सुखों की लालच ना सताए। ऐसी तेरी स्थिति होगी, जो अपनी ही स्थिति में तू मगन रहके सारे संसार को भी मुग्ध कर देगा। ख़ुद पीएगा, औरों को पिलाएगा, और नशे में रहेगा। सभी को नशे में रखने की, दूसरों को करने की उम्मीद जगाएगा। नशा परमात्मा का है जो कभी उतरता नहीं। बाकी तो नशे अनेक हैं, पर ये नशा कुछ और है। साकी जो पिलाए एक बार जिसे, रहता है ख़ुमार सदा उसे। सदाई खुमार रहता, सदाई तू खुश रहता। सदाई ख़ुश रहो और आत्मा का निश्चय करो। हमेशा पक्का करो कि तू देह नहीं, तू तो ब्रह्मस्वरुप है।


।। है ही भगवान ।।

21-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

क्यों न जो सर्व मान्य सिध्द होता है, उस बात को पकड़े! बाकी द्वन्दों से, झगड़ों से, अपने को जूदा कर दें। 'है ही परमात्मा' में, मैं भी, तू भी, वह भी, एक ही ढाॅंचे में ढल गए। 'अहम् ब्रम्ह असमई तत्वमसी' सिध्द हो गया।बाकी ये शरीर, यह प्रकृती, यह अत:करण अपने गुण में बरतेंगे, जो बदलते रहें, पर मैं नहीं बदलूॅंगा। हाॅं जीवभाव से जो मैं मैं निकलेगी, वह अपने प्रभु के लिए, अपने प्रियतम् के ढांचे में ढलने के लिए, भले ही अपने से लढ़ाई करें, तड़फें, पीडा में पड़े, या खुशी-खुशी समर्पण करें, आप विसर्जन करें, उसे प्रभु से मिलके एक होना ही पड़ेगा। गुरु का साथ, रास्ता सरल बना देता है।

।। है ही भगवान ।।

21-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"कर्ता-अकर्ता"

जिज्ञासु जब कर्ता भाव में है, तो उसे देह का अहंकार होता ही है। कर्ता फिर भरता, फिर तकलीफ उठाता। अकर्ता - अकर्तापणे में जिज्ञासु खुश रह सकता है, पर वहाँ भी वह अहंकार का पड़ोसी बन जाता है। अकर्तापणे का भी अहंकार जिज्ञासु को आता है। कर्तापणे में तेरे देह का अंहकार, अकर्तापणे में शुद्ध अहंकार।

तू अपने ज्ञान का,अपने गुणों का, अपने आदर्शों का, अपनी आत्मा का अहंकार करता रहता है। ध्यान से विचार करें तो अकर्ता - वहाँ करता है, यहाँ अकर्ता।

तू कुछ नहीं करता। पर तू कुछ ना कुछ करता ही है कि यह मैंने किया, ज्ञान भी मैंने लिया, अज्ञान भी मैंने छोड़ा ,आदर्श मेरा है। बीज खत्म नहीं हुआ तो रस कहांँ से आए। रस छलक पड़ा है गगन से। ऐसी स्थिति बन जाए जो अहंकार तेरे में रहे ही ना। अहंकार को छोड़ो और फिर आतम-रस के भंडारे भरपूर हैं तेरे लिए। तुझे आतम-रस मिल सकता है, उसके बाद किसी चीज़ की कामना नहीं रहती। मिलता तो सब कुछ हैं फिर भी, पर तू भीतर से कितना तृप्त रहता है ये कर्ता-अकर्ता से free होके, बाद में विचार करो।

।। है ही भगवान ।।

22-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

आश्चर्यवत आत्मा न जानी, तेरे लिए जगत आश्चर्यवत रहेगा। अनेक विचारधाराऍं, अनेक परिस्थितियाँ, अनेक रिश्ते-नाते, अनेक सृष्टियाँ बन जाते हैं। किसका सदस्य बनेगा? जिस पार्टी का सदस्य बनता है, उसके आदर्श, उसूल, उसके राज़-रहस्य समझना चाहता है। कहीं शंका आती है तो बेचैन हो जाता है! वैसे सृष्टी का सदस्य तो बना, उसकी अनेकता को जान सका? उसकी परिवर्तनशीलता तेरे लिए आश्चर्यवत रहती है, यह सृष्टी का आश्चर्य तेरे को आश्चर्यवत बना देता है।

।। है ही भगवान ।।

22-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"साक्षी -भाव"

साक्षी-भाव में तू सुखी हो जाता है, साक्षी-भाव के सिवा तू सुखी हो ही नहीं सकता| चाहे कितने भी तेरे पास पदार्थ हैं, धन-दौलत रिश्ते याँ फिर कितना भी तू ज्ञानी है, ज्ञान इकट्ठा कियाहै। कितना भी तू अपने को महान आदर्शी समझ, तो भी साक्षी-भाव के सिवा, तू सुखी नहीं हो सकता। क्योंकि साक्षी-भाव में जब तक आया नहीं तब तक कोई ना कोई धुव्धं, कोई न कोई भ्रम, हल्की सी कोई गिला या शिकायत, अच्छा लगता है, यह अच्छा नहीं लगता। मामूली विख्खेप भीतर से अहंकार जो प्यार करने देता नहीं। Counting जाता नहीं, साक्षी-भाव के सिवाय, comparison जाती नहीं। सब थोड़े थोड़े थोड़े थोड़े अटके हुए। तेरी सब बातें वहीं की वहीं पड़ी हैं| कुछ कम हुई हैं, लेकिन बीज अभी तक खत्म नहीं हुआ है।

जब तक तू सब कुछ होते हुए भी तू साक्षी भाव में देखने का काम नहीं करता, तब तक विख्खेप की खिड़कियाँ बंद नहीं हो सकती। करता बनता है तो भी विख्खेप कहीं ना कहीं से आ ही जाएगा। अकर्ता भी बनता है तो भी कहीं ना कहीं से सतोगुणी माया विख्खेप दे ही देगी|

इसीलिए, शांति-स्वरुप बनो, धीर-गंभीर बनो, परमात्मा के प्यारे बनो ,भगवान जहाँ-तहांँ देखो, दूजा-भाव ना रखो। हस्ती-शक्ति हरि की सिद्ध करो। जब तक हरि की शक्ति को सिद्ध ना किया, तब तक तू अपनी देह की हस्ती से मुक्त नहीं हो सकता। इसीलिए हस्ती-शक्ति, हरि की है ये सिद्ध करके खुद साक्षी-भाव में आकर, निष्काम जीवन जियो, सबकी भलाई करो, सर्व में पेखे भगवान।

॥ है ही भगवान ॥

23-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

गुरु के मुख से नया जन्म मिलता है। जन्म तो संसार के माता पिता देते हैं, पर गुरु के मुख से, 'तू आत्मा है, तू ब्रह्म है', इस भाव को जो जन्म मिलता है, वह तृप्ति की ओर लेके जाता है। गुरु के ज्ञान से, निरइच्छापणे से, छानी के सुराख बंद हो जाते हैं, निश्चय से पूरी तृप्ति मिल जाती है, full sponge, ज़्यादा पानी नहीं ले सकता है। अपने निश्चय में पूर्ण तृप्त होकर जीव प्रकृती से प्राप्त हुआ जो भी सुख है, प्रकृती की अमानत समझकर उसमें बाॅंटता है। माँ-बाप ने शरीर को जन्म दिया, जीवन गुरु देता है। Past, present, future का खाता खत्म हो जाता है। चैन की, आनंद की सेजा प्राप्त होती है, तभी बोल सकते हैं - गुरु मात-पिता, गुरु बंधू-सखा, तेरे चरणों में स्वामी कोटी-कोटी प्रणाम।

।। है ही भगवान ।।

23-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"त्यौहार"

त्यौहारों में उमंग, उतसाह होना चाहिए। लेकिन अगर उमंग और उतसाह के बदले आपने emotions उमंगों में plus कर दिए, तो उमंगों का आनंद किरकिरा हो सकता है। खुशियाँ गमों में बदल सकती हैं। अगर तू emotion में आकर, कोई कर्म करता है, तो उसमें ना आप खुद ख़ुश रह सकते हैं, ना तू किसी और को खुश रख सकता है।

बस छोटा सा emotion आया क्या, तकलीफें शुरु हो जाती हैं। पर जे तू emotion के बदले धीरज रखता है, शांत स्वभाव अपना तू करता है, २ foot torch सामने देखकर तू कर्म करता है, deeply नहीं सोचता, तो शायद आपके त्यौहार बहुत अच्छे गुज़रते हैं। सभी ख़ुश हो सकते हैं। इच्छा छोड़कर, emotion छोड़कर, हर त्यौहार मनाओ। सतगुरु की आशीष तेरे साथ रहेगी।

।। है ही भगवान ।।

24-Oct-2015

।। परम पूजय सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सतसंग के नेम-टेम में कमी ज़िंदगी की कमी बन जाती है। Be careful ! मन की एकाग्रता को प्राप्त करने के लिए सतसंग, मन की शांती को पाने के लिए रोज़ का सतसंग, राग-द्वेष को मिटाने के लिए नेम-टेम से सतसंग, सर्व को प्रेम करने के लिए सतसंग की भूख, गुरु के आज्ञाचक्र में रहने के लिए सतसंग का प्यास। प्यासी बनो, अभिलाषी बनो! सतसंग के सहारे ही तुझे ये सब सारी चीज़ें मिल सकती है। बिना सतसंग कुछ नहीं हो सकता, इसीलिए तेरा पहला पुरषार्थ है सतसंग का नेम-टेम ! 'एक घड़ी,आधी घड़ी,आधीयते पुण आद, संतन से की गोष्टी, सतसंग से की दोस्ती, तो बाकी सब दिन आबाद!' तेरा सारा दिन आबाद हो जाएगा जे एक आधी घड़ी तू सतसंग से दोस्ती करेगा, गुरु वचनों से प्रेम करेगा और नेम-टेम निभाने का प्यासी बनेगा।

।। है ही भगवान ।।

25-Oct-2015

।। परम पूजय सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

अभूल आत्मा बनने के लिए परमात्मा की हस्ती शक्ती को सिद्ध करना पड़ता है। अभूल आत्मा बनने के लिए सतगुरु के आज्ञा चक्र में चलना पड़ता है। अभूल आत्मा बनने के लिए अपने मुख को संयम में रखना पड़ता है, दिमाग को ठंडा रखना पड़ता है, बुध्दी को राम रंग से भर देना पड़ता है। आत्मा का इतना ही शौंक है, अद्वैत का इतना ही शौंक है, भक्ती की चाह है तो आ जाओ मैदान में और अभूल बनके दिखाओ, धीरजवान बनके दिखाओ। हर वक्त खुश रहके दीखाओ। हर वक्त खुश रखके भी दिखाओ।

।। है ही भगवान ।।

26-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"धीरज और आदर्श”

धीरज और आदर्श के सिवाय मनुष्य आधा अधूरा रहता है। अधूरा सा अधूरा ही रहता है। कभी complete नहीं होता | धीरज है तो बातों को समझने की शक्ति है। जब शक्ति बातों को समझने की आती है तो आदर्श मज़बूत होता है। वरना सारी की सारी बातें टिरकाऊ| मनुष्य कहता है धीरज है, पर आता नहीं| मनुष्य कहता है, मैं आदर्श बना रहा हूँ, पर बनता नहीं। इसीलिए अपने आदर्श और धीरज को अपनी ज़िंदगी में जगह दो और सुखी हो जाओ। उसके सिवाय सुख मिलनेवाला नहीं है।

॥ है ही भगवान ॥

27-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

तू अपने अनुमानों पर चलता है, सफलता और असफलता से विचलित होता है, न प्रकृती को जान पाता है और न अपने को। पर जैसे ही प्रभु को खोजने में लगता है तो जगत आश्चर्यवत नहीं रहता। अपने पर ही आश्चर्य लगता है कि जिसे मैं खोज रहा था वह सुख स्वरुप, आनंद स्वरुप, शांत स्वरुप मैं ही तो हूँ। 'प्रभु को खोजन मैं चली, मैं आपा भूल गई'। जो रास्ता प्रभु पाने को कठिन लगता था, गुरु के मिलने से, सही मार्गदर्शन से, वो सरल हो जाता है। संसार जिसको सत् मानके बैठे थे वह एक नाटक सा लगेगा। अभी कोई डर नहीं, दूसरा कोई है ही नहीं, तो डर किसका ? गुरु ने अभी अजर अमर बना दिया। मैं न मरबो, मरता है संसार, मुझे मिला प्रभु जीयावण हार।

।। है ही भगवान ।।

27-Oct-2016

। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"आतम ज्ञान"

आतम ज्ञान के सिवाय मनुष्य प्रेम में निभा नहीं सकता, प्रेम कर नहीं सकता, तृप्त रह नहीं सकता। आत्मा का ज्ञान जो ज़रुरी है, वो जिज्ञासु नहीं समझता है। टिरकाऊ बातों में मन रखता है। टिरकाऊ बातें सुनकर, कहकर time waste भी करता है और प्रेम में निभा भी नहीं सकता। फिर-फिर तकलीफ़ देता भी है, लेता भी है।

।। है ही भगवान ।।

28-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जो कल हुआ वो कल का था। आज शुभ दिन, शुभ भावनाएँ, शुभ विचार, शुभ कामनाएँ खुद के लिए भी रखो और पूरे विश्व के लिए भी रखो। अपनी शक्ती को पहचानो। Positive इतनी शक्ती तेरी बढ़ती जाए जो negative को जगह ही न रहे। आज नहीं हुआ तो कल ज़रुर रहेगा, इसी भावना के सहारे ज़िंदा रहना है, खुश रहना है, प्रेम करना है, सतसंग सुनना है।

।। है ही भगवान ।।

29-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“सत्संग की महिमा”

सत्संग की महिमा है जहाँ जन्म जन्म के फेरे कट सकते हैं! कईं अधूरी जिंदगी कंप्लीट होने लगती हैं| सत्संग सतगुरू की देन हैं|अब तेरी लगन हैं तेरा शौंक हैं| तेरा मन जब बदलाव में नहीं आता चेंज़ नहीं होता|सब जगह टकराता रहता है| तो एक सत्संग ही उसे ठीक कर सकता है| जब कोई बात बिगड़ जाए जब कोई हालत अा पढ़े तो तुम देते साथ सधा हे कृपा निदान क्योंकि तूँ हीं है भगवान| भगवान भगवान कहते भगवान हीं रह जाएगा बाकी कुछ बचेगा नहीं| कर्मों की कई फाँसीयाँ कई कर्म सत्संग में तेरे आने से तेरे कट हों जाते हैं |बशर्तेक्क श्रद्धावान् लभते् ज्ञानम्| शारदा की देवी कों तूँ मनाके चल तेरा बेड़ा पार हों जाएगा तूँ निहाल हों जाएगा और तूँ खुशहाल हों जाएगा|

॥ है ही भगवान ॥

30-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'है खुदा का करम, आज इन्सान हम। हरकतें हम अगर जानवर सी करें, तो हरी क्या करे ? गुरु भी क्या करे ?' खुदको देखना है, खुदको बचाना है। खुदको खुद ही बचा सकते हैं, खुदा नहीं बचा सकता। खुदा अगर बचा पाता, तो सारी दुनिया को ही बचा देता।खुदा अगर तार सकता था, तो सारी दुनिया को तार सकता था।पर तरने के लिए अपना शौंक, अपनी उम्मीद, अपनी लगन, अपनी सच्चाई, अपनी तपस्या ज़रुरी है। वरना 'ड्॒यणे औलाद, खाई भोजन, पशु भी खूब ड्॒यारण था। बाकी पशुअ में, जानवर में ऐ पाण में फरक कैरो भायीं थो!' 'मिठा मूँह निधणखे, तू चरणन समाईं !' सुबह होवे इस भजन के साथ, रात होवे इस भजन के साथ। तो ही एक मनुष्य का उध्दार हो सकता है।

।। है ही भगवान ।।

31-Oct-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

अज्ञान एक नशा है! उस नशे में, उस बेखबरी में, जीव दल-दल में फॅंसता जाता है। अपने बनाए हुए चक्रव्यूह में फॅंसता जाता है। समझता है मैं भलाई कर रहा हूॅं, प्यार कर रहा हूॅं, दुसरों के लिए जी रहा हूॅं। उसका base है काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। ज्ञान के सिवाय उसे समझ में नहीं आता है कि यह मेरा हद्द वाला प्यार है, जो अपने तक सीमित है। या कभी कीर्ति, कामिनी, कंचन में आकर हो जाता है। वो रुके हुए पानी की तरह तालाब बन जाता है, नदी नहीं बन सकता है। पानी तो बहता भला। तेरे पास प्यार का सागर है, उसके लिए हद्द न बनाओ, मोह को, कर्तापने को, प्रेम न समझो। हद्द में विखेप है, बेहद्द में विखेप का नाम नहीं।

।। है ही भगवान ।।

31-Oct-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"खुश रहो"


खुश आयो लाल! खुश रखना तेरे अपने हाथ में है। ख्याल तेरा तेरे को तकलीफ ना दे तो फिर खुशी ही खुशी है। खुशी को प्राप्त करने के लिए ख्यालों को ठीक करना बहुत ज़रुरी है। ख्याल ठीक हो सकते हैं। लेकिन तू इतना busy है जो तुझे पता ही नहीं पड़ता कि कौनसा ख्याल कब तुझे तकलीफ दे रहा है। यह तू विचार कर तो सकता है लेकिन तेरी दृष्टि सामने वाले के ऊपर से उठती ही नहीं। मन कहता है इसी ने ही तो मुझे दुख दिया है। इसी के कारण मैं तकलीफ में हूँ| ज़रा अपनी दृष्टि को उठाके तो देखो। प्रेम की दृष्टि डालके तो देखो। तेरे भीतर से ही तेरे कुछ ख्याल ऐसे मिलेंगे जो तुझे तकलीफ दे रहे हैं|

अंतरमुखी होगा तो ही मालुम पड़ेगा ना। बाहरमुख्ता में तू दुख और सुख, मान और अपमान, खुशी और रंँज्ज। सब तू बाहर से ही ढूंँढ रहा है। भीतर जा। भीतर है सख्खा, तेरा सख्खा, मन तो लगाके देख। भीतर जाएगा, अपने ही ख्यालों की थोड़ी बहुत changes होंगी, और तू सुखी होके सारे संसार को सुखी करेगा| यही प्रीत की रीत है। यही सत्य का मार्ग है।

।। है ही भगवान ।।

November
01-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

जब शरीर पर कोई बीमारी की हालत attack करती है, तो मनुष्य doctor की गोली, hospital, ICU room, सगे-संबंधी, injections, सभी पर भरोसा करता है और खुद को surrender कर देता है। जानता नहीं है क्या हो रहा है, पर खुद को surrender करता है। हम पूछते हैं जब मन की कोई स्थिति बिगड़ती है, मन पर कोई बीमारी छा जाती है, मन तंदुरुस्त नहीं है, तब गुरु की गोली, गुरु की hospital, हर चीज़ गुरु की ठीक कर सकती है। जब हर चीज़ सतगुरु की ठीक कर सकती है, तो मन पर attack होते ही मनुष्य surrender क्यों नहीं करता ? भरोसा क्यों नहीं करता ? क्या भरोसे के काबिल गुरु नहीं है यां भरोसा करनेवाला  दिमाग, हृदय, स्वभाव, संस्कार वो सब तेरे पास नहीं है ? विचार करो! क्योंकि विचार में सुख है।

।। है ही भगवान ।।

02-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

"Love is God, God is Love" परमात्मा प्रेम है, प्रेम परमात्मा है। प्रेम में law नहीं है, ऐसे ही परमात्मा में भी कोई law नहीं है। पर मन जब परमात्मा से दूर हो जाता है, तो सारे कायदे-कानून, सारी मर्यादाएं, सारी तकलीफें,‌ जिज्ञासु के भीतर entry हो जाती हैं। अपनी हस्ती-शक्ति को पहचानकर भगवान को सिद्ध करो और प्रेम को पूर्णता में लाने की कोशिश करो। जहाॅं विखेप नहीं, वहाॅं प्रेम पूर्ण है। जहाॅं विखेप है, वहाॅं प्रेम अधूरा है। अधूरेपन को छोड़कर पूर्णता की तरफ बढ़ना ही हमारा लक्ष्य है।

।। है ही भगवान ।।

03-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

'पाण सुडा॒रण आयो भली करे आयो।' जो अपने आप को पहचानने के लिए संसार में आया है, उसका आना सफल है। उसका संसार में जीना भी सफल है, उसका मरना भी सफल है, मिटना भी सफल है।  उसी का जीवन सफल हुआ है, जो सतगुरु की आज्ञा चक्र में चलते रहते हैं। वैराग वृत्ती तेरे को मज़बूत करती है और चंचल वृत्ती तेरे को ढीला कर देती है।

।। है ही भगवान ।।

04-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

तीन गुण का खेल है सारा। तीन गुण हैं, तीन गुण से चलते ही रहेंगे। अगर मनुष्य इसपर पकता करे, तो किसी भी चीज़ में कभी विखेप न आएगा। हर वक्त यही जानेगा कि गुण-गुण से चल रहे हैं। मैं तो ब्रह्म स्वरुप हूॅं, मैं तो आत्म स्वरुप हूॅं। पक्का करो गुणों का चक्कर, तो तू सब चकरों से निकल जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

05-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

अपने मन की तृप्ति भी एक देवी है। उस देवी की पूजा करो कि 'हे माॅं देवी, हे माॅं तृप्ति, तू मेरे मन में आई, तू मेरे घर में आई, अब मुझे इतनी बुद्धि और शक्ति भी दो जो मैं इसको संभालके रखूॅं। 'हम लाए हैं ब्रह्मकार वृत्ति गुरुद्वार से, इस वृत्ति को रखना मेरे मनवा संभालके'। तृप्ति है तो सब कुछ है, बस 'है ही भगवान' करके आपनी तृप्ति मैया को संभालके रखो।

।। है ही भगवान ।।

06-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

भगवान का बनके, गुरु का बनके, उचित-अनुचित, निषेध कर्मों में अपनी कर्म-पत्रिका बनाता है, निराकार से सहन नहीं होगा। साधारण ग्रामिण मनुष्य दोष करता है, दूसरी ओर पढ़ा-लिखा वकील दोष करता है। वकील को माफी नहीं मिलती। वह नहीं कह सकता गलती हो गई, कायदे-कानून की पहचान नहीं। उसी तरह सत्संग में निष्ठा के लिए आते हैं, सत्संग में तू शांत करके बैठे और उठते ही मन बंदर की तरह उछले, ना कोई नियम, न कोई संयम। सत्संग में तू मनुष्य बनने के लिए आता है। अगर नियम, गुरु की मर्यादा, सत्संग की मर्यादा, संयम, ऑंख ने दूसरा क्यों देखा? पर-स्त्री, पर-पुरुष को क्यों देखा? भगवान क्यों न देखा? अपने लिए इसको but natural ना समझ। अगर गलत विचार आते हैं तो पश्चाताप कर, खून के ऑंसू बहा।

।। है ही भगवान ।।

06-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"वचन"

वचन गर्भ अंदर जो तू करके आया, कि नाम जपूंगा मैं तेरा, तो नाम जप जपना नहीं है, जटना है। गुरुमुख नाम जट्टए इक वार। एक वारी परमात्मा का नाम मज़बूती से catch करो। सतगुरु ने कहा catch me. मुझे सुनो नहीं, पर मुझे catch करो, पकड़ो। खुद पकड़ो, औरोंको पकढ़ाओ। तो ही तेरा निश्चय मज़बूत होगा और तू निश्चय के आधार पर सर्व को प्रेम करेगा, सबमें भगवान देखेगा, त्याग वैराग में मज़बूत रहेगा।

आज्ञा चक्कर में चलते-चलते, तेरा सफर बहुत अच्छा कट जाएगा। आज्ञा चक्कर है तो तेरे कईं फेरे कट जाते हैं। आज्ञा चक्र नहीं है तो कईं फेरे भी तुझे फेर लेते है, गुमा लेते हैं। इसीलिए मज़बूती से आज्ञा करो और आज्ञा मानो। ऐसी कोई बात ना करो जो किसीको अच्छी ना लगे। हर वक्त, सबमें परमात्मा देखकर, सबमें गुरु देखकर प्रभु की आज्ञा माथे मानी।

।। है ही भगवान ।।

07-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

ड॒यारी(दिवाली) पर हमने छोटी-सी दुकान खोली है - सत्य की। 'असाॅं हटरो कडयो आहे हक्क जो, जिते सौदो थिये तो सच्च जो'। सत्य का सौदा एक मनुष्य, एक जिज्ञासु ही कर सकता है। बशर्ति वह सत्य को जाने, सत्य को पहचाने और सत्य की ज़रुरत को समझे। आज हम पहले खुद को change करते हैं, फिर संसार को भी तू तुर-तुर-तुर-तुर करके change कर सकता है। लेकिन उसके लिए अस्त्र-शस्त्र-वस्त्र सत्संग के चाहिए। वह ज़रुरी है। सत्संग ऐसी सौगात है जो तू जान सके तो जान।

।। है ही भगवान ।।

08-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पुरुषार्थ"

तेरा देव है पुरुषार्थ। पुरुषार्थ तेरा अपना है, पुरुषार्थ तेरे अपने हाथ में है। पुरुषार्थ तेरा तेरे नसीब में है। पुरुषार्थ से तू प्रभु को प्राप्त कर सकता है। पुरुषार्थ से बिगड़ी बात बना सकता है। पुरुषार्थ से तू कई कर्म जो उल्टे चल रहे हैं, सीधे कर सकता है। पुरुषार्थ से शत्रु को मित्र बना सकता है। बस खाली पुरुषार्थ - पुरुष के अर्थ होना चाहिए। खाली meaning नहीं है पुरुषार्थ की मेहनत, लेकिन मेहनत वो जो करे तो परमात्मा के अर्थ में होनी चाहिए। अपने पुरुषार्थ में भरोसा रखो, कुदरत पर विश्वास रखो और चलो इस नेक राह में।

।। है ही भगवान ।।

09-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सुख सागर"

सुख सागर में आईके, मत जाना तू प्यासा प्यारे। परमात्मा जैसे चलाए, वाह-वाह। हलाँई त्त हल्ला, भिहारी त्त बस, वाघ संजण तुहिंझे वस। जो चलाए, जैसे चलाए परमात्मा, बस वो ही चला रहे हैं, वो ही उठा रहे हैं, वो ही भुला रहे हैं, वो ही खिला रहे हैं। वचन भी वो ही दे रहे हैं। उसकी मर्ज़ी के सिवाय कुछ भी-पत्ता नहीं हिलता। हुकुम्में अंदर हरको, बाहर हुकुम ना को। नानक में जो भीगे तो वो ही मूर्त भगवान कहिए। जो भगवान के हुक्म में चलता है वो भगवान की मूरत ही बन जाता है। जियरा हरि नू दीयाएं, हरि रुप बनता जाए। बहुत अच्छा लगेगा, जब तुम रज़ा में राज़ी रहोगे और शुक्राने मानके इस जीवन यात्रा को आगे बड़ाओगे।

।। है ही भगवान ।।

10-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आज्ञा चक्र"

आज्ञा चक्र में रहने से, मन को शक्ति मिलती है, और भक्ति बढ़ती है। मन शक्तिशाली बनता है, और भक्ति करता है, तो मन का power बढ़ जाता है। मन की शक्ति बढ़ जाती है। ऐसा आदर्श बनाओ, जो मन की शक्ति बढ़ती ही जाए। गुरु झिंढके तो मीठा लागे़। गुरु भक्शै तो गुरु वडि्याई। गुरु के झिंढकने से भी, गुरु के डाँट से भी power मिलता है, शक्ति मिलती है, और भक्ति बढ़ती है, उमंग बढ़ते हैं, प्रेम भावना बढ़ती है, भाईचारा भी बढ़ता है। इसीलिए हर हाल में दाता का, जो शुक्र मनाते हैं, उनके घर होती खुशियों की बरसातें हैं।

।। है ही भगवान ।।

11-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जब तू खुद देह में है, खुद को देह मानता है, तो तू सामने भी देह देख रहा है। सामने वाले को देह देखने के कारण से तेरे में वह सब विकार आ रहे हैं। जिस-जिस को देह देखेगा, उस-उस के विकार तेरे भीतर जाते रहेंगे। यह तो घाटे का सौदा हुआ ना ! तुम घाटे का सौदा क्यों करते हो? पहले तुम खुद को बोलो "मैं देह नहीं हूॅं, मैं ब्रह्म स्वरुप हूॅं", फिर सामने भी सारे देह disappear हैं।

ऐसा मान कर चलो कि 'भगवान जी लीला पेई सब हले'। सारा जगत उसकी ही लीला है, उसका ही किया गया सब करम है, वही सब कर रहा है, वही खेल रहा है, वही खेलणहार है, वही उपायनहार, वही सब है। तू क्यों मगज़मारी करता है? तू अपनी मगज़मारी करके खुद को भी तकलीफ और दूसरों को भी तकलीफ देता है। और खुद को तू कितनी तकलीफ दे रहा है, उसका तुझे अंदाज़ा नहीं है। तू अपने को अपनी तकलीफ दे रहा है। तू समझता है इसने-इसने- इसने तकलीफ दिया। अनगिनत नामों की list तू बनाता है, जिससे तेरे को तकलीफ मिल रही है। असलियत में कोई भी list नहीं है, तकलीफ का कारण तू खुद है। जहाॅं तू तकलीफ का कारण खुद को मानेगा, तो ही तेरी तकलीफ मिटती जाएगी। इतना आत्मा का निश्चय अंदर में मज़बूती से करो कि सब में भगवान की शक्ति ही है, सब वही है, तो तू स्थिरता को प्राप्त करेगा ।

।। है ही भगवान ।।

11-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"नेम-टेम"

नेम-टेम से कोई बात जब हम करते हैं, निभाते हैं, तो नेम-टेम के कारण, success मिलती है। तू कामयाब हो जाता है। तू हर कर्म में pass हो जाता है। फिर चाहे पढ़ाई करो, चाहे सत्संग का कोई कर्म करो, या कुछ और करो। लेकिन तू हर कर्म में pass होता है, success होता है। ऐसे ही जब तू आतम-निश्चय में आता है, तो आतम-निष्ठी भी success ही रहता है। आतम-निश्चय करो, आत्मा की कुर्बानी करो। आत्मा की कुर्बानी क्या होती है-देह अध्यास को मिटाओ तो तू कुर्बानी की कतार में आजाएगा।

सच्ची कुर्बानी सतगुरु ने सिखाई। अब तू भी सच्ची कुर्बानी करके, अपनी आत्मा को ऊपर उठाओ और देह को पीछे छोड़ो। यह सच्ची कुर्बानी है। औरोंको भी तेरी कुर्बानी काम में आएगी और तुझे भी वो सुख देगी, success देगी, relax देगी, प्रेम देगी, नेम-टेम से सत्संग भी मिलेगा। हर चीज़ तेरी अच्छी, अच्छी, अच्छी होती चली जाएगी। अपनी चिंताओं को दूर करो। मुखे चिंता ना काईआ, दादी भगवन वेठो आ। No tension but attention. Attention होके रहो तो संसार में कोई दुख तेरे नेरे ना आएगा।

।। है ही भगवान ।।

12-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लग्न"

सतगुरु तुझसे लग्न मेरी लागी रहे। ब्रह्मकार दृष्टि, ब्रह्मकार वृत्ति मेरी जागती रहे। लग्न में जब अग्न आती है तो ही सब तेरे काम पूरे होते हैं। Spirituality की राहों पर तू चल सकता है जब लग्न में अग्न है। ये तन मन जीवन सुलग उठे, कोई ऐसी आग लगा दे। हरि का हो सो सब रह जाए, मेरा बस सब जल जाए। देह-देह ना रहे, देहध्यास ना रहे, मन, बुद्धि, चित्त से मैं ऊपर उठ जाऊँ, अहंकार मेरे पल्ले ना पड़े, नम्रता आज का मैं fashion करुँ, कल का fashion पुराना अहंकार का छोड़ दूंँ और अपने आप में रहना सीखूँ। अंतर-मुखी सधाई सुखी। अंतर-मुखता में आओ और सुखी हो जाओ।

।। है ही भगवान ।।

13-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पहरे पर पहलवान"

संग निमारन माण आ, मुहिंजो सतगुरु सदाई साण आ, पहरे ते पहलवान आ। यहाँं-वहांँ, दाएंँ-बाएंँ, ऊपर-नीचे, अंदर-बाहर जहाँ भी मैं देखूँ तो प्रभु तू ही तू, तू ही तू वर्त्नता, तू ही है। हर वक्त एहसास होता है कि मेरा सतगुरु पहरे पर, मेरे पहरे पर पहलवानी कर रहा है। वो हर वक्त मुझे संभाल रहा है। उसकी मेहर से ही मैं पल रहा हूँ। उसके कवच के आगे मैंने अपनी safety पाई है। जो भी है, वो कुदरत का धणी है, और मैं भी कुदरत का ही एक हिस्सा हूँ। प्रभु प्यारे से संबंध बढ़ता जाता है मेरा भी, क्योंकि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से मैं ऊपर उठता जा रहा हूँ, तो जो भी है, बाकी सब भगवान का ही है। है ही भगवान करके हम चलते हैं, तो साथ जिसके सतगुरु हैं, वो कभी नहीं गिरते हैं। वो हमेशा आगे बढ़ते हैं और अपने ही प्रभु की बातों में रहते हैं। उनकी छाया में पलते हैं।

।। है ही भगवान ।।

14-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सच्ची खुशी"

सच्ची खुशी गुरु वचनों में रहती है, गुरु प्रेम में रहती है। जो खुशी आए, फिर न जाए, उसका विचार करते हैं, तो खुश रहते हैं। जब खुश रहते हैं, तो ज़मीन से दो foot ऊंचा उड़ते हैं। खुश रहते हैं, तब तृप्त रहते हैं और सभी को तृप्त करते भी हैं। इसीलिए खुश रहो, शाद रहो, आबाद रहो। अपने आप में रहो, हर वक्त अपने कार्य में एकाग्र रहो, हर वक्त कर्म और क्रिया में ध्यान दो। तूँ क्रिया भी ऐसे करता है, जैसे कि कर्म करता है। इतने आलस में तू कर्म करता है जो क्रिया तेरी कर्म बन जाती है। और कर्म भी तेरा क्रिया बन जाए ऐसी तेज़ी से कर्म करो जो तुझे बासे ही न कि तूने किया है। हर वक्त खुश रहो, शाद रहो, आबाद रहो।

।। है ही भगवान ।।

15-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शरण"

तेरी शरण में जो आ गया, तो भव से उसे छुड़ा दिया। मनुष्य कितना भी पात्तकी हो, पर सतगुरु उसे पावन बना ही देता है, क्योंकि गुरु खुद पाक, पवित्र, पावन है। तेरी ब्याई-दुआई, तेरी हरकतें गुरु को पसंद नहीं आती। इसीलिए सतगुरु अपनी दृष्टि से, तुझे उन बातों से छुड़ा देते हैं। ताकि मेरा बच्चा बराबर रहे, पाक-पवित्र रहे, शुद्ध भावना में रहे, शुद्ध कर्म में रहे, शुभ क्रिया में रहे। इसके आगे मैं क्या कहूंँ। तू ही समझ तू किसमें रहना चाहता है।

।। है ही भगवान ।।

16-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

बिना आत्म-निश्चय के जीवन बन नहीं सकता, जीवन का बोझ कोई उठा नहीं सकता। अनेक प्रकार के दुख पेड़-पौधों से, रोड़-रास्तों से, व्यक्तीयों से, past-future से। अपने मन के रोग count करो, कितने सारे रोग हैं, जिससे तू किसीके आशिर्वाद से निपट सकता है ? एक अपने निश्चय से निपट सकता है। गुरु भी क्या कर सकता है ? एक दुख आये, एक दुख जाये, पर तू जो शेर-शिवोहम की गर्जना करे, फिर मैं ब्रम्हस्वरुप हूँ, मैं आत्मस्वरुप हूँ। मुझमें अंधेरा बना नहीं, मुझमें द्वैत बना नहीं। आत्मस्वरुप हूँ मैं, ऐसी तू शेर जैसी गर्जना करे तो हर दुख बाहर, हर तेरा विकार बाहर, हर सुख तेरे भीतर आ ही जाएगा। आत्मरस का सुख जो गुरु ला सकता है, पर जब तक तू निश्चय ना करे तो गुरु भी क्या करे ?

।। है ही भगवान ।।

17-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

साक्षी भाव तेरी उन्नती में सीढ़ी का काम करता है। सफलता मिलती है तो साक्षी भाव में आने से। जो होता है उसके साखी बनो। जो हो रहा है, जो हो गया है, जो हो सकता है, हर चीज़ के साखी भाव में आनंद ले लो और साखी भाव में आने से तेरे प्रेम में मजबूती आएगी और यही पकता तेरे को अपने सतगुरु से मिलाके एक कर देगी, आप-विसर्जन हो जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

18-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

अपने लक्ष में, आतम निश्चय में कितनी सारी ममता है तेरी। फिर भी उस ममता को तू क्यों कुचल देता है ? फकत जलकर, द्वेत करके, द्वेष करके, मेरी मर्ज़ी सोचके, first मैं सोचके, मेरे से कोई बात नहीं करता मैं क्यों करुॅं, ऐसे छोटे-छोटे विकारों में।अपनी energy गॅंवा-गॅंवाके, किट-किट कर करके, अपने लक्ष्य को प्राप्त तो नहीं कर सकता, पर जो लक्ष्य में तूने ममता रखी है, उसको काट रहे हो, कुचल रहे हो। इसीलिए अच्छे बच्चे की तरह, किट-किट छोड़ो, समता भाव रखो, अपनी ममता की इज़्ज़त रखो, मर्यादा रखो अपनी ममता की, गुरु वचनों की मर्यादा रखो। जो रास्ता पकड़ा है, उस रास्ते की मर्यादा रखो तो तेरा बेड़ा पार है। वरना तेरा बेड़ा कैसे पार हो सकता है ? यही समझ में आ जाए तो बस निश्चय दूर नहीं है, हाज़रा-हज़ूर भगवान भी दूर नहीं है।

।। है ही भगवान ।।

18-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मोक्ष का आनंद"

मरण खाँ अग़्ग जे मणी, त माणी तू मौज मौलाई। मरने से पहले मरना क्या होता है, वो मन का मरना होता है, तन का नहीं। वो बुद्धि की शांति होती है, बाहर की शांति नहीं। मोक्ष में तू relax हो जाएगा और relax में तू दूसरों को भी relax कर सकता है। परमात्मा प्यारे से संबंध जोड़के रखो। फिर तेरी ज़िंदगी में बाहर ही बाहर आती हुई दिखाई देगी। प्रभु प्यारे से जुड़े रहो तो मोक्ष का आनंद आपको मिलता जाएगा। मोक्ष easy पद में हो जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

19-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

आत्मा का दीदार सुंदर दीदार है। देह अपनी नहीं हो सकती, आत्मा पराई नहीं हो सकती। गुरु का ज्ञान अपने-पराए का भेद मिटाकर, जीव और ब्रह्म को मिलाके एक कर देता है। जीव ईश बना और इश्क लगाया परमात्मा से तो बेड़ा पार हो गया। 'तेरी इको ही झलक, मेरी लखाॅंदी मरज़'। दीदार सतगुरु का मिल गया, बाकी कुछ ना मिला तो सब चलेगा।

।। है ही भगवान ।।

20-Nov-2015

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

वैसे तो धीरज के भंडारे भरपूर हैं, ऐसे तो बहुत सारी change मनुष्य में आ भी जाती है, फिर भी समय पर पता नहीं कुछ घड़ियों के लिए मनुष्य विचलित क्यों होता है ? अगर यह घड़ियाॅं जिज्ञासु के हाथ में आ जाए, तो निश्चय ही नहीं, महा-निश्चिय हो सकता है; धीरज ही नहीं, महा-धीरज हो सकता है; प्रेम ही नहीं, प्रेम में डूब जा सकता है, गुम हो जा सकता है। अपने को भाग्यशाली बनाओ। धीरज के भंडारे के साथ-साथ उस घड़ियों के लिए धीरज की कामना खुद के लिए करो और सुखी जीवन बिताओ। ऐसे सुख की तलाश करो, जो सुख आए फिर ना जाए। ऐसा विचार करते-करते तू आत्मा के विचार में आ जाएगा और एकदम थिर-थिर-थिर होता चला जाएगा। यही आज के लिए आशीष है।

।। है ही भगवान ।।

20-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जहाँ देखूंँ तुझको पाऊँ"

तुमको कैसे पाऊँ रे प्रीयतम, तुमको कैसे पाऊँ? तुमको कैसे रिझाऊँ रे साजन, तुमको कैसे रिझाऊँ? बात जब समझ में गुरु वचनों से आई, तो यह समझा खुदको गंवा के तुझको पाऊँ और अमर मैं हो जाऊँ। आप विसर्जन होए तो सिमरण कहिए सोए। आपको अमर बूटी खानी है, अमृता को प्राप्त करना है, तो उसके लिए खुदको गंवाना पड़ेगा, शर्त एक ही है। आप कहोगे 99 गुरु की चले, 1 तो मेरी चले। लेकिन 1 तेरी चली तो आप विसर्जन हुआ ही नहीं। यहाँ तो सौ की सौ देनी पड़ती है। तब जाके आप विसर्जन होता है और आत्मा प्रगट होती है, और आतम बोध होता है, आप विसर्जन होता है और सब आत्मा का ज्ञान पाकर तू अपनी निष्काम राहों पर चल पड़ता है।

।। है ही भगवान ।।

21-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

हसनियाॅं, खिलनियाॅं, खावनियाॅं, विचों-विच होए मुक्त। जो धीरज के जहाज़ पर बैठता है, वो अवश्य पार होता है। परमात्मा के रास्ते पर चलने के लिए, अपने ही लगन की ज़रुरत है। जिसको अपनी लगन है, उसको अपनी शक्ति मिल जाती है। जो शक्ति का सागर है वह कहीं क्या मांगेगा ? क्या माॅंगू कुछ थिर नहीं। अद्वैत भक्ति में रहो, अनन्य प्रेम करो, अनन्य भक्ति करो, एक-एक में आत्मा देखो, जड़-चेतन में आत्मा देखो। सर को तू पाॅंव बना ले, फिर चल इस नेक राह। हमेशा अपने दिमाग को ठंडा करो, पाॅंव को गरम करो और पेट को नरम रखो - यही तंदुरुस्ती की रीत है। मन को शांत रखो, यह प्रीत की रीत है।

।। है ही भगवान ।।

21-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जब लग देखी, सो सब माया"

जो देखा सो सब माया है। माया किसको कहते हैं ? तू कहेगा माया माना धन, दौलत, पदार्थ, ये माया है। सबसे बड़ी माया तेरे अपने मन की है, देह-अध्यास की है। जब तू चम की आँखों से बाहर की ओर देखता है, तो बाहर की माया collect करके मन के भीतर बेज देता है। और जब तू देह-अध्यास की आँखों को बंद कर दे, तीजा नेत्र खोल दे, तो हर चीज़, जढ़ हो या चेतन, तुझे माया नहीं दिखेगी, प्रभु का प्रेम दिखेगा, भरोसा दिखेगा, विश्वास दिखेगा। इसीलिए अंदर की आँखें खोलो, तीजा नेत्र खोलो और माया से मुक्ति प्राप्त करकर प्रेम को नया जन्म दो।

।। है ही भगवान ।।

22-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मैं ही था, मैं ही हूॅं, मैं ही रहूॅंगा", यही विचार करके मनुष्य को relax होना चाहिए। Past, future, present सबका साक्षी बनो, सब घड़ियों का साक्षी बनो, हर विकार का साक्षी बनो। साखी भाव जब तक नहीं है, तब तक तू मज़बूत नहीं हो सकता, success नहीं हो सकता। तू सैलानी, मैं सैलानी। तू साखी चेतन आए, सबखा न्यारो, तू कैसा शामिल नाहीं (सिंधी)। अंदर ही अंदर मज़बूती से यह पक्का करो कि मैं किसी से शामिल नहीं हूॅं। मैं अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हूॅं। मेरा कभी न नाश होता है, इसीलिए ब्रह्म-पद पर बैठो। मैं सैलानी, तू सैलानी।

।। है ही भगवान ।।

22-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जेड़ाथी नज़र दौहरायाँ, सतगुरु स्वामी तोखे थी मा सदा पायाँ"

मुहिंजी नस-नस में वस्सी रहयो आहीं तू, मुहिंजी ख्यालन में ढेरो ड्यमायो आ तू, मुहिंजे आदर्शन में आसन ठायो आ तू। पाणखे विन्याए तोखे पातो, तोखे पाए पाण सफल कयो। अच्छा लगता है, बहुत प्यारा लगता है ये अहसास कि मेरा सतगुरु मेरे साथ में है। जब मेरे साथ है वो तो हर एक प्राणी में, जीव-जंतू में, मिट्टी-सोने में, जड़-चेतन में, हर एक राही में, बस मुझे तो छवि दिखती है अपने सतगुरु दी। सतगुरु है, सतगुरु ही रहेगा।

।। है ही भगवान ।।

23-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जो बीज डालते हैं, वही फल मिलता है। तेरा शरीर भी एक ऐसा सुंदर gift है तेरे लिए। जो जैसा भाव जगाए, वैसा फल पाएगा। अपने देह के लिए तू कौनसा भाव जगाता है ? अपने देह के लिए भी positive mood रखो कि आज इसने गलती की है, कल ना करेगी। आज द्वेष किया है, कल ना करेगा। ऐसे positive mood अपने देह के लिए भी, अपने मन के लिए भी, अपने बुद्धि के लिए भी रखो। और साक्षी-भाव को पकड़-पकड़कर चलने वाला ऐसे चलता है जैसे अंधा मनुष्य लाठी को पकड़कर चलता है तो safe है। तू भी साक्षी-भाव को पकड़कर चलेगा तो safe है।

।। है ही भगवान ।।

23-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"पुरुषार्थ और थकान, शुक्राने और नीरसता, प्रेम और हदें - ये तो हो नहीं सकता"

शुक्राने हैं तो तू झूमने के सिवाय रह नहीं सकता। प्रेम है तो तू बाँटने के सिवाय रह नहीं सकता। हदों में तू खुदको बांध नहीं सकता। थकावट कहांँ से आएगी। तू रोज़ एक अलौकिक, freshness के यात्रा पर निकलेगा। जब तू देह नहीं, भगवान है, जब सतगुरु का डेरा तेरे मन मंदिर में है, तो तू अपना जीवन सफल बनाते-बनाते अपनी जीवन की यात्रा को सुखमय बनाएगा। हालत कैसी भी आए, दुख हो या सुख हो, तू प्रभु के चरणों में ही अपने को अर्पित करता है। प्रभु तेरा चिंतन करता है, तू प्रभु का चिंतन करता है। जिसके हृदय में हरि चिंतन होगा, उसका ही सफल जीवन होगा। जिस ऊपर तेरा हाथ है स्वामी, वो कैसा दुख पाए, तेरा नाम गुरु जो दिए।

।। है ही भगवान ।।

24-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

गुरु ने किया क्या हसीन करम, जो हम रहे ना हम। कल तक मैं देह था, आज मैं ब्रह्म स्वरुप हूॅं। पक्क करो! पक्क करने से तुझे शांति, संतोष, धीरज, नम्रता, प्रेम मिलेंगे। रज़ा में राज़ी हूॅं। सिंधी दोहा - 'हलाईं त हला, बिहारीं त बस, वाग़ सड्यण तुहिंजे वस'। जो परमात्मा के सहारे चलते हैं, उसको किनारे easy मिल जाते हैं। जिसको किनारा मिल जाता है वो कभी बेसहारा नहीं होता। हमेशा सतगुरु की साया उसके सर पर रहती है। जो भी कर्म है, देह में करने से तुझे विखेप और अंधेरा मिलता है। पर उहे कर्म आत्मभाव से करो तो तुझे रोशनी और संतोष दोनों मिल सकता है। देह में किया गया करम थकान पैदा करता है, पर आत्म-भाव में किया गया कर्म थकान को मिटा देता है।

।। है ही भगवान ।।

24-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ज्ञान मन की हदों को तोड़ता है"

आपको कुछ अच्छा लगता है, कुछ नहीं। किसीसे प्रेम है, तो किसीसे नहीं। किससे क्या नज़दीक होना तू पसंद करता है, किसीको तू दूर रखना चाहता है। कुछ लेने में तेरे को मज़ा आता है, कुछ त्यागने में तू खुश रहता है। मनमानी-यह सब मनमानी है। ज्ञान मन-मत को छुड़ाता है, गुरु-मत पकड़ा देता है। ज्ञान है तो ये मन की हदें तू छोड़ता जाएगा और मन के उस पार तू पहुँच जाएगा। आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ, इक ऐसे गगन के तले, जहाँ कोई गम नहीं, कोई हदें नहीं, बस प्रेम ही प्रेम पले।

।। है ही भगवान ।।

25-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मंथन"

मंथन के सिवाय क्या मिलता है! दही को मंथन किया, तो ही तो मखन निकला। मखन को जब गर्म किया, तो ही तो घी निकला। अपने स्वभाव- संस्कार को मंथन करो। स्वभाव से भगवान निकलेगा। स्वभाव उस भाव में आ जाएगा, कि मैं ब्रह्मस्वरुप हूँ। देह-अध्यास को छोड़कर आतम भाव में स्वभाव आ सकता है, जब तू मंथन अपने स्वभाव का करता है।

मंथन अपनी आदतों का करो। मंथन अपनी हदों का करो। मंथन अपने बुरे विचारों का करो। मंथन अपने उसूल जो तूने बनाके रखे हैं, जो आतम निश्चय में रुकावट डालते हैं, उसका मंथन करो। तो माणिक मोती सब तुझे मिल जाएँगे और तू नए दौड़ पर आ पहुँचेगा। नई ज़िंदगी तू अपना लेगा और खुश रहेगा। खुश रहो, खुश रखो। खुश करो और दूसरों की खुशी को accept करो। ये भी एक खुशी है। तू कहता है मैं प्रेम करुँ, दूसरा accept करे। पर तू करे और दूसरा accept ना करे तो कोई परवाह नहीं। लेकिन दूसरा प्रेम करे, तेरे को accept करना ही है। ये कठिन व्रत लीजिए, जो ले ना सके कोई। घड़ी इक बिसरुँ राम को तो ब्रम्ह हत्या मोहे होए।

।। है ही भगवान ।।

26-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जो मज़ा फकीरी में है, वह अमीरी क्या जाने ? जो आनंद सादगी में है, वह artificial दुनिया क्या जाने ? भगवान श्री गुरु नानकजी ने यही महसूस कराया कि फकीरी अच्छी है, गरीबी अच्छी है, सेवा अच्छी है, शांत अच्छी है, मौन अच्छी है, गंभीरता अच्छी है, नम्रता अच्छी है। गुरु बाबा की सब बातें ध्यान में रखते हुए अपना आदर्श सिद्ध करो ।

।। है ही भगवान ।।

26-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लगने लगे सब अपने,अब है न कोई पराया"

परायापन तू छोड़ देगा जब आत्मा को प्यार करेगा। देह को पकड़ने और जकड़ने वाला व्यक्ति आत्मा को कभी प्रेम कर नहीं सकता। पकड़नी जब तू निकालता है, कपड़ा भी तेरा तभी तो गिरेगा। अब ये भी तो एक कपड़ा ही है ना। तेरी देह एक कपड़ा ही है। लेकिन तूने देह को देह-अध्यास से पकड़ लिया है। देह-अध्यास को पकड़नी बना दीया है। तो तेरा कपड़ा गिरता ही नहीं।

कपड़ा देह का तेरा गिरे तो आत्मा की झलक मिले ना। ज्ञान कितना भी सुनो और सुनाओ, देह-अध्यास छुटा नहीं, प्रेम बढ़ता नहीं। सूंग-सूंगकर प्रेम करना जिज्ञासु का धर्म नहीं है। Flow तेरे जीवन में आ जाए, fountain खुल जाए, सब नहाले, सारे गीले हो जाएँ। ऐसा प्रेम आपको हो सकता है जब तू सतगुरु के आज्ञा-चक्र में रहे तो। ऐसे प्रेम के दरवाजे आज्ञा-चक्र से निकलते हैं, ज्ञान से नहीं निकलते। इसीलिए अपना इलाज करो और आज्ञा-चक्र में चलो।

गुरु को रिझाओ, मन-मंदिर में उसका आसन बनाओ, प्रेम का दीपक रोज़ जलाओ, आरती करो कि हे सतगुरु तेरे भक्तों की महफिल में, मैं तुझको ढूँढू। तेरे सत्संग में मैं तुझको प्राप्त करुँ। तेरे बच्चों में मैं अपने को खो दूँ। गुम होईके फिर वेख्ख नज़ारा। एक वारी ज़िंदगी में खुदको गुम करना ही है। Fast-fast अभी-अभी करो तो अच्छा है। तेरे से भी संसार को कुछ तो मिलेगा। तू भी गुरु से दिया हुआ वादा पूरा करेगा कि मैं सृष्टि सुंदर करुँगा।

।। है ही भगवान ।।

27-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दुमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सो ही वड़भागी है जो अपने सतगुरु के चिंतन में रहता है। जो चिंतन में रहता है उसकी सारी चिंताऍं खत्म हो जाती है। जैसे ही चिंताऍं खत्म हो गई, वैसे तू आतम-निष्ठी बन सकता है और आतम-निष्ठी ही आतम -निष्ठा करानेवाला भी बन जाता है। जन्म-जीवन तब सफल होगा जब तू आतम-निश्चय डट के करेगा और कराएगा। बाकी कर्म तो सब चलते रहेंगे, उसकी कोई बात नहीं है। जिंदगी भी है, स्वास भी है, कर्म भी है, पर यह कर्म कुछ और है, जो दादी भगवान ने कहा खुद पकड़ो और पकड़ाओ। भगवान देखो और दिखाओ। यही गुजारत है जो अकल में आ गई तो बस।

।। है ही भगवान ।।

27-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ख्यालों का टक्कर, ख्यालों का बदलाव, ख्यालों की setting"

सुखी तू किसमें होगा ये तू जान। ख्याल ख्याल से टक्कर लगाके, ख्याल को change करके, तू सुखी हो सकता है। लेकिन ख्याल को बदलने में, ख्याल को set करने में, तेरे पास torch नहीं है, अंधेरा है। तभी ख्याल से ख्याल टकराता है। उजाले में आ जाओ, आत्मा की रौशनी में आ जाओ, तो ख्याल टकराएँगे नहीं, ख्याल खुद में setting ढूँढ लेंगे। सब natural होता है। लेकिन तू पुरानी चीज़ों को छोड़ना पसंद नहीं करता। नई हवाएँ तुझे भाती नहीं। Change में तेरा मन गबरा जाता है। क्योंकि तू कमज़ोर है। कमज़ोर मनुष्य खुदको change नहीं कर सकता। हवाओं के आगे अपने रुख को बदल नहीं सकता।

इसीलिए कई problems संसार-समाज में, घर-परिवारों में आते हैं और ख्यालों के टक्कर लगते हैं। टक्कर लगते हैं, चोट दोनों तरफ आती है। इसीलिए ख्यालों की setting, देह-अध्यास को छोड़कर, आत्मा के ज्ञान से, गुरु प्रेम से, गुरु वचनों से हो सकती है तो क्यों नहीं करते हो। क्योंकि बदलना तेरे को अच्छा नहीं लगता। इसीलिए तू हर वक्त अकेला रहना पसंद करता है, पर अपने को बदलकर, बीच संसार में अलख की धूणी नहीं जगा सकता। खुदको change करो और अपने जीवन को सफल करो। विशालता में आ जाओ, और हालातों के आगे, तूफानों के आगे, हवाओं के आगे, अपना रुख change करो। सभी का प्रेम मिलेगा, सब तुझे प्रेम करेंगे और तू भी सबको प्रेम करने के काबिल बनेगा।

।। है ही भगवान ।।

28-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

न्यारा और प्यारा दोनों एक साथ जो होता है, वही जिज्ञासु है, गुरु का बच्चा है। कभी-कभी तू न्यारा तो हो जाता है लेकिन उसके साथ प्यारा नहीं होता। और कभी-कभी प्यारा होता है, तो कुछ ज़्यादा ही प्यारा हो जाता है। इसीलिए दादी भगवान ने balance की लकीरें खींच कर रखी है कि न्यारा भी बनो, प्यारा भी बनो, दुलारा भी बनो, निश्चयवान बनो, प्रेम-वान बनो, गृह-गृहस्थ संभालो। हर खुशी को limit में रखो ताकि excess में खुशी तेरे से रुठ ना जाए। Excess में सुख रुठ सकता है, खुशी रुठ सकती है, लेकिन balance वाली खुशी, balance का सुख, हर चीज balance में तेरी अपनी होकर रहती है।

।। है ही भगवान ।।

28-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी ते अमृत वचन ।।

"अथक बनो"

अथक बनके जब तू परमात्मा के कतार में आता है तो बेड़ा पार होता है। कईयों को खुश करने की, सुखी करने की शक्ति तेरी बढ़ जाती है। हदें खिसक जाएगी। बेहद का तू बादशाह बनेगा। अपने भीतर ब्रह्मकार दृष्टि, ब्रह्मकार वृति महसूस करेगा। थकने का ख्याल थक्का देता है। अथक हूँ, यह ख्याल सारी थकावट को दूर कर देता है। तेरी dictionary में थकान शब्द होना नहीं चाहिए। चलते रहो, दौड़ते रहो, आनंद में आके दौड़ लगाओ तो आनंद ही टपकता है, थकावट नहीं। प्रेम में आके दौड़ लगाओ तो प्रेम की मुरली बाँसुरी तेज़ी से बजने लगती है, पर सूनापन तेरी जिंदगी में कभी आता नहीं। थकावट है तो सूनापन है। जे थकान शब्द भी नहीं है, तो सूनापन भी नहीं है। इसीलिए अपनी थकान का इलाज करो। Active बनो और हर वक्त eveready रहो।

।। है ही भगवान ।।

29-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन।।

हर हालत में सम रहना जिज्ञासु धर्म है। जोड़-तोड़ करना तेरा स्वभाव है। लेकिन उस स्वभाव को आत्मा का निश्चय करके छोड़ दो। क्या जोडू़? क्या तोडू़? इससे तो अच्छा है जो बनाए, हम देखते चलें। हर हालत में शुकराने माने, हर हाल में वाह-वाह करें। हर हाल में प्रभु को, सतगुरु को ध्यान में रखकर अपने ज्ञान का मार्ग, अपने उन्नति का मार्ग आगे निकालते जाऍं। 2 foot torch रखें और तय करते जाऍं। आखिर कब तू पर्वत पर पहुॅंच जाएगा सतगुरु की कृपा से, तुझे पता भी नहीं चलेगा।

।। है ही भगवान ।।

29-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सच्ची सुंदरता"

मनुष्य की सच्ची सुंदरता है, ख्यालों से खाली रहना। ख्यालों का भंगार, ख्यालों की दल-दल जब तेरे दिल-दिमाग में फंसी हुई है, तो तेरे चेहरे पर नूर दिखाई नहीं देती। पर जे तू ख्यालों से खाली है, all-rounder है, प्रेममय है, निमृता में है, अहंकार से दूर है, आप देखेंगे ख्यालों की quality कुछ अलग ही है। ख्याल ऐसे हैं जैसे फटा-फट पूरे हो जाएँ। ध्यान देता है तो पूरे भी होते हैं। तेरा ख्याल जब सिद्ध होता है, पूरा होता है, तो तू सुंदरता को प्राप्त करता है। क्योंकि ख्यालों के कारण, जो रेखाएँ तेरे चेहरे पर रुकी हुई हैं, अटकी हुई हैं, आती हैं, जाती हैं, वो अपना स्थान बना लेंगी। सही है तो किसी कोने में बैठ जाएगें ख्याल। जे गलत है तो चुप-चाप बाहर चले जाएँगे। आपको दोनो में से, किसीसे कोई तकलीफ नहीं होगी और मज़े से जीवन बीतेगा कि है ही भगवान। आहे ही भगवान।

।। है ही भगवान ।।

30-Nov-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सतगुरु प्रेम से तेरी बुद्धि की रोज़ polish होती है। पहले दिन कैसी बुद्धि लेके आया था, आज कहाॅं पहुॅंचा है ! यात्रा सुखद है ना ? स्थूल बुद्धि - उसकी भी polish होती है। छंड-छाण easy हो जाती है, तेरी नज़र तेज़ हो जाती है। सूक्ष्म बुद्धि विवेकी बुद्धि बन जाती है। स्थूल बुद्धि छंड-छाण करती है, सूक्ष्म बुद्धि विवेक से अपना रास्ता लेकर सुखी पाती है। जब गुरु बुद्धि की polish न करे तो बुद्धि विचलित, भटकती हुई, लावारिस बुद्धि हो जाती है। अब जब गुरु ने बुद्धि के ऊपर दृष्टि डाली, काम किया तो वो ही बुद्धि सतगुरु की आत्मिक बुद्धि बन जाती है। अपनी बुद्धि से सही सोच ले लो, शरीर से सही कार्य ले लो, मन से सही संकल्प ले लो, अपने स्वभाव से सही language ले लो, मीठी भाषा ले लो और भावनाओं को सही करके अपने जीवन की यात्रा को सुखद बनाओ।

।। है ही भगवान ।।

30-Nov-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सतगुरुअ जे घात में भी डा्त"

गुरु जिणकता है तो भी मीठा लगता है। क्योंकि गुरु जिणके तो देह-अध्यास भागे। गुरु जिणके तो मेरे द्वैत के ख्याल भागे। जब तक गुरु महर न करे तो तेरे द्वैत का कोई इलाज ही नहीं है। कोई दवाई नहीं है देह-अध्यास की। बस गुरु की महर। गुरु महर करे, मत्त ठाए। गुरु रुठता तो नहीं है, पर जिज्ञासु अपने कर्ता-भाव से, अपने ख्यालों से कभी-कभी महसूस करता है कि गुरु रुठा हुआ है।तो भी गुरु रुसे तो मत्त खसे। गुरु महर करे तो, मत्त भंडारा बढ़े डे्। बढ़ जाएँगे भंडार आनंद के फिर जे तू गुरु से एक होके चलेगा। एक होके चलो, एक में रहो, एक में जियो, एक ही अंदर विचारधारा रखो।

।। है ही भगवान ।।

December
01-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

तू सैलानी, मां सैलानी। सैलानियों की तरह जिज्ञासु को रहना चाहिए। अपनी समझ और रमज से निश्चय में आगे बढ़ना चाहिए। त्याग-वैराग्य ध्यान में रखते हुए, balance की लकीरों को खैंचना चाहिए। प्रेम की मुरली बजाते-बजाते अपने सतगुरु में लीन होकर, अपना जन्म और जीवन सफल करना चाहिए।

।। है ही भगवान ।।

01-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आत्म-चिंतन और पर-चिंतन"

They fall in love, we rise in love! आत्मचिंतन में ऐसा प्रेम तू सीख जाता है। भावनाएँ इतनी शुद्धता से तेरे भीतर जन्म लेती है जो तू प्रेम में रोज़-रोज़ ऊपर आता है। देह में तू कितना भी प्यार करे तो भी कहीं ना कहीं नीचे आता है जब तू ये सोचता है कि मैंने तो प्यार किया पर सामने वाले ने स्वीकार नहीं किया। प्यार नहीं किया, स्वीकार नहीं किया, समय पर काम में नहीं आया, इसी प्रकार के ख्याल तुझे गिराते रहते हैं प्रेम में और प्रेम ऊपर आ नहीं सकता, और आत्मा के निश्चय से, भावनाएँ शुद्ध में, प्रेम में, अंदर ही अंदर शुक्रानों में इतनी आती हैं जो तू प्रेम में उभरने लगता है।

प्रेम है तो तू पूरा positive है। देह-अध्यास है तो negativity तुझे छोड़ती नहीं। इसीलिए प्रेम-मय बन जाओ। जो भी सामने आता है सबसे प्रेम करो। Love Your Neighbour. जो तेरे संपर्क में आया वो ही तेरा पड़ोसी है और प्रेम का हकदार है। देह-अध्यास में शुक्राने मानना तू भूल जाता है तो पर-चिंतन में आ जाता है। आत्म-भाव में शुक्राने मानते हो, आत्म-चिंतन में रहते हो, आत्म-चिंतन में रहनेवाला आत्मा का स्वभाव अपना बना देता है। देह का स्वभाव, पर-चिंतन वाला तू छोड़ देता है।

।। है ही भगवान ।।

02-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मान्यता (कहना मानना) करने से मन मोटा नहीं होता। मान्यता करने से कहीं संकट टल जाते हैं। मान्यता करने से दिल-दिमाग ठंडा रहता है। मान्यता करने से हाथों की लकीरें change हो जाती हैं। मान्यता करने से तू सर्व से प्रेम कर सकता है। मान्यता करने से तू अपने संसार, गृह-गृहस्त को भी सुखी कर सकता है। मान्यता करो, प्रेम करो, आत्मा का निश्चय करो और सफल जीवन बनाओ।

।। है ही भगवान ।।

02-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अपने आदर्शों पर नूरानी दृष्टि"

किसी ख्याल से ज़िद ना करो। कोई बात तेरी समझ में नहीं आती तो ज़िद ना करो। ज़िद में ज़िद तो बिल्कुल भी ना करो। इसीलिए उसके ऊपर नूरानी दृष्टि डालो, भगवान की दृष्टि डालो। तो ख्यालों में बदलाव आता जाएगा। आदर्शों में भी बदलाव आता जाएगा। नूरानी दृष्टि से नूर बरसता है। तू नूर बरसाता चल, प्रेम की गंगा को बहाता चल। जब कोई बात बिगड़ जाए, हालत आ जाए तो तुम देते साथ सदा हे कृपा निधान। तू ही है भगवान। जड़-चेतन में, अहंकार के time तू तू तू तू तू तू कर, सब तेरा-तेरा-तेरा-तेरा कर। जब निश्चय हो जाएगा तो तू कहेगा मैं ही तो हूँ। फिर मैं-मैं भी तुझे सुहाती है, सुंदरता और आदर्श बढ़ाती है।

।। है ही भगवान ।।

03-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

कर्म करने का भाव रखो। निष्काम जीवन का शौंक रखो। तू कर्म करने का शौंक रखता है और निष्काम जीवन परमात्मा के सहारे छोड़ देता है। निस्वार्थ जीवन तेरे कर्मों की ज़ंज़ीरों को तोड़ सकता है। और निष्काम प्रेम तुझे अपनी आत्मा से और सतगुरु से मिलाकर एक कर सकता है।

कर्ता भाव कर्म कराके तुझे ले डूबता है और अकरता भाव, सहज भाव, प्रेम भाव डूबने से बचाता है। तू तैरना सीख जाता है। औरों को भी हाथ पकड़कर तैरने की प्रेरणा देता है। गुरुद्वारे तक पहुॅंचाकर, सत्य की राह पर चला कर, उनको भी रास्ता दिखाकर, जन्म सफल करने के लिए आधार देता है। जो सत्य का आधार दूसरों को पकड़ाता है, वही खुद निराधार होकर जीवन गुज़ारता है और प्रेम की राहों पर चलकर परमात्मा की ओर अपनी यात्रा को पूर्णता में बदल देता है।

।। है ही भगवान ।।

03-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरा हृदय किसीके प्रेम का महलात बन जाए"

उसके लिए एक ही चीज़ चाहिए- मुस्कुराहट। प्रेम से भरी, सच्चाई से भरी, तपस्या से भरी, ज्ञान से भरपुर, संतोषमई, ममतामई, समतामई मुस्कुराहट। ऐसी मुस्कुराहट तेरी जब है, तू किसीके हृदय में महलात बना सकता है। किसीमें अपने विश्वास का दीपक जलाओ। वही विश्वास सृष्टि सुंदर कर सकता है। तू तो करेगा, तेरे आस-पास जो भी तेरे साथ हो जाएँगे, वो भी सृष्टि सुंदर करने में लग जाएँगे।

सृष्टि paint brush से सुंदर नहीं होती। पर जबकि तेरे हृदय में विचार positive होते हैं, अच्छे ख्याल होते हैं तो वो ही ढा्त तू और किसीको भी दे सकता है। इसी प्रकार ये ढा्त, ये मुस्कुराहट कई हृदयों में पहुँचती है और महल बना देती है। अपनी मुस्कुराहट को प्रेम में बदली करो, धीरज में बदली करो, संतोष सिखाओ और हरी के गुण गाओ।

।। है ही भगवान ।।

04-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

कम बोलने से शक्ति बढ़ जाती है। फिर भी पता नहीं, समझदार मनुष्य ज़्यादा क्यों बोलता है ? हकीकत में उसको शक्ति बढ़ानी है, संकल्प तो यही है। पर पता नहीं क्यों उल्टी चाल चलता है ? गुरुजी ने कहा, पेट में भी उल्टे लटके पड़े थे, बाहर निकले तो भी उल्टे, गुरु का ज्ञान लिया तो भी उल्टा, अपनी समझ रखी तो भी उल्टी। सीधे कब बनोगे ? जिस दिन तू सीधा बन जाएगा, हम भजन गाऍंगे - आहे अड्यू जी घड़ी सभागी, मुहिंजी सुमयल सूर्त पई जागी।

।। है ही भगवान ।।

04-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Ego-अहंकार-Superiority Complex"

Ego की निशानियांँ है कि ego वाला मनुष्य किसीको पसंद नहीं करता। वो खुदको ही चाहता है। खुदको चाहने वाला मनुष्य सबको प्यार कैसे कर सकता है ! Ego वाला मनुष्य किसी को सुन नहीं सकता। क्योंकि उसको अहंकार के कारण अपने दिमाग में traffic लगी पड़ी है कि मैं अब ये सुनाऊ, वो सुनाऊ, किसको सुनाऊ, कब सुनाऊ। यही ख्याल पीं पीं पीं पीं पीं पीं करते रहते हैं। तो वो दूसरे की बात कैसे सुन सकता है। सुनेगा नहीं, तो सीखेगा क्या ! समजेगा कब !

Ego वाला मनुष्य सुख बुद्धि में रहता है। उसको अपना सुख अति प्यारा है। वो दूसरे की खुशी इसीलिए पूरी नहीं कर सकता। क्योंकि अपने सुख से फुर्सत ही नहीं है। Ego वाला मनुष्य age के पहले बुढ़ापे में आ जाएगा। क्योंकि ego के कारण उसमें किट-किट-किट-किट फसी पड़ी है। इसीलिए वो कलयुग में गोते खा रहा है। सतयुग का रास्ता उसे कैसे मिलेगा।

Ego वाला मनुष्य सत आत्मा का निश्चय, सत आत्मा का संदेश, सत आत्मा का प्रेम दे नहीं सकता। क्योंकि वो देह की ज़ंज़ीरों में जकड़ा हुआ है। सबसे बड़ी ज़ंज़ीर है - I Am Right ! मुझे जो अच्छा लगेगा मैं वो ही करुँगा। पो खणी दुनिया उंदह थे। फिर चाहे दुनिया में अंधेरा छा जाए। लेकिन ego वाले मनुष्य को तो अपनी ही चलानी है।

वो विरासत सही नहीं कर सकता कि मैं खुदको भी safe रखूँ और सबको भी प्रेम दे सकूंँ। अपनी ही, अपने ही ख्यालों की, अपनी मर्जी़ की, अपनी इच्छा को, शुभ इच्छा का cover चढ़ाके, अपनी छोटीसी दुनिया में वो रहता है। वो मन के सुखों की, मन की मर्जी़ की, देहध्यास की ज़ंज़ीरों को तोड़ नहीं सकता। क्योंकि वो ego वाला है। इतनी सारी निशानियांँ हमने आपको बताई। उम्मीद करता हूँ कि बाकी की निशानियांँ तेरे हृदय में खुद ब खुद आ जाएगी और आपकी आत्मा आपको रोशनी देगी।

।। है ही भगवान ।।

05-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

Be Relax ! आगे-पीछे मनुष्य को relax में रहना ही है, फिर देर किस बात की ? जो बात कल करनी है, वह आज करें। जो आज करनी है, वह अब करें। अपनी गंभीरता कभी नहीं छोड़नी चाहिए। गंभीरता किसको कहते हैं ? कम से कम बोलना, कम से कम सुनना, कम से कम करना और कुदरत के इशारे को समझना ही सही और सच्ची गंभीरता है। कुदरत के इशारे के विरुद्ध जाना बड़े में बड़ी चंचलता है।

।। है ही भगवान ।।

05-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Ego-अहंकार-Superiority Complex"

Ego वाला मनुष्य किसी को पसंद नहीं करता। हर एक से विखेप लेता है। हर एक को विखेप देता भी है। पर उसको वो बात समझ में नहीं आती कि मैं भी किसी को विखेप देता हूँ। Ego वाला मनुष्य अकेला रहना पसंद करता है। उसको अपने सामने कोई मनुष्य अच्छा नहीं लगता। स्वार्थ पूर्ति के लिए कुछ समय किसी से हंँस्स-बोल लेता है। पर बाद में उसको कोई भी मनुष्य अच्छा नहीं लगता। Ego वाला मनुष्य सदाई अतृप्त रहता है। Ego वाला मनुष्य सदाई अपने को something मानता है कि मैं कुछ बड़ा आदमी हूँ, कुछ खास हूँ। इन आम लोगों से मेरी नहीं बनती। सभी को तू आम समझकर प्रेम में नहीं आता, पर प्रेम से तू भी वंचित, दूसरों को भी वंचित रखता है।

।। है ही भगवान ।।

06-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

गर्भ अंदर जो वचन तू करके आया है, उसको तुझे निभाना ही पड़ेगा। क्या निभाना पड़ेगा ? मीठा बोलना पड़ेगा, धीरज से बोलना पड़ेगा, संतोष अपने हृदय में लाना ही पड़ेगा। बिना संतोष के सतगुरु विराजमान कैसे होगा ?

संतोष की चादर बिछाओ, वैराग का pillow रखो, त्याग का चंवर झुलाओ, मैं आके बैठूॅंगा तेरे ह्रदय के आसन पर। बिना संतोष के गत नहीं। कस खाओ पर संतोष ना गवाओ। संतोष की जितनी value है, उतनी value देह-अध्यास में मनुष्य की कहाॅं है? देह-अध्यास से ऊपर उठकर जब तू संतोष में आता है, तो ही तेरी सच्ची कीमत मालूम पड़ती है।

।। है ही भगवान ।।

06-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आईना"

सतगुरु ज़िंदगी में आईना बनकर खडे हैं। जो आईने में अपने दाग देखता है वो अपने स्वभाव-संस्कार को ठीक करता जाता है। जब तू आईने में अपना देह-अध्यास देखता है, तो देह-अध्यास भी बढ़ जाता है। गुरु आईना है, ऐसा जो दाग दिखाए भी और मिटाए भी। सतगुरु मुहिंजो आहे आत्म। आत्मा का दीदार करके मैं खुदको दोषमुक्त बनाऊँ, दृष्टि को दोषरहित बनाऊँ और सबको प्रेम करुँ। सबको प्रेम करने से तेरे हृदय में विशालता आती है। बुद्धि विशाल होती है, तू हदों से ऊपर उठता है। सबको प्रेम करो। Love your neighbour! जो तेरे संपर्क में आए वो ही तेरा neighbour है। सबको प्रेम करने से तेरे मन की अपनी गाठें खुलती है। तेरी ज़िंदगी सरल और सीधी हो जाती है।

।। है ही भगवान ।।

07-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'हठ हुअन जो हारन लाए, मजबूर थो करे'। होने का हठ, अहंकार, कहीं कहीं तुझे success होने नहीं देता, हर नेक पर मजबूर कर देता है। आत्मा में तो हार-जीत नहीं है, पर जब तू हठी स्वभाव करता है तब तो तू आत्मा में है ही नहीं। तो तुझे हर चीज़ चुभने लगती है। हठ भी आने लगता है, हार-जीत भी आने लगती है, महसूस होने लगती है।

इसीलिए 'जडे॒ तुहिंजे मौत जी धरतीय ते थी वन्ये पधराई'। तेरे मौत की सृष्टि में अनुभव हो जाए सबको, कि यह पहले जैसा अब नहीं रहा, तब जाके तेरा निश्चय होता है। मौत का अर्थ यह नहीं है कि कोई संसार से चला जाए। सच्ची मौत तो यही है कि तू अपने मन को मोड़ता जा। Be bold कब? जब तू होता है mould! Mould होता जा, मुड़ता जा, यही तेरी सच्ची मौत है मन की और पधराई यही है।

।। है ही भगवान ।।

07-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"प्याज"

छोटासा प्याज आपको संसार की असलियत दिखा सकता है, विवेक विचार सतगुरु के हैं तो। प्याज के पत्तों को खोलते जाओ, खोलते जाओ, खोलते जाओ, भीतर कुछ भी नहीं मिलता। ऐसे ही जीव-भाव में, देह-अध्यास में, तू संसार के कितना भी deep में जा, खोलता जा, खोलता जा, पर हाथ तो कुछ नहीं लगता। इसीलिए संसार में deep मत जाओ, deep जाओ भगवान में। और संसार में कमल के फूल की तरह रोको। कमल का फूल कीचड़ में भी होता है तो भी कीचड़ उसे छू नहीं पाती। तू भी भगवान का एक ऐसा ही कमल का फूल बन जा जो संसार में रहे भी, रुके भी, पर भीतर एक न दो। भीतर कुछ भी नहीं है। कोई दुब्बण नहीं संसार की जो तेरे को छू सके। अपने आपको जानो, पहचानो और कमल के फूल की तरह संसार में रहो। प्याज से सीखो कि उसके भीतर कुछ भी नहीं। एसे ही देह-अध्यास में संसार के भीतर कुछ भी नहीं। बाकी देह-अध्यास छोड़ो तो संसार में रौनक ही रौनक है, प्रेम ही प्रेम है। प्रेम खज़ाना जो लुटाए, जग उसका दीवाना बनता है।

।। है ही भगवान ।।

08-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

हे सतगुरु, मुझे अंधेरों से निकालकर रोशनी में लाओ। अरदास करुॅं - हे गुरुवर कि मुझे अपने आदर्शों की डोरी से बांधके रखो, प्रेम की चुनरी से ढ़कके रखो। 'ढ़कीं मुहिंजा ढोलणा, ऐब न खोलणा। नंगणा निमाणीदा जीवे तीवे पालणा।' जैसे-तैसे तू पलके बड़ा तो हो जाएगा, जिज्ञासु से प्रेम-मई सृष्टि में आ तो जाएगा, लेकिन जब तेरे आदर्श चार-चाॅंद लगाते हैं, तो फिर तेरे से परमात्मा पता नहीं क्या कराएगा ! क्या करा सकता है, यह तू भी नहीं जानता और मैं भी नहीं जानता। तेरा तप तुझको ढूॅंढ रहा है। तेरा अजपा-जाप तुझको पुकार रहा है। तेरे प्रेम की बाॅंसुरी तेरे लिए तरस रही है। अब तो देह-अध्यास से लौटके आजाओ और 'है ही भगवान' का नारा लगाओ ।

।। है ही भगवान ।।

08-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ऐनक-चश्मा"

जिस रंग का तू चश्मा पहनता है, संसार वो ही colour में तुझे दिखता है। इसीलिए तू चश्मा green पहनेगा तो हरियाली दिखाई देगी। काला पहनेगा तो अंधेरा दिखाई देगा और सफेद पहनेगा तो साफ सुथरा उजरापन दिखाई देगा। जैसे तेरे चश्मे का colour है वैसे संसार का colour तुझको उस समय दिखता है। इसीलिए तू अपनी दृष्टि के ऊपर भी ध्यान दे। जैसे जैसा चश्मा, वैसा संसार दिखता है, वो ही colour दिखता है। तेरी दृष्टि भी जैसी है, वैसा ही संसार तुझे दिखता है। Change संसार को नहीं करना है, अपनी दृष्टि को करना है। चश्मा तू उतारके अपना रखेगा, फिर दूसरा पहनेगा, जैसे दुनिया दूसरी देखूंँ। पर दूसरा कोई इलाज नहीं। इसीलिए तू संसार को भी change करने के लिए, अपनी दृष्टि को change कर, तो तेरे लिए संसार change है। बाकी तू कहेगा संसार में ये होवे-ये होवे, ये possible नहीं है। खुदको खुदकी जगह पर रखो और अपने में रहो। अपना सोचो कि मैं देह नहीं, मैं ब्रह्मस्वरुप हूँ।

।। है ही भगवान ।।

09-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

संसार में रिश्तों की कमी नहीं, निभानेवालों की कमी है। निभानेवाला जिसको मिल जाए वह भाग्यशाली है। निभानेवाला जो खुद बन जाए वह सर्वश्रेष्ठ भाग्यशाली है। दावा तो हर एक करता है कि 'कुर्बान जावाॅं', पर कुर्बान जाने के समय पर कोई छल कुर्बान जाए। कुर्बान जाना इतना भी तकलीफ वाला काम नहीं है। बस थोड़ा-सा कहना मानना, थोड़ी-सी नम्रता, थोड़ा-सा झुकाव, थोड़ा-सा हठ छोड़ो, तो सब बेड़ा पार। निभाना भी आ जाएगा, तू success भी हो जाएगा, आशीष का हकदार भी हो जाएगा। पूरी कुदरत तेरे साथ भी चलेगी। 'तू उसमें, कुदरत तुझमें' इतना तू भाग्यशाली बनेगा।

हसती शक्ति हरी की सिद्ध करो। हरी के तरफ ध्यान दो। हरी का अर्थ है 'अपना निश्चय'। तेरा निश्चय है तो सतगुरु भी दौड़ा-दौड़ा आता है, तेरे हृदय की ओर, सिंहासन बिछाकर बैठ जाता है और तू सफर सुहाना बना सकता है। सफर सुहाना बनाना है हमको। अपने तन-मन को रंग देंगे, सतगुरु के प्यार में हम तो। तन-मन की सच्चाई, सफाई और शुद्धता ही तेरा लक्ष्य है। अपने लक्ष्य की ओर थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते जाओ और अपना जन्म जीवन सफल करो।

।। है भी भगवान ।।

09-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Sound Sleep-मीठी निंद्रा"

ख्यालों से जब तू खाली होता है, सतगुरु के प्रेम में जब तू बीग जाता है, अपनी ज़िंदगी का balance कर देता है, तो फिर तेरी नींद में फर्क पड़ता है। अपनी उन्नति के लिए, अपना निश्चय, अपनी मीठी नींद, अपना आदर्श, अपनी रहणी कहणी, सब ज़रुरी है। इसीलिए अपनी सबसे पहली मीठी नींद पर ध्यान देगा, तो ही तू दूसरी बातें कर सकता है। वर्ना नहीं कर सकता है। सोने के time, जिसमें तू श्रद्धा रखता है, जिसको तू प्रेम करता है, उसको ध्यान में रखो, उठते ही ध्यान में रखो, मीठी नींद करो और संसार में success को प्राप्त करो।

।। है ही भगवान ।।

10-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

मनुष्य को संसार में चैन नहीं है। चिड़-चिड़ करना बंद करे तो चैन मिल सकता है। अपने चिड़-चिड़ पर ध्यान दो, चैन की ज़िंदगी बिताओ, चैन की नींद सो जाओ। चैन की नींद सोने से, मन में चैन आने से, तेरी ज़िंदगी हल्की-हल्की हो जाती है और ज़िदगी का आनंद तू लूट सकता है। इसीलिए चैन ज़रुरी है।

।। है ही भगवान ।।

10-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Why fear, Satguru is near"

क्यों डरते हो एे जगवालों सुख बुद्धि को छोड़ने के लिए। सुख बुद्धि तो तुझे परेशान करती है, चिंताओं में डालती है। कर्म करके तू शायद आसमान की बुलंदियों को छू सकता है। लेकिन सुख बुद्धि तुझे खैंच लेती है। पतंग की डोर जैसे कम पड़ जाती है तो तेरा पतंग ऊँचाइयों तक पहुँच नहीं पाता। ऐसे ही सुख बुद्धि के कारण तेरा जीवन बुलंदियों को छू नहीं पाता। परमात्मा के प्रेम की डोर छोटी पड़ जाती है। इसीलिए तुझे डर, खौफ, खतरा अपने जीवन में दिखाई देता रहता है। सुख बुद्धि छोड़ो, ये न सोचो कि सुख बुद्धि छोडुँगा तो दुख बुद्धि आ जाएगी। ऐसा कुछ नहीं है। सुख बुद्धि छोड़के तू आत्मा का निश्चय मज़बूती से कर सकता है। Practical में खड़ा उतर सकता है। जब तू आत्मा का निश्चय करेगा तो दुख कहांँ से आएगा, क्यों आएगा! तेरे पास सच्चा सुख ही सुख होगा। दुख तेरे नेरे न आए। पर सुख बुद्धि छोड़ो और सुखी हो जाओ। सुख बुद्धि के कारण आप संसार में सुखों के बीच रहकर भी सुखी नहीं रह सकते हो। कारण एक ही है कि तू सुख बुद्धि में पड़ा है। अपने को ऊपर उठाओ और खुदको सुखी करो, संसार समाज को भी सुखी करो, दुखों से छुड़ाओं।

।। है ही भगवान ।।

11-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

प्रेम में ज़िदगी हल्की हल्की होती है। प्रेम बिना सार नहीं, प्रेम जीने का आधार है। प्रेम में जो जीए, वह सर्व के लिए जीए, सर्व को जीवन दे। ऐसी सतगुरु की शरण पाए, जो गुरु से अलग कभी ना हो पाए। सनम आज मिल गया, प्रेम में जब मैं हूॅं, तो तू मैं हूॅं, मैं तू है। दोनों एक हैं। एक करने वाला एक प्रेम ही है। इसीलिए प्रेम का दामन पकड़ो और ज़िंदगी को मौज में रहने दो।

।। है ही भगवान ।।

11-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अद्वैत मत"

अद्वैत मत तुझे शक्तिशाली बना ही डालती है, क्योंकि अद्वैत मत में तू एक आत्मा को सिद्ध करता है। तू ब्रहम स्वरुप है, तू आनंद स्वरुप है, तू आत्मा है - यह तुझे अद्वैत मत में विश्वास आ जाता है। अद्वैत भक्ति तेरे मन को एकाग्रह करती है। अद्वैत भक्ति में तू खुदको first पहचान लेता है कि मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ, कहांँ से आया हूँ, आत्मा क्या है, आत्म रस क्या है, आतम विचार कैसे होते हैं ? ये सब बातें जानकर जब तू संसार में ठहराव से, झुकाव से, प्रेम मय होकर, धीरज से रुकता है तो सभी को तेरे प्रति प्रेम पैदा होता है और वही प्रेम तेरा जीवन बन जाता है। तू शक्तिशाली बन जाता है, सबको प्रेम करने के काबिल बन जाता है। चाहता हर एक यही है कि मैं संसार में प्रेम ही करुँ, पर अद्वैत मत तेरी ज़िंदगी में नहीं है। सतगुरु के मीठे-मीठे इशारे तेरे जीवन में नहीं है तो तू कैसे success हो सकता है।

अंतर मुखी हो जाओ, जो अद्वैत मत से अंतर तू चला जाएगा। बाहर जो ढूंँढे भ्रम बुलाए। अद्वैत मत अंतर मुखी बनाती है, बाहर मुक्ता से छुड़ाती है। भगवान तू अंदर देखता है, बाहर विचार change हो जाते हैं कि भगवान किसी एक वस्तु, किसी एक बंदगी में है। तू कण कण वासी को पहचान लेता है। घट-घट वासी में विश्वास रखता है जो अद्वैत मत से तुझे मिलती है। अब अद्वैत मत को सिद्ध करके जो अन्य बातें हैं, उसको छोड़ना है ये नहीं है, वो साथ-साथ चलेगी। लेकिन तू अद्वैत को सिद्ध करेगा तो द्वेत भी तेरा सुंदर आएगा। कहीं तू भक्ति करेगा, कहीं तू प्रेम करेगा, helpful होके रहेगा, तू देह से भी जो कर्म करेगा, वो भी तेरे कर्म सुंदरता से हो सकते हैं जब कि तू अद्वैत मत को सिद्ध करे तो।

।। है ही भगवान ।।

12-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

प्रेम क्या है ? प्रेम परमात्मा तो है ही, प्रेम पर्वत है, प्रेम दरिया है, प्रेम सागर है, प्रेम बहती नदी है। प्रेम अलौकिक है, प्रेम सबसे अलग है। जिस दिल में प्रेम बस जाए वो दिल भी अलौकिक हो जाता है। मन में बसे हो तुम, तन में बसे हो तुम। सतगुरु के प्रेम में ऐसा प्रेम का तूफान लगता है जो महसूस कराता है कि तन में और मन में सतगुरु ही बसे हैं, गुरु का प्रेम ही बसा है। प्रेम करनेवाले की स्थिति क्या होती है? प्रेम करने वाला, प्रेम देने वाला, प्रेम लेने वाला मनुष्य सदा ही धीर-गंभीर रहता है, सदा ही शांत वातावरण पसंद करता है। हर वक्त एकांत चाहता है। ऐसा नहीं कि उसको संसार से कोई लगाव नहीं। लगाव होते हुए भी वह एकांत पसंद है। अंदर ही अंदर भगवान देखकर प्रेम के तूफान को जन्म देना जिज्ञासु का धर्म है। प्रेम तूफान बन जाए और फिर जिज्ञासु का आदर्श बन ही जाता है। कोई chance नहीं कि प्रेम का तूफान उमड़ आए और जिज्ञासु में change ना आए।

।। है ही भगवान ।।

12-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"ओम तेरा सच्चा साथी"

ओहम सतगुरु प्रसाद। एक ओम अक्षर को जान लिया तो सब जान लिया। 'ओहम' - उहे शक्ति मैं ही तो हूँ। उहे शक्ति सब में ही तो है। मैं आप विसर्जन जब करता हूँ तो शक्तिशाली महसूस करता हूँ। आप विसर्जन किसको कहते हैं - क्या तू घर का पता भूल जाएगा? या घरवालों को भूल जाएगा? संसार के सुखों को भूलेगा? किस-किसको भूलेगा? क्या-क्या भूलेगा? आप विसर्जन वो होता है कि चलते, फिरते, उठते, बैठते, संसार की गलियों से गुज़रते, राम वसायऊँ मन में। संसार की गलियों से गुज़रते भगवान मेरे अंग-संग है। मैं नहीं चलता, वो ही चल रहे हैं, वो चला रहें हैं। नज़र टेढ़ी करें तो गाई बना दे। उसकी नज़र पढ़ने से नज़ारे मेरे बदल जाएँ। एेसी सौगात सतगुरु-भगवान देते हैं। कोई लेना चाहे। धाणा पाणी मेरे सतगुरु दा कोई खावणवाला खाए, सोइ वढ् भागी जो सतगुरु पाए। पास रहो या दूर रहो पर हृदय में हुजू़र है, हाज़रा हुज़ूर है। विश्वास ऐसा होना चाहिए कि गुरु मेरे अंग-संग है, गुरु प्रसाद हर वक्त मेरे पास है।

।। है ही भगवान ।।

13-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सतगुरु से पहला सबक मिला कि 'तू देह नहीं ब्रह्म स्वरुप है'। दूसरा सबक मिला 'जाओ मेरी सृष्टि सुंदर करो'। तीसरा सबक मिला 'जे तू ब्रह्म स्वरुप है, तो तेरी एक-एक इंद्री भी ब्रह्म स्वरुप होनी चाहिए'। बाॅंध लिया ना अपने आदर्शों में। बाॅंध लिया ना अपने प्रेम में। ऐसे तो नटखट हैं हमारे दादी भगवान!

चतुर भी हैं, चालाक भी हैं, होशियार भी हैं। प्रेम में बाॅंध लेते हैं, आदर्शों के सहारे सहारा देते हैं। अपने वैराग्य की ज़री हमें भी बख्श देते हैं। वरना आज की generation को क्या मालूम कि वैराग्य क्या होता है? त्यागी की खुशबू क्या होती है? पर ऐसी निगाह डाली, ऐसी दृष्टि डाली है अपने बच्चों पर, सारे वैराग्य में रसदार बन गए हैं, त्याग में अव्वल नंबर बन गए हैं, प्रेम में मस्तराम बन गए हैं, सौदा करने में तो चूकते ही नहीं।

जो 'श्री शारदा शरणम' के बच्चे हैं, सत्य का सौदा करते हैं। दादी भगवान ने यही सिखाया है, यही समझाया है और मेरे बच्चे बहुत अच्छी तरह से आगे बढ़ रहे हैं। इसके लिए मुझे बहुत खुशी है ! हम बहुत खुश हैं और अपने बच्चों को वचन देकर जो खुशी मिलती है वो हम बाॅंट नहीं सकते!

।। है ही भगवान ।।

13-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"धीरज तेरा भोजन बन जाए"

भोजन के सिवाय तू रह नहीं सकता। उसी प्रकार धीरज तेरा भोजन बन जाए, कि धीरज के सिवाय मेरा पेट भरता नहीं। धीरज के सिवाय मेरा मन तृप्त होता नहीं। धीरज के सिवाय मेरा मुख भटकता रहता है। धीरज के सिवाय रिश्ते निबते नहीं। धीरज एक ऐसी स्थिति है जो सुहाती सभी को है। सभी चाहते हैं जेकड़ मैं धीरज करुँ। समय आने पर जेकड़ मैं धीरज करुँ। हर हृदय की यही पुकार है। लेकिन समय पर तू धीरज छोड़के अधीरज होता है। Emotion में आ जाता है। फिर तू भूखा प्यासा रह जाता है, तृप्ति मन को आती नहीं। बुद्धि सदाईं बेचैन रहती है, हृदय तेरा तकलीफों से गुज़रता है। इसीलिए अपने धीरज को मज़बूत करो। धीरज का मंगलसूत्र पहन लो। भगवान सदाईं तेरे साथ है। वो धीरज बनकर तेरे साथ है। ऐसे सुना है क्या, अधीरज बनकर भगवान मेरे साथ है। नहीं ! तो धीरज करने में देरी क्यों करता है। देरी मत करो, जीवन निकल जाएगा। इसीलिए धीरज अर्थ है, समय पर होना चाहिए। वरना कुछ फायदा नहीं।

।। है ही भगवान ।।

14-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

कठिनाई कर्म में नहीं है, कठिनाई कर्ताभाव में है। सुख संसार में नहीं है, सुख आत्मा में है। उल्टी चाल जब मनुष्य चलता है तो ही तकलीफों के बीच में आ जाता है। कर्म करो पर कर्तापणे में ना आओ। हर चीज़ enjoy करो पर संसार में परमात्मा के भाव से रहो। सांसारिक बुद्धि तुझे कहीं ना कहीं गिराती है। निश्चयात्मक बुद्धि तुझे गिरते हुए देखकर सहन नहीं करती, झट से उठा देती है। निश्चयात्मक बुद्धि को बनाते जाओ, बाकी सांसारिक बुद्धि उसमें समाई हुई होगी। कोई चीज़ संसार की तेरे से भूल नहीं सकती। तू पहले से भी अच्छा संसार कर सकता है, बना सकता है, संसार में चल सकता है। निश्चयात्मक बुद्धि संसार के लिए रुकावट नहीं है। संसार की सारी सहुलतें निश्चयात्मक बुद्धि तुझे दिला देती है।

।। है ही भगवान ।।

14-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तेरे नाम की लौ"

तेरे नाम की लौ कुछ ऐसी जली, ऐसी लगी जो पलभर भी तुझे बिसरा न सकी। लौ के लिए आपको दिया, उसमें oil, उसमें वाटी, उसके बाद चिंगारी-इतनी सब स्थितियों से निकलते हैं आपके दीपक-दीया। तब जाके आपको लौ मिलती है, लाट मिलती है। जिसको देखके आपको शक्ति आती है। वो शक्ति आई कैसे। दिया अपने में oil न समाता तो कैसे होता! Oil में वाटी न आती तो दीपक कैसे जलता! वाटी को अगर चिंगारी न मिलती तो वाटी में लौ कैसे दिखती! एक दूसरे को प्यार करने के बाद आपको दिए की लौ मिल सकती है। ऐसे ही सत्संग तेरे लिए दिया है, दीपक है, सुंदर दीपक। गुरु वचन उस दीपक में oil का काम करते हैं, सच्चे घी का काम करते हैं। उसके बाद उसी oil में वाटी बनकर तेरी लग्न खड़ी रहती है। अगर लग्न आपकी खड़ी हो गई दीपक के अंदर तो सतगुरु चिंगारी अपने प्यार की डाल देते हैं और लौ जगमगा उठती है। तेरे नाम की लौ कुछ ऐसी जली, ऐसी जग मगाई जो पलभर भी तुझे मैं बिसरा न सकी। इसी प्रकार अपना दीपक, गुरु वचन, चिंगारी, oil सब ready रखो। आपके जीवन में रोशनी ही रोशनी, उजाला ही उजाला रहेगा, अंधेरा कहीं नहीं दिखाई देगा। अंधेरे मन के सब दूर किए दादी भगवान ने।

।। है ही भगवान ।।

15-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

लीला तो कितनी बार सुनी, कितनी बार देखी। कभी किस पैगंबर की, कभी किस अवतार की! लीला देखकर ज्ञान बढ़ाना है हमको। ज्ञान ना बड़ा, निश्चय ना हुआ, तो क्या देखा? क्या सुना? कौनसी लीला थी? हर time, हर वक्त, एक story ! तेरा धर्म क्या कहता है? जब कभी किसीकी कोई बात समझ में ना आए, अच्छी ना लगे, मन-मुटाव पैदा करे, तो देखनी है लीला ! क्या देखनी है ? लीला ! जब कोई इच्छा तेरी पूरी ना होवे, जब तेरी इच्छा किसी दूसरे की तरफ मोड़ खाकर चली जाए, तुझे ना मिले, उसे मिले, तब देखनी है लीला। जब तुझे मनपसंद स्थिति, मनपसंद व्यवहार ना मिले, तो भी अपनी स्थिति में स्थित रहना, अपने व्यवहार को clear रखना तेरा धर्म है। अपना धर्म निभाओ, सब लीला चल रही है। लीलाधारी की लीला को नज़र में रखके आनंद ले लो और अपने जीवन को हल्का-हल्का बनाके सफल बनाओ। "सब लीला पेई हले"।

।। है ही भगवान ।।

15-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लहरें"

जब तू सागर के किनारे बैठता है तो लहरें आपको कितना आनंद देती हैं! सागर का शान बढ़ाती हैं। लहरों के बगैर सागर सूना-सूना रहता है। जब लहरें आती हैं तो सागर जैसे खुश हो जाता है। ऐसे ही तेरा भी जीवन बन जाए। कोई लहर आए, कोई लहर जाए, पर तुझे आनंद में रखे। जैसे सागर की शान बढ़ाई लहरों ने, ऐसी तेरे जीवन की लहरें जो आती हैं, वो तेरे जीवन की शान बढ़ा देती है। तेरा आदर्श कौन प्रगट करे ? लहरें ही तो हैं जो तेरा आदर्श प्रगट कर सकती हैं। तू सागर के जैसा धीर गंभीर है ये कौन प्रगट करे ? लहरें सागर की गंभीरता प्रगट करती है कि हम कितने भी उछलतें हैं, लेकिन आप सागर पर दृष्टि डालो तो वो धीर और गंभीर है। छोलियों के होते हुए भी सागर अपनी गंभीरता कभी नहीं छोड़ते। ऐसे ही तू भी अपने जीवन की गंभीरता कभी न छोड़। लहरें आएँ, छोलियाँ उठें, बुद्ध बुद्धे आएँ पर तू अपनी धीर गंभीर का स्वभाव न छोड़, अपनी गंभीरता न छोड़। तब तेरा जीवन हल्का-हल्का आनंदमय हो सकता है।

।। है ही भगवान ।।

16-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

दादी भगवान के हृदय में दर्द था। दुखः नहीं था, पर दर्द था। दुखः दूसरों के लिए होता है पर किसीका दुख तू उतार नहीं सकता। दर्द अपना स्वरुप जानकर तू अपने ह्रदय में सर्व के लिए, सारी सृष्टि के लिए रखता है। दर्द का धुऑं तेरी तपस्या को जन्म देता है। तपस्या की खुशबू सारी सृष्टि तक फैलती है और उसी खुशबू में सब एक नईं मंज़िल पा सकते हैं, एक नईं रोशनी की किरण को प्राप्त कर सकते हैं, नईं राहें चुन सकते हैं, सारी सृष्टि को बहुत कुछ मिल सकता है।

जैसे दादी भगवान ने कहा "सृष्टि सुंदर करो"। हमें बहुत कुछ मिल गया, मंज़िल मिल गई। ऐसे ही तेरे ह्रदय में एक थोड़ासा दर्द का अंश मात्र भी आ जाए कि मैं सर्व के लिए जीऊॅं, सर्व के लिए उठूं, सर्व के लिए अपना आदर्श बनाऊॅं, तो बस, हो गई सृष्टि सुंदर और तेरा जन्म सफल।

।। है ही भगवान ।।

16-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"इत्तफाक"

एक इत्तफाक ये है कि तू देह-अध्यास में, देह-अध्यासी के पास देह को जन्म मिला। तूने मान लिया कि हाँ मैं तो देह हूँ। ६ दिन के बाद नाम पड़ा। तू फलाणा फलाणा बन गया। भाई बन गया, बेटा बन गया। ये इत्तफाक में चलते-चलते तू उसी इत्तफाक को सत्य भी मानने लगा। मानने के बाद चलते-चलते एक और इत्तफाक तेरी ज़िंदगी में होता है, आता है। वो ये कि चलते-चलते राह में सतगुरु, ब्रह्मनिष्ठी गुरु मिल जाते हैं। और तुझे आत्मनिश्चय देते हैं। ज्ञान मिला, भगवान मिला, सबसे पहला सबक मिला कि तू देह नहीं तू तो आत्मा है। आत्मविश्वास मिला, आत्मशक्ति मिली, आत्म power मिला, आत्मप्रेम भी मिला। इत्तफाक देह निश्चय का हुआ तो जल्दी तूने अपना नाम accept कर दिया। अब इत्तफाक ये हुआ कि गुरु ने बताया, तू देह नहीं, तू तो आत्मा है, तो ये इत्तफाक accept करो। मन से मानो। ये भी सत्य का ही रुप है। ये भी सत्य ही है। मानोगे तो ही तो पकता होगी। पकता होगी तो ही तो मन शांत रहेगा। शांत रहेगा तो औरोंको शांति देने के काबिल बनेगा। इसी प्रकार तो संसार में शांति का फहलाव भी होगा। तेरे एक आत्मनिश्चय से अगर संसार के बहुत सारी हदों में शांति मिलती है, तो सौदा बुरा नहीं है। भगवान ने वाणी में कहा है - मन हीते मन मानिया। मानने में देरी न करो कि मैं ब्रह्मस्वरुप हूँ, मैं आनंदस्वरुप हूंँ, मैं तो अजर, अमर, अविनाशी, आत्म हूंँ। आतम निश्चय से आतम power बढ़ता है, तेरा ज़िंदगी में will power बढ़ जाता है और उसी will power से तू निर्विकारी भी होता है और प्रेममय भी हो जाता है। यहाँ सब विकार दे दे, बदले में तू प्यार ही ले ले। इसी प्यार से तू ज़िंदगी गुज़ार। मोहब्बतें लुटाता चल जहाँ में तू सभी पर।

।। है ही भगवान ।।

17-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री भगवानजी के अमृत वचन ।।

शुकराने tonic हैं, शिकायत poison है। फिर भी पता नहीं सारा संसार अमृत छोड़कर ज़हर के पीछे क्यों पड़ता है! शिकायत! शिकायत! शिकायत! छोटे से शिकायत, बड़े से शिकायत, जड़ से शिकायत, भगवान से शिकायत, खुद से भी शिकायत। इतनी सारी शिकायतों के बीच में तू कैसे जीवन को आगे बढ़ा सकता है? ज्ञान से तू ब्रह्म स्वरुप है, तू आनंद स्वरुप है, तू देह नहीं है, तू तो आत्मा है। जब यह तीर तेरी शिकायत को लगे तो शिकायत टूट कर बिखर जाएगी और प्रेम देवता आगे आ जाऍंगे। शुकराने आगे आ जाऍंगे। थोड़ासा पुरुषार्थ बहुत बड़ी खुशी, थोड़ासा मन को मोड़ना बहुत बड़ा फायदा, थोड़ी सी गुरु की मत समझ लेना और बहुत बड़ी ज़िंदगी अच्छे से जीवन गुज़ारना, यही समझदारी है, यही शुकराने हैं। 'शुकरानों के गीत गाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो।

।। है ही भगवान ।।

17-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शीतलता"

तेरी शरण में जो आ गया, भव से उसे छुड़ा ही दिया। चाहे वो कैसा भी पात्तकी था पर पावन तो आपने बना ही डाला। ये प्रीत्त की रीत कैसी! कर्म करीं, धर्म करीं, खणी क्या भी करो, पर तू पावन-पवित्र-पाक बन नहीं सकता जब तक देहध्यास का अंधेरा तेरे साथ चिपका हुआ है। पर सत्य का सूरज सतगुरु का अब उघ आया है। ठोकर खाएँ क्यों मेरे बच्चे जब जन्म सफल करने की वारी आई है, तो ठोकर कैसी, अंधेरा कैसा!

सतगुरु ने डाल दिया आत्मज्ञान, आत्मसवेरा, चंद्रमा जैसी शीतलता, सूर्य जैसी रोशनी। तू शीतल भी बन चंद्रमा जैसा, सूर्य जैसा तेज़ भी होवे, हवाओं जैसे, पवन-देव के जैसे उड़ान होवे, जय झूलेलाल के जैसा ठंडक में बहते चलो, माँ धरती के जैसा धीरज, विशालता होवे आकाश गगन जैसी, अग्नि जैसा तेज़ होवे, गर्मी होवे तेरे में।

एक तरफ शीतलता, एक तरफ गर्मी, बेरो पार। गर्मी है अग्नदेव की तो तू active है, शीतलता है चंद्रमा जैसी तो तू active है, सूरज जैसा तप है तो भी तू active बनेगा, हवाओं जैसे उड़ेगा, पंछी की तरह पल में आसमान को छुएगा, तभी तो तू active बनेगा। मेरे बच्चे धरती के घोड़े, आसमान के पंछी और मट्टी की चिंटियाँ - यह कभी न भूलो। जहाँ तू घोड़ा बनता है, पंछी बनता है, तो चींटी भी बनना ही है। हरि नाम की शक्कर रेत में बिखरी पड़ी है। जब तक तू चींटी न बनेगा, राम रस कैसे मिलेगा। बस आ जाओ कुर्बानी की कतार में। आज संसार को इसी की ज़रुरत है।

।। है ही भगवान ।।

18-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

अपना मन, अपना तन, अपनी खुशी, अपनी हालतें, जो भी आपको अच्छा न लगता है, उसको अपनी आराधना में अर्पण कर दो। आराधना में अर्पण होते ही तेरी स्थिति बन जाएगी, हालतें निकल जाऍंगी, खुशी आ जाएगी। आराधना अपने आराध्य की जब करते हैं तो ही तू पूर्णता के तरफ आगे दौड़ लगा सकता है। अपने से कितनी भी आप उम्मीद रखो, आस रखो - मैं ये करुॅंगा, मैं वो करुॅंगा, पर उससे बेहतर, उससे easy, उससे खुशी का रास्ता है आराधना। अपने आराध्य की आराधना ! आराधना में मन तेरा मगन हो जाए, जीवन तेरा सुलग उठे। तन-मन जीवन सुलग उठे, ऐसी आग लगा दो अपने को और भजन रोज़ गाओ जो हमने आपको गाके सुनाया, तो आपका मन पिगलेगा। संगीत से मन पिगलता है। इसीलिए संगीत को भी अपना साथी बना लो तो आपका रास्ता easy हो जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

18-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"सहनशीलता"

सहनशीलता मनुष्य में अगर नहीं है तो मनुष्य, मनुष्य नहीं है। सहनशीलता के सिवाय मनुष्य कहांँ चल सकता है? ना अपने परिवार से निभा सकता, ना friend circle में चल सकता है, ना किसी संसार के angle पर रुक सकता है। फकत इसीलिए कि सहनशीलता नहीं है। अब सहनशीलता कितनी सुंदरता है ये आप अगर realise करें तो सहनशीलता के सिवाय तू रह नहीं सकेगा। Realise करो एक मनुष्य emotion में आके, discussion में आके, खुद भी तपता है, औरोंको तपा देता है। पर सहनशीलता वाला मनुष्य समय आने पर discussion में नहीं आता, वो अंदर चला जाता है। बहस करने से ब्रह्म खिसक जाता है। फायदा क्या होता ? इससे तो अच्छा है अपने मन का digestion power बढ़ाते जाएँ। तब जाके तू मन का ईश बन जाएगा। मन का ईश बना तो बस, सब कुछ तेरे भीतर ही होगा और तू भीतर से ही तृप्त रहेगा, भीतर से ही तू प्रेम करेगा, विश्वास रखेगा।

सहनशीलता एक ऐसा गुण है जो जिज्ञासु के लिए तो सर्वश्रेष्ठ है, ज़रुरी भी है। इसीलिए अगर आपका मन emotion में आता है तो उसको please change करो। उसको कहो कि सहनशीलता में सब कुछ है, emotion में कुछ भी नहीं है। Emotion is disease ! बीमारी के सिवाय आपको कुछ न मिलेगा। इसीलिए आत्मनिष्ठी बनो और जिज्ञासु बनके सहनशीलता का पाठ पक्का करो। हम भी खुश, आप भी खुश, संसार भी आगे, समाज में भी शांति।

।। है ही भगवान ।।

19-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

'गुम होईके वेख नज़ारा'। ज्ञान सुना, ज्ञान सुनाया, सेवाऍं भी की, सब कुछ हुआ, पर गुम न हुआ तो क्या हुआ ? कुछ भी नहीं! ज्ञान सुनने सुनाने, सेवा करने की end यही है कि आप गुम हो जाओ, खो जाओ, आप विसर्जन में आ जाओ। आप विसर्जन, गुम होना, तेरी मंज़िल है, तेरी अपनी मंज़िल है। बाकी सब राहे हैं। खो जाना तेरी अपनी मंज़िल है। खोते तो हो ही, संसार में मनुष्य खुद को इच्छाओं में, पदार्थों में, हालातों में, गुम तो करता ही है, लेकिन गुम होने की दिशा गलत है।

पानी वहाॅं इतना गहरा नहीं है संसार में जो तू बराबर डूब सके। अब देखो जो दादी भगवान ने अपना घाट बनाया, अपने वाणी के, अपने प्रेम के, अपने आदर्शों के, जो भगवान ने रास्ते दिखाए, उधर पानी बहुत गहरा है। अमृत है! गहरा अमृत है! आप डुबकी मारोगे तो पूरा भीग सकते हो। पूर्णता में आ सकते हो। संसार की कोई खुशी तब तक तुझे पूर्णता में नहीं आने देगी, जब तक तू spirituality में नहीं आता, आत्मा का निश्चय नहीं करता। आत्मा का निश्चय करके अपने को पूर्णता में लाओ। दादी भगवान के अमृत वाले घाट में पूरी डुबकी लगाके फिर संसार में भी डुबकी लगाओ। संसार को भी मत छोड़ो। संसार में डुबकी लगाएगा तो संसार भी तेरे लिए अमृत बन जाएगा। गहरा पानी बन जाएगा, जिसमें तू अच्छे से डुबकी लगा सकता है। 'पहले अल्लाह, फिर पुलाव', यह हमेशा याद रखोगे तो आप को पूर्णता में तकलीफ नहीं होगी। Easily आप पूर्णता की पदवी तक पहुॅंच सकते हो।

।। है ही भगवान ।।

19-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अमरता"

वीर पुरुष अमरता को प्राप्त कर ही लेता है। अमरता को प्राप्त करके वो bold, mould, बहादुर, शक्तिशाली वीर हो जाता है। जो वीर है वो विच्च सीर से डरता नहीं। तभी तो वो हर वक्त, हर जगह, कोने-कोने में, सत्य के दीप जगाता रहता है। मुहिंझी बे्री अथई विच्च सीर ते, सत्य जो पलव पाया थी माँ ज़िंद पीर ते। बीच मझधार में वो एकाग्र होके कई हालातों के बीच में परेशानियों के साथ दुख, दर्द, जो भी हैं, उनके साथ, हर तूफान में, वो विच्च सीर पर खड़ा हो सकता है। क्योंकि पक्का किया है-है ही भगवान। किनारे पर हूँ, विच्च सीर पर हूंँ, पर है ही भगवान। है ही भगवान की शक्ती तेरे साथ ऐसे हो जाएगी जो अखुट खज़ाना बन जाएगी। कभी खूटेगा नहीं।

अमरता को तू आतम ज्ञान से प्राप्त करेगा। अमर बूटी हुनन खादी, बी् चिंता सब मिटाइआ। एसी अमरता की बूटी आपने ग्रहण करली है जो सारी चिंताएँ आपकी छूट गई हैं। ऐसे सतगुरु के गुण हर वक्त गाओ, खुशियाँ मनाओ कि उसने कैसा रास्ता दिखाया, कैसी मंज़िल पकढ़ाइ। बलि बलिहारी जाऊँ उस गुरुदेव को जिसने राह दिखाई। सर्व में भगवान दिखाया, सर्व में वासा मेरे वासुदेव का दिखाया।

।। है ही भगवान ।।

20-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

तू जब कर्ता नहीं है, तो भगवान तेरे लिए कर्ता बन जाएगा। तू जब शांत है, मन की एकाग्रता में है, धीरज में है, तो भगवान को तेरे लिए ख्याल होगा कि मेरे बच्चे को मैं किस प्रकार बराबर रखूॅं। तू जब धीरज में है, तो यह वादा है कुदरत का, कुदरत तेरे लिए धीरज करेगी या तो अधीरज होगी, लेकिन तुझे संभालेगी। तू जहाॅं भी गिरेगा, अगर तू कुदरत की गोदी में गिरा, गुरु की गोदी में गिरा, दोनों एक ही बात है। क्योंकि गुरु कुदरत का धणी है। तो तेरा धीरज कामयाब धीरज बन जाएगा। तुझे कहीं चोट न लगेगी और तू अपने परमात्मा से मिलके एक हो जाएगा। तेरा आदर्श भी बनेगा, अकर्ता भाव में। धीरज भी आएगा, अकर्ता भाव में। चैन भी मिलेगा, शांति भी मिलेगी, अकर्ता भाव में। Study करो, पुरुषार्थ रखो कि कर्तापणा तुर-तुर-तुर-तुर करके छोड़ते जाओ और अकर्ता भाव में आते जाओ। 'तरण की न ड॒यारा, मुड॒स पे लहरुन में, तुहिंजी रमज़ुन सा लग़ी वयुस किनारे। कुदरत ऐसी रमज़ देगी, सतगुरु ऐसी रमज़ देंगे कि तू किनारे लग जाऐंगे। यानी अपनी मंज़िल पकड़ लेंगे और अपने आदर्शों में रह सकते हैं।

।। है ही भगवान ।।

20-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मधुरता"

मुरली बजाई भगवान श्री कृष्ण ने तो आई आप में मधुरता। ज्ञान सुनाया गुरुदेव ने तो आई आप में मधुरता। निश्चय जब तू करेगा अपना तो आ जाएगी हकीकत में जो मधुरता तेरे वास्ते है, तेरे लिए है, तेरे लिए ज़रुरी है, वो आ जाएगी तेरे हृदय में मधुरता। मन झूम उठता है निश्चय में, आत्मनिश्चय में। तू पाक पवित्र bold और mould बन जाता है आत्मनिश्चय में। पहाड़ जैसी अढोलता, प्रेम पिगलने वाला, जैसे मेणबती जले, लाट औरोंको रोशनी दे, खुद पिगले, खुद छोटी होती जाए, औरोंको रोशनी देती जाए। ऐसी स्थिति तेरी अपने आत्मनिश्चय में होगी।

निष्काम जीवन के सिवाय मधुरता कैसे आए। जीवन में मधुरता नहीं, मज़ा नहीं, तो तेरा जीवन थोथा बन जाए, पोला, पोलाळ हो जाए। जैसे दीमक लकड़े को खाके पोला बना देती है, ऐसे तेरा जीवन अहंकार के कीटाणु पोलम पोल पोला कर देते हैं तेरे तन को, तेरे मन को, तेरे बुद्धि को। अहंकार के किटाणु आत्मज्योति के सिवाय निकलते नहीं हैं। सतगुरु से दी हुई आत्मनिष्ठा जो समय पर तूने ले ली तो अहंकार से छूट जाएगा और जीवन भरपूर आनंद मधुरता से बढ़ जाएगा। खाली ईंदो, भरजी वेदों, हू त सागर मा सो तारे। गुरु त मुहिंजो मिठडो़ आहे राम थो डे्खारे। जहाँ देखो राम ही राम, श्याम ही श्याम, भगवान ही भगवान। यही तेरा जीवन है, यही तेरा लक्ष्य है।

।। है ही भगवान ।।

21-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

यह दिल है अमानत सतगुरु दी। दर-दर पे रुलाया नहीं जांदा। एक दिल परमात्मा को अगर हम अर्पण करके देते हैं, तो जीवन की safety हो गई। वही दिल परमात्मा को अर्पण न करके, एक दिल हज़ार हुए टुकड़े! कोई कहाॅं गिरा, कोई कहाॅं गिरा। गिरे हुए तुकड़ों को कोई जोड़ नहीं सकता। जीवन नष्ट, पुरुषार्थ fail, प्यार होते हुए भी मनुष्य खाए मार। पर जे तू परमात्मा से दिल लगाए, इश्क परमात्मा की तरफ होवे, तो दिल के हज़ार टुकड़े होने से बच जाऍंगे। एक दिल कईंयों को सुखी करेगी। एक दिल कईंयों के दिल के टुकड़े को जोड़ देगी। वो दिल जो कुदरत से जुड़ी है, सतगुरु से जुड़ी हुई है। अंदर गुरु का आसन बनाके बैठी है, कि गुरुदेव मेरे तू ही मेरा स्वामी, तू ही मेरे इष्टदेव। ऐसी अपनी रहनी-कहनी रखो, जो परमात्मा में लीन रहो। तो संसार के सारे कार्य भी सफले हो जाऍंगे। जो खुशी तुझे मिलनी है, उसमें कहीं कोई रंडक-रुकावट नहीं आएगी। सब खेल प्यो हले, सब पाणई पियो थे। सब अपने आप हो रहा है यह तू महसूस करेगा। फिर भी अपने आपको जब तू नीरस पाए तो निश्चय आगे रख।

परमात्मा के इश्क का थोड़ासा स्वाद चखो। किसीके भी इश्क को थोड़ा देखेंगे तो तुझमें भी वह इश्क आ जाएगा। सतगुरु को देखो कि दादी भगवान ने कैसे अपने सतगुरु के साथ इश्क किया, प्रेम किया, मनता किया और परमात्मा से हाथों हाथ निश्चय लिया। तू भी तो उन्हीं का बच्चा है, तू भी धीरज कर, शांति कर, सतगुरु से प्रेम ले ले, निश्चय ले ले, इश्क माॅंग ले। झोली फैलाके इश्क मांग ले कि मुझे इश्क है तुम्ही से, झूठा ही सही। पल भर के लिए इश्क तो कर दे, झूठा ही सही! फिर मेरी promise है वही झूठा - सच्चा इश्क तेरा बन जाएगा और तू परमात्मा के लिए जीवन जीएगा। परमात्मा तेरी आरती उतारेगा। यह तो प्रीत की रीत है, कुदरत का कानून है। सुखी गुज़ारो और इन वचनों को ध्यान दो।

।। है ही भगवान ।।

21-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"उमंग, उत्साह"

उमंग और उत्साह में आपको ज्ञान भी लेना नहीं पड़ता। उमंग और उत्साह के सहारे ज्ञान तेरे हृदय में भीतर खुद ब खुद पहुंच जाता है। संसार की कोई उन्नति करो तो भी उमंग और उत्साह ज़रुरी है। उमंग कभी-कभी मर जाते हैं। वो क्यों मरते हैं? क्योंकि अहंकार के कारण आपको कभी कुछ अच्छा लगता है, कभी किसी की बात अच्छी नहीं लगती है। आप कहते हो इससे तो अच्छा है side हो जाऊँ। मर गया उमंग। कभी आपकी चलती है, कभी नहीं भी चलती है। आप कहते हो इससे तो चलाऊं ही नहीं, वो ही अच्छा है; बोलूं ही नहीं, वो ही अच्छा है। मर गया उमंग।

आप कभी किसी से प्रेम करते हो, थोड़ी-बहुत तीन गुण के कारण टक्कर, तीन गुण के कारण कभी न कभी हल्का सा विखेप आ ही जाता है। आप कहते हो इससे तो अच्छा है विखेप आए तो मैं कर्म ही नहीं करुं, किसीसे मिलूं ही नहीं, किसीसे बात ही नहीं करुं। इसी प्रकार उमंग मरते जाते हैं रोज़-रोज़। लेकिन इन सब बातों का ध्यान रखते हुए आपको अपनी दिल बड़ी करनी है। मर्जी़ चली तो ठीक है, नहीं चली तो भी ठीक है। किसी ने माना तो भी सही है, नहीं माना तो भी भलाई है किसी में।

हर तरफ से आप नैलानी जोराबे की तरह fit हो सकते हैं, fit हो जाओ। तो उमंगों की बारात ज़िंदा रहेगी, कभी मरेगी नहीं। उमंग मर गए तो जैसे ज़िंदगी का स्वाद मर गया। खाना तो है table पर, पर स्वाद जैसी चीज़ उसमें नहीं है, तो तू कैसे खाता है। खाके काम उतारता है पर दिल से खाना नहीं खाता। इसी प्रकार जीवन में उमंग और उत्साह है तो तू जीवन जीने के लिए तू खुश रहता है। वर्ना तेरे को जीवन संभाला नहीं जाता, उठाया नहीं जाता। अपना आत्मनिश्चय करो, प्रेम की दुनिया में रहो। इन बातों का ध्यान दो और अपने जीवन को संभालो।

।। है ही भगवान ।।

22-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

जैसे अनाज साफ करते हो, वैसे अपने ख्यालों को साफ करना है। ख्यालों के कंखर-भितर, भंगार वाले ख्याल, उनको दिल-दिमाग़ से बाहर निकाल फेंकना है। ख्यालों को जब तू साफ-सुथरा रखेगा तब ही तो तेरा आदर्श साफ-सुथरा होगा। आदर्श साफ-सुथरा है तो ही तो जीवन और जीवन का व्यवहार साफ-सुथरा होगा। जब तक व्यवहार साफ-सुथरा नहीं है, तब तक मन की शांति नहीं मिलती है। मन की शांति ना मिली तो success नहीं मिलती है और तू दौड़ता रहता है अपनी success के लिए। पर तुझे यह पता नहीं है कि success के लिए भी साफ-सुथरा होना ज़रुरी है। मन की सफाई, तन की सफाई, घर की सफाई, व्यवहार की सफाई, सब सफाई तेरे लिए जितनी ज़रुरी है, उतनी तू नहीं करता, तभी जाके तुझे कुछ कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। अब पूर्णता में बाकी कुछ दिन ही बच गए हैं। इसीलिए please अपने आदर्शों को ठीक करो। अपनी पूर्णता की तरफ आगे बढ़ो तो नए साल में नईं रोशनी, कुछ नया lesson मिल सके !

।। है ही भगवान ।।

22-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मस्ती"

मुझे मेरी मस्ती कहांँ लेके आई, जहाँ मेरे अपने सिवाय कुछ भी नहीं है। मस्ती ऐसी होवे जो नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात। हर वक्त छाई रहे मस्ती। वो मस्ती सच्ची है और भगवान की मस्ती है। मस्ती तेरे बाहर के बातों की तो वो उतरती और चढ़ती है। मस्ती तेरे भीतर के भगवान की, भीतर के सखा की, तो वो चढ़ती उतरती है मस्ती, हकीकत में मस्ती नहीं है। पर जो स्थिर मस्ती है, वो ही हकीकत में आत्मा की मस्ती है। अपनी मस्ती को पहचानो, उमंग को पहचानो, emotion को ध्यान दो। Emotion तेरी मस्ती का loss करता है। इसीलिए emotions से दूर रहके अपनी मस्ती को, आत्मा की मस्ती को बरकरार रखो। आत्मा की मस्ती है तो तेरे पास आत्मा की शक्ति भी है। आत्मा की शक्ति ना होने के कारण तेरा देह-अध्यास तेरे को तोड़ देता है। देह-अध्यास के पंजे से बाहर निकलो और भगवान के बातों में आ जाओ। प्रेम खज़ाने में आ जाओ। प्रेम खज़ाना जो भी लुटाए वो जग सब उसका दीवाना बन जाता है। इसीलिए प्रेम में रहो, प्रेम में उठो, प्रेम में चलो।

।। है ही भगवान ।।

23-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

एक गुरु का साथ जीवन भर का सहारा है। गुरु तू न मिलता तो क्या होता? तू न जगाता तो मैं सोता! प्रेम के बंधन से कभी मुक्त होने की इच्छा ना रखो। प्रेम का बंधन कबूल कर दो। कभी-कभी जिज्ञासु को चलते-चलते थकान भी आती है, मन कुछ दूसरा ढूॅंढने लगता है; थकान को हज़म करो। मन को कुछ दूसरा चाहिए, वाणी से निकालकर भजन में लगा दो, भजन से निकालकर शेवा में लगा दो, शेवा से निकालकर सतगुरु में लगा दो, सतगुरु से निकालकर सर्व में लगा दो, कभी सर्व से निकालकर खुद में लगा दो। लेकिन यह change दे दो। उसको बाकी की कोई change ऐसी ना दो, जो कहीं तू खड्डे में गिरे, राग-द्वेष में आए या और किसी मुसीबत को मोल ले।

प्रेम परमात्मा है। Everything is God, Everywhere is God ! हर चीज़ में परमात्मा है, हर चीज में भगवान है। उसको महसूस करो, तो कभी तेरा मन ups-down में आएगा नहीं। ज्यों ही परमात्मा पर दृष्टि गई, तो विखेप से दृष्टि उठ जाएगी। भगवान महसूस हुआ, तो द्वेष महसूस न होगा। रिश्तो में कभी खटास आए तो परमात्मा की थोड़ी-सी मिठास लेके उसमें डाल दो। वही रिश्ते मीठे लगेंगे। कभी निभाना कठिन पड़ जाए, तो सतगुरु को याद करो। गुरु ने क्या दिया, गुरु ने कैसे निभाया, गुरु कैसे चलते हैं। ऐसे तू भी संसार के कोने-कोने में सतगुरु के वास को लेके फिर, लेके घूम। जहाॅं भी आया वहाॅं प्रेम के fountain को खोल दिया। सब को नहलाया, खुद भी नहलाया तो उजली हो गई सृष्टि। तू भी उजला, जो तेरे सामने आए वह भी उजला। वायु-मंडल को खींचना तेरे हाथ में है, जीवन को बनाना तेरे हाथ में है, क्योंकि सतगुरु तेरे साथ में है।

।। है ही भगवान ।।

23-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तस्वीर बदलती है तकदीर"

एक तस्वीर जो नामरुप करके तू मन में बसा लेता है - इसने ऐसा किया, उसने वैसा किया। तेरी अच्छी तकदीर में भी कहीं ना कहीं राग-द्वेष से, नाम-रुप से, तू-मा से, तकदीरों में भी कमियांँ आ जाती हैं। कई तस्वीरें तू अपने मन के भीतर लगाके बैठा है जिसने आपको तकलीफ दी है। इसने दिया, उसने दिया, उसने दिया - counting करते रहो, पर हिसाब-किताब end होती नहीं। तकदीर में भी घटा-वदी इसीलिए आती है क्योंकि राग-द्वेष के कारण तू सही मार्ग पकड़ नहीं सकता, सही दिशा तेरे को मिल नहीं सकती, इंद्रियों में आलस भर जाता है और तू कार्य करने में सफल नहीं रहता, इसीलिए आपको राग-द्वेष से जो अंदर तस्वीरें भरी पड़ी हैं, वो तकदीरें खराब करती हैं।

एक तस्वीर सतगुरु की, जो बिगड़ी तकदीर बनाती है, क्योंकि सतगुरु ने एेसा तप किया जो अपने जीवन से तो कोई राग-द्वेष है ही नहीं, पर सर्व के जीवन से राग-द्वेष, नफरत, मोह, साड़-पच्च, वैर-विरोध निकालने में वो सफल रहे। उनकी एको ही झलक, लखाँदीं मरज़। एक झलक से सब विकार छूट जाते हैं, तू सदा-सद जागृत हो जाता है और अपनी दिशा पकड़के, सत्य का मार्ग पकड़के, संसार सागर से पार उतर सकता है। एक तस्वीर तकदीर तेरी बना देती है। एक तस्वीर जो राग-द्वेष से भरी है, वो तेरी तकदीर को कहीं न कहीं down करती है, बिगाड़ देती है। अपनी तकदीर को बराबर रखो और सच्चा नाम रुप से ऊपर सतगुरु का दर्शन करते रहो। दृश्य ढि्सा मां पहिंजे सतगुरु जो, आस हीया मुहिंजे अंदर में।

।। है ही भगवान ।।

24-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

सतगुरु की महिमा अपरम्पार है। ना होने वाली बातें भी कैसे कर देते हैं, करा देते हैं। उनकी महिमा चमत्कारी है। एक चमत्कार तुझे पदार्थों से भर देता है, एक चमत्कार तुझे spirituality से भर देता है, खुशियों से भर देता है। कौनसी खुशियाॅं ? परमात्मा की खुशियाॅं, भक्तों की खुशियाॅं, संतों की खुशियाॅं, दिल की खुशियाॅं। "खुश आयाॅं, खुश आयाॅं, सज॒ना तुहिंजी खुशीअ में खुश आया। मैं तो खुश हूॅं, लेकिन सभी खुश होए, यह मेरी सभी के लिए शुभकामनाऍं हैं, आशीष है। तू भी मेरा बच्चा है, सभी के लिए खुश रहने की आशीष माॅंग और अपना आदर्श ऐसा रख जो सब तेरे आदर्शों पर चलकर खुश रहें। दूर-दूर, गाॅंव-गाॅंव ढंढोरा पिटाऊॅं मैं, गली-गली, ऐसा तो मेरा सतगुरु है, बहुत देनेवाला, सब खुशियाॅं देनेवाला, दुख हरनेवाला, आनंद देनेवाला, मेरा एको ही दातार है, जिसे मैं कभी ना भूलूॅं, जो भी है सब झोली में समा के रखना है और सृष्टि सुंदर करनी है। उनके आदर्शों को, उनके ख्यालों को हृदय के नस-नस में जगह देनी है।

।। है ही भगवान ।।

24-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"गुरुमुख - गुरु के मुख से निकले शब्द"

गुरु के मुख से शब्द निकलते हैं तो उसके साथ-साथ सही दिशाएँ भी सामने-सामने मिलती हैं। ये गुरु वचनों की महिमा है। ये गुरुमुख की महिमा है। जो गुरु के मुख से निकले उसको भक्त वरदान के रुप में देर न करे, उठाले, तो गुरुमुख से निकला हर एक वचन तेरे को सौगात देता रहेगा। विश्वास,भरोसा, श्रद्धा, प्रेम बढा़ता रहेगा। पर आप कभी-कभी यूंँ कहते हो कि आगे जाके वचन काम में आएँगे, आपे ही मान लूँगा। पर यहाँ से गुरुमुख से निकले, वहाँ तेरे हृदय में जाए और practical में आप उतार सको। इसको कहते हैं गुरुमुख। गुरुमुख से जो निकला, उसको बराबर time पर लेते जाओ तो हर दिशा सही साबित होती है। वर्ना कोई न कोई गड़बड़ घोटाला हो ही जाएगा। इसीलिए गुरु वाक्यम सत्यम। वो ही सत्यम शिवम और सुंदरम बन जाएगा।

।। है ही भगवान ।।

25-Dec-2015

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाॅं भगवानजी के अमृत वचन ।।

पूर्णता की तरफ आगे बढ़ना है, पूर्ण होना है। प्रकृति में परिवर्तन कितने भी आए, पर मैं पूर्ण रहूॅं। शरीर में changes आए, मैं अपने आत्मा के निश्चय में आकर पूर्ण रहूॅं। कहीं दुखों-सुखों, मान-अपमान, गरीबी-शाहूकारी की दीवारें आकर टकराए तो भी पूर्णता कभी नहीं छोड़नी है। राग-द्वेष, नफरत की कभी दीवारें भी ज़िदगी में आए तो भी धीरज करके, पूर्णता नहीं छोड़नी है। गुरु से किया हुआ वादा पूर्ण करते जाओ। अब पूर्णता में दिन बाकी के चार हैं।

चार दिनों में आपको पूर्णता की तरफ दौड़ लगानी है। बचे-कुचे जो भी आधे-अधूरे ख्याल हैं, भंगार है, जो भी अंदर की चिंताऍं हैं, tensions हैं, सबको आत्मा में change करते जाओ और आगे बढ़ते जाओ पूर्णता की तरफ और खुशी-खुशी new year मनाते जाओ। पूर्ण हो जाओगे तो new year का मज़ा भी आएगा। नए साल का मज़ा, पुराने साल का मज़ा, दोनों मजे़ एक साथ। पूर्णता की तरफ आगे बढ़ो हमारी है यह आशीष !

।। है ही भगवान ।।

25-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Happy Happy Christmas मेरे बच्चों"

आज Christmas, 25 December, Christ का दिन है। सब मिलकर उनकी कुर्बानियों को नमस्कार करो। याद रहे सदा कुर्बानियांँ जिन्होंने अपनी जीव-जान की परवाह न करके, सत्य को प्रगट किया और अपने आनेवाले कल के बच्चों के लिए आदर्श छोड़ा। सत्य जीवन है, सत्य ही सहारा है। सत्य पर चलना है, सत्य को प्रगट करना है। सत्य है तो संसार सुखी है। सत्य से जब मनुष्य वंचित होता है, देह में, देह के रसों में आता जाता रहता है, तो खुद दुखी, संसार भी उससे दुखी। पर जे तू सत्य के मार्ग पर चल पड़े, गुरुजनों, पैगंबरों की एक आसीस, एक आदर्श साथ में लेले तो तेरे दोनों पईयों से तेरे जीवन की गाड़ी कहीं आगे निकल जाएगी। जब आदर्श तेरा बन जाएगा तो संसार की कोई ताकत तेरे मन को हिला नहीं सकती। क्योंकि गुरुजनों का ज्ञान, उनकी भक्ति तेरे साथ होगी। उनकी कुर्बानियों को याद करो और कुर्बानी की कतार में खड़े हो जाओ। ये आज की ज़रुरत है और ये आज के बच्चों का फर्ज़ भी है, प्रेम भी है। है ही भगवान। Happy Christmas ! खुश रहो।

।। है ही भगवान ।।

26-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अलौकिक कर्म"

अलौकिक कर्म किसे कहते हैं ? तू बड़ी-बड़ी study करेगा, dictionary खोलेगा, खोज करेगा कि अलौकिक कर्म क्या होते हैं ! हम कहते हैं, अलौकिक कर्म अपने को सुखी रखो और औरोंको भी सुखी रख सको। संसार में मनुष्य या तो सत कर्म करता है, या तो बद्ध कर्म करता है। पर सत और बद्ध दोनों से उपराम होके, आप अलौकिक कर्म करो, जो तुझे भी सुखी रख सकता है, औरोंको भी खुश रख सकता है। उसीको अलौकिक कर्म कहते हैं जो आत्मा के निश्चय में रहते हैं। आत्मा के निश्चय में कर्म इस प्रकार हो जाता है, जैसे आपने किया ही नहीं। तो जो कर्म थकान न पैदा करे वो अलौकिक कर्म है। जो कर्म राग-द्वेष पैदा न करे, वो अलौकिक कर्म है। जो कर्म counting न करे, वो अलौकिक कर्म है। बस इतना ही। इसके आगे आप खुद समझो कि तू अलौकिक कर्म करता है या ऐसे ही लोगों के विचार से चलता है।

।। है ही भगवान ।।

27-Dec-2016

।। पूय सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हिम्मत"

हिम्मत रखनेवालों को ही सतगुरु मदद करते हैं और हिम्मत रखनेवालों को ही माँ-प्रकृति मदद करती है। जड़-चेतन की हिम्मत वालों को आसीस मिलती है। वो कहते हैं कि हम अपनी बात को आगे रखें, पर क्या पूरी हो सकती है ? नहीं, तो हिम्मत गई पानी में। पर यह सोचना बेकार है। बस हिम्मत करते चलो, आपके साथ सतगुरु हैं, भगवान हैं। है ही भगवान करके अपनी हिम्मत को collect करना है जो तूने संसार में गवाई है। जब हिम्मत रखते हैं तो भीतर भी शक्ति और शांति दोनो आती है।

।। है ही भगवान ।।

28-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"संसार का पागलपन, भगवान का दीवानापन"

जो allround नहीं बनता, हर तरफ ध्यान नहीं देता, one side होकर फकत संसार की ही बातों में उलझा रहता है, वो पागलपन को ही तो प्राप्त कर सकता है। पर जो संसार के साथ अल्लाह और पुल्ला दोनों के साथ जो संसार सागर से पार उतरने की शक्ती रखता है, वो भगवान का दीवाना बन जाता है। एक तरफ पागलपन, एक तरफ दीवानापन, एक तो मंज़ुरी तुझे लेनी पड़ेगी। फिर तू क्या चाहता है- संसार के बीच में संसार का पागलपन लेकर खुदको तकलीफ देना, या भगवान के प्रेम में प्रेम-मय होकर, भगवान की शक्ति को साथ रखकर, संसार में दुनिया के साथ-साथ परमात्मा के भी साथ-साथ तू अपना दीवानापन साबित करेगा।

।। है ही भगवान ।।

29-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दृष्टि और लक्ष्य"

तेरी दृष्टि हर वक्त अपने लक्ष्य की तरफ होनी चाहिए। ज़रा गफलत हुई या नजरें झुकी, चौ तरफ सभी ने घेर दिया। जब एहसास हुआ तो पता चला कि गुरु ज्ञान का दीपक हर वक्त अपने मन मंदिर में जलाना ही पड़ता है। घड़ी इक बिसरुँ राम को, मतलब अपने निश्चय से एक घड़ी भी दूर होते हो, तो ब्रम्ह हत्या हो जाती है। ब्रह्म से दूर हो जाते हो, अपने से दूर हो जाते हो। इसीलिए अपनी दृष्टि, अपने लक्ष्य की तरफ बरकरार रखो। जैसे अर्जुन ने लाल आँख पर दृष्टि रखी तो सफल हुआ। तू भी अपनी दृष्टि अपने निश्चय की तरफ रख दे, वही तेरी लाल आँंख है। यहाँं-वहांँ जब दृष्टि जाती है तो क्या मिलता है और जब तू लक्ष्य को प्राप्त करेगा तो क्या नहीं मिलेगा? फिर भटकाओ कैसा? क्यों भटक रहे हो एे जगवालों? भटकना बंद करो। इस-उसकी बात में मत जाओ। इस-उसके दुखडे़ सुखड़े count मत करो। नफरत की आंधियों से थोड़े हटके रहो। ज़रा गफलत होती है, नफरत ह्रदय में आके पड़ती है। उसको पढ़ने न दो, क्योंकि तू आत्मा है, तू ब्रह्म स्वरुप है। अपना मूल पहचान। जब तू अपना मूल पहचान लेता है तो किसी तरफ से कोई तकलीफ आती नहीं, हर तरफ से खुशियाँ ही खुशियाँ तू बटोरता रहता है और अपने प्रभु के साथ, अपने संसार के साथ आराम से चलता है।

।। है ही भगवान ।।

30-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आपकी दिनचर्या"

आप सारे दिन में कैसे चलते हैं? क्या खाते हैं? कैसे विचार हैं? सोना और उठना किस प्रकार है? आपके मुख से किस प्रकार की भाषा निकलती है? भावनाएँ क्या कहती हैं? क्या आप all round हैं? दिनचर्या जब सही है तो ही आपके भीतर सतगुरु के ज्ञान का कुणका जाता है, और कुणका जाके मणका बना देता है। लेकिन बिना तेरे आदर्श के, सही routine नहीं है तो कुणका भी अंदर नहीं जाता। Please अपना ध्यान रखो। आप जो ज्ञान बोल रहे हो, बता रहे हो, सुन रहे हो, सुना रहे हो, वो मुख तक सीमित है या कोई हृदय के दर्द की धारा है।

अगर आपके मुख से निकला हुआ शब्द या कानों से सुना हुआ शब्द हृदय की धारा नहीं है तो कोई काम वो शब्द कर नहीं सकता। जैसे तेरी tube light fuse हो गई, लगी तो पड़ी है, लेकिन current नहीं लेगी। Wire निकल गई तो कोई चीज़ तेरे काम में नहीं आएगी। ऐसे ही तू दिल की, अपने हृदय की धाराओं से जो ज्ञान दृष्टी तेरी है, जो तेरी मुख से निकली धाराएँ हैं, वो अगर हृदय से नहीं है, हृदय से तेरी wire जुड़ी हुई नहीं है, तो ना दृष्टी काम करेगी, ना सृष्टि में तेरा कोई कर्म भरकत डालेगा, ना ही तेरा सुना हुआ वचन तेरे को तृप्ति देगा, ना ही तेरे कहा हुआ वचन किसी और को तृप्ति देगा। इसीलिए सावधान। अपनी दिनचर्या को संभाल के रखो। दिनचर्या में पहला सबक हम आपको यह देते हैं कि आप अपने खाने-पीने को सुधारके रखो। सही समय पर सही खाना खाना जिज्ञासु का पहला धर्म है।

।। है ही भगवान ।।

31-Dec-2016

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"है ही भगवान ! 31st December 2016 - मतलब Happy New Year"

मेरे बच्चों Happy New Year ! आज एक घड़ियांँ आपको दुआएँ देके, श्रृंगार कराके, जानेको बेकरार हैं। एक घड़ियांँ आ रही हैं अपने बच्चों की ओर शुभकामनाएँ लेकर, शुभ अवसर लेकर, मज़बूत ताकत लेकर, दिल में उमंग, मन में तरंग, नस-नस में उत्साह। वो घड़ियांँ आ रही हैं 31st December 2016 रात 12:00 बजे। जोरदार तालियाँ बझाईए और 2017 की बात का इंतज़ार कीजिए। छोटा सा आशीर्वाद कि 17 को नाहीं कभी कोई खतरा।

अब मेरे बच्चे हर तरफ से बाहर निकल चुके हैं। मेरा-मेरा भी करते थे, चौदवी का चांँद भी बने, तेरा-तेरा भी करना सीखे, पूर्णता की ओर बढ़े, श्रृंगार भी किया। अब आप ऐसे तैयार हो गए कि वो घड़ियांँ आने को बेकरार हैं जो अपने बच्चों को निर्भय बनाती हैं, निरवैर साथ में बनाती हैं। इस साल आपको कोई खतरा नहीं। आप निर्भय बनो और निरवैर भी हो जाओ। बस परिपूर्ण, परिपक्कता, आत्मा का निश्चय, आत्मबोध, सब दाग मिट गए, श्रृंगार हो गया, बहुत अच्छा लग रहा है। आप एक नए युग की ओर एक कदम आगे बढ़ा रहें हैं। मेरी शुभकामनाएँ मेरे बच्चों के साथ हैं और मेरे बच्चों और बुजु़र्गों की आशीषें मेरे साथ हैं। बोलो दादी भगवान की जय।

।। है ही भगवान ।।

Events

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लाल लोई"

आज लाल लोई का दिन है । आज भक्त प्रहलाद का दिन है । भक्त प्रहलाद की भक्ति का दिन है । आज के दिन अलौकिक अधबुद चुनरी ने भक्त प्रहलाद को कवच के रूप में अग्नि के घेरे से बाहर निकाल अपनी प्रभु से मिला दिया । भक्त की लाज रखी, प्रेम देखा, अधबुद् चुनरी ने अपना खेल खेला । भक्त का मान सन्मान अपने भगवान के ऊपर रहता है । भक्त surrender कर देता है, वो मान अपमान में, दुख सुख में, सम्मान भाव से रहता है । लेकिन भगवान अपनी दृष्टि से, अपने प्रेम से, अपने बच्चों पर अपनी चुनरी का कवच डालकर भक्त को हर दलदल से, संसार से ऊबड़ खाबड़ रास्तों से उसे बाहर निकालके खुद में समा देता है । ये प्रीत की रीत है ।

शरण पड़े की लाज रखना कुदरत का धर्म तो है ही पर अति सुंदर प्रेम भी है । भक्ति में बीने रहो, अपने आत्म निश्चय में रहो, सत्संग के दायरे में रहो, सतगुरु कुदरत का धनी है, कुदरत की पूरी चुनरी कवच बनकर तेरे जीवन पर आ जायेगी और तुझे हर दुख सुख, गम खुशी, दलदल के घेरे से बाहर निकालके, तुझे मुक्त करके खुद में समा जायेगी । निराकार साकार होकर तुझे अपने गोदी में ले लेगा और उनकी गोदी छोटी नहीं । पूरी सृष्टि में उनकी गोदी है, जिसमें तू समा सकता है फकत अपनी ही लगन, अपनी ही लिंक,अपने ही प्रेम की जरूरत है । प्रेम करो परमात्मा से बाकी सब कुछ तुझे हाज़िर मिलेगा ।

प्रेम में हर चीज आपको filter होके मिलती है, हल्की होके मिलती है । प्रेम की कमी के कारण हर सुख तेरा भारी भारी है । प्रेम होने के कारण हर सुख हल्का फुल्का है । सुख तेरे लिए बोझ नहीं बनता, सुख में भी तू enjoy करता है, और दुख में धीरज करता है।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"लाल लाई की बधाई हो"

लाल लाई जी वधायु लाल

लाल लाई अचे, महींजा लाल, लाल थी वेंद आहिन

आज अपने को ढूँडो, आप भी लाल हो गए हो।
लाली मेरे लाल की, जीत देखूँ उत् लाल, लाली देखन मैं चला, तो मैं भी हो गयी लाल। अग्नि देव की जय कहो। मकर संक्रांत की आशीर्वाद शुभकामनाएं बधाई हो आपको। तिल खाओ, गुड़ खाओ, मीठे मीठे तिल khao, मिठा मिठा बोलो। White white मुली khao, मुली जैसे गुणकारी बनो, तिलों जैसे ताकत्वर् बनो, मकर संक्रांत की आपको आशीर्वाद है।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मकर संक्रांत (तिर मूरी)"

आज मकर संक्रांत, तिर मूरी का दिन है, आपको बधाई हो। तिल और मूरी खाकर त्यौहार की, त्यौहार के दिन की शोभा बढ़ाओ। तिल और गुड़ खाके मीठे हो जाओ। मीठा-मीठा बोलो, मीठा-मीठा सोचो, मीठा-मीठा विचार करो। आसीसें आपके साथ हैं। हर दिन मनाओ, हर त्यौहार मनाओ, खुशियाँ करो, और खुशियाँ सबको बांटते रहो।

प्रेम में जो आनंद है, कहुँ कैसे कथा ये तो अनंत है। सत्य का सौदा तू ही करता है। सत्य का सौदा एक प्रेम का सौदा ही है। प्रेम के सौदागर कभी भटकते नहीं। हर वक्त उन्हें प्रेम के रास्ते, हर मुश्किल में सामने आते हैं। प्रेम की दिशा खड़ी हो जाती है और जो आपके हृदय में प्रेम है, तो आप हर दिन, हर त्यौहार में अपना प्रेम आगे रखते हो। हर त्यौहार पर कोई न कोई नफरत मिटाओ, कोई न कोई राग द्वेष मिटाओ। तेरा दिन और त्यौहार सफल हो जाएगा।

पाँचों तत्वों का आपको आसीस होगा और प्रकृति मांँ हृदय से आपको धन्य-धन्य कहेगी कि मुझे भी मेरे बच्चे हल्का करते हैं और खुद को भी हल्का रखते हैं। आपका राग, द्वेष, नफरत, जो भी मनुष्य की दलदल है, वो प्रकृति को भी भारी-भारी कर देती है। माँ प्रकृति भी खुश होती है जब तू नफरत छोड़कर, राग द्वेष छोड़कर, impression, उसूलों से ऊपर उठकर, तू कोई त्यौहार मनाता है, तो कुदरत भी तेरी खुशियों में चार चाँद और भी लगा देती है।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"मकर संक्रांति के दिन की महिमा क्या होती है"

तिल खाके अपने गर्मी पद पर आ जाओ। सबसे तेरा पद ऊँचा है। अपने ऊंचे पद पर आ जाओ, आत्मा में आ जाओ। देह- अध्यास छोड़के गुरु शरण में आ जाओ। तिलों में इतनी गर्मी होती है। और मीठा खाओ, मीठे बन जाओ। ऊंचे पद पर आने के बाद मीठा होना ज़रुरी बन जाता है। इसीलिए तिलों के साथ मीठा भी जोड़ दिया। ऊपर जाओ, गर्मी में आ जाओ। आत्मा की गर्मी सबसे बढ़कर गर्मी है। आत्मा का निश्चय सबसे तेज़वान निश्चय है। इतना तेज़ निश्चय गुरु कराए तो मीठा तो होना ही पड़ेगा ना। गुढ़ खाओ, शक्कर खाओ, तिल खाओ, मीठा मीठा बोलते जाओ, मीठे मीठे कर्म करो, यही संक्रांती का विशेष दिन है कि तू सबसे मीठा मीठा प्यार कर। जिससे नहीं बनती है उसको गुढ़ तिल ज़रुर खिला और झपकी लगा अपने अज्ञान से। अज्ञान में तू सोया है तो उठ नहीं पाता ज्ञान में। अब ज्ञान में उठने के लिए अज्ञान को तो भूलना ही पड़ेगा। आज संकल्प ले लो कि मैं अपने ही अज्ञान से उठकर, अपनी आत्मा में आता हूं और मकर संक्रांति मनाता हूं।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शिव"

आज शिवरात्रि है, सभी को शुभकामनाएं । शिव रात्रि की मुबारक बात ।

शिव शक्ति है । शिव भक्ति है । शिव शांति है । शिव संतोष है । शिव सद्भावनाएं हैं। ऐसे भगवान शिव को जानने से तेरे में भी उसी की शक्ति आती है । शिव शक्ति का सागर है, तू भी उसी सागर में जब उतरता है तो शक्ति का भंडार बन जाता है । जब कभी आलस हो, सुस्ती आ जाए, नीरसता आए, ॐ नमः शिवाय, थोड़ी सी धूनी लगा दो, आलस आलस ना रहेगा, तू active बन जाएगा ।
शिव तेरे भीतर है, शिव बाहर है, शिव तेरे आस पास है । शिव कहां नहीं है, जड़ चेतन, भक्ति भाव में, भगवान शिव को आप खुद में पाओगे ऐसी आराधना आज भगवान शिव की हो जाए तू उसीका परमात्मा के रास्ते का पुजारी बन जाए । आप विसर्जन होए सिमरन करिए सोए ।

शिव रूप जानो गुरु विष्णु के स्वरूप है । साक्षात ब्रह्म जानो लिखा है पुराण में। तू ही सागर तू ही किनारा ढूंढता है तू किसका सहारा, जब है तू शिव का दुलारा ।

भगवान शिव का आदर्श महसूस करो, सबको प्यार । ना नीच देखे, ना ऊंच देखे, हर मनुष्य सृष्टि के कण कण से प्यार ये है भगवान शिव का सिंगार । सत्यम शिवम और सुंदरम जानो तो दिल बहार हो जायेगी ।

भगवान शिव पर जल चढ़ाओ तो मन की मैल उतर जायेगी । आज शिव रात्रि है, लेकिन हर दिन चढ़ाना चाहिए । भगवान शिव के आगे दीया जलाओ तो मन में तेरे अंधेरा रहेगा नहीं । भगवान शिव पर थोड़ा सा दूध चढ़ाओ तो तू अतृप्त रहेगा नहीं । फूल चढ़ाओ तो तू खुद फूल बन जाएगा । दतुरा चढ़ाओ तो तू कांटों और फूलों से प्रेम करने लगेगा ।

हर दिन की अपनी महिमा है । आज शिव भक्ति का दिन है, शिव भक्ति ज़रूर करना । सब दिन का महत्व जानो और अपनी आत्म पूजा को पकड़कर हर दिन की शुरुवात करो। पूजा करो, प्रेम करो, दिन मनाओ, त्योहार मनाओ मगर आदर्शों से । आदर्श के विरूद्ध कुछ न करो । आदर्श है तो जीवन है । आदर्श नहीं तो कुछ भी नहीं ।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Happy Happy Happy Shivratri"

।। ॐ नमो शिवाय। हर हर महादेव की जय ।।

आज शिवरात्रि के दिन आप सबको बधाई होवे, भगवान शिव की आसीस होवे। दाणा-पाणी मेरे सतगुरुदाँ कोई खावण वाला खाए। प्रशाद भी वड्भागी के मुख में आता है। वो वड्भागी तू ही तो है। तू ही सागर, तू ही किनारा, ढूंँढता है तू किसका सहारा। शिवरुप तू भी तो है। शिव शिव है, भगवान शिव है, पर तू भी तो उसका ही रुप है। जब तू उसका ही रुप मानता है तो तू शक्तिशाली हो जाएगा। अपने में उनकी ही शक्ति को महसूस करो तो तू भी वो ही सागर है, सागर बन जाएगा।

शिव प्रेम है, शिव खाली है। तू भी अपने को खाली करता जा। राग से, द्वेष से, उलझनों से, दलदल से, नफरत से। Impression न बना, इच्छा ना रख। जीअ हलाईं तीअ वाह-वाह। वाह-वाह करके चलते हो तो तू सत्य का सौदा भी कर सकता है। वर्ना सत्य तेरे से दूर हो जाता है। सत्य को जानो। खुद में मानो, सर्व में देखो। देखना सर्व में है। Practical सर्व में रुककर कर सकते हो, अकेले में नहीं। जब तू किसी के साथ रुकेगा, तब तो तेरे राग द्वैष का पता पड़ेगा। रुकेगा नहीं तो कैसे पता पड़ेगा। इसीलिए सबको प्रेम करो, अपना लक्ष्य बना लो कि मुझे प्रेम करना है। थकान से ऊपर उठो, अपने हृदय से गुरु के वचन लगा लो।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हमारे बच्चे - Exam Vachan"

हमारे बच्चों की पढ़ाई चल रही है, अब पढ़ाई के दिन है, exam की तैयारी चल रही है । कीअं आयो लाल, हमारे शेर बच्चे आप कैसे हो ? आपकी पढ़ाई अच्छी चल रही है ? अच्छी चलनी ही चाहिए, क्योंकि तू होनहार बच्चा है । तेरी पढ़ाई अच्छी चलनी ही चाहिए क्योंकि सरस्वती माता की आशीश बच्चों पर हर वक्त हर दिन हर वेले हर घड़ी रहती ही है । थकान बच्चों की डिक्शनरी में होनी नहीं चाहिए । अथक होके तू जब पढ़ाई करता है पढ़ाई भी तेरी अच्छी होती है और तू अपने ही हृदय से अच्छी पढ़ाई करके satisfy रहता है । मन में खुशी भी आती है कि मेरी आज पढ़ाई अच्छी हुई । अच्छी पढ़ाई नहीं होती इसके कारण क्या हो सकते हैं ?  सबसे पहला कारण है कि बच्चों का कहीं न कहीं टाईम waste हो रहा है । बच्चों को सुजाग रहना चाहिए कि समय waste न करो घड़ी घड़ी घड़ी देखो, कौन से period में मैंने कितनी पढ़ाई की, कितना enjoy किया । Enjoy करने के लिए, अपनी पढ़ाई की थकान को मिटाने के लिए कभी-कभी आप थोड़ी बहुत टीवी देख लेते हैं, लेकिन वहां पर exam के दिनों में टीवी देखना समय को बर्बाद करना है बच्चों । नामरूप जो तूने टीवी में देखा वो दिमाग में आ ही जाता है घूमता रहता है मन कहता है और देखूं , इसीलिए थकान तो मिटती नहीं बच्चे और थक जाते हैं ।  टीवी न देख कर आप आसमान में तारे देखो, चांद देखो, भगवान सूरज को नमस्कार करो कि वो आपको सही दिशा दे, चलने की शक्ति भी दे, थकान मिट जाएगी तेरी पढ़ाई अच्छी हो जाएगी समय बर्बाद होने से बच जाएगा । जल देवता को हाथों में रखकर, आंखों में छीटें डालो । साफ-सुथरे पानी से अपने मुंह को सफा करो,  मुख को साफ करो, आंखों को साफ करो,  एक positive energy आप में दौड़ने लगेगी ।  जल देवता की भी आशीश हो जाएगी । पृथ्वी को प्रणाम करो । मां पृथ्वी को अरदास करो कि मैं थक गया हूं मेरी अच्छी पढ़ाई कर दे, वो करा देंगे । धरती मां से आशीश लो और पांवों छुओ,  थकान मिट जाएगी टीवी देखने से नहीं इन बातों से सब थकान मिटेगी । जब तू सही दिशाओं में चलता है, तब तेरी study बहुत अच्छी होती है और तुम परीक्षा में सफल भी हो सकता है, खाली पास होना नहीं है बच्चों को पर अच्छी percentage में पास होना है आगे जाना है क्योंकि तू परिवार का लाडला है, देश का सिपाही भी है, मेरा साथी भी तो है ।  आप बच्चों को बहुत सारे कार्य करने है लेकिन सबसे पहला कार्य है पढ़ाई, अच्छे से पढ़ाई करो थकान को अपनी जिंदगी में जगह न दो और जब भी थक जाओ बोलो मैं देह नहीं मैं तो ब्रह्म स्वरूप हूं मैं तो आत्मा हूं, मैं पढ़ता नहीं हूं मैं लिखता नहीं हूं उंगलियां लिख रही है दिमाग पढ़ रहा है भगवान आशीश दे रहे हैं मैं कुछ नहीं करता मैं कुछ नहीं करता सब हो रहा है चल रहा है, ऐसी feeling रखने से आप अथक बन जाओगे ।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बच्चों की पढ़ाई में रुकावट - Exam Vachan"

कभी-कभी बच्चे कुछ बातों को लेकर पढ़ाई में रुकावट महसूस करते हैं । उस एक ख्याल का उनकी पढ़ाई पर अच्छा असर नहीं पड़ता, बुरा असर पड़ जाता है ।  जब बच्चे महसूस करते हैं कि मेरे घर का वातावरण शांत नहीं है, हम पढ़ाई कैसे करें ?  शोरगुल है । कभी-कभी घर ग्रहस्त में थोड़ा बहुत आवाज होता है, उनको शांति चाहिए । अच्छी बात है शांति में पढ़ाई अच्छी होती है । पर जे शांति नहीं मिलती तो भी अशांति में शांति ढूंढना बच्चों की ताकत है ।  छोटी मोटी बातों को परीक्षा के दिनों में पीछे फेंक दो अपने मन से न लगाओ ।  परीक्षा के बाद सोचा जाएगा कोई टेंशन आता है उसको भी पीछे फेंको, पहले पढ़ाई तो करूं, exam तो दूं, टेंशन भी दूर कर दूंगा । अच्छी उम्मीद रखो लेकिन पढ़ाई में disturb न होने दो ।  नसीब पर भरोसा रखो, उससे ज्यादा भरोसा अपने पुरुषार्थ पर रखो, अपनी मेहनत पर रखो, मेहनत लगन अगर आपकी भरपूर है तो किस्मत में तेरे नसीब में चार चांद लग जाएंगे । साथ देगी अगर तेरी feeling तेरे को अच्छी अच्छी तो किस्मत और पुरुषार्थ भी साथ देगा । अच्छी feeling रखना तेरा स्वधर्म है कि मैं study के टाइम किसी भी बात का टेंशन न लूं आगे जो भी होगा देखा जाएगा । अगर आप अच्छे से exam की तैयारी करते हो, तो मेरा भी आर्शीवाद आपके साथ है कि Golden future is waiting for you । Golden future मेरे बच्चों का होगा जो अच्छे से पढ़ाई करके परिवार का नाम और देश का नाम और थोड़ा सा मेरा भी नाम रोशन करेगा । अगर आपको घर में पढ़ाई करते समय शांति नहीं मिलती,  घर में आवाजें हैं,  तो छोटा सा काम करो, cotton थोड़ा लेके अपने कानों में डाल दो, आवाजें कम हो जाएगी । वरना सबको  बोलते बोलते आवाज कम करो आवाज कम करो मैं पढ़ाई करूं बोलते बोलते गाड़ी निकल जाएगी, exam  हो जाएंगे पर तू बोलता ही रहेगा । इससे अपने रास्ते ढूंढना सीखो ।  कानों में cotton डाल दो आवाजें एकदम silence हो जाएगी । अगर आपको कोई personal  रूम नहीं है पढ़ाई करने के लिए, गम न करो फिर क्या हुआ personal कोना ढूंढ दो कोई न कोई घर में एक कोना मिल जाएगा, कोने की तरफ face करो, दीवार की तरफ face करो, Book रखो study करो पीछे की तरफ जो भी आवाजें हैं, जो भी बातें हैं, जो भी घर की हलचल है वो चलती रहेगी तेरी पीठ की तरफ तेरे आगे होगी तेरी पढ़ाई की टेबल । टेबल न मिले तो जमीन पर बैठो, धरती मां के गोदी में बैठकर तू book लेके अपनी study कर, मां धरती भी आपको आशीष देगी और silence देगी, अपने vibrations देगी । cotton डालो कोना पकड़ो, घड़ी घड़ी घड़ी देखो और अच्छे से पढ़ाई करो । यही मेरी उम्मीद है और आपके लिए आशीष है ।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Why Fear When God is  Near"

आज मेरे बच्चों के exam start हो गए । आज आपका पहला paper है, आर्शीवाद है आपको All The Best ।  सब अच्छा ही होगा, विश्वास रखो, अब तक जो पढ़ाई की वो बहुत अच्छी की ।  अब भगवान के ऊपर थोड़ा ध्यान देकर मन से डर निकाल दो ।विश्वास खुद में रखो जितनी भी पढ़ाई की है आपकी पढ़ाई में बरकत पड़ेगी । भरोसा रखो । आपके दिल दिमाग में हर सवाल का जवाब आ ही जाएगा क्योंकि आपने पूरे साल में हर पढ़ाई की है, हर चीज को turn तो दिया ही होगा, फिर वो कहां गया ?  तेरे भीतर है, exam में वो आपे ही निकलेगा, चिंता बिल्कुल न करो, खुशदिल होकर exam दो । आप देखना result भी जो आएगी आपको खुश कर देगी । डरो नहीं । Question paper हाथों में लेते समय भगवान देखो । सबसे पहले भगवान देख कर उसको ही प्रणाम करो । Question paper पर जब आप दृष्टि डालते हो, एक नजर डालते हो, कई questions आपको आते हैं,  आप खुश रहते हो कि मुझे सब आ रहा है । लेकिन कभी कोई ऐसा छोटा-मोटा question आपको दिखाई देता है कि शायद यह मुझे नहीं आएगा, उसको side रखो ,  वो आएगा क्योंकि तूने उसी question की भी पढ़ाई तो की है ना, लेकिन उस question पर अटक के खड़ा रहना, जो आपको नहीं आता ये सही नहीं है । उसको side करो और जो आपको आते हैं, जिनके जवाब आते हैं उनके answer साफ-सुथरी writing  में दिल दिमाग को ठंडा करके speed को fast करके अपने काम में आगे बढ़ते जाओ लिखते जाओ बिना time waste किए, बिना यहां वहां देखते हुए, आप उन question ओं को पहले पूरा करो जो आपको आते हैं, जिनके answer आप easily लिख सकते हो, उसको जल्दी पूरा कर दो और बाद में वो भी questions के answer आपको आ ही जाएंगे, जो आपको नहीं आ रहे थे । ये भगवान देखो, परमात्मा आपके हृदय में दिमाग में वो जरूर कुछ देंगे जो आप वो भी लिख सकोगे, ऐसी अच्छी उम्मीद रखो will power रखो, शांत मन से आप अपने paper को आगे बढ़ाते जाओ जब तक समय है, लिखते जाओ । कभी भी हार न मानो । Handwriting अच्छी रखो, clear रखो, pen  बराबर रखो, pen में भगवान में विश्वास रखना ये भी आपके लिए सही होगा । अपनी उंगलियों को भगवान देखो, कभी भी न थकेगी और वह बराबर कार्य करती ही जाएगी । All the best, All is well ।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan - Sunday"

मेरे प्यारे बच्चे , किए आयो लाल
आप कैसे हो ? आपकी पढ़ाई अच्छी चल रही होगी , यही मेरा विश्वास है , आशीर्वाद आपके साथ है। बच्चों को अथक होके अपनी study करनी है , थकान शब्द भी आपकी dictionary में नहीं होना चाहिए जब थकान आए तो आप पानी पी लो, आसमान देखो, किशमिश खा लो। किशमिश कभी नहीं थकती, आप जितनी भी खाओ अच्छी लगती है, आपको वह अथक बना देगी थोड़ी सी किशमिश के दाने खा लो और थकान मिटा के फिर से पढ़ाई करो। आज Sunday है,जरा संभाल के, exam के दिन है, exam की तैयारियां हो रही है और आज Sunday, आपका time waste हो सकता है,‌ लेकिन करना नहीं है। आप कुछ गलत खा सकते हो ऐसा जो आपको भारी बना दे , heavy कर दे लेकिन आपको exam के दिन में हल्का हल्का खाना खाना है। भारी-भरकम आपके burger pizza exam के बाद enjoy करना , लेकिन अभी हल्के हल्के खाना है। सब्जी रोटी खानी है। Juice पीनी है ,दूध पीना है और अथक रहना है। ना सर में दर्द ना पेट में दर्द । ऐसी खुद की संभाल करनी है और अच्छी पढ़ाई करनी है । बच्चे जब अच्छी पढ़ाई करके exam देकर अच्छी result देख कर अपने घर परिवार में आते हैं तो कितनी खुशी होती है । उस खुशी को पाने के लिए थोड़ा सा परेज करना जरूरी है । Fun- Feast ना करो Time pass ना करो । इन दिनों में समय की कदर करो, समय देवता भी आपको आशीष करेंगे और आपके लिए अच्छा सारी प्रकृति में होगा। मां प्रकृति भी भीआपका साथ देगी और exam आपके अच्छे जाएंगे तब जब आप पढ़ाई अच्छी करोगे।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan"

 

" है ही भगवान "
आज बच्चों का exam का दिन है , बच्चों को मेरी आशिर्वाद है। All the best , All is well . Why fear God is near . आपकी‌ मेहनत आपके साथ है ,संकल्प अच्छा रखो , अच्छे संकल्प में शक्ति है। कभी भी अपने मन‌ को discourage नहीं करना है। बोलो अच्छा होगा, अच्छा होगा ,जरूर अच्छा होगा। अच्छा होके रहेगा। हम भी उम्मीद करते हैं ,आशीर्वाद भी देते हैं कि ‌आप Question paper जब आपको मिलेगा, आप खुश हो जाओगे कि मुझे तो सब आता है। और answer लिखकर, पेपर दे कर, आप झूमने उठोगे। झूमते हुए आप घर आओगे , सब को बताओगे कि हमने पेपर अच्छा किया। यही उम्मीद है और ध्यान दे दो, Attention हो जाओ , tension मत करो। No tension but attention। ज्यादा बातें मत करो, शांत में रहो, ध्यान paper में रखो, कहीं भी उधर उधर ध्यान ना भटकाओ ,और जो आपको आता है, वह जल्दी जल्दी easy easy लिखते जाओ। जो नहीं भी आता है, उसकी तरफ ध्यान मत दो, जब तक तू लिखेगा दूसरा तब तक वो भी आ जाएगा। ऐसी अच्छी भावना रखो, अपनी study के लिए। आखिर आपने पूरा साल study किया है, अभी भी मेहनत की है, घबराने वाली कोई बात ही नहीं है।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan"

है ही भगवान बच्चों ,  आज आपका exam ( एग्जाम ) का दिन है , All the best ,  आशीर्वाद है । सभी बच्चों के सर पर मैं हाथ रख रही हूं , आपका paper  ( पेपर ) अच्छा हो ,  आपके लिए अरदास करती हूं  लेकिन आपको हिलना ,  डरना ,  discourage ( डिसकैरेज ) होना बिल्कुल भी नहीं है । शान मान से paper ( पेपर ) देकर आओ , प्यार से जाओ  और प्यार से आ जाओ । कहीं कोई भी आपको ख्याल आए , है ही भगवान बोलकर , उस ख्याल को पीछे रखो कि मेरा सब अच्छा ही होगा । मन का स्वभाव है ,  अच्छे से बुरा निकाल देता है क्योंकि मन थका हुआ है । आपका मन कभी exam के दौरान कुछ ऐसी वैसी बातें बोल भी दे तो आप समझो वो छोटा बच्चा है और वो  थक गया है इसीलिए ऐसी बातें करता है , लेकिन मेरे सतगुरु ने कहा है exam ( एग्जाम ) बहुत अच्छा होगा तो अच्छा ही होगा । मेरे ऊपर भरोसा रखो , अपने ख्याल पर नहीं , ठीक है । है ही भगवान , खुशी-खुशी जाओ और खुशी-खुशी आ जाओ ,  खुश रहो ।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"10th Exam Vachan"

है ही भगवान
आज 10th के बच्चों के exams शुरू हो रहे हैं, बच्चों को हमारी तरफ से शुभकामनाएं आर्शीवाद है,सारे बच्चों all the best, all is well । हिमथ कायम रखनी है , डरना नहीं है , exam पे जाते वक़्त या exam के देने वक़्त, जब exam चालू है तो भी Why fear God is Near, पढ़ाई करो तो भी ये महसूस करो कि God is near, थक जाओ थोड़ी सी किशमिश खाओ थक जाओ आयो लाल कयो झूलेलाल, थोड़ा सा जल ग्रहण करो दो । Tension आता है जब exam के चलते चलते दिमाग कुछ सोचता नहीं है तो दिमाग में भी भगवान देखो, जो पहले आपको आता है वो लिखते जाओ, तब तक आपे ही दूसरा भी आ जाएगा, इंतज़ार न करो बैठके सोचो विचारो नहीं कि अब मैं क्या लिखूं , जो आता है आगे आगे काम करते जाओ l उंगलियां थक जाती है ऐक वारी हाथों पर दृष्टि रखो जैसे भगवान आपके ऊपर दृष्टि डाल रहे हैं, पेन में भगवान देखो, पेपर में भगवान देखो, जहां आप बैठे हो वहां भगवान देखो, हर चीज में भगवान देखो, हिम्मत बनी रहेगी, शक्ती आती रहेगी continuous परमात्मा तेरे साथ है, No Tension पर attention जरूर होना है।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan"

आज बच्चों का पेपर है, आशीर्वाद है मेरे बच्चों । All The Best । खुशी-खुशी जाओ मस्त पेपर देकर आओ । किशमिश खाकर जाओ, भगवान सब में देखो और अच्छे से पेपर करो । मेरा हाथ आपके सर पर होगा आप सब अच्छे से लिखेंगे विश्वास रखो ।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan - Exam Day"

बच्चों Good Morning. Happy Happy Exam । आज आपका exam है, study चल रही है । आशीर्वाद है, All The Best । सफल होगा तेरा exam । सफल होगी तेरी study । No Tension But Attention ।

आशीर्वाद तो प्रकृति माता का आपके ऊपर है ही है । पेन, आपके हाथ, आपकी दिल, आपका दिमाग सब आपके favour में जाएगा । आपका ही फायदा करेगा । आपको अच्छा रास्ता दिखाएगा । सब आपके साथ है पूरी प्रकृति आपके साथ है । Why fear God is Near । Nervous होना नहीं है, strong होना है । मेरे बच्चे कभी nervous नहीं होते, हमेशा strong होते हैं । बस बाकी थोड़ी time की बात है बहुत सारे पेपर तो चले गए अब तो बाकी थोड़े ही है । इज्जो वया, इज्जो पूरा थ्या ।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"SSC Xth Board Exam"

SSC Xth के बच्चों को मेरी शुभकामनाएँ, आशिर्वाद है। Why Fear, God is Near ! Pen, Exam paper, आपके ह्रदय में, आपकी उँगलियों में भगवान बैठे हैं। डरो नहीं बच्चों, हिम्मत रखो, भगवान साथ हैं। डर से, की हुई पढ़ाई भी दिमाग से निकल जाती है और जब डरते नहीं हो तो जो पढ़ाई की है, वो समय आने पर दिमाग में आ जाती है। इसीलिए मेरा आशिर्वाद है आपके paper बहुत अच्छे जाएँगे। आप ख्याल नहीं करो, किशमिश खाओ, पानी पियो और आसमान देखो, प्रकृति माता में विश्वास रखो और अपनी उँगलियों में भगवान ज़रुर देखना।

All The Best ! All is well ! Happy Happy Exam !

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan"

आज बच्चों का पेपर है
मेरी बच्चों को आशिर्वाद है
बहुत अच्छा जायेगा
Why fear ?
डरो नही
हिमतवाले बनके जाओ
समय भी आसीस करेगा
जड़ चेतन हर चीज आसीस देगी क्योंकि आप मन मे संकल्प करके जाओ की मैं भगवान का ही बच्चा हू
Happy happy exam
All the best
All is well
शेर बच्चों जाओ, exam देके आओ फटाफट ।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Exam Vachan"

आज बच्चों का पेपर है
है ही भगवान
अच्छा हुआ ,अच्छा होगा, शेर बच्चे मेरे शेर बनके जाओ औऱ paper देकर फटाफट आओ
है ही भगवान
All the best
Aal is well
भगवान साथ में है

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"हैप्पी होली"

होली की आपको शुभकामनाएं ।आशीर्वाद है, होली प्यार से खेलो, मोहब्बत से खेलो, इमोशन से मत खेलो। इमोशन डिजीस, इमोशन बीमारी है । होली का त्योहार वैसे भी आपको थोड़ा बहुत इमोशनल तो बना ही देता है। फिर भी संभाल करनी है इमोशन में आना नहीं है तो सुजागी में रहना है, बैलेंस में रहना है, प्यार में रहना है, एक दूसरे की इज्जत रखनी है, इज्जत के साथ होली खेलो। होली कहती है, “हो गया तू भगवान का”। भगवान के रंग में खुद को रंग ले। भगत प्रलाद् का भी मिसाल, उसकी भक्ति का आदर्श अपने साथ रखो।बताओ प्रेम का रंग, चढ़ाव सतगुरु के आदर्शों का रंग, चढ़ाओ समानता का रंग, चढ़ाओ ठंडा जल, थोड़ा सा डाल दो एक दूसरे पर, तू भी ठंडा मैं भी ठंडा। हो गई होली ॥ हर त्यौहार आदर्श के साथ मनाया जाता है, तो त्यौहार की खुशियों में चार चांद लग जाते हैं। तू ठंडा जल डालता है, मीठा खाता है, खिलाता है, त्यौहार भी ठंडा और मीठा बन जाता है। वह दिन भी आपके लिए मीठा और ठंडा बन जाएगा। हर एक से प्रेम होगा, भगवान साथ होगा, कदम कदम पर भगवान देखो, भगवान के अलावा कुछ ना देखो॥

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"होली"

आज होली की सभी को शुभकामनाएं, सभी को आशीर्वाद, होली खेलो, खुशियां मनाहों, सबको प्रेम करो, खास करके उसको प्रेम करो जिससे तेरा मन मुटाव है, नफ़रत की आंधी को आज समेट लो, प्यार मैं बदल दो, होली मना खुशी, सची खुशी, आत्मा और जीव के मिलाब से होती है, जीव जीव न रहे ईश बन जाए ऐसी खुशी मना लो, सब मे वसे तो साई घट वद छो केंखे बाईं। सब एक दूसरे को इतना प्रेम करो की संसार तेरे प्रेम को देखकर भी तुझे आसिस दे की ये कौनसे बच्चे है जो इतना प्रेम मै भरपूर है।
"दिलरी लगी वई मुझिंजो मनरोह लगी व्यो,दिलरी लगी वई मुझिंजो मनरोह लगी व्यो, मनरोह लगी व्यो मंथार तोसा, होली खेल्या मां शाम तोहसा"

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"होली - आज पहली होली, होली का पहला दिन"

होली का त्यौहार भक्त की भक्ति को सिद्ध करता है। आज भक्त प्रल्हाद को याद करो, उनकी भक्ति को प्रणाम करो, उनकी भक्ति के आदर्शों को अपना लो। भक्ति है तो शक्ति है। यही भक्त प्रल्हाद ने सिद्ध करके दिखाया कि भक्ति में कितनी शक्ति है। भक्त कभी हिलता नहीं, कुदरत पर भरोसा है उसको। भक्त कभी हालतों से घबराता नहीं, क्योंकि श्रद्धा और विश्वास उसके साथ हैं। भक्त कभी खुदको अकेला महसूस नहीं करता क्योंकि जिस ऊपर तेरा हाथ है स्वामी वो अकेला कैसे हुआ।

पल-पल भगवान अपने भक्त के साथ रहता है। हालत आई भक्त प्रल्हाद की भक्ती को भगवान ने सिद्ध कर दिया। उनके ऊपर अपने प्रेम से चुनरिया डालकर उनको ढक दिया और हालत से, आग से, ज्यूं का त्यूं बचा दिया। भक्ति में शक्ति है, भावनाओं में भक्ति है। अपनी भावनाओ को शुद्ध, साफ-सुथरा, पाक-पवित्र रखो और भक्ति की राह पर चलो और खेलो आज होली।

रंगवाले अब देर क्या है, मेरा भी चोला रंग दे ! श्याम रंग रंग दे, राम रंग रंग दे! भक्ति का रंग रंग दे, धीरज का रंग रंग दे! संतोष, नफरत से दूर, प्रेम रंग रंग दे! ऐसे रंगों से मेरी भी चुनरिया रंगके मुझे ढक दे, ताकी मैं तुझमें समा जाऊँ और खुदमें तुझको पाऊँ। यही मेरी भीतर की भक्ति की, शक्ति भी होवे, चाहना भी होवे, लग्न भी होवे, बेड़ा पार है। आप सबको होली की बधाई है! मिठाई खाओ और खिलाओ, लेकिन सबसे पहले आप जिसको पसंद नहीं करते हो उसीको खिलाओ। जो तेरे लिए नफरत का डेर है, वहीं पर मिठास फेंको, वहीं पर मिठास खिलाओ। थोड़ासा मन को मोड़ो और अपने आदर्शों से खुदको तृप्त करो।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दूर्यो - आज होली का दूसरा दिन, दूर्यो"

नफरत से दूर रहो और दूर्यो मनाओ। आज दूसरा दिन मनाओ, दूर्या है। नफरत से दूर होके मनाओ, प्रेम को पकड़के मनाओ। आज आप खेलते हो गुलाल से, खेलो। गुलाल - वैसे गुलाल से खेल सकते हो लेकिन ज़रा संभालके। क्योंकि तू खुद गुलाल है। गुरु का लाल है। तू खुद गुलाल, गुरु का लाल। तू गुरु का लाल बनकर, तू खुद ही लाल है, सब रंग तेरे ऊपर हैं, लाल रंग आया, तो सारे रंग तेरे ऊपर छाने लगते हैं। खुश रहता है तू गुरु का लाल बनकर। होली खेलो, घूमो फिरो, मौज करो, अपनी मर्यादाओं को न भूलो, अपनी चद्दर से खुदको ढकके होली खेलो। चौ तरफ तेरी दृष्टी होवे, आदर्शों के साथ होली खेलो, दूर्या करो, सब कुछ करो। पूरी ज़िंदगी तुम्हारी है लेकिन आदर्शों के साथ। ऐसी चीज़ों का इस्तेमाल न करो जो तेरे आदर्श को खराब लगे और तेरा आदर्श तेरे से रूठ जाए। बड़ी मुश्किल से मिला यह सतगुरु का आदर्श। वो जीवन बना हमारा, अब उसको संभालना काम है तुम्हारा। सबसे प्रेम करो और सबको खुशियाँ बाँटो।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"होली अॾ दुरियों"

दुरिये ज्यूं खुशियों मनायो । प्रेम में सबनी खे पहिनजो कयो , अहिड़ो पक्को कलर चढ़ायो जो धोबी धोई न सगे , बॖयो कलर उन जे मथा चढ़ी न सगे । अहिड़ो गहिरो कलर , राम रंग , श्याम रंग , सतगुरु रंग , प्रेम रंग , उहो ही थी सगदो आहे , जैं सां पाण खे सजाइणो आहे । सजांया  त किंय सजायां ? छा कयां जो मां पाण खे सजायां ? सजायां पहिंजे अंदर जे त्याग सा , सजायां पहिंजे अंदर जे वैराग्य सां। प्रेम बंधन जो धागो खणी , संसार जे जड़ चेतन खे पाण सां मिलाए , पाण खे उन सां मिलाए हिक करयां । मनुष्य जन्म जी     पहचान सतगुरु दिॖनीं । जन्म मिलयो  केतरी तकलिफुन सां, माता जे , पिता जे महिरबानियुन सां, मनुष्य जन्म मिलयो , सतगुरु जे कुरब सां ज्ञान मिलयो , भगवान मिलयो ,छो ना मां पहिंजो फर्ज पूरो करे , पाण सुञाणण जो , पाहिंजे मथां उपकार कयां ? भगवान श्री कृष्ण वादो कयो संकट में साथ दिंधा। मनुष्य भी वादो कयो , नाम जपिंदुस तुहिंजो , गीता जो ज्ञान कडीं न बुलंदुस । मां देह न  आहियां , मां पाण खे आतमा दिॖयाणा , पहिंजी मंजिल पछाणियां , इहो भी मनुष्य जो वादो ही त आहे। वादा पूरा करण खां सिवाय , मनुष्य जी सजावट थीयणी न आहे, डव थियणो न आहे , आखिर डव कियं थे , जो भव लय ।डव थींदो न , भव लहिंदो न ,  भव लहिंदो न , प्यार किंय थींदो  । सडेॖ संसार खे हिक बाकुर में बरणो आहे , पाण ते महिर करे, संसार खे खुश रखी सगजे थो, थोड़ो , थोड़ो , थोड़ो , थोड़ो  करे जे मनुष्य।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"चेटी चंड"

चेटीचंड की सभी को बधाई हो , सभी बच्चों को शुभकामनाएं । नया साल , नई उमंग , नई तरंग , नई भावनाएं आप सब को मुबारक हो , खुशियां मनाओ । चेटीचंड , आयो लाल झूलेलाल के गीत गाओ , गुणगान गाओ । आज से दुर्गा अष्टमी , माता रानी के उपवास भी शुरू हो रहे हैं , उसके लिए भी आपको शुभकामनाएं , आशीर्वाद है । मां दुर्गा के नवरात्रे रखेंगे , आपको भी बहुत अच्छा लगेगा , शक्ति बढ़ेगी , शुद्धता बढ़ेगी , ज्ञान तो है ही है लेकिन भक्ति भी जरूरी है । ज्ञान बिना भक्ति कैसे आए तेरे ध्यान में  और भक्ति बिना ज्ञान कैसे टिक पाए तेरे निश्चय में ? ज्ञान और भक्ति एक दूसरे के पूरक हैं ,  या झूलेलाल भगवान के धूम मचाओ या माता रानी की तपस्या करो , आनंद , आनंद , आनंद पूरे वायुमंडल में आनंद छा जाएगा , आपके भीतर भी आनंद आएगा । "उहा खबर को लहनदो शेर , असुल  में मां आया केर" ? मैं कौन हूं  ,क्या हूं , तपस्या क्या है,  जब थोड़ी सी तपस्या , भीतर से निकलती है  तो ही तू जान पाता है कि गहिरी शांति किसको कहते हैं । गहिरी शांति अपने तप  में भी है ।  बल , तप   से ही आता है ,  तू बलवान बनता है , बुद्धिवान भी बनता है  , परमात्मा तेरे इंद्रियों में समा जाते हैं , दिल दिमाग में भी समा जाते हैं , भक्ति में जब झूमते हो तो  तेरे भक्ति में भी तेरी मंजिल तुझे दिखाई देती है कि है ही भगवान ।  झूमो , नाचो , गाओ और खुशियां मनाओ।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"चेटीचंड"

चेटीचंड जूं लख लख वाधायूँ।आज चेटीचंड है,खुशियां मनाओ,प्रेम करो।आयो लाल कयो झूलेलाल,लाल जा झाती सभई चओ झूलेलाल।झूलेलाल भगवान बहना सीखो,जल देवता से बहाव सीखो,बहते जाओ।प्रेम में बहते जाओ,ख्याल तेरे रुके हुए ना होवे,बहते हुए ख्याल हैं बस बहते जाए।जो तेरे लिए जरूरी नहीं है उनको बहाते जाओ,जरूरी ख्याल है practical रूप देते जाओ।अपनी जिंदगी को बहना सिखाओ रुकना तेरा शान नहीं है।झूलेलाल भगवान की आपके ऊपर आशीष है,दिल से उसके भजन गाओ आज के दिन,दिल से उनका प्रसाद उनका भोग आप भी ग्रहण करो।मंदिर में जाओ,माथा टेको,जहां तहां भगवान देखो।नाम कोई भी लीजिए ईश्वर तो है एक।जहां-तहां झूलेलाल भगवान देखो,वो आपकी हर तरह से संभाल करेंगे।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"चेटीचँड ज्यूं सबनी खे लख लख वाधायूं"

शुभकामनाएँ, आपके लिए नया साल मुबारक हो। नई मंज़िल मिलती है, नई राहें भी मिलती हैं, नई खुशियाँ भी मिलती हैं अगर तू खुदको हर दिन new महसूस करता है। इसीलिए दिन त्यौहार आते हैं, आपको new करने के लिए। मन भी new, स्वभाव-संस्कारों को भी new करो, अपनी राहों को भी new करो। पुरानी राहें छोड़ते जाओ, नई राहें लेते जाओ। मेरे सतगुरु मैं तेरे द्वारे आई, मैं तेरी ही राहों पे चलती रहूंगी। बिना ज्ञान हर कोई धोखा खाए, प्यासा आए प्यासा जाए। मगर मेरी प्यास सतगुरु ने बुझा दी। अंदर बैठ गए डेरा डालके, ज़र्रे ज़र्रे में दिखाया भगवान।

आज झूलेलाल भगवान, लाल साईं का दिन है। आयो लाल कयो झूलेलाल। जल देवता से बहना सीखो, निर्मल रहना सीखो, पवित्रता को प्राप्त करना सीखो। अपनी ज़िंदगी में बंदगी को जगा दो, भक्ति को जगा दो, दीया जलाओ, अपने इष्टदेव को नमस्कार करो। नमस्कार। नमन नमन सुख पावे। हाथ बांधके खाली नमस्कार नहीं होता। लेकिन तू निम्रता करता है, धीरज करता है, संतोष करता है, वो ही सच्चा नमन है। परमात्मा में भरोसा रखो और समरस रहो।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आज से नवरात्रि का शुभ आरंभ"

नवरात्रि की आप सभी को शुभकामनाएँ। बोल माँ दुर्गे, बोल माता रानी की जय। शक्ति का ध्यान करो तो तू शक्ति का सागर है। मांँ दुर्गा रानी शक्ति का स्वरुप है, तो उसकी भक्ति से, उसकी शक्ति से तू भी शक्ति का सागर बन जाएगा। लेकिन अपनी शक्ति को पहचानो। ज़र्रे-ज़र्रे भगवान कहाँ नहीं है, जहाँ भी हम देखते हैं वहाँ भगवान का ही वास है। नाम कोई भी लीजिए ईश्वर तो है एक। एक ईश्वर को सिद्ध करने के लिए कितनी सारी बातें तुझे करनी पड़ती हैं। एक ईश्वर को सिद्ध करने के लिए, अपने भीतर अंतर्मुखी होके झांकना पड़ता है। भीतर है सखा, तेरा सखा, मन लगाके देख। अपनी इंद्रियों को वश में करके तो देख। किस ओर तेरी मंज़िल, किस ओर तू जा रहा है, अनमोल तेरा जीवन, तू यूँ ही गवां रहा है। अपनी मंज़िल का ध्यान करो, अपनी मंज़िल की तरफ आगे बड़ो और मंज़िल को प्राप्त करने की इच्छा रखो, तेरा बेड़ा पार है।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"अष्टमी"

है ही भगवान बचो.हैप्पी हैप्पी हैप्पी अष्टमी।आप सब को आशीर्वाद,शुभ कामनाएँ।बोलो माता रानी की जय।जय माँ दुर्गे।है ही भगवान।आज अष्टमी है,झूमो पूजा करो,प्यार करो।माँ  दुर्गे शक्ति के सागर,शक्ति की अरदास करो और इच्छा न करो।शक्ति का सागर तू है।जब तू ऑल राउंड होता है,हर दिन मनाता है ,हर त्योहार मनाता है,हर दिल को नमन करता है  तो तू शक्ति का सागर है ।तू कुदरत में विश्वास रखता है,प्रेम करता है जड़ चेतन को तो तू शक्ति का सागर है।माँ दुर्गे के दर्शन मे देखो,कितना आनंद आ रहा है कितना अच्छा लग रहा है क्योंकि वो शक्ति के भंडार है ,तुझे भी भर देते है,प्रेम के भंडार है,तुझे भी प्रेम से वाक़िफ़ करते है अपने नयनों से,उनके नयनों में देखो,आपको प्रेम का सन्देश मिलेगा कि मेरे जगत में प्रेम करो,मेरे जगत को प्रेम से भर दो।सच्ची ख़ुशियाँ मनाओ आत्मा की,आत्मा के आनंद में रहो,एक दूसरे को अपनी शक्ति का एहसास दिलाओ कि तू भी शक्ति का सागर है।अष्टमी के दिन जितनी तू माँ दुर्गा से शक्ति माँगेगा सच्चे मन से,भक्ति मांगेगा  सच्चे मन से,तो वो शक्ति और भक्ति ज़रूर देते है,तू भी अपनी शक्ति और भक्ति का good use कर।positive mood रखो,positive कर्म में मन लगाओ।positive विचार रखो अपने ही आनंद में तुझे कई संकल्प सिद्धियाँ भी मिलती हैं कि तू जो संकल्प करेगा परमात्मा के रास्ते का,सत्य के रास्ते का,अपनी भक्ति के रास्ते का,भक्ति ले लिये तू जो संकल्प करेगा तेरा पूरा होगा. परमात्मा राहें,रास्ते,दिशाएं खोल देते है अपने भक्तों के लिए। 

ठार माता ठार पहिंजे बचरन खे ठार
ठार माता ठार पहिंजे बचरन खे ठार
अगे बि ठारियो माता हाणे बि ठार
हे लक लंगे बचा पवन्दम पार
ठार माता ठार पहिंजे बचरन खे ठार

वैसे तो माता रानी बचों को कोई तकलीफ़ नहीं है,ख़ाना पीना भोगना सब सुख उनको आप की तरफ़ से बहुत सारे है लेकिन हे  लक लांघे बच्चा पवन्दम पार,इसका हम ये समझते हैं कि बच्चे समय से पहले  जो इच्छाएँ करते है , समय से पहले हर चीज़ चाहते है , माँगते है ,वह उनके लिए problem बन जाता है ,लक बन जाते है ,वह समय से पहले संभल भी नहीं पाते है,इच्छा भी करते है ,धीरज नहीं आता है।माता रानी हम सभी बचों की तरफ़ से आप के लिये अरदास लेते है कि आप सभी बचों को धीरज दो, शांति दो,संतोष दो और अपनी भक्ति में रंग दो।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"बोलो माता राणीअ की जय। देवी माता जगद्म्भे मईया की जय"

आज अष्टमी का दिन है। माता की शक्ति आपके साथ है, भक्ति आपके साथ है, आशीर्वाद भी आपके साथ ही है। माँ दुर्गे का ध्यान धरो और शक्ति को बढ़ाओ। उनके ध्यान से आपकी शक्ति में कभी कोई कमी न रहेगी। भक्ति में जब जिज्ञासु झूमता है तो उसके भाग्य की लकीरें और चमकती हैं। एक तरफ ज्ञान का भंडार, एक तरफ भक्ति की शक्ति का भंडार। जिज्ञासु को और क्या चाहिए।

अपने निश्चय में आने के बाद पूरी प्रकृति माँ, पूरी ग्रहचारी तेरे सहयोगी बन जाते हैं। देव देवताए भी हृदय खोलकर उसी जिज्ञासु को आशीष देते हैं जो आत्मा का निश्चय करते हैं, जो गुरु वचनों में चलते हैं, जो गुरु की आज्ञा-चक्र में रहते हैं। देव देवताओं की भी उनके ऊपर महर, सतगुरु की महर, माँ प्रकृति की महर, गृह चारियों की महर, सब की महर से जिज्ञासु का जीवन चमक और धमक उठता है। निष्काम जीवन उसके ही हिस्से में आता है और निष्कामता से वो अपनी ज़िंदगी आगे बढ़ाकर, अपने आत्मपद् को पहचानकर, उसी में डटके रहता है और जीवन सफल बना लेता है।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"CA Exam Vachan"

है ही भगवान
श्री शारदा शरणम सत्संग CA वाले बच्चों के exam चालू हैं हमारी तरफ से सबि बच्चों को आशीर्वाद है , No Tension but Attention, मुस्कुराते हुए पेपर दे दो, exam दे दो मुस्कुराते हुए, तो result भी मुस्कुराती हुए आपके पास अवश्य आहेगी, इसीलिए मुस्कुराहो tension न करो attention होके पढ़ाई करो, आगे ईश्वर आपके साथ है, शुभकामनाए मेरी आपके साथ है, आशीर्वाद साथ है, सभी बच्चों की result जरूर जरूर जरूर अच्छी आहेगी लेकिन मुस्कुराते हुए पेपर दो, तो मुस्कुराते हुए result आ जाएगी

॥ है ही भगवान ॥

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"SSC Result Vachan"

है ही भगवान
बच्चों 10th के बच्चों की रिजल्ट है खुश रहो खुश खुश होके रिजल्ट देखो और खुश हो जाओ ऑल द बेस्ट , ऑल इज वेल, आशीर्वाद है मेरा सबकी रिजल्ट बहुत बहुत बहुत अच्छी आएगी ,आप हस्के मेरे को फोन करोगे ।

॥ है ही भगवान ॥

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Adhik Maas Ekadashi-Haridwar"

है ही भगवान
बोलो गंगा मैया की जय अधिक मास भगवान की जय हम हरिद्वार पहुंचे हैं अच्छा लग रहा है भगवान सब अच्छा ही कर रहा है अच्छा ही हो रहा है सभी यज्ञ मां कुदरत के सहारे दादी भगवान के आधार पर चल रहा है बहुत अच्छा लगा एक 8 घंटे दिल्ली में बिताए सत्संग हुआ प्रेम प्यार हुआ सभी संगत से जान पहचान हुई समय देव की कदर हुई कि कितने कम समय में कितना अच्छा सब हो सकता है फिर हम समय वेस्ट क्यों करते हैं जीवन के कुछ घंटे कुछ गड़ियां हम कहां बिताएं और सत्य का नगारा बजे उठे तो क्या खराबी है , प्लीज अपना टाइम वेस्ट मत करो , एनर्जी वेस्ट मत करो उसको बेस्ट करो, सारी सृष्टि तेरा ही तो इंतजार कर रही है कि कब मेरा यह बच्चा उठे और सबको प्रेम करें , अपनी स्थिति ऐसी बना ले स्थिरता को प्राप्त कर फिरता का लक्ष्य बना दे समान दृष्टि को समझ ले आत्मा का निश्चय ग्रहण कर दे मान ली कि तू देह नहीं तो ब्रह्म स्वरूप है ऐसी स्थिति में जब तू आता है तेरा भाग्य तो खुल जाएगा जो तेरे साथ चलेगा उसका भी नसीब खुलता हुआ दिखाई देगा क्या से क्या सतगुरु बना देता है तुझे पता भी नहीं पड़ता मां गंगा पर आप सभी की डुबकी लगाई कल मैंने सारी सृष्टि को निहार के इन अच्छे दिनों में मां गंगा की गोद में जब हम खड़े थे तो हमारी भी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था कुदरत ने कैसे खींच के अपनी गोद में रखा ये हम नहीं जानते न सोच थी न विचार था कैसे अपनी तरफ खींच लिया यह तो वही जाने आगे भी सब उसके हाथ में है हलाई त हला विहारी त मुहिंजी वाग सजन तुझे व स , यही विचार रखना है इसी विचार के सहारे अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाना है आप की डुबकी लगा रही हूं आज एकादशी है अधिक मास की एकादशी आप को शंडा डाल रही हूं , सारी सृष्टि में ठंडक आए यही कामना कर रही हूं बच्चों को अच्छी गाइडेंस मिले अच्छे होकर चले हर मनुष
हर प्राणी अपना जन्म सफल करें यही मेरी कामना है ।


॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"आयो लाल कयो झूलेलाल"


चालीहा साहिब जूँ लख लख वाधायूँ ,उडेरे लाल जी जय,अमर साहेब जी जय।चालीहा साहेब शुरू थ्यो आहे,पहिंजे जप ऐं तप खे पकडियो।
अच्छा लगता है जब तपस्या का मौका मिलता है ।आत्मा के निश्चय में हर चीज automatic हो जाती है , जब तप पूजा पाठ सब हो ही जाता है।सुजागी में रहना ज़रुरी है, सुजगी ये ही होवे कि मैं देह अध्यास में अटकू नहीं भटकू नहीं, मन की आवारागर्दी में कहीं उलझ ना जाऊं। हर वक्त हर समय अपने में संतोश करो। जब आवे संतोश धन ,सब धन धूल समान। अंतर मुखता में जो आनंद है कहूं कैसे कथा ये तो अनंत है। अपने अंतर मुखता में आ जाओ हर वक्त हर घड़ी तुझे सुजागी रहेगी और आत्म निश्चय easy हो जाएगा। easy easy easy करके देखो आत्मा का निश्चय तो तू हर वक्त देह अध्यास से ऊपर उठ ही जाएगा और तेरे जीवन में रौनक आ जाएगी।वैसे तो नशे अनेक है लेकिन ये नशा कुछ और है।अब इस नशे को थोड़ा ग्रहण करके देखो कि नाम खुमारी ननिका चढी रहे दिन रैन।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“रक्षा बंधन - भाई-बहन के प्रेम का बंधन"

आज रक्षा बंधन है। सभी को बधाई है। सर्व को दुआ है। खुश रहो, शाद रहो, आबाद रहो, मुस्कराते रहों। आपका त्यौहार बहुत अच्छी तरह से बीते, यही दिल से दुआ है। भाई-बहन का दिन - मर्यादाओं का दिन, मन को साफ करने का दिन, राग-द्वेष छोड़ने का दिन। कोई बहन आज भाई से ना रुठे, कोई भाई अपने बहन को आज दूर ना रखे। यही मर्यादा है, जो सबको निभानी है। उसी में सच्ची खुशी है।

आज का त्यौहार निरइच्छा होके मनाओ, तो त्यौहार में चार-चाँद लग जाएँगे। इच्छा ना रखो़, बस एक दूसरे को दुआएँ देते, प्यार करते, प्रेम की गंगा बहाते त्यौहार मनाओ। इच्छा ना रखो़। जो मिले सर-आँखों पर। न मिले तो बोलो भगवान ने किसी ना किसी रुप में सब दीया ही है। Love is oneway traffic. मैं खाली प्यार करुँ। आस ना करें और की, आप करे उपकार।

त्यौहार प्रेम के लिए करो, इच्छापूर्ती के लिए नहीं। अपने भीतर के भगवान को कभी ना छोड़ो। निश्चय नहीं होता तो मर्यादाएँ कहीं ना कहीं भंग होती है।
सबसे पहले अपना निश्चय, फिर चल तू संसार के हर कोने में, हर दिन में, हर function में, हर त्यौहार में। परमात्मा को साथ लेके चलो, हर चीज़ अच्छी गुजरेगी, हर बात अच्छी बनेगी, हर प्रेम Success होगा।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो। निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो। ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी, तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

॥ है ही भगवान ॥

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

" सारी संगत को अष्टमी की बधाई हो "

मांँ दुर्गा आशीष करती है, शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। Happy Happy Happy Happy अष्टमी। बोलो मांँ दुर्गा की जय। माता रानी की जय। शेरोवाली माता की जय।

शक्ति- भंडार है तू शक्ति का। जब तू सत्य का दीवाना है, सत्य को समझने लगता है, सत्य में खड़ा हो जाता है, तो शक्ति का भंडार है। वर्ना तू शक्ति कहाँ-कहांँ अपनी गवा रहा है, ये तू भी नहीं जानता। क्योंकि अज्ञान का मन, देहाध्यास का मन, अंधेरे में भटक रहा है। मांँ अंधेरों से निकाल देती है। घने अंधेरे में, रोशनी की एक किरण दिला देती है। तू रोशनी में आएगा तो सारे कार्य तेरे सफल हो जाएँगे। जन्म और जीवन भी तेरा सफल ही होगा। अपनी प्रालब्ध पर भरोसा रखकर, तू allround बन सकता है।

वर्ना प्रालब्ध का tension, व्यवहार का tension, परिवार का tension, संसार का tension। हर tension में तू कहीं न कहीं खड़ा हो जाता है, रुक जाता है। पर जब तू प्रालब्ध में भरोसा रखता है तो तेरे सारे tension निकल जाते हैं कि आगे-पीछे मेरी प्रालब्ध मेरे लिए आ रही है। फिर मैं क्यों सोचूं। असाँखें चिनता न काई आ छोजो भगवान वेठोई वेठो आ। मातारानी वेठाई वेठा आहींन। अपनी सारी चिंताएँ उनको देदो, सत्य को पकड़ो, सत्य के दीवाने बनो और प्रेम भक्ति जीवन में आगे बढ़ाओ।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Happy Happy Happy Dussehra"

दशहरा, दशहरे का त्यौहार तुझे याद कराता हैं के तुँ अपना आदर्श बना और अहंकार ना कर| अहंकार मनुष्य को गिराता हैं | चाहे वों कितना भी ज्ञानवान हों, धनवान-हों  यां  विद्वान हों पर अहंकार मनुष्य कों सुख़ नहीं देता, तकलीफ देता हैं|

दशहरे के दिन यह बात realise करो के तुझे गुरू की मत् लेनी हैं| जिंदगी में तूं कितना भी ज्ञानवान यां विद्वान हैं पर गुरूमत् जरूरी हैं| गुरूमत् के सिवाय मनुष्य आधा-अधूरा हैं| और आत्मज्ञान से भरपूर हैं| आत्मज्ञान में तूं त्रपत हैं| आदर्श कायम-धायम हैं, अहंकार नहीं आता, गुरूप्रेम में अहंकार को dissolve कराने का मौका मिलता हैं|

इसीलिएं दशहरे के त्यौहार पर यहीं शिक्षा लेंलो के तुझे निम्रता करनी हैं और देह की बातों से, तुझे ऊपर उठना हैं| देह की कोई भी बात आईं , सुख़ मांगा यां दुख़ मांगा, क्या-भी तुझे आयां, उसमें तूं अगर अटक गया तों फिर तेरे आदर्श उसूलों पर शांति का ठप्पा नहीं लगता| तूँ अशांत हों जाता हैं, और तेरे भीतर संतोषधन नहीं रहता|

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Navratri Vachan"

जगत पालन हार है माता,
मुक्ति का एक धाम है माता,
हमारी भक्ति का आधार है माता,
हम सबकी रक्षा की अवतार है माता!

श्री शारदा शरणम् सतसंग के बच्चों के तरफ से सभी विश्व-वासियों को नवरात्री की हार्दिक मंगल कामनाएँ और ढ़ेर सारी बधाईयाँ ! भगवान के विश्व के सभी बच्चे, नवरात्री में जगत जननी माॅं के समक्ष शीश झुकाकर उनसे आशीर्वाद लें। दुनियाभर की संस्कृतियों में ईश्वरीय शक्ति की कल्पना पुरुष स्वरुप में की गई है। जबकि भारतीय संस्कृति एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो ईश्वरीय तत्व की पूजा जगत जननी माॅं जगदम्बा, माॅं लक्ष्मी और माॅं सरस्वती के विभिन्न नारी स्वरुपों में करती है। शारदीय नवरात्र का यह लोक महोत्सव ज्ञान और भक्ती के माध्यम से हमें आनंदमय और सुखमय बनाकर अपनी मंज़िल के ओर आगे बढ़ने का संदेश देता है।

।।है ही भगवान।।

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

"Happy Happy Happy Dhanteras"

आप सबको हमारी तरफ से शुभकामनाऍं। सत्य का सौदा करनेवाले, सत्य को तू ही जानेगा। आज अपने मन को आत्मा की राह ज़रुर दिखा देना। असाॅं हटरो कडयो आहे हक्क जो, जिते सौदो थिये तो सच्च जो। जो चीज़ धीरज में मिलती है वह सत्य का सौदा है। जो चीज़ छीना-झपटी से दूर मिलती है, without छीना-झपटी मिलती है, वह सत्य का सौदा है, प्रेम का सौदा है। कस खाओ पर प्रेम ना छड़॒यो। आज की हमारी यही आशीष है।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"शरद पूर्णिमा"

परमात्मा का शौंक जब लगता है तो शक्ति बढ़ती है, आयु भी बढ़ती है। बल, बुद्धि, आयु को बढ़ानेवाले यह ब्रह्मज्ञान है। श्री शारदा दादी भगवानजी के यह ब्रह्मज्ञान को थोड़ा बहुत continue करते हैं तो शक्ति बढ़ती है। शरीर-रुपी गाड़ी को rough use करते हैं तो उसकी आयु कम होती है और उसको सहजता में रहकर हेलाओ- चलाओ तो आयु भी बढ़ जाती है।

आज चंद्रमा भगवान आए हैं। हम शरद पूर्णिमा में बैठे हैं तो शक्ति बटोरने, मज़बूत होने के लिए बैठे हैं ना ! गुरु वचनों से शक्ति मिलती है तो दिनों-दिन हम कुदरत के बहुत करीब आते जाते हैं। दिनों-दिन महसूस करोगे कि तू कुदरत का साथी है और कुदरत तेरा साथी है। शारदा दादी भगवानजी ने अपने वाणी से, vibration से सबको भर-भर के दिया।

"गुरु ने किया क्या हसीन करम, जो हम रहे ना हम, गम रहे ना गम।"

लगने लगे सब अपने, लगता न कोई पराया। ना मान अपमान रहता है, ना गम रहता है। सब अच्छा ही अच्छा लगने लगता है। जब मैं ही हूॅं जहाॅं तहाॅं तो पराया कौन? सब भेद-भ्रम मिट गया ।

।।है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Dhanteras - Happy धनत्रेधषी"


धनतेरस के दिन तू खरीदारी करना पसंद करता है। सोना, चाँदी, हीरा, मोती, कुछ भी। लेकिन विचारने रहता है कि मैं कुछ खरीदारी करूँ। क्यों न करो। सधाई करो। सतगुरु की भी आशीष है कि करो। लेकिन अपनी शक्ति अनुसार करनी चाहिए। अपनी चादर के अनुसार पांँव लंबे होने चाहिए। वर्ना ठंड लगने का इनकान रहता है।

सतगुरु सच्ची खरीदारी करा देते हैं-कि कयो मूँ संतन सा व्यापार। संतों से सच्ची खरीदारी होती है। संत बता देते हैं कि तू ही सोना है, तेरा मनुष्य जन्म हीरा मोती है। तेरा आदर्श चाँदी-सोने से कम नहीं, अगर आदर्श सत्य की तरफ़ तेरा बहता है तो। सच्ची धनतेरस मनाओ। खुशियाँ मनाओ। Tension ना करो। जो मिला, जो लिया, वो सब ठीक है। नहीं तो गुरु वचन तो लिए, पूरा प्रेम तो लिया, प्रेम तो दिया, सत्य का एहसास तो हुआ, सत्य का सौदा तो किया। सत्संग में सच्ची खरीदारी हो जाती है और तू शांत स्वरुप होकर दिवाली की शुरुआत करता है। सच्चे दीये जलाओं, सच्चा सोना खरीदो, सच्चा प्रेम करो। आज संसार को इसी सच्चाई की ज़रूरत है। तेरी सच्चाई से, समाज change हो सकता है, संसार खुश हो सकता है। जहाँ दुख-दर्द, पीडाएँ बड़ी पड़ी है, वहाँ किसी एक की सच्चाई संसार के लिए सफाई बन सकती है।

तेरा एक आदर्श संसार के लिए, सृष्टि के लिए एक pillar बन सकता है। ये न सोचो कि मैं अकेला क्या कर सकता हूँ? बूंद बूंद से सागर बनता है। तू एक में सच्चाई, सफाई, आदर्श बना दे, सत्य की तरफ तू अपने को मज़बूत कर दे तो तेरा एक ही सब कुछ काफी है। एक से एक निकलेगा, दो हो जाएँगे। दो से दो निकलेंगे, चार हो जाएँगे। इसी प्रकार सच्चाई multiply होती जाएगी और संसार खुशहाल हो जाएगा। शाद रहो, आबाद रहो। खुद खुश रहो और संसार को खुशहाल करो। यही आशीष है धनतेरस की।


।। है ही भगवान ।।

॥ परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ॥

डि॒यारी ! डे॒ सबनीखे यारी। डि॒यारी ! डे॒ सबनीखे यारी। तेरी यारी से सबको याराने का, तेरी दोस्ती का, तेरी मोहब्बत का ऐसा नशा लगना चाहिए जो उनके हृदय में कुछ चुभन है तो निकल जाए। उनके दिमाग में बातें हैं, वो निकल जाए। प्यार में दिवाली मनाए और तुझे डि॒यारी की दुआऍं दें। डि॒यारी ! सबनीखे डे॒ यारी। 'ओ यार त मुहिंजो हीय त कैमल कीय त कैमल कीय'।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Diwali"

ज्योती पर्व है ज्योती जगाऍं, गहर तिमिर को दूर भगाऍं। घट में, घर में, विश्व भर में ज्ञान दीप माला सजाऍं। सृष्टी सुंदर करें ! प्रथम दीप जलाए सतगुरु प्रेम का, हर दिन सतसंग नित्य नेम का। गुरु दाता भक्ती-मुक्ती का, हर पग, हर पल कुशलक्षेम का। गुरु दाता है ब्रम्हज्ञान का, ज्ञान के बिना भव-सागर कभी कोई ना तरा। दीप दूसरा प्रभु प्रेम का, अनंत कोटी ब्रम्हांड को देत आसरा। हर पल, हर क्षण बसत साथ सदा।

जब तक दीप ये दो न जले दिल में, घोर अमावस कैसे टले ? दीप पर्व है, दीप जगाऍं, मीठी वाणी की बाती बनाऍं। प्रेम और श्रद्धा के घी में डुबो-डुबोकर नित्य जलाऍं। "मैं हूॅं ज्योति-स्वरुप" यह दीपों की दिप्ती संदेशा लाई है, करें मिलकर स्वागत, दिवाली आई है !

श्री शारदा शरणम् सतसंग के बच्चों के तरफ से, सभी विश्व-वासियों को दीपावली की हार्दिक मंगल कामनाएँ और ढ़ेर सारी बधाईयाँ ! यह दीपों का उत्सव ज्ञान और भक्ती के माध्यम से हमें आनंदमय और सुखमय बनाकर अपनी मंज़िल की ओर आगे बढ़ने का संदेश देता है।

॥ है ही भगवान ॥

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Happy Diwali"

हरि ओम लाल। आज दिवाली है। दिवाली - उसका अर्थ यही है कि देह का दिवाला निकालो, आत्मा में दिवाली मनाओ। भगवान श्री रामचंद्र ने कैसे पहले तपस्या की, फिर दिवाली मनाई। तू भी, कभी कोई बात आती है, मुश्किल है, परेशानी है, सोचो - पीछे दिवाली आ रही है। दिवाली की खुश़ियाँ, वो मेरी है। अपने देह-अध्यास का, पूरे का पूरा ही ड़ेवाला निकाल दो। तू खुश हो जाएगा, अच्छे से दिवाली मनाएगा। घर, प्रकृति, परिवार - सब में प्रेम की दृष्टि रखो। सबको प्रेम करो। कोई एक रहने ना पाए, इतना प्रेम करो। प्रेम ही परमात्मा है, परमात्मा प्रेम है। पटाखे जलाओ, मिठाइयाँ खाओ, खुश रहो।

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"दिवाली का दूसरा दिन - बड़ - न्यारी - बड़"

दिवाली तो आपने first class मनाई। निरइच्छा होके मनाई। माता लक्ष्मी को प्यार करके मनाई। इसके लिए आप सबका thanks! शुक्रिया! अभी आज दूसरी दिवाली है। होशियार। होशियार रहना है। जो भी त्यौहारों पर अपना balance रखता है वो सारे संसार की खुशियों को प्राप्त करता है। Balance खोया, खुशियाँ खोई। कौन चाहता है मैं खुशियों को खो दूँ? कोई भी नहीं चाहता है। लेकिन भूल हो जाती है। खिसक जाते हैं। सतगुरु साथ है, तो खिसकने से बचा लेते हैं। गिरता नहीं है मनुष्य। गुरु की गोदी में पड़ता है। जो गुरु के साथ चलता है, वो कभी गिरता नहीं, वो झोली में पड़ता है।

प्यारे बच्चों, मस्त-मस्त बच्चों, आदर्शी बच्चों, जैसे कल मनाया, जैसे 15 दिन से दिवाली मना रहे हो, बस बाकी आज और कल का दिन। बाद में भी निरइच्छा होना नहीं छोड़ना। अनुभव कर लिया ना, तो इच्छा नहीं की, तो भी आपको सब कुछ मिला होगा। राग़ द्वेष नहीं किया, तो भी मन खुश रहा होगा। तो फिर इन बातों से, हम दि क्यों लगाएँ और ऐसी बातें क्यों करें।

ढ़ावा बॉर, सदोरा बॉर, न राग़ कयो, न द्वेष कयो। न गुस्सो खाओ। मिठाई खाओ। कस्स न खाओ। प्रेम चुस्कयों। चुँस्की लगायो प्रेम जी। बाकी छेयूंजी चुँस्की छाा थिंदी आहे।

प्रेम प्याला गुरु दिया रे साधु।
प्रेम प्याला गुरु दिया।
ओ प्याले मां पित्ती, ना बोतल मां पित्ती।
मुँह त सच्चन संतन जे महफिल मां पित्ती।
मुँह त पित्ती आ, ढाधे प्रेम सा।
ओं ओं प्यारी थन, ढाधे यत्न साँ।

ना अपनी मेहनत भूलो, ना सतगुरु की मेहनत भूलो। बस सदाई खुश रखो खुदको, शाद आबाद रखो। लकीरों के अंदर चलना सीखो। Discipline पकड़ना सीखो। बाकी परमात्मा संभालेगा। डरने की क्या बात जब मैं बैठा हूँ!

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"तीसरी दिवाली - चँढ - दिवाली का चाँद"

चाँद की सबको बधाई भी है, आशीष भी है। दिवालियाँ आती हैं, जाती हैं, खुशियाँ लाती है, तुझे खुश रखती है। तू अपनी खुशी, जो भी मिलती है, दिनों से, त्योहारों से, उसको permanent बनाने की कोशिश कर। Permanent खुशी तब बन सकती है जब तू कहीं अटक न जाए। किस सुख में अटके नहीं। हालत पसंद आए, अच्छी लगे या न लगे, पर अटके नहीं। बस जो सुख कल था वो कल था। आज का नया विचार रखो। अपने सुखों को परमात्मा के प्रेम का colour लगाओ। तभी तेरी खुशियाँ चार चाँद बन सकती है।

हरवक्त अपनी खुशी ढूंढने में तू समर्थ नहीं भी हो सकता है, कहीं ना कहीं रंजिश आ भी जाए, लेकिन तू सबकी खुशी, सबके लिए प्रेम लेकर जब संसार में चलता है, तो तू खुद भी खुश हो ही जाता है। ऐसा खुशी का निशाना ढूंँढो और सदा खुश रहना सीखो, मुस्कुराना सीखो। इसी प्रकार रोज़ तेरी दिवाली आए और चाँद आए, दिवाली पूरी हो जाए। खुशी-खुशी आए, खुशी-खुशी पूरी हो जाए। फिर सतगुरु की दिवाली शुरु है, जो हर रोज़ होती है, हर दिन होती है, हर घड़ी होती है। हरवक्त दिवाली, हरवक्त होली, हरवक्त हर खुशी है बाबा। जब आशिक मस्त फकीर बना तो फिर क्या दिलगिरी है बाबा।

।। है ही भगवान ।।

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन॥

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो। निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो। ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी, तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

है ही भगवान

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन॥

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो। निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो। ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी, तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

है ही भगवान

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो। निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो। ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी, तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

है ही भगवान

 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन॥

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो। निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो। ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी, तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

है ही भगवान

।।परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एकादशी"

 

आज एकादशी का दिन है , बोलो कृषण भगवान की जय। एकादशी मैया की जय। गौ माता की जय।दादी भगवान की जय। वैसे  तो मन की शुद्धि के लिए दादी भगवान के वचन बहुत है, पर जब मन शुद्ध होने लगता है पर तन की तरफ ध्यान देता है कि मैं शुद्ध हो गया तन को पीछे क्यों छोड़ूं, उस को भी क्यों छोड़ूं ,तन की शुद्धि की लिए व्रत, नेम टेम सही है,अच्छे है, तेरी तंदुरुस्ती के लिए भी व्रत, नेम टेम ज़रूरी है , अपने में आल राउंड बनों, हर बार प्ले करो, खुद को गुरू के वचनो से, आदर्श से सुन्दर बनाओ और अपने संसार समाज को भी सुंदर बानाओ, जब तू आल राऊंडर बनेगा तभी तू सूंदर बना सकता है, मन की शुद्धि के लिए ज्ञान और तन की शुद्धि के लिए व्रत रख, नेम् रख, मंदिर में भी जा लेकिन भगवान देख, इच्छा न कर, आशा कर । इच्छा में ज़िद्द है आशा में प्रेम है, इच्छा में तू रजा में राज़ी नही रह सकता जो तेरे ज़रूरी है पर आशा में तू रजा में रा जी रह सकता है इसी लिए अपनो उसुलो और अधर्श को सत्य की तरफ सत्य के मार्ग में लगा दो और तन मन में ब्रहम सुवरुप देखो , तन मन की शुद्धि के लिए पुरषार्थ करो ।

 

।। है ही भगवान ।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"Gurunanak Jayanti"

आज गुरुनानक जयंती है। जो भी गुरु के आदर्शों पर मर-मिटता है, वही सुखद जीवन का अधिकारी होता है। याद करो गुरुजनों की कुर्बानियाॅं। सभी बादशाहियों पर ध्यान धरके बोलो, ध्यान धरके देखो कि कितनी कुर्बानी सभी ने की है, क्योंकि हम सब उनके बच्चे आतम निश्चठ बने।

दादी भगवान को भी देखो, उन्होंने जो कुर्बानी की, क्यों कि ? क्योंकि आतम-निश्चय ही हमारा जीवन है। सुजागी में रहना, सुजाग होकर चलना भी हमारा कर्तव्य ही है। धीरज धरके मनुष्य अगर देखेगा तो खुद की गलतियाॅं खुद को ही मिल सकती है और आगे के लिए तू अभूल आत्मा बन सकता है।

।। है ही भगवान।।

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

“गुरु नानक जयंती"

बोल गुरु नानक देव की जय। बच्चों आज गुरु नानक बाबा का दिन है, उसके लिए आप सभी को शुभकामनाएँ, आप सभी को आशीर्वाद है। संत ना होते जगत में, तो जल मरे संसार। संत, पीर-पैगंबर संसार में जब जगत के उद्धार के लिए आते हैं, तो वो जाते नहीं हैं। वो अपने आदर्शों के साथ, अपनी भावनाओं के साथ, जुड़े रहते हैं संसार से और समय-समय पर अपने बच्चों को रास्ता भी दिखाते हैं, सही दिशा देते हैं और प्रेम विश्वास देकर जीवन को संवारते हैं।

उनका आदर्शी जीवन हम सब बच्चों के लिए एक सबक बन जाता है। उसी सबक के सहारे, हम भी संसार में तैरना सीख लेते हैं। सारा जग तारिया। गुरु बाबा ने सारा जग तारीया। मुझको भी तारा, तुझको भी तारा, सारे संसार को तारा। ऐसा मानो और उनकी वाणी में अपने को गुम करो।

आतम रस पीयो और पिलाओ। जो उनका रस है, वो रस पहचानो, चख्खो और सबको पिलाने का तू भी मार्ग चुनले। निष्काम राहों का मार्ग चुननेवाला जिज्ञासु हर वक्त अपने सतगुरु के आदर्शों के सहित रहता है। इसीलिए तू भी एक आदर्श लेले और उसी में अपने जीवन को डालते जा। जब तू अपने सतगुरु के आदर्शों पर चलेगा, तो ही तू अपनी लगन से ऊपर उठके परमात्मा में लीन हो सकता है।

।। है ही भगवान ।।

  पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन 

"जय माँ दुर्गे"

आज माँ दुर्गा के नवरात्रों के आरंभ हो रहे हैं। प्रेम से बोलो माता दुर्गा की जय। देवी रानी की जय। माँ दुर्गा शक्ति का रुप है, भक्ति का स्वरुप है, प्रेम का भंडार है, ज्ञानदात्ता है, ममता मई है, करुणा का सागर है। माँ क्या नहीं हैं ! प्रेम से, भक्ति के दिन हैं, भक्ति करो।निस्वार्थ भक्ति करो, निष्काम होके रहो, प्रेम में विश्वास रखो, माँ की ममता में विश्वास रखो। भक्ति को ज़ोर करो।ज्ञान भी तेरा भक्ति के सिवाय अधुरा है, इसीलिए ज्ञान सुनते हो, समझते हो, जिज्ञासु हो, तो भक्ति के दिनों में भक्ति भी,  तेरा हक भी बनता है, तेरा फर्ज़ भी बनता है, प्रेम भी बनता है तेरा, लक्ष्य भी बनता है तेरा। इसीलिए allround बनो और अपना जन्म, अपना जीवन सफल करो।

 है ही भगवान 

।। परम पूज्य सतगुरु श्री दीमाँ भगवानजी के अमृत वचन ।।

"एकादशी"

आज एकादशी का दिन है । बोलो कृष्ण भगवान की जय । एकादशी मैया की जय, गौ माता की जय, दादी भगवान की जय ।

वैसे तो मन की शुद्धि के लिए दादी भगवान के वचन बहुत हैं, पर जब मन शुद्ध होने लगता है, तो तन की तरफ भी ध्यान देता है, कि मैं शुद्ध हो गया, तन को पीछे क्यों छोड़ूं, इसको भी शुद्ध करूं ।

तन की शुद्धि के लिए व्रत नेम टेम सही है, अच्छे हैं । तेरी तंदुरुस्ती के लिए भी व्रत नेम टेम अच्छी हैं, जरूरी है । अपने में all round (ऑल राउंड) बनो हर part play करो । खुद को गुरु के वचनों से, आदर्शों से सुंदर बनाओ और अपने संसार और समाज को भी सुंदर बनाओ । जब तू all-rounder (ऑलराउंडर) बनेगा तभी तो सुंदर बना सकता है । मन की शुद्धि के लिए ज्ञान और तन की शुद्धि के लिए तू व्रत रख, नेम रख, मंदिर में भी जा, लेकिन भगवान से इच्छा न कर आशा कर ।

इच्छा में ज़िद्द है ।आशा में प्रेम है । इच्छा में तू रज़ा में राज़ी नहीं रह सकता, जो तेरे लिए जरूरी है । पर आशा में तू रज़ा में राज़ी रह सकता है । इसीलिए अपने उसूलों, आदर्शों को, सत्य की तरफ, सत्य के मार्ग में लगा दो और तन मन में ब्रह्म स्वरूप देखो । तन मन की शुद्धि के लिए पुरुषार्थ करो ।

।। है ही भगवान।।